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Thursday, 30 July 2026

अपनी अपनी दुनिया

गोयल साब अंदर आए और अपने जूते खोलने लगे। आपको शायद पता नहीं है की ये वही जूते हैं जो 'वॉक' पर जाने के लिए छोटे बेटे ने अमरीका में दिलवाए थे। पूरी दोस्त मंडली में किसी के पास नहीं हैं ये अठारह हजार वाले जूते। 

हाथ मुंह धोया और किचन में चाय बनाने की तैयारी करने लगे। उन्होंने सोचा संध्या चाय तो कम ही पीती है पर पूछ ही लेता हूँ, अच्छा इम्प्रैशन पड़ेगा। और अगर नहीं पूछा तो तुनक जाएगी। 

- सुनो चाय बना रहा हूँ पियोगी?

- रहने दो। जब पीनी होती है तब तो तुम नज़र नहीं आते। 

- अरे जरा दस मिनट के लिए सैर करने गया था रामेश्वर एंड कंपनी के साथ।  

- संध्या की कंपनी पसंद नहीं आती ना ? जितनी ज्यादा सैर कर रहे हो उतने ही गोलमटोल होते जा रहे हो। 

गोयल साब खीज कर बड़बड़ाए - क्या मुसीबत है! पर लफ़्ज़ जबान पर नहीं आ पाए अंदर ही दफ़न हो गए। 

गोयल साब बैंक में क्लर्क लगे थे और जनरल मैनेजर रिटायर हुए। जब बैंक ज्वाइन किया था तो जैसी कि कहावत है: हीरे की कदर जौहरी ही जानता है, गोयल साब की पहचान उनके होने वाले ससुर जी ने कर ली थी। ससुर जी उस वक़्त बैंक में खुद जनरल मैनेजर थे और अपने जमाई राजा को प्रमोशन और अच्छी पोस्टिंग दिलाने में मदद करते थे। ये बात संध्या और हमारे गोयल साब, दोनों ही अच्छी तरह जानते थे। 

ये बात संध्या जी की सहेलियां भी जानती थीं, क्यूंकि कभी कभी तैश में आकर संध्या बोल पड़ती थी:

- इनके घर था क्या ? कुछ भी नहीं। ये तो पापा का ही आशीर्वाद है - प्रमोशन हो , पोस्टिंग हो या घर का गोल्ड, सब कुछ पापा के परताप से तो है।

पर गोयल साब इसकी चर्चा कभी नहीं करते थे। और क्यों करें ? बैंक के दोस्त यार तो टांग खिंचाई से बाज नहीं आते थे। पर अब रिटायर हो गए तो कोई जिकर नहीं करता। कर भी दे तो अब क्या फर्क पड़ता है। बैंक पीछे रह गया और ससुर जी आगे निकल लिए। हाँ अगर संध्या ये बात छेड़ दे तो उनकी कनपटियां लाल हो जाती थीं पर बोल नहीं पाते थे। बस शीत युद्ध शुरू हो जाता था। अब इस युद्ध के फिर बढ़ जाने की आशंका थी क्यूंकि बड़ी बिटिया और बड़े जमाई राजा बैंगलोर से आने वाले थे। 

बिटिया और जमाई के लिए संध्या तो बस न्योछावर ही हो जाती थी। खाने में, कपड़ों में या फिर घूमने में, दोनों जमाईयों को क्या पसंद है क्या नहीं, सब पता था। उधर गोयल साब कसमसाते हुए अपना बजट देखने लग जाते थे। ऐसे में अक्सर तलवारें खिंच जाती और म्यान में वापिस जाने में देर लगती। 

पिछली बार बड़े जमाई ने मसूरी का नाम लिया तो संध्या ने झट गाड़ी की चाबी पकड़ा दी। साब के कान में फूंक मार दी - कुछ पैसे बिटिया के हाथ रख दो दोनों घूमने जा रहे हैं। दिल पे हाथ रख कर साब ने संध्या को पर्स पकड़ा दिया। खाली होना था, हो गया। बिटिया और जमाई दोनों कमाते हैं, पर पेट्रोल के पैसे सुसरा गोयल देगा। बदले में क्या मिला -  "पापा ये मसूरी में आपके लिए ना इन्होंने गरम जुराबें पसंद की थी !"   

गाड़ी वापिस आई तो भी साब पर्स भर के वर्कशॉप में सारा दिन बैठे गाड़ी ठीक कराते रहे। वहां भी पर्स खाली हो गया। बैंक में रहते हुए बात और थी ,पेंशन में कुछ और, ये बात संध्या को कौन समझाए? इस बार तो बिटिया के साथ जमाई राजा और जमाई जी की अम्मा भी पधार रही हैं। जाहिर है की अब हरिद्वार, ऋषिकेश के भी ट्रिप लगेंगे।

हर हर गंगे 
गाड़ी हरिद्वार पहुंची और पाँचों ने घाट में डुबकी लगाई। उसके बाद घाट के पास ही एक 'मशहूर ढाबे' में गरमा-गरम आलू पूड़ी का मज़ा लिया। घर वापिस पहुंचे तो सब विश्राम के मूड में थे। लेटते ही संध्या ने साब से शिकायत कर दी - 

- ये पूड़ियाँ खा के तो मेरा पेट खराब हो गया है। उलटी ना आ जाए ? हे भगवान् !

- तुम्हें पिछली बार भी यही शिकायत हुई थी। पता तो है फिर क्यों खाई पूड़ियाँ ? 

- हुंह तुम चुप रहो जी। 

- अब चूरन दूँ? या पहले वाली गोली। 

- गोली दे दो और इस बारे में बात नहीं करना समझे ! चाय का टाइम हो गया है? हे भगवान् ! 

- अरे तुम लेट जाओ और दरवाज़ा बंद कर लो। समधन को मैं चाय वाय पिला देता हूँ ! 

- हूँ संध्या को ना पिलाना पर समधन को जरूर पिलाओगे ! 

गोयल सा ने बिटिया से मदद ले कर चाय का बढ़िया बंदोबस्त कर लिया। समधन जी को कह दिया कि संध्या थक कर सो गई है। पर शाम को संध्या को छोटी बिटिया का फोन आ गया कि वे भी एक रात के लिए सबसे मिलने आ रहे हैं। फोन रखते ही आँखों के सामने घूमने लगा घर का इंतज़ाम - फल, सब्जियां, किचन और बिस्तर वगैरह सब ठीक ठाक करने पड़ेंगे। गोयल सा के बस का तो कुछ हैं नहीं सब कुछ मुझे ही देखना पड़ेगा। झटपट लिस्ट बनानी शुरू कर दी और साब को बाज़ार दौड़ा दिया। साब अपनी गाडी में ढेर सारा सामान ले आए पर भुनभुनाते हुए क्यूंकि शाम की ड्राइविंग करना मुश्किल हो गया था। 

अभी वापिस लौटे ही थे कि अगली लिस्ट भी तैयार मिली। बच्चों को वापसी के समय क्या क्या देना है इसकी लिस्ट संध्या ने बना ली थी बोली,

- इसके लिए तो मैं कल आपके साथ चलूंगी। अपने कार्ड वार्ड सारे रख लेना, बाजार में जा कर ये नहीं कहना की कार्ड तो मैं भूल ही गया। 

- हूँ, गोयल सा ने जवाब दिया। मन ही मन हिसाब लगाया कि इस महीने की पेंशन बचने की कितने % सम्भावना है?

खैर साब सबकी बिदाई हो गई, गिफ्ट दे दिए गए और उसके साथ ही गहमा गहमी ख़तम हो गई। अगले दिन संध्या का विश्लेषण शुरू हो गया - समधन ऐसी है वैसी है, जमाई नंबर 1 ऐसा है वैसा है, जमाई राजा नंबर 2 ये कहता है और वो कहता है। हमने जो खातिरदारी की है उसका जवाब नहीं है, गिफ्ट भी एक से एक बढ़ कर दिए हैं याद करेंगे। 

जवाब में गोयल सा ने कहा - हूँ, हाँ, वो तो है, सही है, बिलकुल, इत्यादि। पर मन में उनका अपना ही हिसाब किताब चल रहा था। नौकरी में होते तो खाता फुल रहता था - चाहे महीने की पहली तारिख हो या आखिरी। 

दोनों थके हुए थे इसलिए जल्दी ही डबल बेड पर लेट गए। थोड़ी देर तो संध्या का विश्लेषण जारी रहा पर फिर आवाज़ धीमी पड़ने लगी। दोनों ने करवट ली और एक दूसरे की ओर पीठ कर ली। गोयल सा अपनी और संध्या अपनी ख़याली दुनिया में खो गए। 


Friday, 10 April 2026

आखरी लोन फाइल

 


किस्सा ख़तम !

हमारे गोयल साब चिंता में डूबे हुए थे; लोन करूँ या ना करूँ ? नौकरी के बस आखरी आठ महीने रह गए थे और गोयल सा किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहते थे। कहीं जाते जाते बैंक प्रेम-पत्र न थमा दे कि ये लोन क्यों किया ? चाय की चुस्की लेनी चाही तो पता चला कि चाय ठंडी हो चुकी थी। घंटी मारी और दूसरी चाय मंगाई। 

फिर लोन फाइल उठा ली और पन्ने पलटने लगे। लोन के कागज़ों में से कविता की फोटो बोल रही थी: "अरे मिस्टर गोयल क्यों सोच में पड़े हो ?  ढाई करोड़ का ही तो लोन है कर दो 'यस'। आपकी कलम चलने का इंतज़ार कर रही हूँ मैं !" असल में तो कविता कहना चाहती थी "ओ टकले खूसट जल्दी कर दे!"

इधर गोयल सा मन ही मन बोल रहे थे : "हे सुंदरी तुझे लोन तो दे दूँ पर फंसा ना देना। ये तेरे साथ जो कनकौवा विक्रम आ जाता है वो मुझे विक्रम कम और बेताल ज्यादा लगता है। बात सीधी-सीधी न करके पहेली बुझाता है। और पहेली सुलझाने का टाइम मेरे पास है नहीं।" 

तभी गोयल सा के दिमाग में आईडिया आया क्यों ना अपने नए अफसर मनोहर नरूला को इस विक्रम की खोज खबर लेने के लिए भेजा जाए ? नरूला की रिपोर्ट देखते हैं क्या आती है तब तक कविता और विक्रम की लोन फाइल को ठन्डे बस्ते में रख दिया जाए। 

पहले आपको गोयल सा से और फिर मनोहर नरूला उर्फ़ मन्नू से मिलवा दिया जाए। हमारे गोयल सा, झुमरी तलैय्या बैंक के मुख्य प्रबंधक हैं। जल्द ही रिटायर होने वाले हैं पर उनके सिर के बाल रिटायर हो चुके हैं। कान से कान तक सफ़ेद बालों की छोटी सी झालर बची है, शिखर पर चार पांच बाल सलामत हैं जो पंखे की हवा में मस्त लहराते हैं। गोयल साब बियर के शौक़ीन हैं और शायद इसलिए पेट काफी बढ़ा हुआ है। बैंक की दी हुई लाल टाई पेट पर विश्राम करती रहती है। अपनी पत्नी संध्या के बार बार कहने के बावजूद कोई सैर या कसरत नहीं करते। क्या ज़रुरत है ? 

मनोहर नौजवान अफसर है और दो साल पहले बैंक ज्वाइन किया है। रहन सहन और बातचीत का देसी इस्टाइल है - भई बैंक का भी बेरा ना है. मेरठ वाले को बीकानेर भेज दे है और लखनऊ वाले को मेरठ। यो एच आर डी वाले कुर्सी पे बैठे बैठे पोस्टिंग की जलेबी बना देवे हैं। पर हमें ना फर्क पड़े क्यूं जी ? इब घरआली तो है ना, जहाँ मर्जी भेजो झोला तैय्यार है ! 

इतने में चपड़ासी आ कर बोला, - साब याद कर रहे आपको। 

मन ही मन मनोहर बोलै -  घणा अच्छा काम कर रहे साब। कोई छोरी तो याद करती ना है यो टकला ही याद करे है ! केबिन में पहुँच कर बोले - जी सर जी ? 

गोयल सा बोले - मनोहर जी ये लोन फाइल कई दिनों से पड़ी है इसे पढ़ लो। एक बार इस पार्टी के घर और फैक्ट्री में विज़िट कर लो और फिर अपनी रिपोर्ट दे दो। एक हफ्ते का टाइम है आपके पास, बस अच्छी तरह से चेक कर लेना।    

- जी सर जी। पूरी खोज पड़ताल कर दूंगा सर जी। 

गोयल सा का मन थोड़ा शांत हुआ। शाम को घर जा कर बियर खोली और संध्या से बतियाने लगे। आखरी लोन फाइल के बारे में भी बात चल पड़ी। संध्या बोली - देखो जी ज्यादा टेंशन मत लो और शांति से अब बैंक को नमस्ते करो और रिटायरमेन्ट पार्टी करो। एक नई गाड़ी ले लो और बस फिर दोनों भारत दर्शन करने चलते हैं। कुछ टाइम बैंगलोर में बच्चों के साथ भी बिता लेंगे। 

गोयल सा ने जवाब दिया - हूँ। 

गोयल सा अनुभवी इंसान थे, न तो पत्नी की बात काटते थे और न ही बहस में उलझते थे। वर्ना दो तीन दिनों के लिये हुक्का पानी बंद होने का ख़तरा हो जाता है। उन्हें याद आया कि सुंदरी की लोन फाइल ले कर जब वो उसके घर गए थे तो सुंदरी ने भी ऐसा ही सवाल पूछा था -  सर आप रिटायरमेंट के बाद क्या करोगे ?  तो उनका जवाब था -  सोच रहा हूँ एक गाड़ी ले कर संध्या के साथ भारत दर्शन करने निकल जाऊँगा। आज संध्या ने भी वही बात कर दी। 

ख़ैर साब सोमवार को मनोहर अपनी रिपोर्ट ले कर केबिन में आ गया। 

- सर जी ये रही लोन फाइल और मेरी रिपोर्ट।  

- हूँ।  अरे पहले जबानी तो बता दो के किस नतीजे पर पहुंचे- हाँ या ना, फिर पढ़ भी लेता हूँ,  गोयल सा बोले। 

- सर जी आप तो पेंशन लो, मैडम जी के साथ घूमो फिरो क्या करना है लोन कर के ?  दिल की बात बता रहा हूँ सर जी कि यो विक्रम गुप्ता ठीक बंदा ना है। जब मैं इस लोन पार्टी के घर पंहुचा तो विक्रम ने फौरन बोतल खोल दी। सर जी दो पेग तो हमने भी खेंच लिए। बस उसके बाद तो विक्रम लगा फेंकने लम्बी लम्बी। पैसा ऑफर करने लगा और साथ ही बताने लगा के तुम नहीं करोगे तो कोई और बैंक कर देगा। तो सर जी लुब्बो - लुबाव ये कि दूसरे बैंक में जाता है तो जाने दो ! किस्सा ख़तम।    

- हूँ। 

- तो सर जी मेरी बोतल पक्की है ना ? 

-  हूँ ?

- थैंक यू सर जी थैंक यू !   

घर पहुंच कर गोयल सा ने संध्या को सारी बात बताई कि आखिरी लोन फाइल कैसे बंद कर दी। संध्या बोली, 

- चलो टेंशन ख़तम हुई। पर मेरी गले की चेन अब आपको देनी पड़ेगी ! 

 

   


Tuesday, 14 May 2024

इलेक्शन ड्यूटी

झुमरी तल्लैय्या शाखा के मुख्य प्रबंधक गोयल साब हिसाब किताब करने में मशगूल थे. बड़े बैंक की बड़ी ब्रांच के बड़े मुखिया हैं गोयल सा. सात महीने रह गए थे रिटायर होने से पहले पेंशन पेपर तैयार करवाने हैं और जितने लोन किये हैं उनका रिव्यु करना है. पता नहीं किस लोन फाइल में कोई मरा हुआ सांप निकल आए और हेड ऑफिस नाराज़ हो जाए. इसी उधेड़बुन में पिछली पॉकेट से छोटी कंघी निकाली और टकले सर पर सावधानी से घुमाई. पांच चार बाल ही बचे हुए थे. पहले तो कंघी से दबे और कंघी हटते ही फिर से खड़े हो गए. और इसके साथ ही अफसर नरूला भी केबिन में आ कर खड़े हो गए. गोयल सा बोले,

- आओ नरूला क्या लाए हो ?

- सर डी एम ऑफिस का हरकारा ये लेटर दे गया है. उसके बाद वहां से फोन भी आ गया की और दो कर्मचारी भेज दें शनिवार को.

- किस लिए?

- सर चुनाव चल रहा हैं न.

- अरे दो तो पहले ही भेजे हुए हैं? कितने और भेजने हैं? फिर तो मैं और आप ही बचे हैं या फिर तीन लेडीज बची हैं वो जाना नहीं चाहेंगी.

- सर वो तो ठीक है पर फोन में ये भी कहा गया था की जरा मेच्योर कर्मचारी भेजें जो स्थिति को संभालने वाले हों न की बिगाड़ने वाले हों. 

- हुंह ?

- सर सबसे ज्यादा मेच्योर तो यहाँ आप ही हैं.

- यू आर राइट नरूला. कभी कभी तुम भी मैच्योरिटी की बात कर देते हो. 

- सर मैं तो हमेशा आपकी मैच्योरिटी की तारीफ करता हूँ. वैसे भी सर शनिवार की छुट्टी है ट्रेनिंग हो जाएगी और संडे को वोट डल जाएंगे.

- ठीक है ठीक है ऐसी ड्यूटी से बचना मुश्किल है. कहाँ जाना है?

- झुमरी हाईवे के पास ही है गांव है सर डाबर खेड़ा. बस वहीं प्राइमरी स्कूल में जाना है सर. 

- तुम आधा घंटा पहले पहुँच जाना और मैं पहुँचा तो ब्रीफ कर देना.

- जी सर जी सर. 

नरूला साब ने तुरंत चिट्ठी बनाई और डी एम ऑफिस में भेज दी. चिट्ठी में लिख दिया:

क्रम संख्या           कर्मचारी का नाम                पदनाम                         मोबाइल नंबर 

1.                       श्री महेन्द्र मोहन गोयल          मु.प्र. ( स्केल IV)            xxxxx 12345 

2.                       श्री मनोहर नरूला               अधिकारी ( स्केल I )        xxxxx 23456  

नरूला साब तो ट्रेनिंग लेने आधा घंटा पहले पहुँच गए. उन्हें लेक्चर हॉल में सबसे आगे बिठा दिया गया और पुछा गया की दुसरे कैंडिडेट गोयल कहाँ हैं? जवाब में नरूला जी ने कहा बस आते ही होंगे. गोयल सा देर से आए, उन्हें पीछे बिठा दिया गया. पीछे बैठे बैठे कसमसाते रहे. ' इस नरुले को आगे बिठा रखा है और मुझे पीछे?'

चाय ब्रेक में गोयल सा ने ट्रेनिंग मास्टर से शिकायत की. मास्टर जी ने जवाब दिया,

- देखिये वो नरूला साब क्लास 1 अफसर हैं जो केंद्रीय सरकार में गज़ेटेड अफसर होते हैं. और आप क्लास IV हैं आपको पीछे ही बैठना पड़ेगा।

गोयल सा ऊँची आवाज़ में बोले - वोट डू यू मीन ?

आवाज़ सुन कर नरूला साब भी आ पहुंचे - क्या हुआ सर क्या हुआ? 

खैर क्लास 1 और स्केल 1 के बारे में ग़लतफ़हमी दूर कर दी गई और गोयल सा का स्टेटस दुरुस्त कर दिया गया. गोयल सा सब से आगे विराजमान हुए. पर मन ही मन तिलमिलाट बनी रही. इधर नरूला साब मन ही मन बोल कर मुस्कुराए - कभी अर्श पर कभी फर्श पर, कभी रहगुज़र कभी दर-बदर ! ( अर्श = आसमान ). 

वोट जरूर डालें 


Wednesday, 21 July 2021

साहब प्रमोट हुए

गोयल साहब ने गाड़ी चालू की और डैशबोर्ड पर लगी शंकर भगवान की मूर्ति पर नन्हें नन्हें बल्ब जगमगाने लगे. तीन बार नमस्कार किया और तीन बार कानों पर हाथ लगाया फिर पहला गीयर लगा दिया. अब यहाँ से बैंक तक दस किमी लम्बे रास्ते पर जितने मंदिर, गुरुद्वारे, पीर पैग़म्बर और पीपल के पेड़ मिलेंगे साहब सभी को नमन करते हुए जाएँगे. चौराहे पर अगर कोई भिखारी मिला तो उसे आज दस का नोट मिलेगा! 

मन में वैसे तो आश्वस्त हैं की आज प्रमोशन हो ही जाएगी पर क्या जाने कोई काली बिल्ली ऐन मौक़े पर रास्ता न काट जाए सुसरी. वैसे तो रीजनल मैनेजर से बढ़िया सम्बन्ध हैं और चेयरमैन के पास नेता जी का फ़ोन जा चुका है और विश्वस्त सूत्रों ने विश्वास दिला दिया है की प्रमोशन पक्की है, पर साहब बड़े बड़े खिलाड़ी पड़े हैं देश में कहीं कोई कन्नी न काट जाए. 

अब पचपन साल की उम्र हो गई है और शायद ये आख़री मौक़ा है प्रमोशन का. गोयल सा का चेहरा गोल है और खुद भी गोल मटोल हैं. बड़ा सा गोल पेट है, सिर के बाल उड़ चुके हैं. दोनों कानों के बीच सफेद बालों की एक झालर है जिस पर कभी कभी काला रंग लेप देते हैं. झालर पर दिन में चार पाँच बार कंघी ज़रूर फेरते हैं. दफ़्तर में ज़्यादातर गोलू या मोटू के नाम से जाने जाते थे. पर ये बात आप प्लीज़ अपने आप तक ही रखें. 

दफ़्तर पहुँचे, केबिन में घुसे और टेबल के शीशे के नीचे रखी हुई भगवान की तीन फोटों पर तीन बार नमस्कार किया और तीन बार कानों को हाथ लगाया. आज का दिन था ही ऐसा - आर या पार!  

तीन बजे रीजनल मैनेजर का फ़ोन आया,  
- गोयल हो गया तेरा काम. लिस्ट निकल गई है.
- थैंक्यू सर थैंक्यू सर. आई टच योर फ़ीट सर! सब आपकी आशीर्वाद है सर. पोस्टिंग भी तो आपने करवानी है सर?
- करवाते हैं.

गोयल सा ने चैन की लम्बी साँस ली और घंटी बजा कर चाय मँगाई. चाय वाले को कहा की भाग कर बढ़िया वाले लड्डू ले आए और सब का मुँह मीठा करा दे. चेहरे पर मुस्कराहट आ गई. मूड बन गया. फ़ोन मिलाने शुरू किये. मीना का फ़ोन बिज़ी मिला, दोनों बच्चों को एसएमएस किए. दोस्तों यारों को ख़बर की. उन्हे इस अंदाज में बताया की ये तो होना ही था. आख़िर काम करने वालों को कौन रोक सकता है प्रमोशन से. जिनकी तरक़्क़ी नहीं हुई उन्हे सांत्वना दी की यार लाईफ़ में ये सब तो चलता ही रहता है, अगली बार सही!

इधर बात केबिन के बाहर निकली और उधर स्टाफ़ केबिन के अंदर आ गया. मुबारक हो, बधाई हो सर, पार्टी कहाँ है सर?, सर आपको तो मिलनी ही थी सर, कहाँ पोस्टिंग होगी सर? बड़ी ख़ुशी हुई सर, वग़ैरा वग़ैरा. एक दम से ज़िंदगी में मिश्री सी मिठास घुल गई. फ़ोन रुक नहीं रहे थे और साहब गदगद हुए जा रहे थे.

डिनर होते होते तक गोयल सा को समझ आ गया की मैं अब वाक़ई बड़ा साहब बन गया हूँ. लगातार फोन का सिलसिला जारी था. अगर मीना पर ध्यान नहीं गया तो क्या फर्क पड़ता है? रात के बारह बजने वाले थे बिस्तर में लेट कर एक बार फिर लम्बी साँस लेकर पूरे दिन का फिर ज़ायक़ा लिया. मज़ा आ गया. मीना की तरफ़ हाथ बढ़ाया पर उसने 'हुंह' करके हाथ वापिस फैंक दिया. फिर ट्राई मारी पर इस बार कर्कश आवाज़ में घोषणा हुई 'क्या है?' गोयल सा ने मायूसी से करवट ली और बड़बड़ाए 'यो न समझे सुसरी'!

शनिवार शाम शानदार पार्टी हुई. बड़े साहब ने दिल खोल कर पी और पिलाई. बारह बजे तक  बिस्तर पर पहुँचे. पहुँचते ही लुढ़क गए.  
मीना ने धीरे से हाथ लगाया और पूछा:
- सो गए क्या?
कोई जवाब नहीं आया. मीना बड़बड़ाई:
- मोटा टुन्न हो गया!  

मीठा लीजिए ना !


Wednesday, 14 October 2020

ब्रीफकेस

बैंक बड़ा हो तो स्टाफ भी ज्यादा होता है. और स्टाफ जिस तरह के समाज से आता है और जिस तरह के बम पटाखे वहां फूटते हैं वही सब कुछ अंदर भी होता रहता है. स्टाफ के आपसी झगड़े, गाली गलौज, हाथापाई भी हो जाती है. कई बार ऐसा भी हो जाता है की किसी कर्मचारी या अधिकारी ने फ्रॉड कर दिया या फिर फ्रॉड कराने में शामिल हो गया. ऐसे में जवाब तलब किया जाता है और जवाब संतोषजनक ना पाया गया तो कचहरी बैठा दी जाती है. फिर वही सब कुछ होता है - मुंसिफ, मुद्दा, मुद्दई, मुद्दालेह और आखिर में सज़ा. 

मुकदमा चूँकि मैनेजमेंट चलाती है तो इन्क्वायरी ऑफिसर मन पसंद चुन लेती है. जिस चार्जशीटेड बन्दे को बैंक प्रबन्धन ने कड़ी सजा देनी होती वहीँ गोयल साब की याद आ जाती थी. गोयल सा केस लंबा खींचना हो या जल्दी  ख़त्म करना हो तो कर देते थे. इन्क्वायरी उलझाए रखने, आरोपी को धमकाने डराने में भी तेज़ थे. मैनेजमेंट के मूड के मुताबिक रिपोर्ट तैयार कर देते थे. कड़ी सजा देनी हो तो रिपोर्ट में ऐसा लिखते की मानो इस बन्दे और इस बन्दे की करतूत के कारण बैंक का दिवाला पीटने वाला है. इसलिए चार्जशीटेड बन्दे को बैंक के बाहर फेंक देना चाहिए. 

गोयल सा enquiry और inquiry में फर्क करते थे. उनका कहना था मैं इन्क्वायरी 'e' से नहीं 'i' से करता हूँ -  'i' याने डंडा! ऐसे धाकड़ इन्क्वायरी ऑफिसर का मुकाबला कौन करे? बचाव पक्ष में बचाव बस कॉमरेड मनोहर उर्फ़ मन्नू भैय्या ही कर पाते थे. छोटे मोटे बचाव अधिकारी तो गोयल सा से खौफ खाते थे और कन्नी काट जाते थे. 

एक बार हमारे मित्र ने किसी मैनेजर को कथित अपशब्द बोल दिए. हमारी जानकारी में ये मित्र अच्छी भाषा का ही इस्तेमाल करता था गलत शब्द नहीं बोला करता था. क्या जाने क्या हुआ होगा? हो सकता है की किसी बात पर मैनेजर साब की पूँछ पर पैर आ गया हो. बहरहाल जब गोयल साब को जज बनाया गया तो जाहिर था सजा सख्त होगी. 

इन्क्वायरी का सातवाँ दिन था. बचाव पक्ष से कॉमरेड मनोहर ने हमारे मित्र के पक्ष में दलील पेश करनी थी. कॉमरेड ने मित्र के कान में फुसफुसाया - देख चार बजे गोयल आएगा. मैं उस के साथ किसी ना किसी बहाने तू तू मैं मैं शुरू कर दूंगा. वो भी ऊँचा ऊँचा बोलने लगेगा. इस बीच जैसे ही उसका ध्यान इधर उधर हो तू उसका ब्रीफकेस ले कर ब्रांच के बाहर भाग जाना. और मेरी वेट करना. बाकी मैं सम्भाल लूँगा. मित्र झिझका और घबराया पर फिर हिम्मत कर के उसने हाँ कर दी.  

गोयल सा आए और आकर राजा भोज की सीट पर विराजमान हुए. मुकदमा आगे बढ़ने के लिए तैयार हो गए. आरोपी मित्र और कामरेड मनोहर नमस्ते कर के बैठ गए. कामरेड ने ड्रामा शुरू कर दिया - क्या सर झूठे केस बनाते हो, जी एम के चमचे हो .....गोयल सा भी भिड़ गए - ये क्या बकवास है? मुझे इन्क्वायरी दी गई है मुझे काम करने दो. बदतमीज़ी नहीं करना वरना मैं देख लूँगा तुमको... 

वार्तालाप ऊँची ऊँची आवाज़ में शुरू हो गई और केबिन का तापमान बढ़ गया. इस बीच कॉमरेड ने मित्र को इशारा किया. मित्र ने ब्रीफकेस उठाया और बाहर भाग लिया. अब गोयल सा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया. फ़िल्मी डायलाग शुरू हो गए. काफी देर तक गरमा गर्मी चलती रही.  

पर ए सी की ठंडक ने थोड़ी देर में गोयल सा को शांत कर दिया और वो बोले - अरे यार मेरा कैश पड़ा हुआ है उस ब्रीफकेस में, गाड़ी की चाबियाँ हैं ऐसा कैसे कर सकते हो आप? सरासर गुंडागर्दी है ये तो! 

जवाब में कॉमरेड मनोहर समझाने लगे- गोयल सा ठण्ड रखो ठण्ड. कॉमरेड ने पानी मंगाया, चाय मंगाई और अंत में आपसी सुलह हो गई. हमारा मित्र बाइज्ज़त बरी हो गया. 

अंत भला तो सब भला. 

गोयल सा का ब्रीफकेस 

Wednesday, 7 October 2020

केबिन में क्रांति

बड़े बड़े बैंकों में छोटी छोटी बातें होती रहती हैं. अब देखिये झुमरी तलैय्या की सबसे बड़ी ब्रांच के सबसे बड़े केबिन में सबसे बड़े साब गोयल जी बिराजमन थे. बड़ी सी टेबल पूरी तरह से ग्लास से ढकी हुई थी. एक तरफ कुछ फाइलें थी, अखबार थी, पेन स्टैंड था और फोन था. सामने तीन कुर्सियां थी जिनमें से एक पर ब्रांच यूनियन के सेक्रेटरी कॉमरेड मनोहर बैठे थे. 

आप तो गोयल साब और कॉमरेड को जानते ही होंगे? नहीं तो हम परिचय करा देते हैं कोई दिक्कत नहीं है. हमारे गोयल सा ज़रा सा सांवले कलर में हैं पर सफ़ेद कमीज़ पहनते हैं, लाल काली टाई लगाते हैं. उनके टकले सर पर दर्जन भर बाल खड़े रहते हैं जो यदा कदा हवा में लहरा जाते हैं फिर वापिस आ कर खड़े हो जाते हैं. हाव भाव में गोयल सा का अंदाज़ कुछ यूँ रहता है - अरे हटो यार तुम्हारे जैसे बहुत देखे हैं. 

कामरेड मनोहर उर्फ़ मन्नू भाई कुछ बरस पहले ही नौकरी में आए हैं. गाँव खेड़े के हैं तो ज़रा हृष्ट पुष्ट हैं. जोर से बोलते हैं. बताते हैं की कभी हम गाय भैंसिया वगैरह चराते थे. वही सब तो आवाज़ अंदाज़ में आ गया है. बुलंद आवाज़ में गजब के नारे लगाते हैं. अब जो जोर से बोलता है वही ना यूनियन का नेता बनता है? कामरेड की भाव भंगिमा यूँ रहती - अबे मानता है की नहीं?     

ब्रांच के केबिन में चीफ सा और कॉमरेड सा की आमने सामने गरमा गरम बहस चल रही थी. मुद्दा था ओवरटाइम. चीफ सा दस घंटे की पेमेंट देने के लिए तैयार थे जबकि कॉमरेड बीस घंटे का ओवरटाइम मांग रहे थे. 

बैंकों का राष्ट्रीयकरण को तीन चार बरस बीत चुके थे. रोज़ नई शाखाएं खुल रहीं थी और नया स्टाफ भी भरती हो रहा था. बैंक जो दरबार-ए-ख़ास हुआ करता था अब दरबार- ए-आम होता जा रहा था . शहर की बड़ी शाखाओं में भी नया स्टाफ पोस्ट किया जा रहा था. इसी ब्रांच में सौ लोग थे अब 110 हो गए हैं. 

बैंक का ख़याल था की ओवरटाइम अब बंद कर दिया जाए क्यूंकि एक्स्ट्रा स्टाफ दे दिया गया है. यूनियन कहती थी दिसम्बर और जून में खातों में ब्याज लगाने का काम एक्स्ट्रा था इसके ओवरटाइम मिलना चाहिए और सबको मिलना चाहिए. 

ब्रांच में बड़े लोन और फोरेन एक्सचेंज का काम भी था और रूसी एम्बेसी का खाता भी. केबिन में अभी बातचीत चल ही रही थी कि एक रूसी महिला और एक सज्जन भी अंदर आ गए.  

कामरेड ने मौके की नज़ाकत देख कर बात ख़तम करनी चाही और खड़े हो गए. बोले - चलो आप पंद्रह घंटे दे दो. 

चीफ साब बोले - नो! दस घंटे. 

कामरेड ने खड़े खड़े थोड़ा और ऊँचे सुर में बोल दिया - पंद्रह घंटे! और यह कह कर मेज़ पर जोर से थपकी मारी. उसी हाथ की कलाई में स्टील का कड़ा पहना हुआ था वो जोर से शीशे से टकराया और शीशा कड़क गया. आवाज़ सुन कर बाहर बैठा स्टाफ भी देखने लग गया. ये दृश्य देख कर दोनों रूसी तुरंत खड़े हो गए और महिला ने सोचा की भारत में क्रांति आरम्भ हो गई है. वो बोल पड़ी, 

революция ( revolution)! और दोनों रूसी केबिन से बाहर भाग लिए. 
गोयल सा भी उछल कर खड़े हो गए. कॉमरेड को लगा काम खराब हो जाएगा सो बोले, 
- सॉरी चीफ साब सॉरी.

खैर जो भी हुआ इस क्रांति का समापन शांतिपूर्ण रहा. क्रांति केबिन के अन्दर ही समाप्त हो गई. 
ओवरटाइम? वो तो दस घंटे में ही संतोष करना पड़ा.  
गोयल सा की ऐतिहासिक टेबल 



Saturday, 3 October 2020

खाली प्याला

बैंक में नौकरी लगे मनोहर को अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे. इम्तिहान देकर नौकरी लगी तो अपना गाँव कसेरू खेड़ा छोड़ कर कनॉट प्लेस पहुँच गए. कहाँ हरे भरे खेत और गाय भैंस का दूध और कहाँ ये कंक्रीट जंगल और चाय और कॉफ़ी. पर फिर भी कनॉट प्लेस की इमारतें, बड़े बड़े सुंदर शोरूम, रेस्तरां वगैरह में मनोहर उर्फ़ मन्नू भैया का दिल उलझ गया. अब वापिस जाना मुश्किल लगता था.

एक बड़ी दिक्कत थी यहाँ इस बैंक में. वो ये की कोई बात नहीं करता था और ना ही कोई बात करती थी. खुद बात शुरू करनी पड़ती थी. चलो आदमियों से क्या बात करणी थी उनें सुसरों को तो छोडो पर कोई सी छोरी भी ना बात करे तो जी में आग लगनी थी के नईं? 

बैंक में आए भी कई महीन्ने हो लिए पर काम भी पूरा ना सीख पाया. लोग सिखाते भी ना हैं जी पता नहीं क्यूँ? ट्रेनिंग में जो सीखा सो सीखा. फिक्स डिपाजिट है, लाकर है, लोन है जितने लोग बैठे हैं कोई ना काम समझाता. काम सीख के उस सीट पे कुंडली मार के बैठ जाँ. भई नया आदमी आया है इसे बता तो दो पर ना नू सोचें की पोल खुल जाएगी. किसी दिन इन सबका पत्ता साफ़ करणा है.

इब आज लोन डिपार्टमेंट में ड्यूटी लगा दी है मैनेजर साब ने. लोन की संध्या मैडम पता नहीं कुछ काम सिखाएगी या वो भी बैरंग वापिस भेज देगी. चलो ध्याड़ी तो पूरी करणी ही पड़ेगी. वैसे संध्या देखने में भली लागे है, जीन वीन पहरे है और जब चले है तो हॉल में टिक टोक चले है, अंग्रेजी भी बोले है थोड़ी घणी. चल भाई डिपार्टमेंट में चलो. आज तो अखबार में 'आज का भविष्य फल' भी ना पढ़ा!

संध्या बड़े अच्छे से मनोहर से पेश आई. उसने लोन फाइलों का काम बड़ी अच्छी तरह से समझाया. जब भी कोई सवाल मन्नू ने पूछा संध्या ने पूरी तरह से समझाया और करके भी दिखाया. मन्नू भैय्या का दिल बाग़ बाग़ हो गया और भैय्या वो गदगद हो गए. चार बजे तक संध्या के फैन हो गए और साढ़े चार बजे बोले,

- संध्या जी मैं दिल की बात कहूँ जी? 

- हाँ कहो.

- आज तक इस ब्रांच में मुझे किसी ने इतने बढ़िया तरीके से काम नहीं सिखाया जितना आपने जी. सब सिखाने के नाम पर टरका देते हैं जी. मैं तो जी आपको दिल से कह रहा हूँ जी रिक्वेस्ट है जी. आपको आज मैं चाय कॉफ़ी या आइस क्रीम जो भी आपकी इच्छा हो, मैं खिलाऊंगा जी.

- हाँ हाँ क्यूँ नहीं. मैं मंगा देती हूँ अभी. बताइये क्या लेंगे आप? 

- ना जी ना! मेरी तरफ से और यहाँ नहीं बाहर बैठेंगे जी.

- अच्छा ठीक है पांच बजे चलेंगे. मेरे एक गेस्ट आने वाले हैं पांच बजे इकट्ठे चलेंगे. 

- थैंक्यू जी. मैं सामने सोफे पर बैठा हूँ जी आप इसारा कर देना. 

सोफे पर बैठे मनोहर जी के मन में सितार, गिटार, बांसुरी, शहनाई और कई तरह की घंटियाँ बजने लगीं. मन कभी नदिया किनारे, कभी बगिया में और कभी आसमान में उड़ रहा था. पर बड़े सावधानी से अपना पर्स निकाल कर चेक किया की नोटों की संख्या में कमी तो नहीं है. बिल का भुगतान हो जाएगा जी. आश्वस्त होकर फिर से सपनों में खो गए मन्नू भाई. सपनों के बीच में काली घटा भी आई पर जल्दी उड़ गई थी. 

पांच बज के पांच मिनट पर देखा तो संध्या अपनी सीट पर खड़ी हुई थी चलने के लिए तैयार और सामने कोई कन-कौव्वा खड़ा हुआ बतिया रहा था. जरूर लोन लेने वाला होगा कमबखत. ये लोन लेने वाले शाम को ही आते हैं. तब तक दोनों काउंटर के पीछे से घूम कर सामने आ गए.

- मनोहर जी चलो कहाँ चलना है? 

मनोहर जी भी खड़े हो गए. कभी संध्या को और कभी कन-कौव्वे को देखने लगे. एक तरफ तो गुस्सा आ रहा था ये कन-कौव्वा बीच में टपक पड़ा. दूसरी तरफ ख़तरा नज़र आ रहा था ये संध्या का भाई वाई ना हो. जो भी हो ये अगर साथ चला तो मज़ा कतई किरकिरा होने वाला है.

- वो...

- मनोहर जी मैं परिचय कराना तो भूल ही गई. ये मेरे मंगेतर हैं युगल किशोर जी और आप हैं मनोहर जी. मनोहर जी आज कहीं ले जाने वाले हैं हमें? 

- वो क्या है संध्या जी आज नहीं, आज नहीं. मुझे कुछ काम याद आ गया है.

दोनों बोल पड़े - चलिए चलिए मनोहर जी चलते हैं?

- आप दोनों घूम आइए जी. मैं फिर कभी चलूँगा, कहते कहते मन्नू भाई का मुंह लाल हो गया. 

दोनों खिलखिलाते हुए निकल गए. मन्नू भाई की प्रबल इच्छा हुई की आसपास कोई गड्ढा हो तो उसमें छलांग लगा दूँ.    

प्याला खाली था और खाली ही रह गया 


Wednesday, 23 September 2020

पेंशनर और बीमा

भारत में उन पेंशनर की संख्या कितनी है जो अपने पूर्व एम्प्लायर से पेंशन लेते हैं? कुल मिला के कितने लोग नौकरी के बाद पेंशन ले रहे हैं? ये आंकड़े इन्टरनेट में खोजने की कोशिश की पर पता नहीं लग पाया. यूरोपियन यूनियन की एक साईट में 2005 से 2050 तक के आंकड़े और भविष्य के ग्राफ वगैरह थे. ऐसा लगता है की यूरोप में जनता और ख़ास कर वरिष्ठ नागरिकों की सेहत पर ज्यादा ध्यान रखा जाता है. भारत में केन्द्रीय, प्रादेशिक और सार्वजानिक प्रतिष्ठानों में अंदाज़न ढाई तीन करोड़ से ज्यादा नहीं होंगे? पता नहीं. आपको पता लगे तो कृपया बताएं. 

इन पेंशनर का स्वास्थ्य सम्बन्धी क्या इंतज़ाम है? फौजी भाइयों के तो अपने अस्पताल हैं, केन्द्रीय सरकार से रिटायर्ड लोगों का अपना इंतज़ाम है. जहां तक रिटायर्ड बैंकर का सवाल है वो अस्पताल की सेवाओं के लिए मेडिक्लैम बीमा पर निर्भर हैं. ओ पी डी सेवा ज्यादातर अपने खर्चे पर ही है. बैंक मेडिकल कॉलेज या अस्पताल या क्लिनिक बनाने के लिए लोन तो दे सकते हैं पर अपने पेंशनर के लिए इनमें कोई व्यवस्था नहीं करते या कर पाते? 

रिटायर होने के बाद क्या सेहत खराब हो जाती है या फिर बेहतर हो जाती है?  इस विषय पर इन्टरनेट पर खोज बीन की पर कुछ पक्का नियम या सिद्धांत हाथ नहीं लगा. फिर ख़याल आया कि विश्व स्वस्थ संगठन की वेबसाइट देखी जाए. यहाँ भी कुछ ख़ास नहीं मिला. पता ये लगा की ये एक जटिल सवाल है की सेहत बनी रहेगी या बिगड़ेगी और इसके लिए बहुत बड़ा और बहुत देर तक चलने वाला सर्वे कराना पड़ेगा. मतलब इस काम पर डॉलर लगेंगे और वो उनके पास हैं नहीं फिलहाल. पेंशनर की जेब की तरह इनका खज़ाना भी खाली है. 

फिर भी कुछ मोटी मोटी बातें दी हुई थी. अगर रिटायर होने से पहले सेहत अच्छी थी तो वो ज्यादातर अच्छी ही बनी रहती है. हाँ उम्र का प्रभाव तो नकारा नहीं जा सकता. नौकरी में रोजाना की मेहनत, उतार-चढ़ाव और मानसिक तनाव झेलते रहे थे पर स्वस्थ रहे थे तो फिर रिटायर होने के बाद भी स्वास्थ्य ठीक ही रहता है. ऐसे में तो रिटायर होना एक घटना मात्र है. बल्कि ये बदलाव काफी हद तक सुकून भी देता है कि चलो रोजमर्रा की किचकिच और खडूस बॉस से छुट्टी मिली. इसलिए लोग स्वस्थ बने रहते हैं. मतलब की आप दो पेग लगाते थे तो लगाते रहें फिकरनॉट! 

सर्वे में कुछ उदाहरण इसके उलट भी मिले हैं. याने रिटायर होते ही बिस्तर पकड़ लिया. ऐसा ज्यादातर रिटायर होने के तुरंत बाद ही हो सकता है. पर फिर जैसे जैसे समय निकलता है तो इस तरह की घटनाएं नहीं देखी गईं. इसका मुख्य कारण खुद पर से विश्वास घट जाना बताया गया है.

रिटायर हो चुके बन्दे के लिए मानसिक दबाव मसलन पैसा या निजी मकान ना होना या विषम घरेलु स्थिति भी स्वस्थ रहने में बाधक हैं. विकसित देशों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, ओल्ड ऐज होम जैसी सुविधाएँ हैं जो रिटायर होने वाले को आश्वस्त रखती है. हमारे यहाँ वृद्धाश्रम जैसा इंतज़ाम बहुत ही कम है और दूसरी ओर संयुक्त परिवार भी तेजी से घटते जा रहे हैं. वैसे संयुक्त परिवार में बुज़ुर्ग की पूरी देखभाल होती है या नहीं ये एक अलग सवाल है. इसके साथ ही अब औसत उम्र भी बढ़ती जा रही है. मतलब बुढ़ापा लम्बा चल सकता है तैय्यारी रखें.

तैय्यारी में एक तरफ तो सुबह शाम की सैर, दौड़, खेलकूद, योगाभ्यास, साइकिलिंग वगैरह है और दूसरी तरफ डाइट का भी ध्यान रखना है. साथ ही खाते में पैसे भी रखने हैं कम से कम बीमा तो चालू रहे. 

अक्टूबर का महीना आने वाला है और बैंक के पेंशनर को मेसेज आएँगे की मेडिक्लैम के प्रीमियम के लिए खाते में बैलेंस बनाए रखें वर्ना...! बैंक वाली स्कीम में पिछले सालों से प्रीमियम शैतान की आंत की तरह बढ़ता जा रहा है. लगता है एक महीने की पेंशन प्रीमियम की भेंट चढ़ जाएगी. इसी तरह प्रीमियम बढ़ता रहा तो कुछ बरसों बाद दो महीने, फिर तीन महीने की पेंशन ....!

मेडिक्लैमके इस प्रीमियम पर कुनैन जैसा कड़वा जी एस टी का लेप भी है. पता नहीं सरकार ने क्या सोच कर लगाया है? 

इस मेडीक्लैम बीमे में एक और लोचा है. मान लीजिये आप ने पिछले साल कोई क्लेम नहीं किया तो आपको कोई छूट मिल जाए ऐसा नहीं है. बेजान कार के बीमे में इस तरह की छूट मिल जाती है पर जिन्दा पेंशनर को नहीं! पर चलिए ये बात सोच के संतोष हो जाता है की हमें ना सही किसी को तो इस बीमे का फायदा मिला होगा. इस जमाने का यही दान पुन्य है. 

बीमा कम्पनी के अधिकारी जो प्रीमियम की कोटेशन देते हैं, बैंक के अधिकारी जो कोटेशन मान लेते हैं और हमारे यूनियन / एसोसिएशन के पदाधिकारी( मुझे इनके रोल की जानकारी नहीं है और ये भी नहीं मालूम कि ये कहाँ तक दबाव डाल सकते हैं ) भी जानते ही होंगे की उन्हें भी रिटायर होना है? प्रीमियम घटाने पर किसी का ध्यान नहीं जाता. या सब लाल फीता शाही से बंधे हैं जैसा की निचले चित्र में है. 

कुछ ऐसे भी 'नौजवान' पेंशनर हैं जो ये बीमा पालिसी लेते ही नहीं. इनकी बात सुन कर लगता है कि -  

कहते हैं उम्र-ए-रफ़्ता कभी लौटती नहीं, 

जा मय-कदे से मेरी जवानी उठा के ला!

                        - अब्दुल हमीद अदम

व्हाट्सएप्प से लिया चित्र  


Saturday, 5 September 2020

साब की कार

प्रमोशन के साथ ही साथ ही गोयल साब की ट्रान्सफर भी हो गई. अब वो बैंक की झुमरी तलैय्या में सारी ब्रांचों के जनरल मैनेजर बन गए. धूमधाम से स्वागत होने के बाद कुर्सी सम्भाल ली. अगले दिन हेड ऑफिस से फ़ोन आया, 

- सार सुब्रामणियम सार! बहुत अच्चा पोस्टिंग मिला है सार. 

- थैंक्यू .

- एक खुशखबर है सार. मई सोचा पहले मई फोन करेगा सार को. आपको नया गाड़ी का सैंक्शन हो गया सार. नो लिमिट सार. कोई भी गाड़ी ले सकता सार. येनी ब्रांड सार.

- गुड.

- हम आएगा सार मिलने को. भाबी जी का हाथ का पराटा खाएगा सार. थैंक्यू सार.  

तुरंत फैक्स भी आ गया. पर गोयल सा को कार में ज्यादा रुचि नहीं थी. अगले साल ही तो रिटायर हो जाना है फिर बैंक गाड़ी वापिस ले लेगा. फिर भी श्रीमती को फोन पर सूचना दे दी की सुब्बू का फोन आया था. नई गाड़ी मिल सकती है और इस पर मैडम से मुबारक बाद ले ली. जितनी ख़ुशी साब को जी एम बनने पर हुई उस से ज्यादा मैडम को नई कार की बात सुन कर हुई.

फोन रख कर साब ने फिर पिछली जेब से कंघी निकाल कर बालों में घुमाई. अब बाल तो गिनती के ही बचे थे पर फिर भी. फिर टाई ठीक की. टाई भी माशाल्ला बड़े से पेट पर टिक जाती थी तो हिलती नहीं थी. अब आप से क्या छुपाना साब को बियर का बड़ा शौक है, और अगर साथ में कबाब हो तो सोने पर सुहागा. शाम को डिनर पर नई कार की चर्चा तो होनी ही थी. बिल्लू और बहु भी थे वो भी शामिल हो गए.

- मैं तो कहती हूँ नई कार ले ही लो. किट्टी और शौपिंग का मज़ा हम भी तो लें.

- पापा अगर पैसे की लिमिट नहीं है तो बी एम डब्ल्यू ले लो. कनाडा जाने से पहले हम भी मज़ा ले लें.

- यार ये गाड़ी पुरानी थोड़ी हुई है. चलने दो.

- पापा आप भी ! जब एम्बेसडर मिलनी थी तो आप कहते थे स्कूटर ही ठीक है, जब मारुती मिलनी थी तो आप कहते थे एम्बेसडर ही ठीक है और अब और बड़ी चॉइस मिल रही है तो वो ही पुरानी ही ठीक है.

- इनकी सोच तो ऐसे ही रही है बेटे बिल्लू. तू कहेगा तो शायद नई गाड़ी आ भी जाए मेरे कहने से तो नहीं आएगी. और इस बार प्लीज़ गाड़ी पर 'भारत सरकार' ना लिखवा देना. 

- पापा बी एम डब्ल्यू या फिर ऑडी या फिर मर्सडीज़ ? और हाँ इस बार सफ़ेद रंग नहीं चलेगा. 

- चल जो तू कहे!

- वाह वा! पर लखनऊ में ही मिलेगी यहाँ तो कोई शोरूम नज़र नहीं आता.\

- चलो कल मैं अर्रेंजमेंट करता हूँ. अगले दिन साब ने पी ए को बोला हज़रत गंज में सक्सेना से बात कराओ.

- सक्सेना क्या हाल है ? एक काम करो एक बी एम डब्लू कार की इनवॉइस भिजवाओ.

- जी सर जी सर. आप कहें तो मैं लेकर आ जाता हूँ सर. हें हें हें! एक घंटे की तो ड्राइव है बस. कौन सा कलर पसंद किया है भाभी जी ने सर? और सर बिल्लू तो कनाडा चला गया होगा? बहुत होनहार बच्चा है जी आपकी तरह. शादी में मिला था पर बहुत ही मिलनसार लगा सर. सर मेरी ब्रांच की विज़िट भी करनी है सर. 

- हाँ आना है आपके पास. 

- मेरी समझ से सर विज़िट का प्रोग्राम ऐसा रहे की गाड़ी की डिलीवरी भी उसी दिन हो जाए. फिर आप फॅमिली समेत नई गाड़ी में वापिस जाएं. होटल वोटल मैं देख लूँगा सर.

- हूँ. एक गाड़ी खाली आएगी?

- नहीं सर खाली क्यूँ? लखनऊ के चिकन वर्क के कुरते पाजामे भी तो जाएंगे. और सर पिछले दिनों एक बहुत बड़ी डेरी फाइनेंस की है सर. उसके दो एक कनस्तर घी के भी तो भेजने हैं सर. 

सारे काम ठीक हो गए. मैडम और बहु की शौपिंग हो गई, साब की ब्रांच इंस्पेक्शन भी हो गई और दोनों गाड़ियां सही सलामत वापिस घर पहुँच गईं. अगले दिन मैडम ने सुझाव दिया,

- आप आज पुरानी गाड़ी ऑफिस ले जाओ और नई गाड़ी बिल्लू चला लेगा और हम मन्दिर हो आएँगे. 

- हूँ.

मिठाई, नारियल, फूल पत्ते लेकर मैडम, बिल्लू और बहु मंदिर पहुंचे. गाड़ी का तिलक कराया और दान दक्षिणा दे दी. वापिस चल पड़े पार्किंग की तरफ. तीनों खुश थे और बिल्लू कार की तारीफें करता हुआ थोड़ा जोश में आ गया. बैक करते हुए भी बतियाये जा रहा था और पीछे देखा नहीं. गाड़ी धाड़ से रेलिंग पर जा लगी. नीचे उतर कर देखा और बोला,

- अरे कुछ नहीं कुछ नहीं. मामूली सी खरोंच है. नई कार का ब्यूटी स्पॉट है. हें हें हें. पर प्लीज़ आप पापा को नहीं बताना. 

- ओहो! ध्यान से चलानी थी तूने बिल्लू. पापा को पता लगा तो?

- मम्मी उन्हें कहाँ पता लगाता है इन सब चीज़ों का जब तक की ड्राईवर ना बता दे. सुबह ड्राईवर आएगा तो आप मुझे बुला लेना उसको सेट कर दूंगा. फिलहाल तो आप नई गाड़ी में नैनीताल का प्रोग्राम बना लो. 

साहब की नई कार 



Saturday, 25 July 2020

शरबती

बैंक से बाहर निकलते ही तंग सी सड़क आ जाती है. बाएँ चलें तो सड़क के दोनों तरफ मकान दुकानें हैं. यहाँ अगर दो कारें आमने सामने आ जाएं तो आसानी से क्रॉस नहीं कर पाती है. अगर दाहिनी ओर चलें तो खुली जगह आ जाती है. सड़क से मकान पचास पचास फुट दूर हैं और सड़क के दोनों तरफ काफी खाली जगह है. यहाँ गाड़ियां और स्कूटर खड़े रहते हैं. इक्का दुक्का ठेले वाले भी कुछ देर रुक जाते हैं और माल बेचने के लिए आवाज़ देते हैं, 
- आलू-ऊ टमा-टर!
- ताज़े अमरुद! अलाबाद के पेड़े! 
- दरियां ले लो चद्दर ले लो!

पर ज्यादातर मैदान साफ़ मिलता है. बुधवार को यहाँ बाज़ार लगता है उस वक़्त काफी चहल पहल हो जाती है. सामान नीचे जमीन पर या तिरपाल बिछा कर सजा दिया जाता है. या फिर भैंसा गाड़ी, घोड़ा बुग्गी में ही रखा रहता है. दो तीन दुकानें तो लोहे के सामान की होती हैं जिसमें खुरपे, दराती, फावड़े, तसले और टोकरियाँ बिकती हैं. दो तीन दुकानें मिट्टी के घड़े, हंडिया, गमले, चिलम वगैरा की होती हैं,  दो एक सस्ती चप्पल जूते, कपड़ों और सस्ती प्लास्टिक की चीज़ों की होती है. एक दो जड़ी बूटी और मसालों की होती है. गाँव में जिन चीज़ों का प्रचलन है वो सभी यहाँ मिल जाती है. इन्हीं दुकानों में से एक लोहार वाली दूकान में शरबती भी बैठती है या कई बार उसका पिता बैठा होता है. 

छोटा सा क़स्बा है और जनता जनार्दन कम है इसलिए ब्रांच भी छोटी है. अधिकारी,  खजांची और क्लर्क तीनों फटफटिया पर शहर से आते हैं. केवल नरेश चपड़ासी लोकल है. पक्की नौकरी होने के कारण नरेश का यहाँ काफी मान सम्मान है. बैंक में लोगों के खाते खुलवाता रहता है और आस पास के लोन लेने वालों को ढूंढ निकालता है. नरेश ने ही शरबती का खाता खुलवाया था जो अब अपने पिता के साथ शिकायत लेकर आई है. 
- मनीजर साब यो नरेस को म्हारी छोरी ने पिछले महीने एक एक हजार दिए दो बार जमा कराण को दिए. अब लो खाते में ना चढ़े. कई दिन हो गे नज़र भी ना आता, ना बैंक में ना गाँव में. परेसान हो लिए हम तो. आप तो म्हारे पैसे दे दो जी.
- कोई रसीद दी थी उसने? 
- न जी, शरबती बोली.
- तुम खुद जमा करा दिया करो. तुम क्यूँ नहीं करती? 
- ना जी मैं ना आती बैंक. सरम सी लगै.
- अभी छुट्टी पर है नरेश. सोमवार आएगा तो उससे पूछते हैं.
- ना जी हम तो बुध को आएँगे. बजार में तसले फावड़े की दूकान लगती है जी म्हारी. सुसरा कई सामान भी ले चुक्या है उधारी में. उसका भी हिसाब करणा है.

बुधवार को ब्रांच में शोर मच गया. शरबती, उसके पिता और नरेश की खूब गरमा गर्मी हो गई. इस बहस में नया राज़ भी खुल गया. शरबती का पिता गुस्से में नरेश को बोल रहा था, 
- दो हजार नकद अर औजारन के पैसे तुरंतई दे दे या फेर सरबती से सादी की हाँ भर दे. नहीं तो मेरा फावड़ा अर तेरा सिर!
मुश्किल से बीच बचाव कर के छुड़वाया दोनों को. चार बजे नरेश को बुला कर डांट लगाई,
- तुम्हारी वजह से बैंक में शोर शराबा हो रहा है और बैंक का नाम बदनाम हो रहा है. बोलो ससपेंड करूँ या ट्रान्सफर? 
- ना ना साब जी. दो हजार गुप्ता जी से लेकर उसे वापिस कर दिए हैं जी. बाकी भी कल परसों कर दूंगा जी. अब ना सरबती आएगी जी ना उसका बाप. 
- और तुमने जो शादी की बात थी?
- सादी तो जी संतोस से तय हो गई. 
- संतोष से? तुमने तो शरबती को वादा किया था? दो दो  करनी हैं क्या?
- ना साब जी. एकी सादी करनी है जी. संतोस के पास तो मन लगै है जी. 
- और शरबती को भी कह दिया शादी करूँगा ?
- सरबती तो ठीक है लड़की जी. उस के बाप के पास पैसे भी हैं जी पर आदमी ठीक ना है.

वाह गजब का लॉजिक! इस पर चाँद लाइनें याद आ गईं शायद निदा फज़ली की हैं,
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, 
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता. 
बुध बाज़ार

 

Wednesday, 10 June 2020

परफ्यूम

मैनेजर बनने के बाद नरूला साब बधाइयों के मज़े ले रहे थे. जब प्राचीन काल में बैंक ज्वाइन किया था तब तो लगता था कि क्लर्क ही रिटायर हो जाएंगे. परन्तु बैंक ने धड़ाधड़ ब्रांचें खोलनी शुरू कर दी तो प्रमोशन भी थोक के भाव होने लगी. और नरूला साब भी पहले अफसर और फिर मैनेजर भी बन गए. 

नरूला साब मैनेजर बने तो मिसेज़ नरूला का जनरल मैनेजर बनना स्वाभाविक ही था. भई मैनेजर की कुर्सी पर बिठाने में धक्का तो मिसेज़ नरूला ने भी लगाया था! शायद इसीलिए उन्हें ज्यादा बधाइयां मिल रही थीं. उन्हीं के दबाव में साब और मेमसाब दोनों बाज़ार गए. मेमसाब ने कुछ नई शर्ट पैन्ट दिलवा दी, नए जूते दिलवाए और कुछ सफ़ेद रुमाल भी ले दिए. बतौर मैनेजर पहली बार ब्रांच मिलनी थी इसलिए ये सब तो बहुत जरूरी था जी.  

वैसे नरूला साब को शांति पसंद थी जल्दीबाजी बिलकुल पसंद नहीं थी. घर से बैंक के लिए काफी पहले निकलते, स्कूटर भी खरामा खरामा चलाते और ऑफिस का काम भी आराम आराम से करते हैं. बैंक से सीधे घर आ जाते थे. उनकी शौपिंग भी मैडम ही करवा देती थी. अब तो खैर गाड़ी ले ली है पर वो भी धीरे ही चलाते हैं. उन्हें तीन से ज्यादा गियर लगाना पसंद नहीं है. वो बात और है की कोई सिरफिरा रिक्शे वाला टोक देता है - 'बढ़ा ले! बढ़ा ले!'

नई ब्रांच का पहला दिन था. मिसेज़ नरूला ने काजू, बादाम और किशमिश डाल कर हलवा बनाया. अपने हाथ से साब को हलवा खिलाया और एक बड़ा डब्बा पैक भी कर दिया. साथ में हिदायत भी दे दी की स्टाफ को भी खिला देना. चलने के लिए नरूला साब तैयार हुए तो मिसेज़ बोलीं,
- ओहो आपकी परफ्यूम तो ली नहीं! चलो आज तो यही लगा लो, कह कर उन्होंने साब के ऊपर अच्छी तरह स्प्रे कर दी.

ब्रांच में स्टाफ से पहली मुलाकात अच्छी रही. दो महिलाएं भी थी एक ऑफिसर और एक क्लर्क दोनों ने नए साब का स्वागत किया. वापिस घर पहुँचने के बाद नरूला साब ने अपने जनरल मैनेजर को विस्तार से सब कुछ बताया और उनकी तसल्ली हो गई. अगले दिन गाड़ी बैंक की ओर फिर चल पड़ी. लंच टाइम के बाद महिला क्लर्क केबिन में आई और बोली,
- सर आप झुमरी तल्लैया ब्रांच से आए हैं ना?
- हाँ.
- सर मैं भी वहां पांच साल पहले पोस्टेड थी. 
- गुड. मैं तो बस पिछले साल ही था वहां, प्रमोशन हुई तो यहाँ आ गया.
- सर घर में कौन कौन है? 
- श्रीमती है मतलब हम दोनों ही हैं. बिटिया की तो शादी हो चुकी.
- ओके ओके. अच्छा तभी. किरण और मैं आपस में बात कर रहे थे मैंने सोचा आपको बता ही दूँ. सर बुरा तो नहीं मानेंगे?
- नहीं. बोलिए आप.
- सर ये जो परफ्यूम लगाई है न आपने, ये लेडीज़ परफ्यूम है. 
- ओह!
परफ्यूम 


Sunday, 31 May 2020

मीटिंग

नौकरी जब तक नहीं लगी थी तब तक यूनियन के बारे में पता नहीं लगा था. सन 1972 में बैंक ज्वाइन किया तो साथ ही यूनियन का सदस्यता फॉर्म भी भर दिया. भर दिया या भरना पड़ा इन दो में से आपको जो ठीक लगे वो ही मान लें. जब यूनियन की आठ दस मीटिंग अटेंड कर ली तब समझ में आने लगा की ये भी किसी राज दरबार की तरह ही है.

वैसे इस तरह के दरबार हर जगह मिलेंगे - परिवार में, मोहल्ले में, जात बिरादरी में, स्कूल की क्लास में, देश प्रदेश की सरकारों में और धार्मिक संगठनों में. हर छोटे बड़े दरबार का एक मुखिया होता है और उस के अपने चुने हुए नौरत्न होते हैं. राजा साब अकेले काम काज कैसे चलाएँगे? इसके अलावा राजा को दो चार ढंढोरची, खबरची, लठैत, सेवादार वगैरा भी रखने पड़ते हैं ताके कारवाई सुचारू रूप से चलती रहे और कोई सिरफिरा अचानक कुर्सी ना हिला दे. दरबार का आम ढांचा कुछ इस तरह का होता है:
राजा > नौरत्न > सौरत्न > हज़ार रत्न > लाख रेतीले कण > करोड़ धूल भरे कण. 

तो दरबार सजा हुआ था राजा कॉमरेड बोले, 
- कॉमरेड्स अपनी अपनी राय बताओ.

पहला रतन - दशहरा आ गया है जी, आगे दिवाली है और फिर भैया दूज है. आप इस दौरान कोई धरना प्रदर्शन मत रखना. ना ही कोई उम्मीद रखना की कोई धरने में आएगा. मैं ही नहीं आ सकता घरवाली निकलने नहीं देगी. महिला कॉमरेड्स भी नहीं आएंगी. आप दूसरे रतनों से भी पूछ कर देख लो क्या कहते हैं.

दूसरा रतन - सहमत हूँ जी. इस सीजन को खराब थोड़ी ही करना है. बल्कि  यार मैं तो ये सैंपल भी लाया हूँ. यूनियन की तरफ से गिफ्ट बांटने हैं भाई या धरने देने हैं? मेरे अंकल की दुकान का कम्बल है ये. 100 का 85 में और 200 पीस लिए तो 82 के रेट में दे देंगे. यूनियन मेम्बर खुश हो जाएँगे. लो राजा कॉमरेड पास कर दो. 

तीसरा रतन - ओ रुक जा भाई रुक जा! मैं भी एक सैंपल लाया हूँ. राजा कॉमरेड ये स्टील का टिफ़िन 80 में मिल रहा है. ये कैसा रहेगा? चावड़ी ब्रांच में इस पार्टी का अकाउंट है. ज़रा दबाव डालेंगे तो एकाधा रुपया और डाउन कर देगा. बाकी पसंद आपकी है.

राजा कॉमरेड - रुको रुको यार तुमने तो शोर मचा दिया. सैंपल रख दो यहीं अगली मीटिंग में फैसला करेंगे. तब तक दो चार लेडीज़ से बात कर लेता हूँ. घरेलू चीज़ें हैं घरवालियां पसंद करे तो ज्यादा अच्छा है. अच्छा तू बता तेरी ब्रांच से एक लेडी का चन्दा नहीं आ रहा?

चौथा रतन - कॉमरेड उस लेडी से मैं तो कई बार कह चुका हूँ. पर मान ही नहीं रही. एक बार आप कह के देख लो. वैसे उस का हसबैंड सी बी आई में है. मुझे लगता है की ज्यादा बोलने से कहीं मेरा बैंड ना बजा दे.

पांचवां रतन - क्या बात कर रहा है ये? इसे नौरतन क्यूँ बनाया है राजा कॉमरेड? एक लेडी को मेम्बर नहीं बना सकता?
 
राजा साब - पांचवा रतन ठीक कह रहा है. कभी कभी ऐसे लोगों की ज़रुरत पड़ सकती है. आप उस लेडी का और हस्बैंड का दोनों के नंबर देना मुझे. मैं बात करता हूँ.

पांचवां रतन - देखा चौथे रतन? कल को राजा कॉमरेड डायरेक्टर बनेंगे तो सी बी आई की क्लीयरेंस चाहिए की नहीं? सीख ले कुछ!

छठा रतन - एन्नी दूर तों आए हाँ राजा साब कोई समोसा, कोई बियर शीयर.....
राजा कॉमरेड - ओए सबर कर यार ज़रा. जिस मीटिंग में तू नईं आता ना शांति रहती है.  

सातवाँ रतन - हमारी ब्रांच में एक बड़ा लोन प्रपोज़ल आया हुआ है कॉमरेड. बड़ी तैयारी हो रही है.

राजा कॉमरेड - ओ तैयारी के बच्चे पूरी बात बताया कर. कितनी बार कहा है तुझे? कहाँ की पार्टी है, क्या बनाती है, फैक्ट्री कहाँ है? तू बस हैडलाइन बताता है.

आठवाँ रतन - हमारी ब्रांच ठीक है जी. बन्दा रिटायर होने वाला है कोई लोन वोन का चक्कर नहीं. यूनियन की बात पूरी मानता है. नया आएगा तो देखी जाएगी. 

नौंवां रतन - आपका तो नया आएगा तो यहाँ नई आएगी. अब इनकी संख्या बढ़ती जा रही है कॉमरेड. अब इन्हें भी तो यूनियन में लाना पड़ेगा. 

राजा कॉमरेड - अरे छोड़ ना यार. ये जनानियां छुट्टी मांगती रहती हैं, बच्चा बीमार तो छुट्टी, सास बीमार तो छुट्टी, धरने प्रदर्शन में बुलाओ तो आती नहीं. और सुना ब्रांच का हाल तो ठीक है? लो भई चाय भी आ गई और समोसे भी. आनन्द लो. अगली मीटिंग अगले महीने दूसरे शनिवार को. 
मीटिंग 


Wednesday, 6 May 2020

हवा हवाई

गोयल साब ने मुंडी घुमाकर केबिन के शीशे से बैंकिंग हाल में नज़र मारी. तीनों कैशियर बिज़ी थे. बाकी सीटों पर भी दो चार लोग खड़े थे. एक सम्मानित ग्राहक ऑफिसर से गुथमगुत्था हो रहा था पर अभी बीच बचाव का समय नहीं आया था. कुल मिला कर चहल पहल थी अर्थात ब्रांच नार्मल थी. इन्क्वायरी सीट पर देखा तो कोई सुन्दरी खड़ी कुछ पूछ रही थी. बढ़िया सी साड़ी, मंहगा सा पर्स और अंदाज़े-बयाँ देख कर लग रहा था की अंग्रेजी बोल रही होगी.

गोयल साब बैठे बैठे कसमसाए और बुदबुदाने लगे,
- हूँ! ये शर्मा कमबख्त ठीक से जवाब नहीं देगा. टरका देगा या उल्टा पुल्टा बोल देगा. फिर मुझे बीच बचाव करना पड़ेगा. ल्लो भेज दिया सुन्दरी को लोन सेक्शन में. अबे मेरे पास भेजता सुसरे.

गोयल साब का हाथ स्वत: ही पिछली जेब में चला गया और धीरे से उसमें से कंघी निकाली. सर पर फेर कर वापिस रख दी. वैसे तो सर पर बाल बचे ही नहीं थे पर एक कान से कालर तक और कालर से दूसरे कान तक छोटे छोटे बालों की एक झालर बची थी जिस पर काला रंग किया हुआ था. टाई की नॉट को भी दुरुस्त किया. देखने में तो स्मार्ट लगना ही चाहिए. तब तक सुन्दरी को लोन इंचार्ज वर्मा जी ने बिठा लिया. गोयल साब बुदबुदाए,
- शर्मा के बाद वर्मा! नहले पे दहला. बतियाता रहेगा पर काम ये भी नहीं करेगा. देखना अभी अंदर भेज देगा. कहाँ कहाँ से भरती हो गए बैंक में? देखा, इधर को इशारा कर दिया. आ जाओ आ जाओ सुन्दरी हम आपके हर सवाल का जवाब देंगे अच्छी तरह से. घंटी बजाई और कैंटीन बॉय को बोले - अरे दो गिलास पानी ले आ ताड़ा ताड़ी बाद में दो कप चाय भी ले आना! पानी और सुन्दरी दोनों एक साथ ही आ गए केबिन में. 
- पहले मेमसाब को पानी दो भई लेडीज फर्स्ट!
- जी शुक्रिया, सुंदरी स्वीट सी मुस्कराहट लाकर बोली.
- हें हें हें! साब गदगद हो गए बोले,
- आदेश करें.
- लोन के बारे में पूछना था.
- क्यों नहीं. हम बैठे किसलिए हैं? पर पहले आप अपने बारे में बताइये.
- जी मैं उड़नखटोला एयरलाइन्स में काम .....
- ओहो मैं तो कई बार गया हूँ आपकी एयरलाइन्स से. कभी आपसे मुलाकात नहीं हुई? साब बीच में ही कूद पड़े.
- जी जनवरी में इस्तीफा दे दिया था.
- मैनेजमेंट ने आपको छोड़ दिया! कमाल है आपकी लुक्स आपकी पर्सनालिटी देखकर लगता है एयरलाइन्स घाटे में रहेगी. खैर और बताएं.
- अब प्लान बनाया है की लेदर गारमेंट्स एक्सपोर्ट करेंगे. सात लाख का किया भी है. 
- वाह अच्छा प्लान है हमारा भरपूर सपोर्ट मिलेगा आपको? आप करेंट अकाउंट खोल दें और कल आपकी शॉप या वर्कशॉप जो भी है देख लेता हूँ फिर आगे की कारवाई कर लेंगे. लीजिये चाय लीजिये.
- मैं चाय बहुत कम पीती हूँ.
- हें हें हें! यूँ समझ लीजिये कि आज बहुत कम वाला दिन है! लीजिये लीजिये. मैं आपके ऑफिस आउंगा तो आप क्या पिलाएंगी?
- जो आप कहेंगे. एयरलाइन्स की तरह पूरा इंतज़ाम है पर छोटे स्केल पे.
- हें हें हें! गोयल साब ने मन ही मन कहा हवाई सुन्दरी का काम तो करना ही पड़ेगा. बोले, कल शाम की विज़िट ठीक रहेगी?
- जी मैं गाड़ी भेज दूंगी.

शाम की विज़िट भी बढ़िया रही. कुछ सामान तैयार हो रहा था, पैकिंग हो रही थी और आर्डर बुक में आर्डर भी थे. हवाई सुन्दरी गजब की होस्टेस थी. हर चीज़ तरीके से दिखाई गई, बात भी बड़े सलीके से की गई और हाई टी भी शानदार रही. वापस रवाना हुए तो पिछली सीट पर दो स्कॉच की बोतलें, भुने काजू का पैकेट और एक लेदर की जैकेट भी पैक पड़ी थी. साब मुस्कुराए, 
- हें हें हें! चलो ड्राईवर.
अगले दिन वर्मा जी को बुलाया,
- वर्मा जी कल हवाई सुन्दरी का सेट-अप देख कर आया था सब ठीक है. कागज़ पूरे आ जाएँ तो लोन प्रपोज़ल बना देना. मैं ओके कर दूंगा.
- पर सर हवाई सुन्दरी को एक्सपोर्ट का अनुभव तो है नहीं?
- अरे वर्मा जी आपको लोन का अनुभव था जब बैंक में आए? काम तो आते आते ही आता है. दो चार बन्दे रख लेगी और क्या. एक बार हो आओ देख लो फिर अच्छी सी लिमिट बना देना. और महिला उद्यमी वाली स्टेटमेंट निल बटा निल जा रही है उस में रिपोर्ट कर देना. सुसरा हेड ऑफिस भी खुश हो जाएगा समझे. एक हमारी बीवी है जो ज़बान ही चला सकती है कोई बिज़नस नहीं चला सकती.
- सर अभी तो काम शुरू किया है हवाई सुन्दरी ने छोटा लोन कर देते हैं. 
- यहीं तो हिन्दुस्तान मात खा रहा है वर्मा. ज़रा ब्रॉड विज़न रखो, दूर की सोचो ये हवाई सुन्दरी कल को करोड़ों में खेलेगी. देश को डॉलर कमा के देगी. हम और आप तो कलम घिसते रहेंगे.
- सर आप तो रिटायर हो जाओगे जनवरी में मेरी तो अभी सर्विस काफी है इसलिए ख़तरा लगता है.
- वर्मा आप बहुत तरक्की करोगे. बस अपना दिल बड़ा कर लो. फार्मूला बता रहा हूँ लिख लो. हवा का रुख पहचानने की कोशिश किया करो. एक जेब में चार्जशीट लेकर डालते रहो और दूसरी में प्रमोशन लैटर. 
- अरे सर! 
- अरे वरे छोड़ो और हवाई सुन्दरी को मिलकर आओ. फिर बात करेंगे.

पंद्रह दिन बाद लोन हो गया. जब तक साब रिटायर नहीं हुए खाता सही चलता रहा. पर रिटायरमेंट के कुछ समय बाद खाता लड़खड़ाने लगा और फिर बैठ गया. याने एन पी ए. वसूली की कारवाई जारी है हालांकि रफ़्तार ढीलम ढाल है.

विश्वस्त सूत्रों से पता लगा है गोयल साब और हवाई सुन्दरी हवा हवाई हो गए हैं और कुछ दिनों पहले लन्दन में देखे गए हैं.
उड़नखटोला 
   

Sunday, 26 April 2020

माचिस

चंद्रा साब ने ताला खोला और बेडरूम में आ गए. टॉवेल उठाया और इत्मीनान से नहा लिए. चिपचिपे मौसम से कुछ तो राहत मिली. दाल गरम की, एक प्याज काटा और प्लेट में चावल डाल कर डाइनिंग टेबल पर आ गए. एक व्हिस्की का पेग बना कर टेबल पर रख लिया. पर बंद घर में अलग सी महक आ रही थी तो उठकर चार अगरबत्तियां जलाई और तीनों बेडरूम, किचन और ड्राइंग में घुमा दी. अब खाना खाने बैठे और साथ ही श्रीमती को फोन मिला लिया,
- हेल्लो बस अभी पहुंचा और दाल भात खा रहा हूँ.
- गुड. कोई सब्जी भी बनवा लेते. 
- कल देखता हूँ. या फिर वापिस आते हुए कुछ ले आऊंगा. अभी यहाँ के बाज़ार का पता नहीं लगा. 
- बिस्तर कपड़े वगैरा लगा लिए? 
- वो तो कितना टाइम लगता है. आज भी जी. एम. को बोला था की इतनी बड़ा विला लेकर मैं अकेला क्या करूंगा ? बताओ तीन बेडरूम, दो बाथरूम एक ड्राइंग और सब में फर्नीचर लगा रखा है, हाथी जैसा फ्रिज है. मैंने कहा किसी और को दे दो माना ही नहीं. कहता है एक साल तो रहना है आपने उसमें से भी एकाध महीना आप छुट्टी मार लोगे. कंटिन्यू.
- चलो छोड़ो आप तो टाइम पास कर लो. सिक्यूरिटी तो है ना वहां? 
- सिक्यूरिटी? ये कोई दिल्ली की सोसाइटी के फ्लैट नहीं हैं.
- लोग तो रहते होंगे आसपास?
- हाँ हाँ ऐसे चार पांच विला इसी लाइन में हैं. उसके बाद खेत शुरू हो जाते हैं. पांच सौ मीटर और आगे एक बड़ा सा तालाब है. कुछ ज्यादा ही शांति है यहाँ. तू छुट्टी लेकर आजा दोनों इक्कठे हों तो यहाँ हनीमून का मज़ा है हाहाहा !
- अच्छा ! रिटायर होने वाले हो, जुल्फें उड़ चुकी हैं, तोंद बाहर निकल रही है और अब हनीमून याद आ रहा है. छुट्टी नहीं है मेरे पास अभी दो महीने तक नहीं आ सकती. 
- मुझे पता था तेरा जवाब. चल बाय अभी बर्तन धोने हैं.      

चंद्रा साब ने सारे दरवाज़े चेक किये और लेट गए. टीवी अभी लगा नहीं था और पढ़ने का कोई मेटेरियल नहीं था इसलिए आँखें बंद कर के सोने का प्रयास करने लगे. सोए अधसोए चंद्रा साब को लगा कोई बुला रहा है.
- सेठ ओ सेठ !
- कौन ?
- एक बीड़ी देना ! 
- अबे कौन है स्साला ! चंद्रा जी ने तुरंत बिस्तर छोड़ा और आवाज़ की दिशा में जाकर खड़े हो गए. कोई नहीं था पर किचन की खिड़की खुली थी. बंद करके वापिस लेट गए और फिर सुबह ही उठे. साढ़े नौ बजे ड्राईवर आ गया. बैंक जाते हुए ड्राईवर से पूछा,
- दलीप सिंह आप कहाँ रहते हो ?
- सर ये तालाब है ना उसके आगे एक गाँव है साबूवाला. वहीँ से साइकिल पर आ जाता हूँ. 
- किसी दिन चलूँगा आपके साथ.
- सर आप दिन में ही चलना मेरे साथ अकेले मत आना. 
- क्यों ?
- सर जी तालाब के पास ही एक शमशान है. सांझ के बाद जाना ठीक नहीं है जी.
- मतलब ?
- परेत आत्माएं घूमती हैं सर.
- हाहाहा ! तो घूमने दो यार किसी को कुछ कहती थोड़ी हैं.
- नहीं सर वो बीड़ी माचिस मांगती हैं सर ! 
चंद्रा साब सहम गए. 

अगली रात साढ़े ग्यारह और बारह के बीच चंद्रा साब को लगा की किचन की खिड़की के बाहर कोई है. उन्होंने जोर लगा कर ऊँची आवाज़ में बोला, 
- कौन है ? 
- सेठ माचिस दे दे.
- ठहर तेरी तो .....

उस रात चंद्रा साब ठीक से सो नहीं पाए. सोचने लगे अगर जनरल मैनेजर को बताया तो खिल्ली उड़ाएगा कहेगा पहले भी तो इस मकान में चीफ मैनेजर अपनी फॅमिली के साथ रहता था. संतोष को बताया तो डर जाएगी और ना सोएगी ना सोने देगी.  

सुबह सुबह पुराने चीफ मैनेजर को फोन लगाया,
- नरूला साब ये क्या चक्कर है ?
- हमारे साथ भी हुआ था चंद्रा साब. ड्राईवर किसी पंडित को लाया था. फिर पूजा कराई पर दुबारा परेशानी नहीं हुई. 

अगली रात फिर भूत ने पौने बारह बजे माचिस माँगी और गायब हो गया. 

शनिवार को चंद्रा साब ने काउंटर क्लर्क जगत सिंह को बुलाया और पूछा,
- जगत सिंह बिकुल फिट रहते हो आप ! जिम विम जाते हो क्या ?
- हाँ सर फिट तो रहना ही चाहिए.
- शादी हो गई ?
- नहीं सर.
- गुड आप भी बैचलर और मैं भी. आज का डिनर मेरे घर पे. गाड़ी में साथ ही चलेंगे. 
- ठीक है सर.

चंद्रा साब ने ड्राईवर की छुट्टी कर दी. जगत को बैठाया गाड़ी में, बाज़ार से दो टोर्च और दो लाठियां खरीदी. बोतल, चखना और बटर चिकन पैक कराया और घर पहुँच गए. साढ़े दस बजे तक गपशप चलती रही. फिर साब ने जगत को प्लान बताया,
- सवा ग्यारह बजे तुम मकान के लेफ्ट में दीवार के पीछे खड़े हो जाना और मैं मकान के दाहिने छुपा रहूँगा. साढ़े ग्यारह से बारह बजे के बीच किचन की खिड़की से आवाज़ आएगी - सेठ बीड़ी दे दे या माचिस दे दे. बस उसको मिल के झपटना है. ओके ?
- ओके सर ! ये काम तो बहुत मज़ेदार है आपने पहले बताना था.

प्लान कामयाब रही और भूत पकड़ा गया. जगत सिंह के एक ही मुक्के में ड्राईवर ने उगल दिया की उसकी और पंडित जी की ग्यारह हज़ार की कमाई हाथ से निकल गई. उसने झेंपते हुए कहा,
- साब माचिस मिलेगी ? 
साबूवाला का तालाब 

Sunday, 19 April 2020

संतोषी का खाता

गाँव में बैंक की ब्रांच चलाना आसान काम नहीं है वो भी जब ब्रांच हो झुमरी तल्लैय्या की. कई बार गाँव के कस्टमर को अपनी बात समझानी मुश्किल हो जाती है और कई बार गाँव वाले की बात समझनी मुश्किल हो जाती है. इसका कारण कुछ तो अशिक्षा है और कुछ दोनों तरफ के पूर्वाग्रह. बैंकिंग की जरूरतों को सरल शब्दों में समझा पाना कौन सा आसान है ? लेकिन अगर समझा पाए तो सहयोग भी पूरा मिलता है. वर्ना तो दो साल की पोस्टिंग ख़त्म होने का इंतज़ार रहता है. 

बात असल में संतोषी की है जो बैंक में खाता खोलने आई थी. पचीस के आसपास की उम्र होगी शायद. पतली दुबली सी, हरी सलवार, लाल कमीज़ और हरी चुन्नी ओढ़े हुए थी. कपड़े कभी नए रहे होंगे पर अब उन की रंगत उड़ी हुई थी. एक हाथ में पोलीथिन की पोटली में कुछ कागज़ और दूसरे हाथ से एक मुन्ने को पकड़ा हुआ था. दोनों सकपकाए हुए दाएं बाएँ देख रहे थे. गार्ड ने पब्लिक रिलेशन स्किल दिखाते हुआ कहा,  
- के काम सै?
- खाता खुलाना. 
- फोटू फाटू ले रई ?
- हाँ रासन कारड भी अर आधार भी.
- नरूला साब वे बैठे मिल ले. 
नरूला साब के सामने चार ग्राहक और खड़े थे. निपटा कर दस मिनट बाद बोले 
- बताओ क्या काम है ?
- खाता खुलाना जी.  
- फॉर्म भर लोगी ? 
- ना जी 
- अच्छा पहले कागज़ दिखाओ क्या लाई हो ?
नरूला साब ने काग़ज़ गौर से देखे और पूछा 
- ये क्या ? राशन कार्ड में आपके पति का नाम गोपीचंद है और आधार में किशन लाल ? आपके पति का असली नाम क्या है ? अलग अलग नाम होगा तो खाता नहीं खुलेगा, हंसी दबाते हुए जैन साब बोले.
- जी नाम तो गोपी है.
- देखो आधार कार्ड ठीक करा के लाओ तो खाता खोल देंगे वरना नहीं. KYC जरूरी है. ये लो अपने कागज़ सम्भालो.
संतोषी ने कागज़ समेटे और पोलिथिन के लिफ़ाफ़े में डाल दिए. उसके चेहरे पर निराशा छा गई. अब किस से बात करे ? फिर गार्ड के पास पहुंची और शिकायत करते हुए बोली,
- वे तो खाता ई ना खोल रे. 
- के कै रे ?
- नू कै रे पहले आधार ठीक कराओ.
अब गार्ड ने कागज़ देखे और पुछा,
- ये ल्लो ! भई यो किसनलाल और गोपीचंद अलग अलग आदमी हैं तो कैसे खाता खुलेगा. पति का नाम दोनों में एक जैसा होना चाहिए. साब ठीक कै रे खाता ना खुल सके. अपना आधार ठीक कराओ.
थोड़ी देर संतोषी चुप खड़ी रही. कुछ सोच कर गार्ड से बोली, 
- साब से तो मैं कै ना पाई अर तमें सच सच बताऊँ. किसन और गोपी दोनों भाई तो हैं. गोपी मेरा देवर है. एकी माँ के बेट्टे तो हैं. सगे भाई हैं एकी मकान में रहें. कोई फरक ना ए.  
- हाहाहा ! भई तम तो दूसरे बैंक में जाओ और वहीँ खाता खुलवा लो या फेर परधान जी से मिलो. यहाँ खाता ना खुलने का. नाम ठीक होगा तभी खुलेगा. 

अगले दिन प्रधान जी का फोन आ गया,
- साब जी कल एक छोरी गई थी खाता खुलाने पर खाता खोला ही नहीं. क्या चक्कर है ? 
नरूला साब से प्रधान जी की बात करा दी पर प्रधान जी की तस्सली ना हुई बोले,
- साब जी कल बैंक आ के सारी बात बताऊंगा आपको. 

अगले दिन प्रधान जी पधारे. उनके लिए पास वाले गोकुल हलवाई से स्पेशल सेव और लड्डू मंगवाए. प्रधान जी बतियाने लगे,
- मनीजर साब संतोषी जो है उस का असली पति तो किशन लाल है यो सच्ची बात है जी. लड़का जो लाई थी वो भी उसी किशन लाल का है यो भी सच्ची बात है जी. किशन लाल तो जी जंगलात में चौकीदारी करे था. पिछली गर्मी में जब वो ड्यूटी पे गया जी तो पलट के घर नहीं आया जी. पुलिस ने, गाँव वालों ने और परिवार वालों ने पूरा जोर लगा दिया पर मिल के ना दिया जी किशन लाल. ना ही उसकी ल्हास मिली जी. अब पुलिस कै रही जी की सात साल तक का इंतज़ार करो फेर ही केस की फाइल बंद होगी जी.

- अब आप जानो संतोषी की उमर भी ज्यादा ना है और छोटा बच्चा भी है जी. संतोषी के सास ससुर और माता पिता  बैठक कराई थी. यही तय पाया की संतोषी इसी घर में रहेगी और गोपीचंद उसका आदमी रहेगा. जब कभी किशन लाल आया तब की तब देखी जाएगी. उसका कुछ इन्तेजाम तब कर दिया जाएगा. घर की चीज घर में रह जाएगी. संतोषी का बच्चा भी पल जाएगा जी.

- तो मनीजर साब आज की डेट में पति तो है जी गोपीचंद. बाकी जैसे बताओ वैसे कागज़ बनवा देता हूँ. थोड़ा बहुत पैसा संतोषी के नाम पंचायत से डलवाना है जी सो जमा हो जाएगा. 

क्या विचार है आपका खाता खोल दिया जाए ? 
संतोषी के गाँव में 

Wednesday, 15 April 2020

बैंक की छुट्टी कब होती है

भारत विविधताओं से भरा देश है और उसी तरह यहाँ बैंकों की विविधता भी कम नहीं है. केन्द्रीय बैंक - रिज़र्व बैंक और भारतीय स्टेट बैंक के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, ग्रामीण बैंक, प्राइवेट बैंक, लोकल एरिया बैंक, स्माल फाइनेंस बैंक, पेमेंट बैंक और सहकारी बैंक भी हैं. नाबार्ड जैसी बैंकिंग और वित्तीय संस्थाएं और विदेशी बैंक भी हैं. 

इन बैंकों को चलाने के लिए बहुत से नियम, अधिनियम और कानून की किताबें हैं जिनका पालन करना पड़ता है. इनमें एक बड़ा पुराना नियम लिखा है जिसे कहते हैं 'परक्र्याम लिखत अधिनियम' या 'विनिमय साध्य विलेख नियम 1881' या फिर Negotiable Instruments Act 1881( N I Act या सिर्फ एक्ट ).

इस नियम के तहत चेक, प्रामिसरी नोट या बिल की तारीख का बड़ा महत्व है. और तारीख के साथ जुड़ी है बैंक और बैंकर की छुट्टी. अर्थात बैंक में होने वाली छुट्टियों की घोषणा इस नियम के अंतर्गत की जाती है. अब इस नियम को बनाया तो केंद्र सरकार ने पर छुट्टियां लागू करती हैं प्रदेश की सरकारें. छुट्टी की घोषणा जारी की जाती है प्रदेश की राजधानी से. अक्सर देखा गया है की घोषणा करने वाले अधिकारी को बैंक के N I Act की जानकारी नहीं होती. जब तक घोषणा में इस एक्ट का जिक्र ना हो तो बैंक की छुट्टी नहीं होती. 

बड़ा भरी लोचा है ये. इस लोचे का अहसास तब हुआ जब प्राचीन काल में बैंक ज्वाइन किये कुछ दिन ही हुए थे. एक दिन सुबह नौ बजे हमारी GF का फोन आया कि आज छुट्टी डिक्लेअर हो गई है कहाँ मिलोगे ? जी ऍफ़ की नौकरी तब प्रदेश सरकार के महकमें में थी. बहरहाल दिल बाग़ बाग़ हो गया. बैंक जाने की तैयारी तो थी ही फटफटिया में किक मारी और पहुँच गए इंडिया गेट. फिर वहां से पहुंचे बंगाली मार्किट डोसा खाने. पर वहां तो बैंक खुले हुए थे. मारे गए गुलफाम ! एक कैज़ुअल गई और पर्स अलग हल्का हो गया. तब मालूम हुआ कि बैंक की छुट्टी एक्ट के अंतर्गत होती है.

ये तो पुराने ज़माने की बात थी पर ये वाकया यदा कदा हो जाता है. प्रदेश सरकार ने सुबह घोषणा कर दी. अख़बार पढ़ के जब शाखा प्रबंधक को फोन किया जवाब मिला पता नहीं. शाखा प्रबंधक ने अपने क्षेत्रीय प्रबंधक को फोन किया जवाब मिला पता नहीं. स्थानीय स्टेट बैंक को फोन किया तो जवाब मिला पता नहीं आधे घंटे में बताते हैं. तब तक ब्रांच खोलनी पड़ गई. घंटे भर बाद बैंक बंद करने का आदेश आ गया. 

असमंजस की स्थिति तब भी हो जाती है जब किसी बड़े पद पर बैठे मंत्री का निधन हो जाए और उस दिन सार्वजानिक छुट्टी बिना एक्ट के डिक्लेअर हो जाए. अगर एक्ट के अंतर्गत भी हो तो शाखा को समेटने में एक दो घंटे लग ही जाते हैं. 

इसी तरह अगर दिन के दौरान दंगे फसाद होने के कारण  कर्फ्यू लग जाता है तो भी बैंकर की हालत डांवाडोल हो जाती है. ब्रांच सम्भालें या घर भागें ? ब्रांच से निकलने में पुलिस का सहयोग मुश्किल ही मिलता है. बैंक सरकारी होते हुए भी बैंकर गैर सरकारी हो जाते हैं. आजकल कोरोना बंदी में तो कई बैंकर पुलिस के हाथों पिट चुके हैं जबकि जरूरी सेवाओं में बैंकिंग भी शामिल है. 

इन दिनों इसका उल्टा भी हुआ है. कोरोना के चक्कर में घोषित छुट्टी कैंसिल कर दी गई. कैंसिल करने की घोषणा एक्ट के अंतर्गत हुई. कैंसिल करने में प्रदेश सरकार के अधिकारीयों ने कोई गलती नहीं की. आदेश में एक्ट का पूरा नाम छाप दिया.      

इस स्थिति का इलाज करने की जरूरत है. यूनियन और प्रबंधन दोनों को ही इसका इलाज कर दें तो अच्छा है. बैंकर और ग्राहक दोनों को सुविधा रहेगी.

बैंक खुलने का इंतज़ार 

Friday, 26 July 2019

राष्ट्रीयकृत बैंक की नौकरी की

नोटबंदी के बाद बैंक के आगे लगी लाइन 

बैंकों का राष्ट्रीयकरण 19 जुलाई 1969 को हुआ जो उस वक़्त की एक धमाकेदार खबर थी. बैंक धन्ना सेठों के थे और सेठ लोग राजनैतिक पार्टियों को चंदा देते थे. अब भी देते हैं. ऐसी स्थिति में सरमायेदारों से पंगा लेना आसान नहीं था. फिर भी तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी ने साहसी कदम लिया और चौदह बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया. 

दूसरे बैंकों का तो पता नहीं उस वक्त पंजाब नेशनल बैंक की 619 शाखाएं थीं, डिपाजिट 383.4 करोड़ था, लोन 187.3 करोड़ थे और बैंक के मालिकान को 1020 करोड़ मुआवज़ा दिया गया था. 

रिटायर होने के बाद अब पीछे मुड़ कर देखो तो राष्ट्रीयकृत बैंक की नौकरी की कुछ खट्टी मीठी यादें ज़हन में आ जाती हैं. 

चलो गाँव की ओर: राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य था की बैंकों को दूर दराज़ के इलाकों में छोटे किसानों और उद्यमियों की भी सहायता करनी है जिसके लिए बहुत सी नई शाखाएं भी खोलनी थीं. जल्दी जल्दी शाखाएं खुलने लगीं. राष्ट्रीयकृत बैंकों में होड़ लग गई कि कौन कितनी ब्रांचें पहले खोलेगा. बैंकों की सालाना बैलेंस शीट जब अखबारों में छपती थी तो सबसे ऊपर नई खुली शाखाओं की गिनती लिखी होती थी. गाँव खेड़े, कस्बों और शहर के छोटे छोटे बाज़ारों में शाखाएं खुलने लगीं. ऐसी शाखाओं के अजब गजब नाम सुनने को मिलते थे: - अड्डा कोट पतूही, जीरा, पापा पारे!

अब प्रमोशन होने पर गाँव की शाखाओं में भेजा जाने लगा. पता लगता था की उत्तराखंड के एक गाँव में श्री गोयल ने ब्रांच देर से बंद की और घर की ओर चले. अँधेरे में दो चमकती आँखें और बाघ की गुर्राहट सुनी. भाग कर नजदीक की दुकान में घुस गए. सुबह ऑफिस में आ कर पहला काम किया कि वापिस ट्रान्सफर की चिट्ठी लिख दी. 
श्री चावला ने जब राजस्थान में गाँव की ब्रांच में घड़े से पानी लेना चाहा तो देखा कि घड़े के पास सांप बैठा हुआ है. शायद खाता न खुलने के कारण नाराज़ था और फुंकार रहा था. 
एक मित्र की पोस्टिंग बद्रीनाथ में हुई तो लगभग दो साल उसने चढ़ावे के सिक्के गिनकर और मंदिर के प्रसाद खा कर ही गुज़ार दिए. 
एक गाँव की ब्रांच में लोन न देने पर गोली चल गई. 
एक मित्र गाँव की ब्रांच से वापिस ही नहीं आना चाहते थे. कहते थे की यहाँ नौकरानियां बड़ी अच्छी मिल जाती हैं!
जो भी हो बैंकों का कारवाँ चलता ही गया और फैलाव बढ़ता ही गया. 

नौकरियाँ ही नौकरियाँ: जैसे जैसे बैंक अपनी शाखाएं खोलते गए तो और कर्मचारियों की ज़रूरत पड़ने लगी. एक संस्था बना दी गई Banking Services Recruitment Board जो लिखित टेस्ट लेती थी. हमने भी टेस्ट पास कर लिया और इंटरव्यू में हाज़िर हो गए. 
-अच्छा तो आपका नाम हर्षवर्धन है. इस नाम का एक राजा भी हुआ करता था पता है आपको?
- जी सर. हर्षवर्धन 590 AD में पैदा हुआ था और 606 से 647 तक उसने राज किया था. उसकी पहली राजधानी थानेसर थी और दूसरी कन्नौज. उसके पिता का नाम प्रभाकरवर्धन ......
- थैंक यू थैंक यू.
पक्की नौकरी लग गई साब. गाँव कसेरू खेड़ा जिला मेरठ से पंजाब नेशनल बैंक संसद मार्ग शाखा नई दिल्ली पहुँच गए. इसी तरह हजारों हमउम्र लोगों ने उन दिनों टेस्ट पास कर लिया और बैंक में लग गए. ये सिलसिला लगभग पंद्रह साल तक चलता रहा. मेरा अंदाजा है की लगभग पंद्रह लाख लोगों की नौकरी बैंकों में लगी होगी. अच्छी तनख्वाह, जल्दी जल्दी प्रमोशन और दूसरी सुविधाओं के चलते इन सभी लोगों का लाइफस्टाइल ही बदल गया. सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले और साइकिल चलाने वाले लोअर क्लास से मिडिल क्लास में आ गए और कुछ ने अपर क्लास में छलांग लगा दी.

यूनियन बाज़ी: जहां इतने ज़्यादा कर्मचारी हों तो यूनियन का बनना स्वाभाविक ही है. राष्ट्रीयकरण से पहले भी यूनियन थी पर कमजोर थी. अब बड़ी और ताकतवर हो गई. यूनियन में छोटे बड़े बहुत से नेता थे जिनकी अपनी अपनी छोटी बड़ी सल्तनत हुआ करती थी. अपने अपने 'इलाके' में ट्रान्सफर करवाना, सीटें बदलवाना, मैनेजर को 'सेट' करना इनके काम हुआ करते थे. स्टाफ में से कुछ साइड बिज़नेस भी किया करते थे मसलन ट्रेवल एजेंट, धूप अगरबत्ती बेचना, ट्यूशन पढ़ाना, कीर्तन मण्डली चलाना वगैरह. इन लोगों की यूनियन नेताओं से अच्छी छनती थी. 

एक नियम ये भी था कि यूनियन का एक प्रतिनिधि बैंक के बोर्ड में डायरेक्टर बनेगा. ये लालच की पुड़िया झगड़े करवाती थी. डायरेक्टर तो वही बनेगा जिसे कम्युनिस्ट पार्टी चाहेगी और उसके बाद सरकार हाँ करेगी. डायरेक्टर की कुर्सी के उम्मीदवार के चुनाव में जम कर रस्साकशी होती थी. 

राष्ट्रीयकरण से पहले का स्टाफ बताता था कि पहले नौकरी मुश्किल हुआ करती थी. अक्सर रात को घर लेट पहुँचते थे. बल्कि रास्ते में पीछे पीछे कुत्ते भौंकते हुए चलते रहते थे! राष्ट्रीयकरण और यूनियन की वजह से पुराने स्टाफ की भी जून सुधर गई थी!     

लोन बांटो: राष्ट्रीयकरण के कुछ समय बाद 1975-76 के आस पास हुकुम जारी हुआ कि पांच हज़ार तक के लोन बिना किसी गारंटी या सिक्यूरिटी के दिए जाएं. अब मैनेजरों का घबराने का टाइम था. ये कैसे होगा? लोग पैसा वापिस ही नहीं करेंगे. एक रास्ता निकाला गया. लोन तो दे देते पर लोनी के किसी भाई भतीजे की गारंटी साइन करा के फाइल में लगा लेते. उसके बाद मैनेजरों से लिखवाया गया कि मैं छोटे लोन के लिए कोई गारंटी नहीं लूंगा. बमुश्किल छोटे लोन की सिक्यूरिटी बंद हुई. 

हाकिम को खुश करने के लिए लोन मेले लगने लगे. पहले लोन ज्यादातर व्यापारी के गोदाम पर ताला लगाकर और कुछ जमीन जायदाद के कागज़ बैंक में रख कर होते थे. फिर hypothecation आ गया जिसमें माल का कब्ज़ा भी लोनी के पास चला गया. पुराने मैनेजरों को इससे काफी बैचैनी होती थी. पर हौले हौले ढर्रा बदल गया.

कंप्यूटर बाबा: कम्पू बाबा शायद 1996-97 के आसपास प्रकट हुए थे. यूनियन में हल्ला मच गया, हड़ताल हो गई और फिर सबको एक एक स्पेशल इन्क्रीमेंट दी गई और फिर धड़ल्ले से कम्पू लगने शुरू हो गए. काउंटर चाहे टूटा फूटा हो पर उसके ऊपर कम्पू नया होना ज़रूरी था. 

अब फिर से a b c d सीखनी पड़ी. काफी लोगों ने कम्पू के गेम्स जरूर सीख लिए. काउंटर पर बैठे बैठे कम्पू में ताश तो खूब खेली जाती थी. फिर दिसम्बर 2000 के आखिरी रात तक 2K की धूम रही. फिर बाद में CBS का हंगामा शुरू हो गया था जो अब तक ख़तम होता नहीं नज़र आ रहा क्यूंकि इसमें समय समय पर अपग्रेड भी होने हैं और स्टाफ की ट्रेनिंग भी. वैसे अब हिन्दुस्तानी जनता जान चुकी है कि कनेक्टिविटी न होने, कंप्यूटर डाउन होने या सर्वर डाउन होने का क्या मतलब होता है. 

पेंशन नो टेंशन: भई अब तो ज़िन्दगी पेंशन पर गुज़र रही है ये भी काफी हद तक राष्ट्रीयकरण और कुछ हद तक यूनियन के कारण है. खैर 2004 की अटल सरकार के समय से पेंशन बंद हो गई. और अब की सरकार वापिस निजीकरण चाहती है. अब अगर आप पेंशन लेना चाहते हैं तो आप एमपी या एमएलए बन जाएं तो टैक्स फ्री पेंशन ले सकते हैं. 

राष्ट्रीयकृत बैंक की समस्याएँ भी थीं, कुछ यूनियन की थीं और कुछ मैनेजमेंट की पर काम भी हुए और प्रगति भी हुई जैसा की उद्देश्य था. पर साब ये राजरोग कब ख़त्म हुए हैं? ये तो चलते रहते हैं. बहरहाल आजकल के राष्ट्रीयकृत बैंकों में कार्यरत कर्मचारियों और अफसरों को शुभकामनाएं.

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 राष्ट्रीयकरण पर आर के लक्ष्मण का कार्टून जो 19 जुलाई 2019 को नवभारत टाइम्स में पुनः प्रकाशित हुआ