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Sunday, 5 July 2026

पुरातन आंध्र में बौद्ध धर्म

 जब हम बौद्ध धर्म की चर्चा करते हैं, तो हमारी कल्पना में प्रायः बोधगया, सारनाथ, राजगृह और नालंदा जैसे नाम आते हैं। परन्तु यदि कोई पूछे कि भारत में बौद्ध धर्म ने सबसे लंबे समय तक कहाँ अपनी उपस्थिति बनाए रखी, तो जवाब में आंध्र का नाम प्रमुखता से आएगा। गोदावरी और कृष्णा नदियों के तट, अमरावती का महास्तूप, नागर्जुनकोण्डा की पहाड़ियां और अनूपु का शांत बौद्ध विहार परिसर आज भी प्राचीन बौद्ध जगत की याद दिला देते हैं। इस संक्षिप्त लेख में हम आंध्र के बुद्ध कालीन गुरु बावरी से लेकर नागार्जुन और हुएनत्सांग की चर्चा करेंगे। 


नागार्जुन कोंडा म्यूजियम से लिया गया फोटो। शिष्यों से घिरे हुए गौतम बुद्ध अभय मुद्रा में। अमरावती शैली में चूना पत्थर पर नक्काशी  

दक्षिणापथ: श्रावस्ती से अमरावती का जोड़ 

प्राचीन भारत में "दक्षिणापथ" का अर्थ केवल एक राजमार्ग ही नहीं था, बल्कि विंध्याचल के दूसरी ओर का सारा इलाका था। उत्तर और दक्षिण भारत के बीच व्यापार, संस्कृति और धर्म के आदान-प्रदान की मुख्य धुरी दक्षिणापथ का राजमार्ग ही था। इसी मार्ग से व्यापारी, यात्री और भिक्षु सदियों तक आना जाना था। इस प्राचीन मार्ग के प्रमुख नगर थे:

  • श्रावस्ती
  • कौशाम्बी
  • प्रयाग
  • वाराणसी
  • विदिशा
  • उज्जयिनी
  • माहिष्मती
  • प्रतिष्ठान (पैठण)
  • अश्मक महाजनपद की राजधानी पोटलि
  • धान्यकटक
  • अमरावती
  • कांचीपुरम्

यदि हम आजकल का नक्शा देखें, तो यह मार्ग उत्तर प्रदेश से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश होते हुए दक्षिण भारत तक फैला हुआ था। बुद्ध के समय से ही यह मार्ग बौद्ध धर्म के प्रसार का प्रमुख माध्यम बन गया था।

अश्मक महाजनपद: दक्षिण का अकेला महाजनपद

बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में वर्णित सोलह महाजनपदों में केवल एक ही राज्य विंध्य पर्वत के दक्षिण में स्थित था—अश्मक, जिसे पाली में अस्सक कहा जाता है।  

अश्मक का क्षेत्र वर्तमान महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और तेलंगाना के कुछ भागों तक फैला माना जाता है। इसकी राजधानी "पोटलि", "पोतन" या "पौदन्य" थी, जिसे अनेक इतिहासकार वर्तमान बोधन (तेलंगाना) से जोड़ते हैं। कुछ विद्वानों ने इसे प्रतिष्ठान या पैठण से भी जोड़ा है। उस समय की उत्तर-दक्षिण यात्रा लगभग इन शहरों से होकर जाती होगी:  

श्रावस्ती → कौशाम्बी → विदिशा → उज्जयिनी → माहिष्मती → प्रतिष्ठान → पोटलि (अश्मक) → गोदावरी घाटी → धान्यकटक

यह मार्ग केवल व्यापार का मार्ग नहीं था बल्कि यही वह रास्ता था जिससे बौद्ध विचार दक्षिण भारत तक पहुँचे।

बावरी और उसके सोलह शिष्य : बुद्ध की खोज में 

आंध्र के बौद्ध इतिहास की सबसे रोचक और भावुक कथा गुरु बावरी की है। यह कथा हमें बौद्ध ग्रन्थ सुत्तनिपात के पारायणवग्ग में पढ़ने को मिलती है। 

गुरु बावरी एक वृद्ध ब्राह्मण तपस्वी थे जो गोदावरी नदी के किनारे अपने आश्रम में निवास करते थे। एक दिन उन्हें ज्ञात हुआ कि उत्तर भारत में एक सम्यक सम्बुद्ध प्रकट हुए हैं जो जीवन से दुःख दूर करने का रास्ता -'अष्टांगिक मार्ग ' बताते हैं। गुरु बावरी स्वयं लम्बी यात्रा करने की स्थिति में नहीं थे इसलिए उन्होंने अपने सोलह प्रतिभाशाली शिष्यों को बुद्ध से शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा। इनमें प्रमुख थे—

  • अजित
  • तिस्समेत्तेय्य
  • पुण्णक
  • मेट्टगू
  • धोतक
  • उपसीव
  • नन्द
  • हेमक
  • तथा पिङ्गिय (पिंगिया)

ये सभी भगवान बुद्ध के पास एक लम्बी यात्रा करके पहुँचे। हर एक शिष्य ने बुद्ध से एक एक प्रश्न पूछा और धर्मोपदेश प्राप्त किया। इस कथा का सबसे मार्मिक भाग पिंगिया का है। वह बुद्ध-वचन सुन कर गुरु बावरी के पास वापिस आया और उन्हें सारी बातें बताई।  

गुरु बावरी के आश्रम का कोई पुरातात्विक अवशेष अभी तक नहीं मिला है और न ही कोई उनका कोई स्मारक बनाया गया है। कुछ विद्वान आश्रम को गोदावरी घाटी से जोड़ते हैं। कुछ अन्य विद्वान आश्रम को बासर, जिला निर्मल, तेलंगाना अथवा बोधन, जिला निज़ामाबाद, तेलंगाना से जोड़ते हैं।

जो भी हो, यह कथा इस बात का अद्भुत प्रमाण है कि बुद्ध के जीवनकाल में ही दक्षिण भारत के लोग उनके बारे में जानने लगे थे।

धान्यकटक और अमरावती 

यदि उत्तर भारत में सारनाथ बौद्ध धर्म का महान केन्द्र था, तो दक्षिण भारत में यह स्थान धान्यकटक और अमरावती को प्राप्त था। कृष्णा नदी के तट पर स्थित धान्यकटक (आधुनिक धरणीकोट) और अमरावती लगभग ईसापूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर ईस्वी चौथी शताब्दी तक बौद्ध धर्म के प्रमुख केन्द्र रहे।

यहाँ का महास्तूप प्राचीन भारत की सबसे महान स्थापत्य उपलब्धियों में गिना जाता है। अमरावती कला शैली की विशेषताएँ थीं—

  • श्वेत चूना-पत्थर का प्रयोग,
  • जातक कथाओं का चित्रण,
  • बुद्ध के जीवन प्रसंग का चित्रण,
  • प्रतीकात्मक बौद्ध कला,
  • तथा बाद के काल में बुद्ध प्रतिमाओं का विकास।

आज भी अमरावती की मूर्तियाँ विश्व के प्रमुख संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं। 

महाचैत्य अमरावती, आंध्र प्रदेश 

महायान, नागार्जुन और आंध्र

प्राचीन आंध्र बौद्ध धर्म का केन्द्र होने के साथ साथ बौद्ध दर्शन की एक प्रयोगशाला भी था। एक मान्यता के अनुसार महान बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन का सम्बन्ध आंध्र प्रदेश से माना जाता है। नागार्जुन ने कई पुस्तकें लिखीं जिनमें से एक सुहृल्लेखा (मित्र के नाम पत्र) भी थी। माना जाता है कि यह पुस्तक सतवाहन वंश के राजा गोमतीपुत्र के लिए लिखी गई थी। नागार्जुन के प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं, तथापि यह निर्विवाद है कि आंध्र महायान और माध्यमिक दर्शन के विकास का एक प्रमुख केन्द्र था।

नागार्जुन के "शून्यवाद" दर्शन ने चीन, जापान, तिब्बत और सम्पूर्ण पूर्वी एशिया को प्रभावित किया, उसका एक महत्वपूर्ण विकास-क्षेत्र आंध्र ही था। 

अमरावती में नागार्जुन की प्रतिमा। यह मूर्ति दलाई लामा द्वारा दी गई थी और इसका अनावरण तेज़िन ग्यात्सो द्वारा 2006 में किया गया

नागार्जुनकोंडा और अनूपु बौद्ध विहार 

कृष्णा नदी की घाटी में स्थित नागार्जुनकोंडा (कोण्डा = पहाड़ी) भारतीय बौद्ध पुरातत्त्व का एक महत्वपूर्ण स्थल है। तीसरी और चौथी शताब्दी में यह बौद्ध शिक्षा, दर्शन और कला का प्रमुख केन्द्र था। यहाँ बहुत से अवशेष मिले मिले हैं:

  • महास्तूप,
  • विहार,
  • चैत्यगृह,
  • शिक्षण संस्थान,
  • आवासीय परिसर,
  • तथा अनेक अभिलेख।

नागार्जुन बाँध का जलाशय बनने के कारण , इन अवशेषों को एक म्यूजियम बना कर पुनर्स्थापित किया गया।

निकटवर्ती अनूपु गांव में प्राचीन विश्वविद्यालय परिसर और रंगमंच का पुनर्निर्माण भी अवशेषों से किया गया है। जब कोई व्यक्ति वहाँ खड़ा होता है, तो सहज ही कल्पना कर सकता है कि लगभग अठारह सौ वर्ष पूर्व यहाँ बौद्ध भिक्षु तर्कशास्त्र, दर्शन और ध्यान का अध्ययन कर रहे होंगे। 

अनूपु बौद्ध विहार का रंगमंच 

चीनी यात्री ह्वेनसांग

सातवीं शताब्दी में आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने धान्यकटक का विस्तृत वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है:

"इस देश में अनेक संघाराम (अर्थात बौद्ध विहार) उजड़ चुके हैं, किन्तु लगभग बीस विहार अब भी सक्रिय हैं। यहाँ का महाचैत्य अत्यंत भव्य और प्रसिद्ध है।"

यह विवरण हमें बताता है कि सातवीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म जीवित था, हालांकि उसका स्वर्णकाल समाप्त हो चुका था। ह्वेनसांग ने यह भी लिखा कि बौद्ध और ब्राह्मण दोनों परम्पराएँ यहाँ साथ-साथ विद्यमान थीं। 

अनूपु बौद्ध विहार का एक दृश्य 

भाषा, अभिलेख और जनता का सहयोग 

आंध्र के बौद्ध अभिलेख मुख्यतः ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में हैं। बाद के काल में संस्कृत का भी प्रयोग दिखाई देता है। महत्वपूर्ण अभिलेखीय स्थल हैं:

  • अमरावती,
  • नागार्जुनकोंडा,
  • भट्टिप्रोलु,
  • जग्गय्यपेट,
  • घंटशाला,
  • गुंटुपल्ली,
  • सालीहुंडम।

इन अभिलेखों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें केवल राजाओं का ही नहीं, बल्कि सामान्य लोगों का भी उल्लेख मिलता है। आंध्र में बौद्ध धर्म की सफलता का रहस्य केवल राजकीय संरक्षण नहीं था, बल्कि समाज के सभी वर्गों की सहभागिता थी। यहाँ के दो राज घराने बहुत प्रसिद्द हैं जिन्होनें बौद्ध धम्म के प्रचार प्रसार में योगदान दिया: 

सतवाहन वंश (ईसापूर्व पहली शताब्दी से ईस्वी तीसरी शताब्दी), इस वंश के कुछ प्रमुख नाम हैं: गौतमीपुत्र सतकरणी, वाशिष्ठीपुत्र पुलुमावी और यज्ञश्री सतकरणी 

इक्ष्वाकु शासक (ईस्वी तीसरी-चौथी शताब्दी): सतवाहनों के पतन के बाद इश्वाकु शासकों ने कृष्णा-गुंटूर (आंध्र प्रदेश) क्षेत्र में शासन किया। इस वंश की राजधानी विजयपुरी (आधुनिक नागार्जुनकोंडा) थी। इनके प्रमुख राजा थे: वसिष्ठीपुत्र चान्तमूल, वीरपुरुषदत्त, एहुवुल चान्तमूल

अभिलेखों में वर्णित प्रमुख महिला दानदाता इस प्रकार हैं: रानी चामतिश्री, भट्टिदेवी, रुद्रधर, भट्टारिका। इसके अतिरिक्त अनेक सामान्य दानदाताओं जैसे कि श्रेष्ठी, नाविक, गृहस्थ, भिक्षु और भिक्षुणियों का भी उल्लेख अभिलेखों में मिलता है। 

वास्तव में आंध्र का बौद्ध धर्म जनता का बौद्ध धर्म था।

आंध्र में बौद्ध धर्म का पतन 

इतना विशाल और समृद्ध धर्म धीरे-धीरे क्यों समाप्त हुआ? इसके कई कारण थे : 

  • राजकीय संरक्षण का समाप्त होना,
  • मंदिर आधारित भक्ति परम्पराओं का विकास,
  • व्यापार मार्गों में परिवर्तन,
  • बौद्ध संस्थाओं की आर्थिक सहायता में जख्मी,
  • सम्प्रदायों का विभाजन,
  • तथा सामाजिक संरचना में परिवर्तन।

सातवीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म कमजोर पड़ने लगा था और लगभग बारहवीं शताब्दी तक उसका संगठित स्वरूप आंध्र से लगभग समाप्त हो गया।

आज अमरावती, नागार्जुनकोंडा और अनूपु के अवशेषों को देखकर लगता है कि इतिहास कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता।

गोदावरी के किनारे बैठे बावरी की जिज्ञासा, पिंगिया की श्रद्धा, अमरावती के कलाकारों की कल्पना, नागार्जुनकोंडा के आचार्यों की विद्वत्ता और हजारों ज्ञात अज्ञात दानदाताओं की उदारता—ये सब आज भी आंध्र की मिट्टी में कहीं न कहीं जीवित हैं।

यदि बोधगया बुद्ध के ज्ञान का प्रतीक है, तो आंध्र प्रदेश उस ज्ञान के प्रसार, संरक्षण और सृजनात्मक विकास का प्रतीक है।  

अनूपु बौद्ध विहार का स्तूप। नागार्जुन सागर बाँध बनने के कारण बुद्ध विहार से सम्बंधित अवशेषों को इकठ्ठा करके स्तूप का पुनर्निर्माण किया गया

और आगे पढ़ने के लिए:

  1. Sutta Nipāta (Pārāyanavagga), Pali Text Society.
  2. Samuel Beal, Buddhist Records of the Western World.
  3. Romila Thapar, Aśoka and the Decline of the Mauryas.
  4. A. K. Warder, Indian Buddhism.
  5. H. C. Raychaudhuri, Political History of Ancient India.
  6. K. A. Nilakanta Sastri, A History of South India.
  7. K. Krishna Murthy, Nāgārjunakoṇḍa: A Cultural Study.
  8. B. S. L. Hanumantha Rao, Religion in Andhra.
  9. Epigraphia Indica
  10. Corpus Inscriptionum Indicarum, Vol. I.
  11. A. Ghosh (Ed.), An Encyclopaedia of Indian Archaeology.
  12. K. R. Subrahmanian, Buddhism in South India and Andhra.


Thursday, 2 July 2026

देहदान का सम्मान या अपमान

कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो के अंश देखने को मिले। प्रणीत मोरे के एक कॉमेडी शो में एक मेडिकल छात्रा सेजल पवार ने मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान शव के बारे में कुछ टिप्पणियाँ कीं। उसने मज़ाक करते हुए बताया कि छात्र शवों की चीर फाड़ करते वक़्त शवों के शरीर के अंगों, विशेषकर पुरुष जननांगों के आकार की तुलना करते हैं और उन पर जोक मारते हैं।

वीडियो देखते समय मन में गुस्सा तो नहीं आया पर सच कहूँ तो मैं इस 'जोक' पर हंस भी नहीं पाया। 

मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों की पढ़ाई और ट्रेनिंग के लिए शव को संरक्षित कर के रखा जाता है। इस तरह के शव को कैडावर- cadaver भी कहते हैं।

और ये यह शव आते कहाँ से हैं ? ज्यादातर स्वेच्छा से किसी परिवार द्वारा मीडिकल कॉलेज को शव दान किया जाता है। ये इसी तरह से है जैसे रक्तदान, लिवर, किडनी या नेत्र दान होता है। देहदान किये गए शवों को केमिकल लगा कर लगभग एक साल तक संरक्षित किया जा सकता है। इन शवों पर विद्यार्थी चीरफाड़ कर के शरीर के विभिन्न अंदरूनी हिस्सों का परिक्षण कर सकते हैं। ये भावी डॉक्टर को शरीर की संरचना समझने और ऑपरेशन वगैरा करने में सहायक होता है।  

यह तो हम भी जानते हैं कि युवावस्था में छात्र-छात्राएँ आपस में कैसी-कैसी बातें कर लेते हैं। मेडिकल कॉलेज के छात्र - छात्राएं भी आखिर हमारे जैसे ही हैं, कोई आसमान से तो टपके नहीं। हर कॉलेज में हँसी-मज़ाक खूब होता है और ऐसा ही यहाँ भी कुछ हुआ होगा। फिर भी इस 'जोक' की सोशल मीडिया पर चर्चा और वीडियो वगैरा देखकर मन में एक असहजता बनी हुई है। 

शायद इसलिए कि मैंने और मेरी पत्नी ने अपने मृत शरीरों का दान एक मेडिकल कॉलेज में रजिस्टर कराया हुआ है।

हम दोनों ने यह निर्णय बहुत सोच-विचार के बाद लिया था। परिवार में लम्बी चर्चा हुई, बच्चों की सहमति ली गई, मेडिकल कॉलेज के अधिकारियों से जानकारी प्राप्त की गई और तब जाकर यह कदम उठाया गया। हमारे लिए देहदान कोई भावुकता भरा अचानक लिया गया फैसला नहीं था। लगभग एक डेढ़ साल इस विषय पर आपस में विचार विमर्श चलता रहा था। धार्मिक, सामाजिक और भावनात्मक परम्पराएं तोड़ना आसान मामला नहीं है। हमारा यह भी विश्वास था कि जीवन के बाद भी अगर हमारा शरीर किसी विद्यार्थी की शिक्षा में काम आ सके तो उससे बड़ा शव का उपयोग क्या होगा?

मेडिकल शिक्षा में कैडावर का महत्व असाधारण है। शरीर रचना विज्ञान (Anatomy) की पढ़ाई पुस्तकों और चित्रों से शुरू अवश्य हो सकती है, पर पूरी नहीं हो सकती। शरीर के भीतर नसें कहाँ से गुजरती हैं, मांसपेशियाँ कैसे जुड़ी हैं, हड्डियों और अंगों का वास्तविक स्वरूप क्या है, यह सब एक वास्तविक मानव शरीर से सीखना काफी आसान हो जाता है।

इस दृष्टि से देखा जाए तो देहदान करने वाला व्यक्ति मृत्यु के बाद भी एक शिक्षक बन जाता है। वह बोलता नहीं, फिर भी पढ़ाता है। वह चलता-फिरता नहीं, फिर भी छात्रों को बेहतर भावी डॉक्टरों बना सकता है।

इसीलिए कई मेडिकल कॉलेजों में कैडावर को "First Teacher" भी कहा जाता है।

हम यह नहीं कह सकते कि मेडिकल छात्र कैडावर के सामने हाथ जोड़कर ही खड़े रहें। आखिर उन्होनें शव की काँट-छाँट तो करनी ही है। वे लोग हर समय गंभीर मुद्रा बनाए तो खड़े नहीं रह सकते। ऐसा भी नहीं कि किसी शव के बारे में कभी कोई हल्की टिप्पणी न की गई हो। मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह कठिन और असहज परिस्थितियों में भी हास्य खोज लेता है।

परन्तु निजी या सिमित दायरे में हुई बातचीत और सार्वजनिक प्रदर्शन के हास्य में अंतर होता है। जब किसी मंच से, हजारों दर्शकों के सामने, उस व्यक्ति के शरीर को हास्य का विषय बनाया जाता है जिसने अपनी मृत्यु के बाद शिक्षा के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया, तब कहीं न कहीं उस देहदान की गरिमा कम होती नज़र आती है।

एक क्षण के लिए सोचिए कि किसी देहदाता का परिवार जो यह कार्यक्रम देख रहा हो तो उसे कैसा लगा होगा?

जिस व्यक्ति ने यह विश्वास करके अपना शरीर मेडिकल कॉलेज को सौंपा कि उससे विद्यार्थियों को ज्ञान मिलेगा, उसके बारे में यदि सार्वजनिक रूप से ठहाके लगाए जाएँ तो शायद भविष्य में लोगों का उत्साह देहदान करने में घट जाए।  

भारत में वैसे ही देहदान की संख्या मेडिकल कॉलेज की आवश्यकता से बहुत कम है। हमारे शहर मेरठ की आबादी पैतीस लाख के आसपास है और जब हमने अपना नाम देहदान के लिए रजिस्टर किया तो उस लिस्ट में पैंतीस नाम भी नहीं थे। सोलह लोगों की उस लिस्ट में इकलौती लेडी डॉक्टर भी थी। 

अधिकांश लोग धार्मिक, सामाजिक और भावनात्मक कारणों से इस निर्णय तक पहुँच ही नहीं पाते। हालांकि आजकल रक्तदान, लिवर, किडनी, दिल और नेत्र दान करना आम बात हो गई है पर फिर भी समाज के कुछ वर्गों में इसे ठीक नहीं माना जाता। हमारे विचार में देहदान के लिए जो लोग तैयार होते हैं वे समाज के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। ऐसे में सभी का दायित्व बन जाता है कि हम उनके प्रति सम्मान का वातावरण बनाए रखें।

हमें नहीं मालूम कि उस छात्रा के विरुद्ध क्या कार्रवाई होगी या क्या सजा दी जाएगी और न ही हम किसी दंड की माँग कर रहे हैं। मानसिक दंड तो उस छात्रा को उस दिन से ही मिलना शुरू हो गया होगा जब वीडियो पर तुरंत नाराज़गी भरे कमेंट आने लग गए। उस छात्रा का माफी मांगना मानसिक तनाव की शुरुआत ही तो है और ये स्थिति जल्दी से ख़त्म होने वाली भी नहीं है।  

सज़ा से शायद समस्या का समाधान भी न हो पाए। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इस घटना को एक अवसर की तरह देखा जाए - शिक्षा में नैतिकता, संवेदनशीलता और कृतज्ञता की भावना पर पुनर्विचार किया जाए। स्थिति को दुरुस्त करने के लिए प्रयास किया जाए।

मेडिकल विद्यार्थी जब पहली बार डिसेक्शन हॉल में प्रवेश करते हैं तो उनके सामने केवल एक शव नहीं होता, वहाँ किसी का पिता, माता, पति, पत्नी, भाई या बहन होता है। एक ऐसा व्यक्ति होता है जिसने मृत्यु के बाद भी समाज की सेवा करने का एक मुश्किल निर्णय लिया था। उस शरीर के प्रति सम्मान केवल शिष्टाचार नहीं है; वह चिकित्सा व्यवसाय की नैतिकता का हिस्सा होना चाहिए।

मेरी उम्र अब 75 साल है और गायत्री की 72 साल, पर हम इस घटना के बाद भी अपने देहदान के निर्णय पर डटे हुए हैं।

यदि हमारा मृत शरीर किसी मेडिकल छात्र को एक नस या मांसपेशी पहचानने में, किसी भावी सर्जन को एक ऑपरेशन बेहतर ढंग से करने, या किसी भावी डॉक्टर को एक रोगी का जीवन बचाने में सहायता कर सके तो इससे बड़ी संतुष्टि क्या होगी?

पर साथ ही एक छोटी-सी अपेक्षा भी है: हमारे मृत शरीर को अध्ययन की वस्तु समझिए, खिल्ली उड़ाने की नहीं। ज्ञान के लिए शरीर की चीरफाड़ कीजिए, ठहाकों के लिए नहीं।

शायद यही देहदाता के प्रति सबसे बड़ा सम्मान होगा।

पुनश्च: यदि आपने मेरे पिछले ब्लॉग ‘देह दान – महा कल्याण’ और ‘अंग दान महा दान’ नहीं पढ़े हैं, तो आप निम्न लिंक पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं। उनमें मैंने अपने और अपनी पत्नी के विचारों की पूरी प्रक्रिया, परिवार के बीच कठिन बहस और देहदान पर मेडिकल कॉलेज की शर्तों का विस्तार से वर्णन किया है। 

देह दान कोई मज़ाक नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक जिम्मेदारी है।

अंग दान महा दान - 23 अप्रैल 2014  

देह दान- 22  अप्रैल 21 

 

                                              

  

तेरा मंगल, मेरा मंगल, सबका मंगल होए !