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Sunday, 1 November 2020

सब्ज़ी ले लो

शौपिंग चाहे कपड़े की हो या सब्ज़ी की गोयल साब को झंझट का काम ही लगता है. ये बात और है की कपड़े अगर मॉल से लें तो पिकनिक का मज़ा आ जाता है. ए सी हॉल में घूमना हो जाता है और फिर कुछ खाना पीना भी हो जाता है. किसी किसी मॉल में सब्जी और फल की दूकान या काउंटर लगा होता है वहां गोयल साब को सब्ज़ी लेना थोड़ा बेहतर लगता है. पर घर के आसपास ठेले वाले से सब्ज़ी लेना बेसुरा काम लगता है पर करना पड़ता है. श्रीमती का आदेश भी मानना जरूरी है क्या किया जाए?

जब गोयल साब थैला लेकर बाज़ार की तरफ चले तो रास्ते में रिटायर्ड दोस्त मनोहर भाई ने पूछा,

- आज क्या लेने जा रहे हो गोयल सा?

- आदेश हुआ है की प्याज और लस्सन ले आना. वही लेने जा रहा हूँ और क्या. ये काम सबसे मुश्किल लगता है मुझे. पर करना तो है ही. बड़े बड़े प्याज लेकर जाउंगा तो कहेगी छोटे लाने थे. अगर छोटे ले जाऊं तो कहेगी गोली जैसे प्याज क्यूँ ले आए? अपनी वाट तो लगनी ही है.     

- हेंहेंहें! गोयल सा एक ट्रिक बताता हूँ ये झंझट ख़तम हो जाएगा. प्याज सौ ग्राम और लस्सन एक किलो ले जाओ. घर वापिस पहुंचोगे तो एक बार तो बादल गरजेंगे पर आइन्दा के लिए झंझट समाप्त हो जाएगा. कितनी आसान सी ट्रिक है ना? भाई आज कर डालो.

किया तो वही था पर ट्रिक फ्लॉप हो गई. जोरदार डांट पड़ी. बात श्रीमती मनोहर तक जा पहुंची और मनोहर भाई की भी कान खिंचाई हो गई. आइन्दा के लिए ये रास्ता बंद हो गया. 

बात ये है कि गोयल सा को खाने का ज्ञान तो है पर पकाने का ज्ञान नहीं है तो सब्जियों की शौपिंग कैसे होगी? और फिर मोल तोल करना भी नहीं आता. किसी मॉल से कुछ लेना हो या फिर ऑनलाइन मंगानी हो तो मोल भाव का मतलब नहीं है इसलिए ऐसी शौपिंग आसान हो जाती है. लेकिन ऐसे में धनिया या मिर्च बोनस में नहीं मिलता. ये बात पता नहीं अच्छी है या बुरी, पर महिलाओं को ये फ्री का बोनस बहुत पसंद है. कॉलोनी में जो सब्ज़ी बेचने आता है वो भी बड़ा घाघ है. महिलाएं सब्जी लेंगी तो धनिया या हरी मिर्च या दोनों फ्री थमा देगा लेकिन मर्दों को नहीं. मांग लिया तो ठीक और नहीं माँगा तो नहीं देगा. नतीजतन डांट पड़ने की संभावना सौ प्रतिशत बनी रहती है.  

परसों की ही बात है कि गोयल सा के कानों में ऊँची कर्कश आवाज़ आई 'सब्ज़ी ले लो'. उसके तुरंत बाद किचन से मधुर मधुर आवाज़ आई 'सुनो कोई सब्ज़ी ले लो मैं बिज़ी हूँ'. 

- हूँ ओके ओके! आदेश का पालन करने के लिए गोयल सा ने जेब में पर्स डाला, मुंह पे मास्क चढ़ाया और चप्पल ढूंढी. बाहर देखा तो सब्जी वाला पहुँच चुका था. मिसेज़ जामवाल उस से शिकायत कर रही थी और गोयल सा का हाल भी पूछ रही थी बिना जवाब सुने,

- पहले तुम इस गेट से आते थे अब दूसरे गेट से आते हो. देखो ये कैसी गाजर है? अच्छी वाली सब्जियां बाँट के अब आ रहे हो. नमस्ते गोयल भाईसाब. ये आलू एक किलो और प्याज एक किलो. भाईसाब आज आप आए हो? संध्या ठीक है? टमाटर भी दे दे और हिसाब कर दे. बच्चे ठीक हैं जी? धनिया नहीं डाला? और हरी मिर्च?

तब तक मिसेज़ पालीवाल सर पर तौलिया लपेट कर आ गई. गोयल सा ने दूरी थोड़ी और बढ़ा ली. सबला शक्ति से दूर ही ठीक हैं. अब मिसेज़ पालीवाल गोयल सा से, सब्ज़ी वाले से और मिसेज़ जामवाल से एक साथ बतियाने लगी पर जवाब सुनने की उनकी इच्छा नहीं थी. - अरे तू मेथी लाया कि नहीं? ख़तम? जामवाल जी आप ने तो छाँट छाँट के मेथी ले भी ली! गुड मोर्निंग गोयल साब. लो पालक भी बची खुची पड़ी है. गोभी कैसे दी?

जब गोयल सा की नज़र मेथी पर थी तो वो बिक गई और जब गोभी पसंद आई तो वो भी गई. अब तो बचे थे केवल सिंघाड़े गोयल सा ने सोचा फिलहाल यही ले चलो. सब्जी वाले से पूछा भाई कैसे दिए सिंघाड़े? उसने तो नहीं सुना पर मिसेज़ अग्रवाल ने ठेले के नज़दीक आते आते सुन लिया. तुरंत सिंघाड़े उठा कर टोकरी में डाल दिए - एक किलो कर दे! नमस्ते भाईसाब. 

भाईसाब ने नज़र मारी तो ठेले में शकरकंदी ही बची थी. चार शकरकंद लेकर वापिस आ गए. अब खाली हाथ क्या वापिस जाना था. पर वही हुआ जिसका अंदेशा था. 

- ये सब्ज़ी लाए आप? ये सब्ज़ी है? तुम्हारे सारे काम ऐसे ही होते हैं!

गोयल सा ने सब्ज़ी खरीदी 


Wednesday, 28 October 2020

लॉकर में बंद

बैंकों में आजकल लोन के अलावा सोने के सिक्के, इन्शोरेन्स, मेडिक्लैम, म्यूच्यूअल फण्ड भी मिलने लगे हैं. पहले ये सब झमेला नहीं था. अब इसे झमेला ना कह कर  'फाइनेंशियल लिटरेसी' कहा जाने लगा है. याने पैसे कहाँ लगाने हैं और ब्याज ज्यादा कहाँ मिलेगा ये बताया जाता है. 

चालीस बरस बैंक की नौकरी कर ली, मकान बना लिया, बच्चे सेटल कर दिए और बुढ़ापे का भी इंतज़ाम कर लिया पर आज भी अगर ब्रांच में जाएं तो कोई ना कोई 'फाइनेंशियल लिटरेसी' का ज्ञान देने लग जाता है. लच्छेदार लेक्चर सुनने को मिलता है. सुन कर लगता है हम तो 'फाइनेंशियल इल-लिटरेट ही रह गए. जो भी हो अब रिटायरमेंट के बाद तो फिक्स डिपाज़िट ही अच्छी लगती है. और एक चीज़ जो अच्छी लगती है वो है 'माल' जो कभी लॉकर में डाला था. पर उसकी भी चाबी अपनी जेब में नहीं बल्कि श्रीमती के पर्स में होती है. हम तो बॉडीगार्ड की तरह पीछे पीछे चले जाते हैं और ड्राईवर की तरह गाड़ी में बिठा कर वापिस ले आते हैं.  

इसी पर लॉकर का एक किस्सा याद आ गया. कनॉट प्लेस के एक बैंक की शाखा में बहुत से लॉकर थे. कुछ छोटे, कुछ मझोले और कुछ बड़े साइज़ के थे. गिनती में शायद चार हज़ार से कुछ ज्यादा ही होंगे. ये लॉकर एक बहुत बड़े तहखाने में थे. लॉकर की दो भारी केबिनेट पीठ से पीठ मिला कर कतारों में रखी हुई थीं. इन कतारों के बीच में कस्टमर के लिए जगह छोड़ दी गई थी. तहखाने के एक कोने में लकड़ी की पार्टीशन बनी हुई थी जिसमें बैंक की अपनी भारी भरकम तिजोरियां खड़ी थीं. इनमें दिन भर का जमा कैश रखा जाता था. 

ग्राहकों के लिए लॉकर शनिवार को डेढ़ बजे तक बंद कर दिए जाते थे. लगभग उसी समय ब्रांच का कैश मैनेजर और हैड केशियर दोनों एक साथ चाबियाँ लगा कर बंद कर देते थे. उसके बाद लोहे की ग्रिल और लोहे का भारी दरवाज़ा बंद होता था. इस तरह तहखाना बंद करके अंदर की लाइट्स बाहर से बंद कर दी जाती थी. 

शनिवार को लगभग सवा एक बजे एक मेजर साब अपनी पत्नी के साथ पधारे और लॉकर रजिस्टर साइन किया. मेजर साब श्रीमती से बोले - मैं सामने पोस्ट ऑफिस होकर आता हूँ तुम लॉकर देख लो. मैडम और उनके साथ लॉकर अधिकारी अंदर गए, लाकर खोला और अधिकारी बाहर आ गया. मैडम अपने काम में बिज़ी हो गई. उन्हें टाइम का ध्यान नहीं रहा.

उधर मैनेजर और हैड केशियर कैश बंद करने आ गए. जब ये लोग आये तो लॉकर अधिकारी ने सोचा कि अब मेरा क्या काम और वो घर की ओर रवाना हो गया. कैश बंद करने की कारवाई पूरी की गई. पहले गार्ड और चपरासी बाहर निकले, फिर तिजोरी बंद करके मैनेजर और हैड केशियर. ग्रिल गेट बंद किया गया और आखिर में बड़ा भारी भरकम दरवाज़ा भी बंद कर दिया गया. गार्ड ने बिजली का स्विच बंद कर दिया. जैसे ही अँधेरा हुआ तो मैडम अंदर जोर से चिल्लाई - ये क्या है लाइट क्यूँ बंद की? पर बाहर ना आवाज़ निकलनी थी ना निकली. 

तब तक दो बज चुके थे. मेजर साब अपनी मैडम को लेने आ गए. मैडम नदारद. वो भांप गए की गड़बड़ हो गई है. जोर जोर से चिल्लाने लगे. शोर मचा तो ब्रांच का बचा खुचा स्टाफ तहखाने में इकट्ठा हो गया. चाबी वाले मैनेजर साब तो आ गए पर हैड केशियर नदारद! वो तो घर के लिए निकल चुका था. तभी किसी ने बताया की वो अक्सर सड़क के दूसरी तरफ बस लेता है शायद अभी भी खड़ा हो?

दो लोग भागे बाहर की तरफ. हैड केशियर इत्मीनान से बस स्टॉप पर बस की इंतज़ार में खड़ा था. शनिवार और लंच टाइम की वजह से बसें कम चल रही थी. तीनों ब्रांच में वापिस भागे. लाइट जलाई गई और ताले फटाफट खोले गए.  

अन्दर मैडम फर्श पर पड़ी हुई मेजर साब का नाम बुदबुदा रही थी - मेजर बचा लो, मेजर बचा लो. मैडम की आवाज़ सुन कर सबकी जान में जान आ गई. 

सावधानी हटी और दुर्घटना घटी!

लॉकर की चाबी