कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो के अंश देखने को मिले। प्रणीत मोरे के एक कॉमेडी शो में एक मेडिकल छात्रा सेजल पवार ने मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान शव के बारे में कुछ टिप्पणियाँ कीं। उसने मज़ाक करते हुए बताया कि छात्र शवों की चीर फाड़ करते वक़्त शवों के शरीर के अंगों, विशेषकर पुरुष जननांगों के आकार की तुलना करते हैं और उन पर जोक मारते हैं।
वीडियो देखते समय मन में गुस्सा तो नहीं आया पर सच कहूँ तो मैं इस 'जोक' पर हंस भी नहीं पाया।
मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों की पढ़ाई और ट्रेनिंग के लिए शव को संरक्षित कर के रखा जाता है। इस तरह के शव को कैडावर- cadaver भी कहते हैं।
और ये यह शव आते कहाँ से हैं ? ज्यादातर स्वेच्छा से किसी परिवार द्वारा मीडिकल कॉलेज को शव दान किया जाता है। ये इसी तरह से है जैसे रक्तदान, लिवर, किडनी या नेत्र दान होता है। देहदान किये गए शवों को केमिकल लगा कर लगभग एक साल तक संरक्षित किया जा सकता है। इन शवों पर विद्यार्थी चीरफाड़ कर के शरीर के विभिन्न अंदरूनी हिस्सों का परिक्षण कर सकते हैं। ये भावी डॉक्टर को शरीर की संरचना समझने और ऑपरेशन वगैरा करने में सहायक होता है।
यह तो हम भी जानते हैं कि युवावस्था में छात्र-छात्राएँ आपस में कैसी-कैसी बातें कर लेते हैं। मेडिकल कॉलेज के छात्र - छात्राएं भी आखिर हमारे जैसे ही हैं, कोई आसमान से तो टपके नहीं। हर कॉलेज में हँसी-मज़ाक खूब होता है और ऐसा ही यहाँ भी कुछ हुआ होगा। फिर भी इस 'जोक' की सोशल मीडिया पर चर्चा और वीडियो वगैरा देखकर मन में एक असहजता बनी हुई है।
शायद इसलिए कि मैंने और मेरी पत्नी ने अपने मृत शरीरों का दान एक मेडिकल कॉलेज में रजिस्टर कराया हुआ है।
हम दोनों ने यह निर्णय बहुत सोच-विचार के बाद लिया था। परिवार में लम्बी चर्चा हुई, बच्चों की सहमति ली गई, मेडिकल कॉलेज के अधिकारियों से जानकारी प्राप्त की गई और तब जाकर यह कदम उठाया गया। हमारे लिए देहदान कोई भावुकता भरा अचानक लिया गया फैसला नहीं था। लगभग एक डेढ़ साल इस विषय पर आपस में विचार विमर्श चलता रहा था। धार्मिक, सामाजिक और भावनात्मक परम्पराएं तोड़ना आसान मामला नहीं है। हमारा यह भी विश्वास था कि जीवन के बाद भी अगर हमारा शरीर किसी विद्यार्थी की शिक्षा में काम आ सके तो उससे बड़ा शव का उपयोग क्या होगा?
मेडिकल शिक्षा में कैडावर का महत्व असाधारण है। शरीर रचना विज्ञान (Anatomy) की पढ़ाई पुस्तकों और चित्रों से शुरू अवश्य हो सकती है, पर पूरी नहीं हो सकती। शरीर के भीतर नसें कहाँ से गुजरती हैं, मांसपेशियाँ कैसे जुड़ी हैं, हड्डियों और अंगों का वास्तविक स्वरूप क्या है, यह सब एक वास्तविक मानव शरीर से सीखना काफी आसान हो जाता है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो देहदान करने वाला व्यक्ति मृत्यु के बाद भी एक शिक्षक बन जाता है। वह बोलता नहीं, फिर भी पढ़ाता है। वह चलता-फिरता नहीं, फिर भी छात्रों को बेहतर भावी डॉक्टरों बना सकता है।
इसीलिए कई मेडिकल कॉलेजों में कैडावर को "First Teacher" भी कहा जाता है।
हम यह नहीं कह सकते कि मेडिकल छात्र कैडावर के सामने हाथ जोड़कर ही खड़े रहें। आखिर उन्होनें शव की काँट-छाँट तो करनी ही है। वे लोग हर समय गंभीर मुद्रा बनाए तो खड़े नहीं रह सकते। ऐसा भी नहीं कि किसी शव के बारे में कभी कोई हल्की टिप्पणी न की गई हो। मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह कठिन और असहज परिस्थितियों में भी हास्य खोज लेता है।
परन्तु निजी या सिमित दायरे में हुई बातचीत और सार्वजनिक प्रदर्शन के हास्य में अंतर होता है। जब किसी मंच से, हजारों दर्शकों के सामने, उस व्यक्ति के शरीर को हास्य का विषय बनाया जाता है जिसने अपनी मृत्यु के बाद शिक्षा के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया, तब कहीं न कहीं उस देहदान की गरिमा कम होती नज़र आती है।
एक क्षण के लिए सोचिए कि किसी देहदाता का परिवार जो यह कार्यक्रम देख रहा हो तो उसे कैसा लगा होगा?
जिस व्यक्ति ने यह विश्वास करके अपना शरीर मेडिकल कॉलेज को सौंपा कि उससे विद्यार्थियों को ज्ञान मिलेगा, उसके बारे में यदि सार्वजनिक रूप से ठहाके लगाए जाएँ तो शायद भविष्य में लोगों का उत्साह देहदान करने में घट जाए।
भारत में वैसे ही देहदान की संख्या मेडिकल कॉलेज की आवश्यकता से बहुत कम है। हमारे शहर मेरठ की आबादी पैतीस लाख के आसपास है और जब हमने अपना नाम देहदान के लिए रजिस्टर किया तो उस लिस्ट में पैंतीस नाम भी नहीं थे। सोलह लोगों की उस लिस्ट में इकलौती लेडी डॉक्टर भी थी।
अधिकांश लोग धार्मिक, सामाजिक और भावनात्मक कारणों से इस निर्णय तक पहुँच ही नहीं पाते। हालांकि आजकल रक्तदान, लिवर, किडनी, दिल और नेत्र दान करना आम बात हो गई है पर फिर भी समाज के कुछ वर्गों में इसे ठीक नहीं माना जाता। हमारे विचार में देहदान के लिए जो लोग तैयार होते हैं वे समाज के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। ऐसे में सभी का दायित्व बन जाता है कि हम उनके प्रति सम्मान का वातावरण बनाए रखें।
हमें नहीं मालूम कि उस छात्रा के विरुद्ध क्या कार्रवाई होगी या क्या सजा दी जाएगी और न ही हम किसी दंड की माँग कर रहे हैं। मानसिक दंड तो उस छात्रा को उस दिन से ही मिलना शुरू हो गया होगा जब वीडियो पर तुरंत नाराज़गी भरे कमेंट आने लग गए। उस छात्रा का माफी मांगना मानसिक तनाव की शुरुआत ही तो है और ये स्थिति जल्दी से ख़त्म होने वाली भी नहीं है।
सज़ा से शायद समस्या का समाधान भी न हो पाए। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इस घटना को एक अवसर की तरह देखा जाए - शिक्षा में नैतिकता, संवेदनशीलता और कृतज्ञता की भावना पर पुनर्विचार किया जाए। स्थिति को दुरुस्त करने के लिए प्रयास किया जाए।
मेडिकल विद्यार्थी जब पहली बार डिसेक्शन हॉल में प्रवेश करते हैं तो उनके सामने केवल एक शव नहीं होता, वहाँ किसी का पिता, माता, पति, पत्नी, भाई या बहन होता है। एक ऐसा व्यक्ति होता है जिसने मृत्यु के बाद भी समाज की सेवा करने का एक मुश्किल निर्णय लिया था। उस शरीर के प्रति सम्मान केवल शिष्टाचार नहीं है; वह चिकित्सा व्यवसाय की नैतिकता का हिस्सा होना चाहिए।
मेरी उम्र अब 75 साल है और गायत्री की 72 साल, पर हम इस घटना के बाद भी अपने देहदान के निर्णय पर डटे हुए हैं।
यदि हमारा मृत शरीर किसी मेडिकल छात्र को एक नस या मांसपेशी पहचानने में, किसी भावी सर्जन को एक ऑपरेशन बेहतर ढंग से करने, या किसी भावी डॉक्टर को एक रोगी का जीवन बचाने में सहायता कर सके तो इससे बड़ी संतुष्टि क्या होगी?
पर साथ ही एक छोटी-सी अपेक्षा भी है: हमारे मृत शरीर को अध्ययन की वस्तु समझिए, खिल्ली उड़ाने की नहीं। ज्ञान के लिए शरीर की चीरफाड़ कीजिए, ठहाकों के लिए नहीं।
शायद यही देहदाता के प्रति सबसे बड़ा सम्मान होगा।
पुनश्च: यदि आपने मेरे पिछले ब्लॉग ‘देह दान – महा कल्याण’ और ‘अंग दान महा दान’ नहीं पढ़े हैं, तो आप निम्न लिंक पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं। उनमें मैंने अपने और अपनी पत्नी के विचारों की पूरी प्रक्रिया, परिवार के बीच कठिन बहस और देहदान पर मेडिकल कॉलेज की शर्तों का विस्तार से वर्णन किया है।
देह दान कोई मज़ाक नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक जिम्मेदारी है।
अंग दान महा दान - 23 अप्रैल 2014
*** तेरा मंगल, मेरा मंगल, सबका मंगल होए ! ***