उत्तराखण्ड को प्रायः "देवभूमि" के रूप में जाना जाता है। हिमालय की ऊँची चोटियाँ, गंगा और यमुना के उद्गम स्थल, बद्रीनाथ और केदारनाथ जैसे प्राचीन तीर्थ तथा अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य इस प्रदेश की पहचान हैं। किन्तु उत्तराखण्ड का एक और पक्ष भी है, जो अपेक्षाकृत कम चर्चित है—उसकी बौद्ध विरासत।
जब भारतीय बौद्ध इतिहास की चर्चा होती है तो सामान्यतः बोधगया, सारनाथ, नालन्दा, सांची, अमरावती या गांधार जैसे केन्द्रों का नाम लिया जाता है। उत्तराखण्ड शायद ही कभी इस सूची में दिखाई देता है। इसका कारण भी स्पष्ट है - यहाँ न तो नालन्दा जैसा विश्वविद्यालय था और न ही अमरावती जैसा विशाल स्तूप। फिर भी उपलब्ध साहित्यिक, पुरातात्त्विक और सांस्कृतिक साक्ष्य बताते हैं कि बौद्ध धर्म ने इस हिमालयी प्रदेश को स्पर्श किया था और सदियों तक इसके सांस्कृतिक जीवन पर अपना प्रभाव छोड़ा।
आज का उत्तराखण्ड भारत के उत्तरी भाग में स्थित एक पर्वतीय राज्य है। इसके पूर्व में नेपाल, उत्तर में तिब्बत (चीन), पश्चिम में हिमाचल प्रदेश तथा दक्षिण में उत्तर प्रदेश स्थित हैं। लगभग 53,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस राज्य का अधिकांश भाग हिमालयी पर्वतों, गहरी घाटियों और तेज प्रवाह वाली नदियों से निर्मित है। गंगा और यमुना जैसी महान नदियों का उद्गम यहीं से होता है।
2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की लगभग 83 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दू है। शेष जनसँख्या में मुसलमान, सिख, बौद्ध, ईसाई और अन्य समुदाय हैं। बौद्धों की संख्या आज बहुत कम है, किन्तु इतिहास में उनकी उपस्थिति के संकेत अनेक रूपों में प्राप्त होते हैं।
उत्तराखण्ड की भौगोलिक स्थिति सदैव विशेष रही है। यह केवल भारत का एक पर्वतीय क्षेत्र नहीं, बल्कि भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच एक महत्त्वपूर्ण संपर्क-क्षेत्र भी रहा है। यही स्थिति आगे चलकर इसे बौद्ध इतिहास से जोड़ती है।
बुद्धकाल में वर्तमान उत्तराखण्ड किसी प्रमुख महाजनपद का केन्द्र नहीं था। फिर भी यह क्षेत्र प्राचीन भारतीयों के लिए अपरिचित नहीं था। पालि साहित्य और जातक कथाओं में "हिमवन्त" अथवा "हिमवंत" का उल्लेख बार-बार मिलता है।हिमवन्त केवल पर्वतों का नाम नहीं था। यह हिमालय के विशाल वनप्रदेश, नदियों, घाटियों और तपोभूमियों का प्रतीक था। अनेक जातक कथाओं में बोधिसत्त्व (जो बुद्ध के मार्ग पर च रहा है और सब को साथ ले कर चलना चाहता है) हिमवन्त के वनों में तपस्या करते हैं या पशु-पक्षियों के रूप में जन्म लेकर करुणा, त्याग और नैतिकता का संदेश देते हैं।
महाकपि जातक कथा में बोधिसत्त्व एक महान वानर-राजा के रूप में हिमालयी वनप्रदेश में अपने समुदाय की रक्षा करते हैं। रुरु जातक कथा में वे हिमालय क्षेत्र के एक करुणामय स्वर्ण-मृग के रूप में प्रकट होते हैं जो एक डूबते हुए मनुष्य का जीवन बचाता है। इन कथाओं से स्पष्ट है कि हिमालय बौद्ध कल्पना में आध्यात्मिकता, वन्य जीवन और नैतिक आदर्शों की भूमि के रूप में प्रतिष्ठित था।
यद्यपि इन ग्रन्थों में वर्तमान उत्तराखण्ड का नाम नहीं मिलता, किन्तु अधिकांश विद्वान मानते हैं कि हिमवन्त की अवधारणा में नेपाल, उत्तराखण्ड और समूचे मध्य हिमालय के क्षेत्र सम्मिलित थे।
बुद्ध स्वयं उत्तराखण्ड आए थे, इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है। फिर भी हिमवन्त का बार-बार उल्लेख यह दर्शाता है कि यह क्षेत्र प्रारम्भिक बौद्ध सांस्कृतिक संसार का हिस्सा था।
सम्राट अशोक और कलसी का शिलालेख
उत्तराखण्ड के बौद्ध इतिहास का पहला ठोस और निर्विवाद प्रमाण तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मिलता है। यह प्रमाण है—देहरादून जिले के निकट स्थित कलसी का अशोक शिलालेख।
सम्राट अशोक ने अपने धम्म के संदेशों को साम्राज्य के विभिन्न भागों में शिलालेखों और स्तम्भों पर अंकित कराया था। कलसी का शिलालेख उन्हीं में से एक हैं। यमुना और टौंस नदियों के संगम क्षेत्र के निकट स्थित यह शिलालेख अशोक की उपस्थिति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसमें नैतिक जीवन, प्राणी-मात्र के प्रति करुणा, धार्मिक सहिष्णुता, अहिंसा और प्रजा के कल्याण पर बल दिया गया है।
कलसी शिलालेख की एक विशेषता यह भी है कि इस पर हाथी की आकृति है और 'गजतमे' शब्द अंकित है। बौद्ध कला में हाथी बुद्ध के जन्म और ज्ञान-परम्परा से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश पुरातत्त्वविदों ने इस शिलालेख का पुनः अध्ययन किया और तब से यह भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अभिलेखीय स्रोतों में गिना जाता है। लगभग 2300 वर्ष प्राचीन शिलालेख अशोक के धम्म का पक्का साक्षी बना हुआ है।
क्या सम्राट अशोक के धर्म प्रचारक हिमालय तक पहुँचे थे?
उत्तराखण्ड के संदर्भ में एक रोचक प्रश्न यह है कि क्या अशोक के धर्मप्रचारक इस क्षेत्र तक पहुँचे थे?
श्रीलंका के प्राचीन बौद्ध ग्रन्थ दीपवंश और महावंश के अनुसार तृतीय बौद्ध संगीति के पश्चात् सम्राट अशोक ने विभिन्न क्षेत्रों में धर्मप्रचारक भेजे थे। इनमें भिक्षु मज्झिम (Majjhima) को "हिमवन्त प्रदेश" में भेजे जाने का उल्लेख मिलता है। बाद में सांची के स्तूपों से प्राप्त अवशेषों ने एक नई महत्ता प्रदान की।
इन अवशेष-पात्रों पर मज्झिम, कास्सपगोत्त और अन्य भिक्षुओं के नाम अंकित मिले हैं। एक अभिलेख में कास्सपगोत्त को "समस्त हिमालय प्रदेश का आचार्य" कहा गया है। प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान टी. डब्ल्यू. रीस डेविड्स ने अपनी पुस्तक Buddhist India में इन अभिलेखों का उल्लेख किया है।
निश्चय ही इन अभिलेखों से यह सिद्ध नहीं होता कि मज्झिम या कास्सपगोत्त वर्तमान उत्तराखण्ड में आए थे। किन्तु वे यह अवश्य संकेत करते हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में बौद्ध धर्म के प्रसार की परम्परा केवल साहित्यिक कल्पना नहीं थी। उसका कुछ ऐतिहासिक आधार भी रहा होगा।
मोरध्वज स्तूप
यदि कलसी उत्तराखण्ड में बौद्ध इतिहास का सबसे महत्त्वपूर्ण अभिलेख है, तो कोटद्वार के निकट स्थित मोरध्वज उसका सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक साक्ष्य माना जा सकता है।
मोरध्वज में हुए उत्खननों से एक विशाल स्तूप, पक्की ईंटों की संरचनाएँ, मिटटी की प्रतिमाएँ तथा अन्य वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। अधिकांश विद्वान इन्हें कुषाण या गुप्त काल का मानते हैं।
मोरध्वज का स्तूप उत्तराखण्ड में बौद्ध धर्म की संगठित उपस्थिति का संकेत देता है। यदि यहाँ वास्तव में एक बड़ा स्तूप परिसर था, तो यह माना जा सकता है कि इस क्षेत्र में भिक्षुओं और श्रद्धालुओं का एक सक्रिय समुदाय भी रहा होगा।
यह स्तूप इस धारणा को चुनौती देता है कि उत्तराखण्ड में बौद्ध धर्म केवल एक क्षणिक प्रभाव था। मोरध्वज बताता है कि अशोक के बाद भी कई शताब्दियों तक बौद्ध परम्पराएँ यहाँ जीवित रहीं।
सेनापानी, ब्यानधुर और सुदलीमठ
उत्तराखण्ड में बौद्ध विरासत केवल मोरध्वज तक सीमित नहीं है।
कुमाऊँ क्षेत्र के चम्पावत जनपद के निकट स्थित सेनापानी से प्राप्त प्राचीन ईंट-निर्मित अवशेष विद्वानों का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। इसी तरह से ब्यान्धुर और सुदलीमठ के घने जंगलों में शुंग काल और बौद्ध काल के रेलिंग और ईंट निर्मित अवशेष भी मिले हैं। यद्यपि इनका स्वरूप और तिथि अभी भी शोध का विषय हैं, फिर भी अनेक इतिहासकार इन्हें बौद्ध प्रभाव से जोड़कर देखते हैं।
इसी प्रकार गोपेश्वर, पाण्डुकेश्वर और जोशीमठ क्षेत्र से भी ऐसे संकेत प्राप्त हुए हैं जो हिमालयी बौद्ध प्रभाव की सम्भावना को बल देते हैं। इनमें से कई साक्ष्य प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और पुरातात्त्विक संकेतों के रूप में सामने आते हैं।
यह भी सम्भव है कि पर्वतीय भूगोल, भूकम्पों, भूस्खलनों और सीमित उत्खननों के कारण अनेक प्राचीन अवशेष समय के साथ नष्ट हो गए हों। हिमालयी क्षेत्रों में पुरातात्त्विक साक्ष्य प्रायः गंगा के मैदानों की तुलना में कम सुरक्षित रह पाते हैं।
फिर भी कलसी, मोरध्वज, सेनापानी और अन्य बिखरे हुए अवशेषों को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि बौद्ध धर्म की उपस्थिति उत्तराखण्ड में वास्तविक थी, भले ही वह बिहार, गांधार या आंध्र प्रदेश जैसी व्यापक न रही हो।
तिब्बती मार्ग, महायान और वज्रयान
इस प्रदेश की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता उसकी भौगोलिक स्थिति रही है। उत्तराखण्ड भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच स्थित एक ऐसा संपर्क-क्षेत्र था जिसने सदियों तक संस्कृतिक, व्यापार और धार्मिक विचारों के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यदि हम उत्तराखण्ड के इतिहास को केवल वर्तमान राजनीतिक सीमाओं के भीतर देखकर समझने का प्रयास करें, तो उसकी भूमिका का पूरा आकलन नहीं कर पाएँगे। प्राचीन और मध्य काल में हिमालय विभाजन की दीवार नहीं था; वह संपर्क का माध्यम था। इन पर्वतों के दर्रे कभी व्यापारियों, तीर्थयात्रियों और भिक्षुओं के मार्ग हुआ करते थे।
माणा, नीति और लिपुलेख दर्रे
उत्तराखण्ड के उत्तरी भाग में स्थित माणा, नीति और लिपुलेख दर्रे सदियों तक भारत और तिब्बत के बीच संपर्क के प्रमुख मार्ग रहे।
माणा दर्रा, बद्रीनाथ के निकट, पश्चिमी तिब्बत की ओर जाने वाले प्राचीन मार्गों में से एक था। इसी प्रकार नीति दर्रा और लिपुलेख दर्रा भी व्यापार तथा यात्राओं के महत्वपूर्ण केन्द्र रहे। इन मार्गों से होकर नमक, ऊन, पश्मीना, बोरेक्स (सुहागा या सोडियम टेट्राबोरेट) और अन्य वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था।
किन्तु इन मार्गों से केवल व्यापारिक वस्तुएँ ही नहीं चलती थीं। इनके साथ विचार, भाषाएँ, कलाएँ, धार्मिक प्रतीक और सांस्कृतिक परम्पराएँ भी यात्रा करती थीं। इतिहास में अनेक बार ऐसा हुआ है कि किसी विचारधारा का प्रसार सेना से नहीं, बल्कि व्यापारिक मार्गों से हुआ। बौद्ध धर्म इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
भोटिया समुदाय
इन हिमालयी मार्गों को जीवित रखने में स्थानीय समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उत्तराखण्ड के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले भोटिया समुदाय सदियों तक भारत और तिब्बत के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क का आधार बने रहे।
जोहार, दारमा, व्यांस, चौंदास, नीति और माणा घाटियों में रहने वाले इन समुदायों का जीवन पर्वतीय व्यापार, पशुपालन और सीमापार संपर्कों से गहराई से जुड़ा हुआ था। वे तिब्बत से ऊन, नमक और अन्य वस्तुएँ लाते थे तथा भारत से अनाज, गुड़, कपड़ा और दैनिक उपयोग की वस्तुएँ ले जाते थे।
इस सतत संपर्क का प्रभाव उनकी भाषा, वेशभूषा, लोकविश्वास और सांस्कृतिक परम्पराओं में स्पष्ट दिखाई देता है। यद्यपि अधिकांश भोटिया समुदाय स्वयं हिन्दू परम्पराओं का पालन करते रहे, फिर भी उनके सांस्कृतिक जीवन में तिब्बती प्रभावों की झलक मिलती है।
यही लोग भारत और तिब्बत के बीच सांस्कृतिक संवाद के वास्तविक वाहक थे।
महायान और वज्रयान की प्रतिध्वनि
बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद बौद्ध धर्म की एक शाखा पहली शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास महायान नाम से विकसित हुई। इसने बोधिसत्त्व आदर्श, करुणा और समस्त प्राणियों के कल्याण को विशेष महत्व दिया।
बाद की शताब्दियों में वज्रयान परम्परा विकसित हुई, जिसमें मन्त्र, मण्डल, ध्यान और तांत्रिक साधनाओं को प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ। सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच तिब्बत में महायान और वज्रयान दोनों परम्पराएँ प्रभावशाली बन गईं।
उत्तराखण्ड का तिब्बत से घनिष्ठ संपर्क होने के कारण इन परम्पराओं का प्रभाव सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुँचना स्वाभाविक था। यद्यपि उत्तराखण्ड में लद्दाख, स्पीति या तिब्बत की तरह विशाल बौद्ध मठों के प्रमाण नहीं मिलते, फिर भी सांस्कृतिक प्रभावों की उपस्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता।
यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। उपलब्ध साक्ष्य हमें यह नहीं बताते कि उत्तराखण्ड में कभी बड़े वज्रयान केन्द्र स्थापित हुए थे। परन्तु वे यह अवश्य संकेत करते हैं कि तिब्बती बौद्ध और उत्तराखण्ड के बीच संपर्क निरन्तर बना रहा।
रिनचेन ज़ांगपो और पश्चिमी तिब्बत का पुनर्जागरण
उत्तराखण्ड और तिब्बती बौद्ध जगत के सम्बन्धों की चर्चा प्रसिद्ध तिब्बती विद्वान रिनचेन ज़ांगपो के बिना अधूरी है।
958 ईस्वी में जन्मे रिनचेन ज़ांगपो को पश्चिमी तिब्बत में बौद्ध धर्म के पुनर्जागरण का सूत्रधार माना जाता है। उन्होंने संस्कृत बौद्ध ग्रन्थों का तिब्बती भाषा में अनुवाद किया और भारत तथा तिब्बत के बीच दार्शनिक सम्पर्क को सुदृढ़ बनाया।
उनके जीवन से जुड़े अधिकांश स्थल आज के पश्चिमी तिब्बत, लद्दाख और हिमालयी क्षेत्रों में स्थित हैं। यद्यपि उनके उत्तराखण्ड आगमन का प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है, किन्तु जिस व्यापक सांस्कृतिक क्षेत्र में वे सक्रिय थे, उसमें वर्तमान उत्तराखण्ड के सीमावर्ती क्षेत्र भी शामिल थे।
बद्रीनाथ और तिब्बती संपर्क
उत्तराखण्ड और तिब्बत के सम्बन्ध केवल व्यापार तक सीमित नहीं थे। धार्मिक यात्राएँ भी इस संपर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं।
बीसवीं शताब्दी के मध्य तक पश्चिमी तिब्बत के व्यापारी और कुछ बौद्ध लामा बद्रीनाथ क्षेत्र की यात्राएँ करते थे। इसी प्रकार कैलास-मानसरोवर यात्रा मार्गों के माध्यम से भी दोनों क्षेत्रों के बीच संपर्क बना रहता था।
यह तथ्य विशेष रूप से रोचक है कि पहाड़ी समाजों में धार्मिक पहचान आज की तुलना में कहीं अधिक लचीली थीं। एक ही व्यापारी या यात्री विभिन्न धार्मिक परम्पराओं के तीर्थस्थलों का सम्मान करता था। इस प्रकार बद्रीनाथ, कैलास और पश्चिमी तिब्बत एक व्यापक पहाड़ी संस्कृति से परस्पर जुड़े हुए थे।
उत्तराखण्ड : एक सांस्कृतिक सेतु
उत्तराखण्ड के बौद्ध इतिहास को समझने के लिए उसे केवल एक भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक सेतु के रूप में देखना आवश्यक है।
मगध, गांधार या अमरावती की तरह यह बौद्ध धर्म का महान केन्द्र नहीं था। किन्तु इसकी भूमिका अलग प्रकार की थी। माणा, नीति और लिपुलेख के दर्रों से होकर जाने वाले मार्ग केवल व्यापारिक रास्ते नहीं थे; बल्कि इन्हीं मार्गों से विचार, आस्थाएँ और सांस्कृतिक प्रभाव यात्रा करते रहे। यही कारण है कि उत्तराखण्ड का बौद्ध इतिहास उसके स्मारकों से अधिक उसके मार्गों में दिखाई देता है।
कलसी का शिलालेख हमें मौर्यकाल की याद दिलाता है। मोरध्वज और सेनापानी बौद्ध उपस्थिति के भौतिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। और पहाड़ी दर्रे हमें हैं कि भारत, नेपाल और तिब्बत परस्पर जुड़े हुए थे।
किन्तु समय के साथ परिस्थितियाँ बदलने लगीं। उत्तराखण्ड में बौद्ध धर्म का प्रभाव धीरे-धीरे क्षीण हुआ, जबकि हिन्दू तीर्थ-परम्पराएँ और अधिक सुदृढ़ होती गईं। दूसरी ओर तिब्बत में बौद्ध धर्म लगातार विकसित हो रहा था।
बौद्ध धर्म का अवसान, विरासत और निष्कर्ष
अब प्रश्न यह है कि यदि बौद्ध धर्म इस क्षेत्र तक पहुँचा था, तो वह यहाँ स्थायी रूप से क्यों नहीं टिक पाया?
इतिहास में किसी धर्म या संस्कृति का अवसान प्रायः किसी एक घटना का परिणाम नहीं होता। इसके पीछे अनेक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारण कार्य करते हैं। उत्तराखण्ड में बौद्ध धर्म के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
सबसे पहला कारण यह था कि उत्तराखण्ड में कभी विशाल बौद्ध संस्थानों का विकास नहीं हुआ। नालन्दा, विक्रमशिला, वल्लभी, अमरावती या नागार्जुनकोंडा जैसे केन्द्रों ने बौद्ध धर्म को दीर्घकालिक संस्थागत आधार प्रदान किया था। उत्तराखण्ड में कलसी, मोरध्वज और अन्य स्थलों के प्रमाण तो मिलते हैं, परन्तु किसी बौद्ध विहार के साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।
दूसरा कारण प्रदेश का भौगोलिक स्वरूप था। ऊँचे पर्वत, कठिन जलवायु, सीमित कृषि भूमि और विरल जनसंख्या बड़े धार्मिक संस्थानों के विकास के लिए अनुकूल नहीं थे। मैदानी क्षेत्रों की तुलना में यहाँ आर्थिक संसाधन भी कम थे।
तीसरा कारण स्थानीय धार्मिक परम्पराओं की दृढ़ता थी। उत्तराखण्ड प्राचीन काल से ही तप, तीर्थ और साधना की भूमि रहा है। गंगा और यमुना के उद्गम स्थल, केदारनाथ, बद्रीनाथ और दूसरे तीर्थस्थलों ने इस प्रदेश को हिन्दू धार्मिक जीवन का एक प्रमुख केन्द्र बना दिया।
समय के साथ शैव, वैष्णव और शाक्त परम्पराएँ अधिक संगठित और प्रभावशाली होती गईं। परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म की पृथक पहचान धीरे-धीरे कमजोर हो गई।
आदि शंकराचार्य और तीर्थ परम्परा
उत्तराखण्ड के धार्मिक इतिहास की चर्चा आदि शंकराचार्य के उल्लेख के बिना अधूरी है।
परम्परा के अनुसार आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने बद्रीनाथ धाम का पुनरुत्थान किया और ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) को अपने चार प्रमुख मठों में से एक के रूप में प्रतिष्ठित किया। यद्यपि उनके जीवन के कुछ विवरणों पर इतिहासकारों में मतभेद हैं, किन्तु इसमें संदेह नहीं कि उनके बाद उत्तराखण्ड की तीर्थ-परम्पराओं को नया बल मिला।
इस प्रक्रिया ने प्रदेश की पहचान को और अधिक स्पष्ट रूप से हिन्दू तीर्थभूमि के रूप में स्थापित किया। परिणामस्वरूप बौद्ध परम्पराएँ, जो पहले से ही सीमित आधार पर टिकी हुई थीं, धीरे-धीरे स्थानीय धार्मिक संस्कृति में समाहित होती चली गईं।
यह ध्यान देने योग्य है कि यह परिवर्तन किसी व्यापक संघर्ष का परिणाम नहीं था। भारतीय इतिहास में अनेक बार धार्मिक परम्पराएँ परस्पर प्रभाव ग्रहण करती रही हैं। करुणा, अहिंसा, दान और तप जैसे अनेक बौद्ध आदर्श व्यापक भारतीय धार्मिक जीवन का अंग बन गए।
बौद्ध धर्म भारत में क्षीण हुआ, तिब्बत में फला-फूला
उत्तराखण्ड के बौद्ध इतिहास का एक रोचक पक्ष यह है कि जिस समय भारत के अधिकांश भागों में बौद्ध धर्म का प्रभाव घट रहा था, उसी समय तिब्बत में उसका अभूतपूर्व विकास हो रहा था।
सातवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच तिब्बत महायान और वज्रयान बौद्ध परम्पराओं का प्रमुख केन्द्र बन गया। अनेक भारतीय आचार्यों की शिक्षाएँ तिब्बती भाषा में अनूदित हुईं और वहाँ सुरक्षित रहीं।
इस प्रकार उत्तराखण्ड एक विचित्र स्थिति में था। उसके उत्तर में स्थित तिब्बत बौद्ध धर्म का विशाल केन्द्र बन चुका था, जबकि उसके दक्षिण में स्थित भारत में बौद्ध संस्थाएं लगातार घट रही थीं।
फिर भी पहाड़ी मार्गों के कारण सांस्कृतिक संपर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। यही कारण है कि उत्तराखण्ड की सीमावर्ती घाटियों में भारतीय और तिब्बती प्रभावों का मिश्रण आज भी दिखाई देता है।
आधुनिक उत्तराखण्ड में बौद्ध विरासत
क्या आज उत्तराखण्ड में बौद्ध धर्म के कोई चिन्ह शेष हैं? उत्तर है - हाँ, यद्यपि वे सीमित और बिखरे हुए रूप में हैं।
कलसी का अशोक शिलालेख, मोरध्वज और सेनापानी जैसे पुरातात्त्विक स्थल हमें उस समय की याद दिलाते हैं जब इस प्रदेश में बौद्ध प्रभाव विद्यमान था। यद्यपि इन स्थलों पर अभी और विस्तृत शोध की आवश्यकता है, फिर भी उनका महत्व निर्विवाद है।
माणा, नीति और लिपुलेख जैसे पहाड़ी मार्ग आज भी इतिहासकारों और यात्रियों को उस युग की स्मृति दिलाते हैं जब हिमालय सभ्यताओं को जोड़ने वाला सेतु था। भोटिया समुदायों की सांस्कृतिक परम्पराओं में भी उस दीर्घकालिक संपर्क की झलक दिखाई देती है।
आधुनिक काल में हिमालयी इतिहास, तिब्बती अध्ययन और पुरातत्त्व के प्रति बढ़ती रुचि ने उत्तराखण्ड की इस कम-ज्ञात विरासत को पुनः चर्चा में लाना शुरू किया है।
लेखक की टिप्पणी
उत्तराखण्ड की यात्रा मैंने अनेक बार की है। कोटद्वार, पौड़ी, केदारनाथ, बद्रीनाथ, नैनीताल और राज्य के अन्य कई स्थानों पर जाने का अवसर मिला। पर उस समय ध्यान मुख्यतः हिमालय की प्राकृतिक भव्यता, तीर्थस्थलों और स्थानीय संस्कृति पर केन्द्रित था। मुझे यह जानकारी नहीं थी कि इन्हीं पर्वतों और घाटियों में बौद्ध इतिहास की इतनी रोचक परतें भी छिपी हुई हैं।
उत्तराखण्ड का बौद्ध इतिहास कुछ वैसा ही इतिहास है—बिखरे हुए साक्ष्य, दूरस्थ मार्गों और सांस्कृतिक स्मृतियों से निर्मित एक कहानी।
निष्कर्ष
उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह कहना कठिन होगा कि उत्तराखण्ड कभी बौद्ध धर्म का महान केन्द्र था। यहाँ नालन्दा जैसे विश्वविद्यालय नहीं थे और न ही सांची जैसे विशाल स्मारक समूह।
किन्तु यह कहना भी उतना ही अनुचित होगा कि उत्तराखण्ड का बौद्ध इतिहास से कोई सम्बन्ध नहीं था।
कलसी का अशोक शिलालेख, महावंश और दीपवंश में वर्णित हिमवन्त मिशन, सांची के अभिलेखों में उल्लिखित मज्झिम और कास्सपगोत्त, मोरध्वज का स्तूप, सेनापानी के अवशेष, हिमवन्त की साहित्यिक परम्परा, माणा-नीति-लिपुलेख के मार्ग तथा तिब्बत से सदियों पुराने सांस्कृतिक सम्बन्ध—ये सभी मिलकर एक ऐसी ऐतिहासिक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं जिसमें उत्तराखण्ड बौद्ध जगत का एक महत्त्वपूर्ण सीमावर्ती प्रदेश दिखाई देता है।
शायद उत्तराखण्ड की सबसे बड़ी भूमिका यही थी। वह बौद्ध धर्म का केन्द्र नहीं था, बल्कि एक सेतु था—भारत के मैदानी बौद्ध संसार और हिमालय के पार विकसित हो रहे तिब्बती बौद्ध जगत के बीच एक सेतु।
| लैंसडाउन , पौड़ी गढ़वाल की पहाड़ी शाम (फोटो लेखक द्वारा ) |
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उत्तराखण्ड में बौद्ध धर्म : एक संक्षिप्त कालक्रम
| काल | प्रमुख घटना |
|---|---|
| छठी–पाँचवीं शता. ईसा पूर्व | बुद्धकाल; बौद्ध साहित्य में हिमवन्त का उल्लेख |
| तृतीय शताब्दी ईसा पूर्व | सम्राट अशोक द्वारा कलसी शिलालेख की स्थापना |
| तृतीय शताब्दी ईसा पूर्व | महावंश के अनुसार भिक्षु मज्झिम का हिमवन्त मिशन |
| तृतीय–द्वितीय शता. ईसा पूर्व | पहाड़ी क्षेत्रों में बौद्ध धर्म के प्रसार की परम्पराएँ |
| प्रथम–तृतीय शताब्दी ईस्वी | मोरध्वज क्षेत्र में बौद्ध गतिविधियों की सम्भावित अवधि |
| चतुर्थ–षष्ठ शताब्दी ईस्वी | गुप्तकाल; बौद्ध और ब्राह्मणीय परम्पराओं का सह-अस्तित्व |
| सप्तम–दशम शता. ईस्वी | तिब्बत में बौद्ध धर्म का विस्तार |
| 958–1055 ईस्वी | रिनचेन ज़ांगपो और पश्चिमी तिब्बत का बौद्ध पुनर्जागरण |
| आठवीं–नौवीं शताब्दी ईस्वी | परम्परा के अनुसार आदि शंकराचार्य और बद्रीनाथ-ज्योतिर्मठ का पुनरुत्थान |
| 11वीं–13वीं शताब्दी ईस्वी | उत्तराखण्ड में बौद्ध धर्म का क्रमिक अवसान |
| उन्नीसवीं शताब्दी | कलसी शिलालेख का आधुनिक अध्ययन |
| वर्तमान काल | बौद्ध विरासत पर नए शोध और पुनर्मूल्यांकन |
और आगे पढ़ने के लिए
- Romila Thapar — Ashoka and the Decline of the Mauryas
- N. A. Nikam & Richard McKeon — The Edicts of King Asoka
- T. W. Rhys Davids — Buddhist India
- Étienne Lamotte — A History of Indian Buddhism
- Richard Gombrich — What the Buddha Thought
- H. W. Schumann — The Historical Buddha
- Mahavamsa (Sri Lankan Chronicle)
- Dipavamsa
- Jataka
- Sam van Schaik — Tibet: A History
- Roberto Vitali — The Kingdom of Guge
- Archaeological Survey of India (ASI) Reports on Kalsi and Mordhwaj
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