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Sunday, 19 July 2026

प्राचीन केरल में बौद्ध धर्म

भारत के दक्षिण-पश्चिमी तट पर स्थित केरल अपनी प्राकृतिक सुंदरता, बैक-वाटर्सचेर , आयुर्वेद और मसालों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। लेकिन कम लोग जानते हैं कि यहाँ लगभग डेढ़ हजार वर्षों तक बौद्ध धर्म की भी एक महत्वपूर्ण कर्मभूमि रही। आज भले ही यहाँ साँची या अमरावती जैसे विशाल स्तूप दिखाई नहीं देते, परन्तु बुद्ध की प्राचीन प्रतिमाएँ, पुराने स्थानों के नाम, ताम्रपत्र, साहित्य और लोक परम्पराएँ इस बात की गवाही देती हैं कि कभी यहाँ बौद्ध धम्म का प्रकाश था। 

प्राचीन काल में वर्तमान केरल को चेर देश, चेरनाडु या केरलपुत्र कहा जाता था। अधिकांश इतिहासकार "केरलपुत्र" को चेर राज्य का ही प्राचीन नाम मानते हैं। यही केरल का पहला प्रामाणिक ऐतिहासिक उल्लेख भी माना जाता है।

चेरनाडु, प्राचीन तमिलदेश या तमिलकम का पश्चिमी भाग था। केरल के एक ओर पश्चिम में अरब सागर और दूसरी ओर पूर्व में घाट होने के कारण यह प्रदेश समुद्री व्यापार का स्वाभाविक केन्द्र था। यही व्यापार आगे चलकर बौद्ध धर्म के प्रसार का सबसे बड़ा माध्यम बना।  

चेर देश (विकिपीडिया से साभार) 

सम्राट अशोक और केरल

केरल कभी मौर्य साम्राज्य का भाग नहीं रहा, फिर भी सम्राट अशोक(राज 268 से 232 ईसापूर्व) इस प्रदेश से भली-भाँति परिचित थे।

अशोक के द्वितीय तथा तेरहवें शिलालेखों में दक्षिण भारत के जिन राज्यों का उल्लेख मिलता है, उनमें चोल, पाण्ड्य, सत्यपुत्र, केरलपुत्र तथा ताम्रपर्णी (श्रीलंका) प्रमुख हैं। इन अभिलेखों से यह स्पष्ट होता है कि अशोक की धम्म-नीति इन राज्यों तक पहुँच चुकी थी। यद्यपि उनके अभिलेखों में यह नहीं कहा गया कि उन्होंने इन क्षेत्रों पर शासन किया या यहाँ बौद्ध विहार स्थापित किए। फिर भी यह उल्लेख इस बात का प्रमाण है कि तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक उत्तर और दक्षिण भारत के बीच घनिष्ठ सांस्कृतिक एवं राजनयिक सम्बन्ध थे।

समुद्री व्यापार : धम्म का मुख्य मार्ग

यदि पूछा जाए कि केरल में बौद्ध धर्म कैसे पहुँचा, तो उसका आसान उत्तर होगा—समुद्र के रास्ते।

प्राचीन काल में अरब सागर एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ने वाला विशाल व्यापारिक राजमार्ग था। भारत के पश्चिमी तट से जहाज मिस्र, रोमन साम्राज्य, अरब, फारस और पूर्वी अफ्रीका तक जाते थे। दूसरी ओर यही समुद्री मार्ग श्रीलंका और सुमात्रा, इंडोनेशिया तक भी जुड़ा हुआ था। 

इसके अतिरिक्त केरल तट के पत्तन नाला सोपारा, महाराष्ट्र और भड़ूच, गुजरात से भी जुड़े हुए थे। इनकी पृष्टभूमि में पैठण, उज्जैन, प्रयाग, वाराणसी, पाटलिपुत्र और श्रावस्ती जैसे शहर थे जिनसे व्यापारिक सम्बन्ध थे। 

व्यापारी जहाँ जाते थे, वहाँ अपने सामान के आलावा विचार, दर्शन और संस्कृति भी पहुँचा देते थे। बौद्ध भिक्षु भी व्यापारिक जहाजों और सार्थवाह (या कारवाँ) के साथ यात्रा करते थे। वे व्यापारियों के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी होते थे और अनेक स्थानों पर बौद्ध विहार में यात्रियों के विश्राम की व्यवस्था भी करते थे। इस प्रकार मसालों के व्यापार ने अनजाने में बौद्ध धर्म के प्रसार का भी मार्ग प्रशस्त किया।

मुज़िरिस : मसालों का बंदरगाह

प्राचीन केरल का विश्वविख्यात बंदरगाह था मुज़िरिस। अधिकांश विद्वान इसका सम्बन्ध वर्तमान पत्तनम (एर्नाकुलम के निकट) से जोड़ते हैं। प्रथम शताब्दी ईस्वी के यूनानी ग्रन्थ पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी तथा दूसरी शताब्दी के टॉलेमी ने अपनी किताब जियोग्राफिया  में मुज़िरिस का वर्णन किया है। उनके अनुसार यह रोमन साम्राज्य और भारत के बीच मसालों के व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र था।

यहाँ से मुख्यत काली मिर्च, इलायची, दालचीनी, हाथीदाँत, मोती और बहुमूल्य लकड़ी विदेशों को भेजी जाती थी। बदले में रोमन व्यापारी सोना, चाँदी, काँच के बर्तन, मूँगा, उत्तम शराब तथा विलासिता की अनेक वस्तुएँ लेकर आते थे।

वर्ष 2007 से पत्तनम में हुए पुरातात्त्विक खुदाई में रोमन ऐंफोरा (मिट्टी के बड़े बर्तन), काँच की मणियां और गोदामों के अवशेष मिले हैं। इन खोजों ने यह सिद्ध किया कि मुज़िरिस वास्तव में एक अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक नगर था। ऐसे समृद्ध बंदरगाहों पर बौद्ध भिक्षुओं का आना-जाना स्वाभाविक था। सम्भवतः यहीं से बौद्ध विचार केरल के तटीय क्षेत्रों और फिर आन्तरिक दक्षिण तक पहुँचे।

पालक्कड़ दर्रा : पश्चिमी घाट का प्रवेश-द्वार

समुद्री मार्गों के साथ-साथ स्थल मार्ग भी उतने ही महत्वपूर्ण थे। पश्चिमी घाट एक दुर्गम पर्वतमाला है, किन्तु पालक्कड़ दर्रा (Palakkad Gap) लगभग तीस किलोमीटर चौड़ा प्राकृतिक मार्ग है। प्राचीन काल से व्यापारी, यात्री और भिक्षु इसी मार्ग से केरल और तमिल प्रदेशों के बीच आवागमन करते थे।

यह मार्ग आगे चलकर मदुरै, कांचीपुरम और दक्षिण भारत के अन्य सांस्कृतिक केन्द्रों से जुड़ता था। इसके चलते केरल कभी अलग-थलग नहीं रहा, बल्कि दक्षिण भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का सक्रिय भाग बना रहा।

श्रीमूलवासम : केरल का बौद्ध महाविहार

यदि नालन्दा उत्तर भारत का गौरव था, तो दक्षिण-पश्चिम भारत में श्रीमूलवासम का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है। अधिकांश इतिहासकार इसे वर्तमान कोल्लम और अलाप्पुझा के बीच समुद्र तटीय क्षेत्र में मानते हैं, यद्यपि इसकी सही स्थिति आज भी तय नहीं है।

श्रीमूलवासम केवल एक विहार नहीं था, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बौद्ध शिक्षण केंद्र और तीर्थ था। उसके सम्बन्ध में भारत, श्रीलंका और तिब्बती परम्पराओं में उल्लेख मिलता है। कुछ अभिलेखों से यह भी ज्ञात होता है कि केरल के राजाओं ने इस महाविहार को संरक्षण, भूमि और आर्थिक सहायता प्रदान की थी।

प्रसिद्ध 'लीडन ताम्रपत्र' और 'पालियम ताम्रपत्र' इस बात के प्रमाण हैं कि उस समय के शासक बौद्ध संस्थानों को हर तरह से मदद देते थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि केरल में धार्मिक सहिष्णुता की परम्परा काफी विकसित थी। 

(इन दोनों ताम्रपत्रों के बारे में संक्षिप्त परिचय नीचे चलते चलते (क) और (ख) में दिया गया है।)

कुछ विद्वानों का मत है कि समुद्री कटाव या किसी प्राकृतिक आपदा के कारण श्रीमूलवासम का मूल परिसर नष्ट हो गया। उसका भौतिक स्वरूप आज उपलब्ध नहीं है, फिर भी इतिहास के पन्नों में उसका नाम दक्षिण भारत के सबसे प्रतिष्ठित बौद्ध केन्द्रों में लिया जाता है।

बुद्ध की प्रतिमाएँ 

यदि कोई पूछे कि केरल में बौद्ध धर्म के अस्तित्व का सबसे अच्छा प्रमाण क्या है, तो उत्तर होगा - वहाँ से प्राप्त बुद्ध प्रतिमाएँ।

सबसे प्रसिद्ध बुद्ध मूर्ति 'करुमादी कुट्टन' के नाम से जानी जाती है। अलाप्पुझा जिले के करुमादी गाँव में काले ग्रेनाइट से निर्मित यह मूर्ति लगभग तीन फुट ऊँची है और नौवीं-दसवीं शताब्दी की मानी जाती है। दुर्भाग्यवश इसका एक भाग खण्डित है। मूर्ति के शांत चेहरे और ध्यानमग्न भाव से आज भी बुद्ध की झलक दिखती है।

इसके अतिरिक्त मावेलिक्करा, मरुतूरकुलंगरा तथा केरल के अन्य स्थानों से भी बुद्ध प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। ये सभी इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि मध्यकाल से पहले केरल में बौद्ध धर्म का प्रभाव व्यापक था। 

करूमादी कुट्टन (विकी से साभार) 

बौद्ध धर्म का सांस्कृतिक प्रभाव

केरल में बौद्ध धर्म का प्रभाव केवल विहारों और बुद्ध प्रतिमाओं तक सीमित नहीं था। उसने यहाँ की शिक्षा, चिकित्सा, कला, भाषा और सामाजिक जीवन पर भी गहरी छाप छोड़ी।

बौद्ध विहार उस समय शिक्षा, चिकित्सा, यात्रियों के विश्राम और सामाजिक सेवा के केन्द्र भी थे। दूर-दूर से आने वाले व्यापारी, यात्री और भिक्षु इन विहारों में ठहरते थे। इसी कारण बौद्ध धर्म ने केरल के सांस्कृतिक जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित किया।

आयुर्वेद और बौद्ध परम्परा

आज केरल का नाम लेते ही आयुर्वेद की याद आती है। यद्यपि आयुर्वेद की परम्परा बौद्ध धर्म से भी प्राचीन है, परन्तु उसके संरक्षण और प्रसार में बौद्ध भिक्षुओं का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

अनेक विहारों में औषधियों का संग्रह किया जाता था तथा रोगियों की सेवा की जाती थी। करुणा और सेवा बौद्ध धर्म के मूल सिद्धान्त हैं और चिकित्सा को भी उसी भावना का विस्तार माना जाता था।

आचार्य वाग्भट द्वारा रचित अष्टाङ्गहृदयम् आयुर्वेद का मुख्य प्रतिष्ठित ग्रन्थ है। यद्यपि वाग्भट के जन्मस्थान और धार्मिक पहचान को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं, किन्तु इसमें कोई विवाद नहीं कि उनका यह ग्रन्थ केरल में अत्यधिक सम्मान प्राप्त करता रहा है और अष्टवैद्य परम्परा का आधार बना है।

इस प्रकार चिकित्सा और करुणा का जो समन्वय बौद्ध परम्परा में दिखाई देता है, उसका प्रभाव केरल की आयुर्वेदिक परम्परा में भी देखा जा सकता है।

भाषा में बौद्ध धर्म की छाप

इतिहास केवल स्मारकों में ही नहीं, शब्दों में भी जीवित रहता है। केरल की मलयालम भाषा में आज भी अनेक ऐसे शब्द मिलते हैं जिनकी जड़ें बौद्ध और श्रमण परम्परा से जुड़ी मानी जाती हैं।

सबसे प्रसिद्ध शब्द है "पल्ली"। प्राचीन दक्षिण भारत में "पल्ली" शब्द का प्रयोग बौद्ध और जैन विहारों के लिए किया जाता था। बाद में यही शब्द विद्यालय, चर्च और मस्जिद के लिए भी इस्तेमाल होने लगा।

आज भी मलयालम में विद्यालय को "पल्लिक्कूडम" कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है—"पल्ली में शिक्षा का स्थान।"

इसी प्रकार "श्रमण" शब्द तमिल और मलयालम में बदलकर "समन", "समण" या "समनर" के रूप में प्रचलित हुआ। तमिलनाडु में आज भी जैन साधुओं के लिए "समनर" शब्द का प्रयोग किया जाता है। साथ ही मदुरै के निकट स्थित प्रसिद्ध पहाड़ी समनर मलाई की गुफाएं इस परम्परा की याद दिलाती है।

कला और मूर्तिकला

केरल से प्राप्त बुद्ध प्रतिमाएँ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि यहाँ बौद्ध कला का अच्छा विकास हुआ था। सबसे प्रसिद्ध प्रतिमा करुमादी कुट्टन है। काले ग्रेनाइट से बनी यह लगभग एक हजार वर्ष पुरानी प्रतिमा अपने शांत चेहरे और ध्यानमग्न भाव के कारण विशेष आकर्षण का केन्द्र है।

इसके अतिरिक्त मावेलिक्करा, मरुतूरकुलंगरा तथा अन्य स्थानों से भी बुद्ध प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। इन प्रतिमाओं की शैली से यह अनुमान लगाया जाता है कि उस समय केरल में महायान बौद्ध परम्परा का प्रभाव था।

यद्यपि केरल में साँची या अमरावती जैसे विशाल स्तूप नहीं मिले हैं, फिर भी उपलब्ध प्रतिमाएँ और पुरातात्त्विक अवशेष यह सिद्ध करते हैं कि यहाँ बौद्ध कला की अपनी अलग पहचान थी।

पल्लव नाटक और केरल का रंगमंच 

सातवीं शताब्दी में पल्लव नरेश महेन्द्रवर्मन प्रथम द्वारा रचित मत्तविलास प्रहसन दक्षिण भारत के सामाजिक जीवन की रोचक झलक प्रस्तुत करता है।

इस व्यंग्य नाटक में बौद्ध भिक्षु, जैन साधु, कापालिक और शैव संन्यासी, सभी पात्र दिखाई देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि उस समय दक्षिण भारत में विभिन्न धार्मिक परम्पराएँ साथ-साथ विकसित हो रही थीं।

यद्यपि यह नाटक कांचीपुरम में लिखा गया था, उसका प्रभाव केरल की प्रसिद्ध संस्कृत रंगमंच परम्परा कूटियाट्टम पर भी पड़ा। आज भी कूटियाट्टम में इस नाटक का मंचन किया जाता है। इससे पता चलता है कि बौद्ध युग की साहित्यिक परम्पराएँ केरल की सांस्कृतिक धारा में लंबे समय तक जीवित रहीं।

सबरीमाला और बौद्ध परम्परा : एक परिकल्पना

केरल के इतिहास का सबसे चर्चित विषय सबरीमाला और बौद्ध धर्म के बीच सम्भावित सम्बन्ध है।

कुछ इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का मत है कि वर्तमान सबरीमाला क्षेत्र में प्राचीन काल में बौद्ध विहार या बौद्ध तीर्थ रहा होगा। इस मत के समर्थन में वे कुछ सांस्कृतिक समानताओं की ओर संकेत करते हैं। उनके अनुसार,

  • "धर्म शास्ता" उपाधि की तुलना बुद्ध के लिए प्रयुक्त "शास्ता" शब्द से की जाती है।
  • "स्वामी शरणम्" के नारे की तुलना बौद्ध परम्परा के "बुद्धं शरणं गच्छामि" से की जाती है।
  • अयप्पा की ध्यानमग्न मुद्रा और योगपट्टिका को कुछ विद्वान महायानी बौद्ध प्रतिमाओं से मिलती-जुलती मानते हैं।
  • सबरीमाला यात्रा में जाति और सामाजिक भेदभाव को दूर रखने की परम्परा भी कुछ शोधकर्ताओं को बौद्ध संघ की समतावादी भावना की याद दिलाती है।

किन्तु यह उल्लेख करना आवश्यक है कि इन समानताओं को लेकर इतिहासकारों में पूर्ण सहमति नहीं है। अभी तक ऐसा कोई विशेष पुरातात्त्विक प्रमाण नहीं मिला है जिससे यह निश्चित रूप से कहा जा सके कि सबरीमाला मूलतः बौद्ध विहार था।

इसलिए इस विषय को एक रोचक ऐतिहासिक परिकल्पना के रूप में ही देखना अधिक उचित होगा।

बौद्ध धर्म का पतन

लगभग बारहवीं शताब्दी तक आते-आते केरल में बौद्ध धर्म का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा। इसके पीछे अनेक कारण थे।

सबसे पहला कारण था राजकीय संरक्षण का घट जाना। प्रारम्भिक चेर शासकों के बाद अधिकांश राजाओं का झुकाव शैव और वैष्णव परम्पराओं की ओर हो गया। परिणामस्वरूप बौद्ध विहारों को मिलने वाले अनुदान कम होते चले गए।

दूसरा कारण था भक्ति आन्दोलन का प्रसार। दक्षिण भारत में आलवार और नयनार संतों ने भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया। इससे शैव और वैष्णव परम्पराएँ अत्यन्त लोकप्रिय हो गईं।

तीसरा कारण दार्शनिक वाद-विवाद थे। कुमारिल भट्ट तथा बाद में आदि शंकराचार्य जैसे विद्वानों ने बौद्ध दर्शन की गम्भीर समीक्षा की। यद्यपि यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल उनके कारण बौद्ध धर्म समाप्त हो गया, फिर भी वैदिक दर्शन के पुनरुत्थान की भी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

समय के साथ अनेक बौद्ध विहार या तो उजड़ गए अथवा अन्य धार्मिक संस्थानों में परिवर्तित हो गए। यदि कोई यह समझे कि केरल से बौद्ध धर्म पूरी तरह लुप्त हो गया, तो यह सही नहीं होगा। अब तक आप जान गए होंगे:

  • सम्राट अशोक ने अपने शिलालेखों में "केरलपुत्र" का उल्लेख किया है।
  • मुज़िरिस कभी रोमन साम्राज्य के साथ मसालों के व्यापार का सबसे बड़ा भारतीय बंदरगाह था।
  • करुमादी कुट्टन बुद्ध प्रतिमा लगभग एक हजार वर्ष पुरानी मानी जाती है।
  • "पल्ली" शब्द का सम्बन्ध प्राचीन बौद्ध और जैन विहारों से जोड़ा जाता है।
  • श्रीमूलवासम दक्षिण भारत का एक प्रतिष्ठित बौद्ध केन्द्र था, यद्यपि उसका सही स्थान आज भी शोध का विषय बना हुआ है।

केरल का बौद्ध इतिहास केवल कुछ प्राचीन प्रतिमाओं या खोए हुए विहारों की कहानी नहीं है। यह समुद्री व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, शिक्षा, चिकित्सा, कला और सामाजिक समरसता की भी कहानी है। यद्यपि समय के प्रवाह में यहाँ के अधिकांश बौद्ध विहार विलुप्त हो गए, परन्तु उनकी स्मृतियाँ आज भी केरल की भाषा, संस्कृति और आम जीवन में सुरक्षित हैं। 

चलते चलते 

(क) लीडन ताम्रपत्र: इन्हें अनाईमंगलम ताम्रपत्र भी कहा जाता है। ग्यारहवीं सदी के ये राजकीय दस्तावेज चोल राजवंश से जुड़े हुए हैं। इनमें 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेटें हैं और इनका वजन 30 किलो है। ये सभी प्लेटें ताम्बे की एक बड़ी अंगूठी या शाही मोहर में पिरोई हुई हैं। इन पर तमिल और संस्कृत में अक्षर उकेरे गए हैं। इन पर राजराजा चोल प्रथम और उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम द्वारा नागपट्टिनम के चूड़ामणि बौद्ध विहार को दान दी गई जमीन का विवरण दिया गया है। इस अभिलेख के अनुसार अनाईमंगलम नामक गांव का पूरा राजस्व इस बौद्ध मठ को दान किया जाना था। 

यह प्लेटें 1700-1702 में डच मिशनरी फ्लोरंटियस कैंपर को नागपट्टिनम में मिलीं थी। उस समय कोरोमंडल क्षेत्र में डच ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रभुत्व था। कैम्पर ताम्बे की प्लेटों को अपने साथ बताविया (आजकल का जकार्ता) ले गया। 1712 में उसने ताम्बे की प्लेटें नीदरलैंड की लीडन यूनिवर्सिटी को सौंप दीं। हाल ही में ये वापिस भारत आ गई हैं। 

चूड़ामणि बौद्ध विहार को मूल रूप से श्रीविजय (इसे श्री विजया या श्री विजय भी लिखा जाता है) साम्राज्य, इंडोनेशिया के राजा श्री मारा विजयोत्तुङ्गा वर्मन (संग्राम विजयतुंग वर्मन) ने बनवाने का निवेदन किया था। यह विहार राजा विजयोत्तुंगा के पिता राजा चूड़ामणि वर्मन (श्री चूड़ामणि वर्मदेव) को समर्पित होना था। 

उस समय के चोल साम्राज्य के राजा राजेंद्र चोला प्रथम ने ना केवल राजा विजयोत्तुङ्गा वर्मन की बात मानी बल्कि बौद्ध विहार के रख रखाव के लिए जमीन दी और अनाईमंगलम गांव का राजस्व भी स्थाई रूप से दान में दे दिया। 

राजा राजेंद्र चोला प्रथम ने ये विहार नागपट्टिनम शहर में बनवा दिया। इस बंदरगाह से चीन और इंडोनेशिया से व्यापारी और बौध्द भिक्खु आते जाते थे।   

    

 
लीडन ताम्रपत्र अब भारत आ चुके 

(ख) पालियम ताम्रपत्र: ये ताम्बे की प्लेटें केरल के पालियम राजघराने के पास थीं जो अब त्रिपुनिथुरा म्यूजियम, कोचीन में है। ये ताम्रपत्र आई (Ay) क्षेत्र के राजा विक्रमादित्य वरगुणा (राज 898 - 929 ईस्वी) द्वारा जारी की गई थी। इस पर खुदे अभिलेख तमिल और संस्कृत में हैं जो श्रीमूलवासा बौद्ध विहार को दी गई बहुत बड़ी जमीन का विवरण देते हैं। प्लेटों पर अंकित श्लोकों की शुरुआत में शुद्धोधनी (बुद्ध). धर्मसंघ और अवलोकितेश्वर की स्तुति है। भूभाग के नक़्शे में तमिल इस्तेमाल की गई है। यह गवाही बौद्ध धम्म का दक्षिण भारत पहुंचना सिद्ध करती है।   

पालियम ताम्रपत्र (विकी कॉमन्स से साभार) 

(ग) सम्राट अशोक का अभिलेख: इस लेख में चोल, पाण्ड्य, सतीयपुत्र और केरलपुत्र साम्राज्यों के नाम लिखे गए हैं। साथ ही मनुष्यों और पशुओं के लिए दवाइयां और चिकित्सक का इंतज़ाम का जिक्र किया गया है। 

Edict–II of Emperor Ashoka
English Translation of Edict - ii

Everywhere in the dominions of king Devanampriya Priyadarsin and (of those) who (are his) borderers, such as the Cholas, the Pandyas, the Satiyaputa, the Kelalaputa, Tamraparni, the Yona (Greek) king named Antiyoga (Antiochus), and the other kings who are the neighbours of this Antiyoga, everywhere two (kinds of) medical men were established by king Devanampriya Priyadarsin, (viz.) medical treatment for men and medical treatment for cattle.Wherever there were no herbs beneficial to men and beneficial to cattle, everywhere they were caused to be imported and to be planted. Likewise, wherever there were no roots and fruits, everywhere they were caused to be imported and to be planted. On the roads trees were planted, and wells were caused to be dug for the use of cattle and men.


(Translation by E. Hultzsch (1857-1927). Published in India in 1925. Inscriptions of Asoka p.28. Public Domain)

(Source: https://en.wikipedia.org/wiki/Major_Rock_Edicts)

    (घ) और आगे पढ़ने के लिए:

  1. A. Sreedhara MenonA Survey of Kerala History.
  2. K. A. Nilakanta SastriA History of South India.
  3. D. C. AhirBuddhism in South India.
  4. Romila ThaparAśoka and the Decline of the Mauryas.
  5. Rajan GurukkalRethinking Classical Indo-Roman Trade.
  6. Periplus of the Erythraean Sea (प्रथम शताब्दी ईस्वी) – प्राचीन समुद्री व्यापार का महत्त्वपूर्ण स्रोत।
  7. Claudius PtolemyGeographia.
  8. Pattanam Excavation Reports – Kerala Council for Historical Research (KCHR).
  9. Archaeological Survey of India (ASI) – दक्षिण भारत के पुरातात्त्विक सर्वेक्षण एवं अभिलेख।
  10. The Leiden Copper Plates तथा Paliyam Copper Plates – चेर कालीन इतिहास और धार्मिक संरक्षण के महत्त्वपूर्ण स्रोत।



Friday, 17 July 2026

प्राचीन तमिल नाडु में बौद्ध धर्म का इतिहास

जब हम भारत में बौद्ध धर्म के इतिहास का पन्नों को पलटते हैं, तो हमारी दृष्टि उत्तर भारत के मगध, सारनाथ या फिर आंध्र के अमरावती-नागार्जुनकोंडा पर आकर ठहर जाती है। बहुत कम लोग जानते हैं कि विंध्य पर्वतमाला के सुदूर दक्षिण में, कावेरी के किनारे और मन्नार की खाड़ी के आसपास भी तथागत के विचारों का एक स्वर्णिम युग बीता था।  

तमिल संगम काल में तमिलकम या तमिल देश (विकी से साभार ) 

प्राचीन तमिल देश, जिसे ऐतिहासिक रूप से तमिलकम कहा जाता है, सदियों तक बौद्ध दर्शन, साहित्य, न्यायशास्त्र (Logic) और कला का एक जीवंत केंद्र रहा।

आइए, दक्षिणापथ से आगे बढ़कर कांचीपुरम और नागपट्टिनम के तटों तक फैले तमिल नाडु के इस भूले बिसरे बौद्ध गौरव की यात्रा करते हैं।

1. दक्षिण में बौद्ध धर्म का आगमन और दक्षिणापथ

प्राचीन काल में उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने वाला महान व्यापारिक मार्ग दक्षिणापथ केवल वस्तुओं के लेन-देन का माध्यम नहीं था, बल्कि यह विचारों का महामार्ग भी था। बौद्ध भिक्षु, भिक्षुणियां और सार्थवाह (व्यापारिक कारवां) इसी मार्ग से आगे बढ़ते हुए आंध्र से सुदूर दक्षिण की ओर आते जाते थे।

बौद्ध साहित्य और "महावंश" (श्री लंका में लिखा गया पुरातन इतिहास ग्रंथ) के अनुसार, सम्राट अशोक (राजकाल ईसापूर्व 268 से ईसापूर्व 232 तक) ने अपने पुत्र महेंद्र (पाली भाषा में महिंदा) और पुत्री संघमित्रा (पाली में संघमित्ता), को श्रीलंका में धम्म प्रचार के लिए भेजा था। 

उनकी इस समुद्री यात्रा के दौरान उन्होंने तमिलकम के तटीय क्षेत्रों में भी विश्राम किया और बौद्ध धर्म की नींव रखी। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक, चेर, चोल और पांड्य राजाओं के राज्यों में धम्म का प्रवेश हो चुका था। 

इसका बड़ा प्रमाण हमें प्राचीन पांड्य देश (मदुरै के आस-पास) की पहाड़ियों में मिलता है। मगुलामलाई (मंगुलम) जैसी प्राकृतिक चट्टानी गुफाओं में आज भी ईसा पूर्व तीसरी सदी के तमिल-ब्राह्मी अभिलेख और पत्थरों को तराश कर बनाए गए भिक्षुओं के पत्थर से बने बिस्तर मौजूद हैं। इन गुफाओं की छतों पर विशेष रूप से 'ड्रिप-लेज' (पानी निकालने का रास्ता) बनाई गई थी, ताकि बारिश का पानी अंदर न आ सके। ये दुर्गम पहाड़ियाँ गवाह हैं कि कैसे बौद्ध भिक्षुओं ने इन्हें अपने वर्षावास और कठोर साधना का केंद्र बनाया था।

2. व्यापारिक संपर्क: धम्म और सार्थवाह

प्राचीन तमिलकम में बौद्ध धर्म को फलने-फूलने में यहाँ के समृद्ध व्यापारिक वर्ग शेट्टी (Chetty) या पाली में श्रेष्ठि, ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई। प्राचीन तमिल साम्राज्य के पत्तन रोम, सुमात्रा, जावा और चीन के साथ समुद्री व्यापार के मुख्य केंद्र थे।

कावेरीपूमपट्टिनम (पुहार), नागपट्टिनम और मल्लई (महाबलिपुरम या मम्मलपुरम) जैसे बंदरगाहों से जब बौद्ध व्यापारी जहाजों में बैठते थे, तो वे अपने साथ धम्म की पुस्तकें और मूर्तियां भी ले जाते थे। बौद्ध धर्म का स्वभाव उदार और जातिगत बंधनों से मुक्त था, इसलिए व्यापारियों ने बौद्ध विहारों को दिल खोलकर दान दिया। इन तटीय नगरों में भव्य विहार, चैत्य और बुद्ध के चरणों के प्रतीक (बुद्धपाद) बनाए गए, जो विदेशी नाविकों और स्थानीय निवासियों के लिए आस्था के मुख्य केंद्र बने। 

महाबलीपुरम में लाइटहाउस (प्रकाश स्तम्भ या दीप स्तम्भ)। बायां लाइटहाउस ब्रिटिश राज में बना, दाईं ओर प्राचीन झोंपड़ी नुमा दीप स्तम्भ है जिसे रात में नाविकों की सहायता के लिए लकड़ियां जला कर प्रकाशित किया जाता था


3. तमिल साहित्य में बौद्ध धम्म  

संगम काल और उसके ठीक बाद का तमिल साहित्य बौद्ध धर्म से प्रभावित रहा था। तमिल साहित्य के "पांच महाकाव्यों" (Aimperum-kappiyangal / एम्पेरुम-कापियांगल ) में से दो सीधे तौर पर बौद्ध दर्शन से जुड़े हैं, पहला कुंडलकेसी (जिसके अब केवल कुछ अंश मिलते हैं) और दूसरा महान ग्रंथ है 'मणिमेकलई'

बौद्ध कवि सीत्तलई सत्तनार द्वारा रचित 'मणिमेकलई' केवल एक काव्य नहीं, बल्कि एक दार्शनिक दस्तावेज है। यह महाकाव्य 'शिल्प्पादिकारम' की अगली कड़ी है। मणिमेकलई की कथा संक्षेप में इस प्रकार है: नृत्यांगना माधवी और कोवलन की सुन्दर पुत्री मणिमेकलई, सांसारिक जीवन को छोड़कर बौद्ध भिक्षुणी बन जाती है। उसे एक चमत्कारी पात्र 'अक्षय पात्र' मिलता है, जिससे वह भूखों को भोजन कराती है।

यह ग्रंथ बौद्ध धर्म के 'करुणा' और 'सेवा' के सिद्धांत को रेखांकित करता है। इसके अंतिम अध्यायों में बौद्ध दर्शन के चार आर्य सत्य, प्रतीत्यसमुत्पाद और बौद्ध न्याय (Logic) का ऐसा विशद वर्णन है, जो उस समय के तमिल समाज पर बौद्ध धर्म के गहरे बौद्धिक प्रभाव को दर्शाता है।

4. कांचीपुरम: दक्षिण का 'नालंदा' और ह्वेनसांग का आंखों देखा हाल

अगर उत्तर भारत में नालंदा और पश्चिम में वल्ल्भी शिक्षा के केंद्र थे, तो दक्षिण भारत में कांची (आधुनिक कांचीपुरम) को वही गौरव प्राप्त था। यह बौद्ध अध्ययन का एक वैश्विक विश्वविद्यालय था, जहाँ देश-विदेश से विद्वान आते थे।

सातवीं शताब्दी में जब चीनी यात्री ह्वेनसांग कांची पहुंचे, तो उन्होंने यहाँ के वैभव का विस्तृत वर्णन किया। ह्वेनसांग लिखते हैं:

  • कांचीपुरम में लगभग 100 बौद्ध संघाराम (विहार) थे, जिनमें 10,000 से अधिक भिक्षु निवास करते थे, जो थेरवाद और महायान दोनों परंपराओं का अध्ययन करते थे।

  • उन्होंने यहाँ सम्राट अशोक द्वारा निर्मित एक विशाल स्तूप को भी देखा था।

  • ह्वेनसांग ने उल्लेख किया कि कांचीपुरम के लोग शिक्षा, करुणा और धार्मिक सहिष्णुता के लिए जाने जाते थे।

5. कांची के महान दार्शनिक

कांची की पावन भूमि ने बौद्ध जगत को ऐसे दो रत्न दिए जिन्होंने पूरे विश्व का इतिहास बदल दिया:

आचार्य दिगनाग 

पाँचवीं-छठी शताब्दी में हुए आचार्य दिङ्नाग को न्याय और तर्कशास्त्र का पितामह माना जाता है। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान को चुनौती देते हुए 'प्रमाण समुच्चय' की रचना की। कांची में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे नालंदा भी गए। उनके तर्कशास्त्र ने पूरे एशिया के बौद्ध दर्शन को एक तार्किक आधार दिया।

बोधिधर्म 

छठी शताब्दी के महान बौद्ध भिक्षु बोधिधर्म कांचीपुरम के एक पल्लव राजकुमार थे। उन्होंने राजसी ठाट-बाट छोड़कर ध्यान मार्ग को अपनाया। वे समुद्री मार्ग से चीन पहुंचे, जहाँ उन्होंने चान (Chan) बौद्ध धर्म की नींव रखी, जिसे आज जापान में 'ज़ेन' (Zen) के नाम से जाना जाता है। 

(पाली भाषा का शब्द झान, संस्कृत में ध्यान, चीन में चान, कोरिया में सोन और जापान में ज़ेन कहलाने लगा।) 

भिक्षु बोधिधर्म चीन के प्रसिद्ध शाओलिन मंदिर भी गए, जहाँ उन्होंने भिक्षुओं को ध्यान के साथ-साथ आत्मरक्षा के लिए मार्शल आर्ट्स (कुंग-फू) की शिक्षा दी, जिसकी जड़ें प्राचीन तमिल 'कलरीपायट्टु' या 'सिलंबम' से जुड़ी मानी जाती हैं।

6. चोल काल का नागपट्टिनम

आमतौर पर माना जाता है कि 10वीं शताब्दी के बाद बौद्ध धर्म भारत से लुप्त होने लगा था, लेकिन तमिल नाडु का नागपट्टिनम 11वीं और 12वीं शताब्दी (चोल राजवंश के चरम) में भी बौद्ध धर्म का एक स्वर्णिम द्वीप बना रहा।

इस काल में श्रीविजय साम्राज्य (आधुनिक सुमात्रा, इंडोनेशिया) के शैलेंद्र वंशीय राजा चूड़ामणि वर्मन ने चोल सम्राट राजराजा चोल प्रथम की अनुमति से नागपट्टिनम में एक भव्य बौद्ध विहार का निर्माण करवाया, जिसे 'चूलामणि विहार' कहा जाता है। राजराजा चोल के पुत्र राजेन्द्र चोल प्रथम ने प्रसिद्ध 'लेडन ताम्रपत्र' (Leiden Copper Plates) के माध्यम से इस विहार के रख-रखाव के लिए पूरे आनाईमंगलम गांव को दान में दे दिया था।

नागपट्टिनम अपनी उत्कृष्ट कांस्य बुद्ध मूर्तियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। चोल शिल्पकारों द्वारा बनाई गई ये मूर्तियां कला और अध्यात्म का अनूठा संगम हैं, जिनमें बुद्ध को अभय मुद्रा में, सुंदर प्रभामंडल के साथ दिखाया गया है।

7. बौद्ध धम्म की विस्मृति और आधुनिक पुनरुत्थान

तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दी के बाद भक्ति आंदोलन के प्रसार, शैव और वैष्णव संतों के उभार, और राजकीय संरक्षण की कमी के कारण बौद्ध धर्म तमिल नाडु के जनमानस से धीरे-धीरे ओझल हो गया। 

परंतु, उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में तमिल नाडु में बौद्ध धर्म का एक आधुनिक पुनरुत्थान हुआ:

अयोध्यादास पंडित (Iyothee Thass Pandithar या ईयोथीथास पण्डितार ): वे एक महान तमिल विद्वान, सिद्ध चिकित्सक और समाज सुधारक थे। उन्होंने स्थापित किया कि तमिल नाडु समाज के हाशिए पर पड़े लोग मूल रूप से प्राचीन बौद्ध थे। 1898 में दास अमरीकन बौद्ध कर्नल हेनरी स्टील ओलकॉट की सहायता से श्री लंका गए और दीक्षा ली। उन्होंने श्रीलंका के बौद्ध भिक्षु अनगारिक धर्मपाल की सहायता से मद्रास (चेन्नई) में 'साउथ इंडियन शाक्य बौद्ध सोसाइटी' की स्थापना की। उन्होंने 'ओरु पैैसा तमिळन' नामक अखबार के माध्यम से धम्म के विचारों को पुनर्जीवित किया।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर का प्रभाव: 1956 में जब बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने नागपुर में लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया, तो इसकी गूंज तमिल नाडु में भी सुनाई दी। अयोध्यादास पंडित द्वारा तैयार की गई वैचारिक भूमि के कारण, तमिल नाडु के लाखों लोगों ने बाबासाहेब के आह्वान पर पुनः धम्म की शरण ली, जिससे आज भी यहाँ एक जीवंत बौद्ध समुदाय मौजूद है।

प्राचीन तमिल नाडु का बौद्ध इतिहास हमें सिखाता है कि धम्म केवल एक धार्मिक पहचान नहीं थी, बल्कि यह तमिल संस्कृति, भाषा, कला और वैश्विक संबंधों को गढ़ने वाली एक वैचारिक क्रांति थी। कांचीपुरम के स्तूपों से लेकर शाओलिन मंदिर तक, तमिल नाडु के भिक्षुओं ने जो लौ जलाई थी, उसकी चमक आज भी विश्व इतिहास में बिखरी हुई है।   

महाबलीपुरम में समुद्र किनारे एक मंदिर - Shore Temple या पैगोडा। ये मंदिर 700 -728 में पल्लव राजा नरसिम्हा वर्मन द्वारा बनवाया गया था। यूरोप के व्यापारी नाविक इसे Seven Pagodas के नाम से जानते थे। फिलहाल तो यहाँ एक ही पैगोडा है। 2004 की सुमानी के बाद यहाँ से रेत हट गई और बहुत से गढ़े हुए ग्रेनाइट पत्थरों के अवशेष मिले। हो सकता है कि यहाँ सात मंदिर या पैगोडा रहे हों  

8. चलते चलते 

(क) पांच तमिल महाकाव्य या ऐम्पेरुमकप्पियम
- सिलाप्पादिकारम: यह कवि इलांगो अडिगल की रचना है। यह एक प्रसिद्ध प्रेम और दुःख भरी कहानी है। इसमें कोवलन नाम के व्यापारी को चोरी के झूठे आरोप में मार दिया जाता है। इस पर उस की पत्नी कन्नगी न्याय के लिए लड़ती है और अपनी दैविक शक्ति से पूरे शहर को नष्ट कर देती है। 
मणिमेकलाई: इसके रचनाकार सीतलाई सत्तनार हैं और यह कहानी 'सिलाप्पादिकारम' की अगली कड़ी है। इसमें कोवलन और माधवी की बेटी मणिमेकलाई सांसारिक मोह-माया से दूर होकर, बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को अपनाती है और एक भिक्षुणी बनकर लोगों की सेवा करती है। 
- दैविक सिन्तामणि: (या दैविक चिंतामणि) इसके रचयिता जैन मुनि तिरुत्तक्क देव (या तिरुताक्क देवर) हैं। इसमें दैविक (जिसे सिवक, सीवका या जीवक भी कहा जाता है) नाम के एक राजकुमार की वीरता, बुद्धिमानी और उसकी आठ शादियों का वर्णन है। अंत में सीवका अपने राज्य और धन-दौलत को छोड़कर एक जैन मुनि बन जाता है। 
- कुण्डलकेसी: इसके लेखक नाथाकुत्तनार(या नाटकुटनार) हैं। यह ग्रंथ बौद्ध धर्म के दर्शन पर आधारित है। इस में मुख्य पात्र कुण्डलकेसी नाम की एक घुंघराले बालों वाली महिला है। इस महाकाव्य में जीवन की सच्चाई की खोज का बहुत सुंदर वर्णन किया गया है। इस की मूल प्रति उपलब्ध नहीं है और इसकी जानकारी दूसरे ग्रंथों में दिए गए संदर्भ, श्लोक और भाष्य से मिलती है।  
वलैयापति: रचनाकार का नाम ज्ञात नहीं है। यह पारिवारिक सम्बन्ध, नैतिक शिक्षा देने वाली मान्यताओं और समाज के नियमों पर आधारित है।
(ख) लेडेन ताम्रपत्र (Leiden Copper Plates)
ये ताम्रपत्र ग्यारहवीं शताब्दी के चोल राजवंश के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज हैं, जो राजा राजराजा चोल प्रथम और उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम के शासनकाल से संबंधित हैं। कुल 24 ताम्रपत्रों में तमिल और संस्कृत भाषाओं (ग्रंथ लिपि) में लेख उकेरे गए हैं। इनमें नागपट्टिनम (तमिलनाडु) में बने चूड़ामणि बौद्ध विहार को दान में दिए गए गांवों और जमीनों का विस्तृत विवरण है। 
ये ताम्रपत्र चोल साम्राज्य की धार्मिक सहिष्णुता, प्रशासनिक व्यवस्था और दक्षिण-पूर्व एशिया (श्रीविजय साम्राज्य) के साथ उनके मजबूत व्यापारिक व राजनयिक संबंधों को दर्शाते हैं। लंबे समय तक नीदरलैंड की लेडेन यूनिवर्सिटी में सुरक्षित रहने के बाद, इन ऐतिहासिक पत्रों को पिछले दिनों भारत को वापस सौंप दिया गया है।

(ग ) प्रमुख तमिल बौद्ध विद्वान और भिक्षु

  • आचार्य दिङ्नाग - छठी शताब्दी: कांचीपुरम में जन्मे दिङ्नाग को बौद्ध न्यायशास्त्र (Buddhist Logic) का पितामह माना जाता है। उन्होंने पारंपरिक दर्शन को चुनौती देते हुए अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'प्रमाण-समुच्चय' की रचना की, जिसने पूरे एशिया के बौद्ध दर्शन को एक नया तार्किक आधार दिया। उन्होंने ज्ञान के केवल दो साधन माने - प्रत्यक्ष और अनुमान, और 'हेतुचक्र' की रचना की। 

  • बुद्धदत्त - पांचवीं शताब्दी: थेरवाद बौद्ध परंपरा के यह महान लेखक और टीकाकार चोल साम्राज्य के समकालीन थे। उन्होंने अनुराधापुर (श्रीलंका) के महाविहार में रहकर अध्ययन किया और 'विनय-विनिच्चय' सहित पालि भाषा में कई महत्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथों की रचना की।

  • धर्मपाल - पांचवीं-छठी शताब्दी: यह एक प्रख्यात थेरवाद बौद्ध भिक्षु और भाष्यकार थे, जिनका जन्म तमिल नाडु के चेन्नई तटीय क्षेत्र (बदरतित्थ विहार) में माना जाता है। उन्होंने पालि अट्ठकथाओं (टीकाओं) पर अत्यधिक प्रामाणिक और विशद व्याख्याएं लिखीं, जो आज भी थेरवाद परंपरा का मुख्य आधार हैं।

  • बोधिधर्म - छठी शताब्दी: कांचीपुरम के पल्लव राजवंश के राजकुमार, जिन्होंने राजसी जीवन त्याग कर बौद्ध भिक्षु का मार्ग चुना। वे समुद्री मार्ग से चीन पहुंचे, जहाँ उन्होंने 'चान' बौद्ध धर्म की नींव रखी, जिसे आज जापान और पूरी दुनिया में 'ज़ेन' (Zen Buddhism ) के नाम से जाना जाता है; उन्होंने ही शाओलिन मंदिर में कुंग-फू की शुरुआत की थी।

  • बोधिसेन - आठवीं शताब्दी: कांचीपुरम के एक असाधारण बौद्ध विद्वान और भिक्षु, जिन्होंने चीन की यात्रा की और फिर वहां से जापान चले गए। जापान में उन्हें बोदैसेन्ना या बोरुसेना के नाम से जाना जाता है, जहाँ उन्होंने 752 ईस्वी में नारा के प्रसिद्ध तोडाई-जी मंदिर में विशाल कांस्य बुद्ध प्रतिमा की 'नेत्र-उन्मीलन' (Eye-opening) रस्म का नेतृत्व किया और अपने हाथों से आँखों में रंग भरा था।

  • वज्रबोधि - सातवीं-आठवीं शताब्दी: एक महान तांत्रिक बौद्ध भिक्षु थे जिनका जन्म कुछ इतिहासकारों के अनुसार, प्राचीन तमिलकम में हुआ था। वे कांचीपुरम तथा नालंदा से जुड़े थे। वे श्री लंका और और श्री विजय (सुमात्रा ) होते हुए समुद्री मार्ग से चीन गए और वहाँ तांत्रिक झेनयान बौद्ध धर्म का प्रसार किया। यही शिक्षा जापान पहुँच के 'शिंगोन बौद्ध धर्म' में तब्दील हो गई। वज्रबोधि को शिंगोन बौद्ध धर्म के आठ मूल आचार्यों में गिना जाता है।

  • सीत्तलै सत्तनार: संगम/उत्तर-संगम काल के प्राचीन तमिल नाडु के एक महान बौद्ध कवि और अनाज व्यापारी थे। इन्होंने तमिल साहित्य के अमर महाकाव्य 'मणिमेकलई' की रचना की थी। ये कवी इलांगो आदिगाल के मित्र थे। उनकी इस कृति में बौद्ध धर्म के करुणा, सेवा और प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धांतों का सबसे सुंदर साहित्यिक चित्रण मिलता है।

  • बुद्धमित्र - ग्यारहवीं शताब्दी: चोल राजा वीर राजेंद्र के शासनकाल के दौरान हुए थे। वे एक प्रसिद्ध तमिल बौद्ध व्याकरणविद् थे। उन्होंने 'वीरसोलियम' नामक एक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की, जो बौद्ध परिप्रेक्ष्य से तमिल व्याकरण और काव्यशास्त्र को समझाने वाला एक अनूठा समन्वय है।

(घ) और आगे पढ़ने के लिए : 
  1. Manimekalai — Translated by Merchant, A.S. (A classic English translation of the Tamil Buddhist epic).

  2. Buddhism in Tamil Nadu: Collected Papers — Institute of Asian Studies, Chennai (1998).

  3. The Story of Buddhism in Tamil Nadu — Dr. A. Veluppillai.

  4. Buddhism in South India — D.C. Ahir.

  5. On Yuan Chwang's Travels in India (629-645 AD) — Thomas Watters (For Xuan Zang's descriptions of Kanchi).

  6. Selected Writing of Iyothee Thass — Critical editions on modern Buddhist revival in Tamil Nadu.