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Sunday, 31 December 2017

पहाड़ी मसाले

पिछले दिनों ऋषिकेश से आगे देवप्रयाग की ओर जाना हुआ. आम तौर पे तो सड़क किनारे चाय की दुकानें  नज़र आया करती थीं पर इस बार बहुत सी छोटी छोटी दुकानें दिखाई पड़ीं जिनमें पैकेट्स रखे हुए थे. गाड़ी रोक कर देखा तो स्ठानीय दालें और मसाले किलो और आधा किलो के पैक में बिक रहे थे. पहाड़ी किरयाना !

पहाड़ी खेती आसान नहीं है क्यूंकि सारा काम खुद ही करना पड़ता है ट्रेक्टर वगैरा नहीं चल सकते हैं. सिंचाई के साधन भी नहीं हैं बस मानसून भरोसे है. गाँव में जवान लोग नौकरी के लिए पलायन कर गए हैं और ज्यादातर पेंशनर और बच्चे हैं  खेती के लिए जोश कम होता जा रहा है. 

इनमें से कुछ चीज़ों  के नाम तो आप जानते ही होंगे जैसे तौर या तुर या तुड़, गहथ या गैथ, लोविया याने लोबिया, हल्दी, मिर्च वगैरा बाकियों के बारे में जो जानकारी मिली वो नीचे दी हुई है

चलिए साब सौदा हो गया 

दालें - रैश को रयास या झिलंगी भी कहा जाता है जो हलकी हरी या पीली दाल है. सुन्टा या लोविया का दूसरा नाम लोबिया भी है.
अनाज - भट्ट दो प्रकार के हैं काले और सफ़ेद. सफ़ेद भट्ट सोयाबीन ही है. तवे पर भट्ट बिना तेल के भून कर चबैने के काम आते हैं. कौणी और झंगोरा चावल हैं जिन्हें स्वांत के चावल भी कहते हैं.
मसाले - फरण एक तरह का धनिया है जो सुखा कर छौंक या तड़के में इस्तेमाल होता है. यह ऊँचाई पर ही पैदा होता है. जख्या हरी सरसों या राई की तरह है जो हरी सब्जियों में छौंक लगाने के काम आता है. कंडाली या बिच्छू बूटी हालांकि छू जाने से बुरी तरह से जलन पैदा कर देती है परन्तु इसे उबाल कर एक ख़ास अंदाज में साग की तरह पकाई भी जा सकती है.


- गायत्री वर्धन की प्रस्तुति. Contributed by Gayatri Wardhan.



Saturday, 11 November 2017

कुल्थी परांठा

उत्तराखंड में एक पहाड़ी दाल काफी इस्तेमाल की जाती है जिसका नाम है गैथ या कुल्थी. इस दाल के भरवां पराठे भी बनाए जाते हैं जो खाने में बड़े ही स्वादिष्ट और पौष्टिक भी होते हैं. इस दाल को लेकर एक गढ़वाली कहावत है : "पुटगी पीठ म लग जैली" याने इस दाल को खाने वाले का पेट पीठ में लग जाएगा ( चर्बी नहीं चढ़ेगी ) !

कुल्थी की दाल का परांठा 
कुल्थी की दाल के और भी नाम हैं जैसे - कुरथी, कुलथी, खरथी, गैथ या गराहट. अंग्रेजी में इसे हॉर्स ग्राम कहते हैं और इसका वानस्पतिक नाम है Macrotyloma Uniflorum. ज्यादातर पथरीली जमीन पर पैदा होने के कारण कुल्थी के पौधे का एक नाम पत्थरचट्टा भी है. संस्कृत में इस दाल का नाम कुलत्थिक है. दाल के दाने देखने में गोल और चपटे हैं और हलके भूरे चितकबरे रंग में हैं. हाथ लगाने से दाने चिकने से महसूस होते हैं.

कुल्थी की दाल 
परांठा बनाने की विधि : चार परांठे बनाने के लिए 250 ग्राम गैथ साफ़ कर के रात को भिगो दें. सुबह उसी पानी में उबाल लें. दाल को ठंडा होने के बाद छाननी में निकाल लें. पानी निथरने के बाद दाल को मसल लें. इसमें बारीक कटा प्याज, हरी मिर्च, हरा धनिया और थोडा सा अदरक कद्दूकस कर के मिला लें. नमक स्वाद अनुसार डाल कर अच्छी तरह से मिला लें. तैयार पीठी से भरवां परांठा बना लें और देसी घी से सेक लें. गरम परांठे को  चटनी और घी या मक्खन के साथ सर्व करें.


 
दाल की पीठी 


भरवें परांठे की तैयारी 

भिगोई दाल के बचे हुए पानी में निम्बू निचोड़ कर सूप बना लें. सूप टेस्टी भी होता है और फायदेमंद भी. इस दाल के साथ राजमा भी मिला कर बनाई जा सकती है.

कुल्थी के गुण : इस दाल में खनिजों के अलावा प्रोटीन, कार्बोहायड्रेट प्रचुर मात्रा में होता है. इस दाल को पथरी- तोड़ माना जाता है. दाल का पानी लगातार सेवन करने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी घुल कर निकलने लग जाती है. इस का एक सरल सा उपाय है की 15-20 ग्राम दाल को एक पाव पानी में रात को भिगो दिया जाए और सुबह खाली पेट पानी पी लिया जाए. उसी दाल में फिर पानी डाल दिया जाए और दोपहर को और फिर रात को पी लिया जाए. ये दाल इसी तरह दो दिन इस्तेमाल की जा सकती है. अन्यथा भी यह किसी और दाल की तरह पकाई जा सकती है. चूँकि ये गलने में समय लेती है इसलिए रात को भिगो कर रख देना अच्छा रहेगा. कुल्थी की दाल का पानी पीलिया के रोगी के लिए भी अच्छा माना गया है. ये दाल उत्तराखंड के अलावा दक्षिण भारत और आस पास के देशों में भी पाई जाती है.


* गायत्री वर्धन के सौजन्य से   *** Contributed by Gayatri Wardhan *


Tuesday, 7 November 2017

डुबकी

शादी की तैयारी हो रही थी पर इतने बड़े आयोजन में चुटर पुटर काम तो कभी ख़तम ही नहीं होते. किसी के नए कपड़े आने बाकी हैं, किसी का मोबाइल नहीं मिल रहा, किसी के जूते नहीं मिल रहे, किसी की गाड़ी लेट आई है या फिर हलवाई के मसाले रख कर भूल गए वगैरा वगैरा. रावत जी की मुस्कराहट कभी आती थी और कभी चली जाती थी. शादी ब्याह में ये सब चलता ही रहता है. रावत जी के दो बेटों की शादी हो चुकी थी और ये तीसरी शादी इन की बिटिया प्रिया की देहरादून में हो रही थी. खुश भी थे पर बीच बीच में मुस्कराहट गायब हो जाती थी. इसका कारण इंतज़ाम की दिक़्क़त नहीं थी बल्कि इसका कारण कुछ और ही था - बंगाली दुल्हा. 

सूरत सिंह रावत गढ़वाली राजपूत थे और उत्तराखंड के पौड़ी जिले के रहने वाले थे. दोनों बेटे फौज में थे और अपने अपने परिवारों सहित अलग अलग शहरों में पोस्टेड थे. अब छोटी बिटिया प्रिया ने बारवीं पास करने के बाद सॉफ्टवेयर का कोर्स किया, फिर एमबीए किया और फिर पुणे में नौकरी लग गई. बड़े भैय्या की इत्तेफाकन पोस्टिंग भी पुणे में ही थी. बड़े भाई को रहने के लिए क्वार्टर मिला हुआ था तो रावत जी को अच्छा लगा कि प्रिया फॅमिली में ही रह कर कुछ पैसे भी बचा लेगी. कुछ पैसे रावत जी ने भी बचा रखे हैं तो कुल मिलकर शादी बढ़िया हो जाएगी. पहाड़ी राजपूतों के कई रिश्ते भी आ रहे थे. कुंडली मिलाने का काम भी बीच बीच में चल रहा था हालांकि प्रिया ने अभी शादी के लिए हाँ नहीं की थी. फोन पर कुछ इस तरह से बातें होती थी : 

रावत जी - प्रिया बेटी हाल ठिक ठाक छिं ? नौकरी ठिक चलणि ? ले अपण माँ से बात कर.
मम्मी जी - प्रिया बेटा ब्यो क बारम के सोच ? रिश्ता आणा छिं पत्री भी मिलनी च. कब करण ब्यो ( प्रिया ब्याह के बारे में क्या सोचा है ? रिश्ते आ रहे हैं पत्री भी मिल रही है. कब करना है ब्याह ) ?
प्रिया - के जल्दि होणी तुमथे ? अभी निं करण ब्यो ( क्या जल्दी है तुमको ? अभी नहीं करना है ब्याह ) !
मम्मी जी - लो फोन ही काट द्या ! ब्यो मा अबेर होणी नोनी कतई न बुनी ( लो फोन ही काट दिया ! ब्याह में देर हो रही है लड़की कतई न बोल रही है ).

जनवरी में पता लगा कि प्रिया ऑफिस के किसी सुदीप्तो भट्टाचार्य नाम के लड़के को लेकर भाई के घर आई थी. वहां भाई भाभी ने सुदिप्तो की अच्छी खातिरदारी की और उसके जाने के बाद मम्मी पापा को फोन करके बता भी दिया. बस तब से ही मम्मी जी और पिता जी की परेशानी चालू हो गई थी. कुछ इस तरह के डायलॉग आपस में चल रहे थे :
- पहाड़म क्या रिश्ता नि मिलना छिं जो तू देशिम जाणी छे ( पहाड़ में रिश्ता नहीं मिला जो तू दूसरे देश में जा रही है ) ?
- बोली भाषा फरक च हमुल कण के बचाण ऊँक दगड़ी ( बोली भाषा फर्क है कैसे बातचीत होगी उनके साथ ) ? ?
- न बाबा इन ना केर ( न बाबा ऐसा न कर ) !
- वो बामण छिन हम जजमान ( वो ब्राह्मण है और हम राजपूत यजमान ) ?
- सब पहाड़म थू थू व्हे जाएल ( सारे पहाड़ में थू थू हो जाएगी ).
- कन दिमाग फिर इ नोनिक जरूर बंगालिल जादू केर द्या ( कैसे दिमाग फिर गया इस लड़की का. जरूर बंगाली ने जादू कर दिया ) !

पर प्रिया ने तो अपने फैसले की घोषणा कर दी थी. भाइयों ने भी सपोर्ट कर दिया और अब शादी होने वाली थी. शादी की गहमा गहमी में रावत जी को बीच बीच में गुस्सा आ जाता था. इस लड़की ने ये क्या किया ? बंगालियों में कैसे एडजस्ट होगी ? पेैल दिन ही ईंक टेंटुआ दबैक गदनम धोल दींण छ ( पहले दिन ही इसका टेंटुआ दबा के नदी की धार में डाल देना था ) !
मम्मी की चिंता लेन देन और पूजा पाठ को लेकर थी. पता नहीं दुल्हे की ढंग से पूजा भी की होगी या नहीं. जो भी हो अपनी मान्यताएं तो पूरी करनी थी. लड़की का हल्दी हाथ का कार्यक्रम शुरू हो गया.
रावत जी प्रिया की मम्मी से बोलते रहते,
- तू अपण बोली भाषा ठिक केर ले. यत अंग्रेजीम बच्या या बंगलीम ( तू अपनी भाषा ठीक कर ले. या तो अंग्रेजी में बात कर या बंगाली में ) !
- सुपरि चबाणी कु जाणी के बुनी ? लड़का त हमार जन हि छ पर बचाणा कि कुछ पता नि चलणु ( सुपारी चबा के जाने क्या बोलती है समधन. लड़का तो हमारे जैसा ही है पर बातचीत समझ नहीं आ रही है) ?

उधर प्रिया अपने ही चक्कर में लगी हुई थी. अग्नि के सात फेरे जितनी जल्दी ख़तम हो जाएं उतना ही अच्छा है. वरना रिश्तेदारों की टीका टिप्पणी से मम्मी और पिताजी परेशान हो जाएंगे. उसने पंडित जी को पकड़ा,
- बामण बाडा जी मंगलाचार और बेदी शोर्ट-कट म हूण चेणी. टाइम अद्धा घंटा कुल, ठीक च ( ब्राह्मण देवता मंगलाचार और फेरे शोर्ट-कट में होने हैं. टाइम आधा घंटा है केवल. ठीक है ) ?
इस पर पंडित जी ने पहले ना नुकुर तो की पर मौके की नज़ाकत देखकर तैयार भी हो गए. अपनी पोथी निकाल कर मुख्य मुख्य मन्त्रों वाले पन्नों पर कागज़ के झंडियाँ लगा दीं. फिर सभी मन्त्रों का समय जोड़ा और कहा,
- चल ठिक च अद्धा घंटम कारज व्हे जाल. तू खुस रओ ( चल ठीक है आधे घंटे में कार्य हो जाएगा. तू खुश रह ) !

फेरों का कार्यक्रम पचीस मिनट में ही निपट गया और रावत जी, मम्मी जी और प्रिया ने चैन की सांस ली. मेहमानों ने पकवानों का स्वाद लिया, लिफाफे दिए और सरक लिए. रावत जी और मम्मी जी प्रिया को बार बार धड़कते दिलों से आशीर्वाद देते रहे :
- जा बुबा, जा प्रिया, जा बेटा तू सुखी रओ !
- चिरंजीव रओ !
- हमर पहाड़ियों क नाम न खराब करीं ( हम पहाड़ियों का नाम नहीं खराब करना ) !
- खूब भलु बनि कर रओ ( खूब भली बन कर रहना ) !

प्रिया की विदाई तो हो गई पर पर दिल की बैचेनी विदा नहीं हुई. तीन महीने भी नहीं गुज़रे कि दोनों ने पुणे की टिकट कटा ली. प्रिया से मिलकर दोनों आश्वस्त हो गए. जवांई राजा से मिलकर भी तसल्ली हुई की ठीक ठाक है. जवांई बाबू ने प्रस्ताव किया की सब मिलकर कलकत्ते और खड़गपुर घूम के आते हैं और उनका घर भी देख कर आते हैं. हवाई जहाज में रावत जी और मम्मी जी पहली बार बैठे बहुत से मंदिर देखे, समुंदर देखा, पानी के जहाज में सैर की और समधी समधन से मिले. तबियत खुश हो गई.

लौट कर मम्मी जी ने रावत जी से कहा,
- जवें भलु आदिम च इन खुजाण तुमार बस म भी निं छ. सब त ठिक चलणु हम सुद्धि घबराणा छै. नोनि सुखि च.( जवाईं भला आदमी है इस जैसा खोजना तुम्हारे बस का भी नहीं था. सब ठीक चल रहा है हम यूँही घबरा रहे थे. लड़की सुखी है ).
रावत जी ने जवाब दिया,
- चल भग्यान सीधा हरिद्वार जौला और डुबकी लगौला ( चल भाग्यवान सीधा हरिद्वार चलें और डुबकी लगाएं ) !

हर हर गंगे 

गायत्री वर्धन की कलम से  *** Contributed by Gayatri Wardhan 



Saturday, 29 July 2017

बगला भगत

मानसून के दिनों में अक्सर सफ़ेद बगले दिखाई पड़ जाते हैं. नदी, तालाब, खेत या झाड़ियों के आस पास ये बगले या बगुले या Egret अपना नाश्ता ढूंढते नज़र आते हैं. पर हमारी मुलाकत बगला भगत जी सेे घर के नजदीक ही हो गई. अभी गाड़ी मोड़ी ही थी कि गाड़ी के सामने ही बगला भगत ने हवाई जहाज़ की तरह लैंडिंग कर दी. हर्ष जी ने गाड़ी रोक दी और मैंने जल्दी से पर्स में से मोबाइल निकाल कर गाड़ी में बैठे बैठे ही सात आठ फोटो ले ली. ऐसा लग रहा था कि कार के इंजन के शोर से बगला उड़ जाएगा पर नहीं उसने तो शिकार करना था.

1. बगला भगत आमने सामने. पर बगले का ध्यान शिकार की ओर ही था 

2. बगला भगत तेज़ी से झाड़ी की तरफ बढ़ा
3. और झट से शिकार पकड़ कर बाहर आ गया

3. चोच में या तो केंचुवा था या शायद सांप का छोटा बच्चा

4. हालांकि शिकार ने बचने के लिए काफी उछल कूद की पर बगले की पकड़ मज़बूत थी   

सफ़ेद बगले का वैज्ञानिक विवरण :
Phylum - Chordata,
Class - Aves,
Order - Pelecaniformes,
Family - Ardeidae


गायत्री वर्धन की प्रस्तुति  



Saturday, 3 December 2016

काले बाल

घर में सन्डे के दिन आम तौर पर शान्ति रहती है पर आज थोड़ी हलचल है. आज तीन बजे मनोहर नरूला उर्फ़ मन्नू ने अपने साथ मम्मी पापा को लेकर मोती बाग जाना है लड़की देखने. मन्नू की बड़ी दीदी अपने घर से सीधे वहीँ पहुँच जाएगी. जीजा के पास कार है ना. बड़ी दी ने मन्नू को समझा दिया है कौन से कपड़े पहनने हैं और कौन से जूते. मम्मी ने वही बातें चार पांच दफा दोहरा दी हैं और पापा ने भी याद दिला दिया है.

मन्नू को अकेले में लड़की से बात करने के लिए पांच सात मिनट ही मिलेंगे इसलिए मन ही मन सवाल जवाब तैयार करता रहा है. स्माइल कैसे देनी है, कौन से पोज़ में पहला सवाल पूछना है और कौन से पोज़ में दूसरा सब तैयार है. पेंट शर्ट धोबी ने प्रेस कर दी थी पर फिर भी घर की प्रेस से एक बार क्रीज़ दोबारा ठीक कर ली है. जूते इतनी बार चमकाएं है की अब जूते को हाथ लगाने का मन नहीं हैं. मन्नू को दो साल हो गए बैंक में नौकरी करते करते अब तो काफी कुछ समझ आ चुकी है !

मोती बाग दूर है और ऑटो महंगा पड़ेगा इसलिए मन्नू के स्कूटर पर तीनों बस स्टैंड तक चले जाएंगे और स्कूटर वहां जमा हो जाएगा. फिर वहां से ऑटो ले लेंगे. स्कूटर पर तीनों का लड़की के घर जाना अच्छा नहीं लगता, क्या कहते हो ? वापसी में जीजा की गाड़ी है ही.

मन्नू को पहली नज़र में, दूसरी नज़र में और फिर अकेले में रीना के लम्बे लम्बे और काले बाल बड़े पसंद आए. उसे लगा की ऐसे बाल पहले कभी देखे नहीं. मीटिंग के बाद 'लड़की पसंद है' की घोषणा हो गई और दिसम्बर के महीने में मन्नू और रीना का बैंड बज गया और ज़िन्दगी नए रास्ते पर चल पड़ी.

तीन साल बाद पहला बेटा बंटी, पांच साल बाद पप्पू और सात साल बाद बिटिया आ गयी. राजेश का समय बंट गया - 40 % नौकरी में, 50 % बच्चों में, 5 % सामाजिक कार्यों में और 5 % रीना के लिए. रीना का समय 20 % घरेलु कामों में, 60 % बच्चों की सेवा में, 15 % सामाजिक कामों में और 5 % राजेश के लिए. मियां बीवी के इस 5 % के टाइम शेयर में हंसी मज़ाक, नाराज़गी और लड़ाई झगड़ों के बीच बच्चे पढ़ गए और बंटी की नौकरी कब लग गयी पता ही नहीं चला. सन्डे को बंटी के लिए लड़की देखने जाना था. मन्नू और रीना दोनों तैयार हो रहे थे. मन्नू ने रीना के बालों को हाथ लगा कर कहा,

- जब तुझे देखने गया था तो तेरे काले घनेरे बाल बहुत पसंद आये थे और तेरी जुल्फों को देख कर मैंने हाँ की थी. अब देख ज़रा अपने झड़े हुए और रंगे हुए बालों को ?

- रहने दो जी ज्यादा जबान ना चलाओ. और अपनी शकल भी देख लो ज़रा शीशे में. कंघी कर कर के टकले हो गए हो !


रब ने बना दी जोड़ी 

... गायत्री वर्धन, नई दिल्ली



Friday, 30 September 2016

सेवा और मेवा

ठेकेदार और ठेकेदारनी दोनों भोत ख़ुस थे. पिछले साल बड़े बेटे जगतू का ब्या हो गया था और इस साल छोटे वाले भगतू का भी काम निपट गया. ठेकेदार ने सोचा अब दोनों बेटे खुद ही छोटे मोटे ठेके लेने सुरू कर देंगे. कब तक दारू पी के म्हारे सिर पे नाचते रहेंगे. अपनी ज़िम्मेवारी समझें खुद भी खाएँ और हमें भी खिलाऐं. 

ठेकेदारनी ने सोचा कि अब घर में दो दो बहुरिया आ गई हैं इसलिए अब तो सजधज के गाँव का फेरा लूंगी और रिस्तेदारी में बैठूंगी. अब तो खटिया पे बैठ के राज करुँगी राज. अब ना रसोई में क़दम रक्खूं. मैया री मैया बहुत कर ली क्यारी की गुड़ाई और गाय बकरी की चराई.

सुबह पांच बजे उठ कर नहा धो कर ठेकेदारनी तैयार हो जाती. अपनी और ठेकेदार की चाय बनाकर खटिया पर दोनों बैठ जाते और गर्म चाय की चुस्की लेकर बतियाते रहते. ठेकेदार बीड़ी सुलगा लेता. किसी किसी दिन ठेकेदारनी भी सुट्टा मार लेती.

आठ सवा आठ बजे तक ठेकेदार और दोनों बेटे रोटी टिक्कड़ की पोटलीयां ले के काम पर निकल जाते. उसके बाद दोनों बहुओं को ठेकेदारनी काम पर लगा देती,
- ए बड़ी तू गाय चरा ल्या और खुरपा रख ले साथ. निचले खेत में खर पतवार की गुड़ाई कर दियो.
- छोटी तू बकरियां ले जा और दराती साथ रख ले. दो चार लकड़ियाँ काट लियो चूल्हे खातर.

उनके जाने के बाद अपने कमरे में जाकर दरवाज़ा अन्दर से बंद कर लेती, तखत के नीचे से पुराना महाभारत काल का ट्रंक खींच कर ताला खोलती. ट्रंक के अंदर कपड़ों के नीचे से छोटी संदूकची निकालती फिर उसमें से जेवर की पोटली निकालती. देखते ही ठेकेदारनी मुस्करा देती. दो चूड़ियाँ निकाल कर पहन लेती और सहेलियों से बतियाने चल पड़ती.

एक दिन दोपहर बाद वापिस आकर नीम तले खटिया पर पसर गई. छोटी आई तो उससे पुछा,
- अरे क्या कर आई ? चल आजा इधर और जरा पैर दाब दे. अरे उल्टा पैर दबा दूसरा तो बड़ी दाबेगी. और ध्यान से सुन ले उलटे पैर के बिछुए, उलटे हाथ की चूड़ियाँ और उलटे कान की झुमकी तेरे लिए हैं. सेवा करेगी मेवा पाएगी. और खबरदार जो तैने बताया किसी को तो.

ऐसा ही हलफनामा ठेकेदारनी ने बड़ी बहुरिया से भी ले लिया. अब बिना जुबान खराब किए ठेकेदारनी के दिन आराम से कटने लगे. पर सास की लगातार सेवा और उसकी तानाशाही से दोनों बहुए तंग भी होने लग गई थीं. सासू जी महीने दो महीने में नया जेवर पहन लेती तो दोनों सहम कर चुप हो जाती.

इधर दो तीन दिन से छोटी भुनभुना रही थी. गुस्से में बोली तो कुछ नहीं पर सास को ठंडी चाय दे गई. सास ने बाएं हाथ की चूड़ी उतार कर दाहिने हाथ में पहन ली. छोटी जब पैर दबाने बैठी तो देखकर हैरान परेसान हो गई. फिर से गरम चाय ला कर दी तो सांझ को चूड़ी वापिस अपनी जगह आ गई !

पर छोटी ने बड़ी के सामने दिल खोल दिया और बड़ी ने छोटी के सामने. दोनों ने प्लान बना ली. सासू की खटिया के सामने प्लान के मुताबिक झगड़ना सुरू कर दिया. छोटी ने सासू के दाहिने पैर पर चपत मारी और बोली,
- ले बड़ी यो तो तेरा पैर है न ?
बड़ी ने सासू का बांया कान पकड़ कर खींचना सुरू कर दिया,
- बोल छोटी यो तेरा कान है मरोड़ दूं ?
छोटी तब तक डंडा ले आई.
ठेकेदारिन चिल्लाई 'मैया री-ईईई' और खटिया से छलांग लगा कर भाग ली.

मेरो गांव
... गायत्री वर्धन, नई दिल्ली.


Friday, 9 September 2016

बेटा बेटी

मंदिर से निकल कर मिसेज़ मेहता ने मिसेज़ गुप्ता से बोली,
- अच्छा जी चलती हूँ मैं. बहू के आने का टाइम हो गया है.
- आपका ख्याल रखती है कि नहीं ? हमारी तो बिचारी सुबह सुबह निकल जाती है रात को आती है. अपना ही ख्याल नहीं रख पाती उल्टा हमें ही उसका ध्यान पड़ता है. क्या करें आजकल नौकरियां ही ऐसी हो गई हैं. ना आने का टाइम  है ना जाने का. फिर ये मीटिंग शीटिंग आजकल बहुत चल पड़ी हैं. कभी बम्बे जाना है तो कभी बंगलोर.
- ना ये तो आ जाती है छे सवा छे. भई पीठ पीछे कै रई हूँ ख्याल रखती है. बेटा बहू दोनों ही ख्याल रखते हैं जी. जो सच्ची बात है सो है.
- नईं वैसे तो ठीक है. बाहर भी जाते हैं तो भी ध्यान रखते ही हैं. तक़रीबन हर सन्डे बाहर ही खाते हैं तो मुझे भी ले जाते हैं. पर थकावट हो जाती है जी. आजकल इतने अंग्रेजी खाने चल पड़े हैं न जी कि बस हमें तो नाम ही याद नहीं रहते ना ही हजम होते हैं जी अब.
- हंजी हंजी वो तो है. हमारी बहू भी कह रही थी कि शनिवार को डिनर पर चलेंगे. अच्छा जी मिसेज़ गुप्ता बाय.

चलते चलते मिसेज़ मेहता को ख़्याल आता रहा कि बेटा बाहर ले जाता है पर ना तो ज़्यादा खाने को मनुहार करता है और ना ही फिरंगी चीज़ें खाने देता है. बेटी तो हर चीज़ खिलाती है सच बेटियों की बात ही और है. बेटी भी दिल्ली में ही रहती है और महीने मे दो तीन बार मिलने आ जाती है और मॉ को अपने प्यार दुलार से सरोबार कर जाती है. बहू बेटे के पास बात करने के लिए रोज़ कोई नया विषय तो होता नहीं सो बात तबीयत ठीक है ?, दवाई ले ली ?, आराम कर लो, नींद ठीक से आई ? वगैरा तक सीमित रहती थी. बेटी के पास मसालेदार विषय बहुत थे. कभी ननद का, कभी सास ससुर का, देवरानी का या फिर पतिदेव का. मिसेज़ मेहता को भी इन बातों में आनंद आता था. बेटी के साथ पूरा दिन भी कम पड़ जाता था. पर उसके जाते ही मिसेज़ मेहता थोड़ी देर गुमसुम हो जाती थी. बेटा माँ को जितना नियम से रखता बेटी एक दिन के लाड़ प्यार में सारे नियम भूला देती. 

शनिवार शाम को बहू ने तैयार होने को कहा साथ में कह दिया की जेवर ना पहनना क्यूंकि रात हो जाएगी. तीनों तैयार हो कर रेस्टोरेंट पहुँच गए. बेटे ने कहा,
- मम्मी आपके लिए क्या आर्डर करूं ? पीज़ा और नॉन-वेज तो आपके लिए ठीक नहीं रहेगा. बाकी आप बताओ. पर आप प्लीज़ ध्यान रखना कल को कोई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए.
मम्मी ने दाल रोटी खाई.

अगले शनिवार बहू बेटे ने किसी पार्टी में जाना था इसलिए मिसेज़ मेहता ने बेटी को फ़ोन कर दिया. बिटिया ने कहा कि वो शाम को पिक कर लेगी और डिनर करा के वापिस ड्राप कर जाएगी. शनिवार शाम बिटिया आ गई और मम्मी को लिपट गयी,
- ओहो ! मम्मी ये सूट नहीं चलेगा. प्लीज बदलो इसको. अपनी नीली वाली साड़ी निकालो, गले में कुछ पहनो. कोई परफ्यूम लगाओ. अच्छी तरह तैयार हो जाओ ज़रा अब तो मज़े करने के दिन हैं तुम्हारे.
मम्मी, बेटी और जमाई राजा तीनों रेस्टोरेंट पहुंचे. बेटी ने मम्मी से कहा,
- अब बताओ क्या खाओगे मम्मी ? नूडल्स ले लो, चिकन ले लो नहीं तो पास्ता ले लो. जो दिल करता हो खाओ, शौक से खाओ.

मम्मी ने थोड़ा थोड़ा सभी कुछ खा लिया. रात दस बजे घर वापिस आ गए. 11 बजे बेटा बहू भी आ गए. लगभग 12 बजे मम्मी के पेट में दर्द होने लगा. पहले तो लगा अभी ठीक हो जाएगा पर फिर बिस्तर से उठना ही पड़ा. दर्द भी हो रहा था और घबराहट भी कि बेटा डांटेगा.

लाइट जलाई और दवाइयों का पिटारा खोला और गोली ढूंढ ली. स्टील के गिलास में बड़ी सावधानी से पानी डाला ताकि आवाज़ ना हो. लेकिन सावधानी कुछ ज्यादा हो गई और भरा हुआ गिलास गिर पड़ा. बेटा भागा हुआ आया और जान गया की रात को जागना पड़ेगा. मम्मी की क्लास तो उसी वक़्त रात को 12.30 बजे ही लग गई. 

सुबह बिटिया का फ़ोन आया.
- मम्मी आप कैसी हो ?
- कैसी क्या ? तेरे लाड में जाने क्या क्या खा लिया. रात से पेट में दर्द हो रहा है. अब गोलीयां खा रही हूँ और साथ में तेरे भाई की डांट पी रही हूँ. बहुत गुस्से में है. और सुन ले, तेरी क्लास शाम को लगने वाली है !

आप क्या लेंगे ?

- - - गायत्री वर्धन, नई दिल्ली.



Tuesday, 30 August 2016

ट्रेनिंग

सरकारी नौकरी का अपना ही मज़ा है. एक ही दफ़्तर में एक ही कुर्सी टेबल पर १० बजे से ५ बजे तक फ़ाइलें उलट पलट करते रहिये. बीच बीच में टी ब्रेक, लंच ब्रेक, गप्प ब्रेक, तफरी ब्रेक और बॉस-सेवा ब्रेक करते रहिये. बॉस की तबीयत बहली रहेगी तो उसी ऑफिस में कुर्सी बनी रहेगी. वैसे भी तबादला कौन चाहता है ?

तबादला तो दूर की बात है प्रमोशन भी नहीं चाहिए. वरना एक तरफ जिम्मेवारी बढ़ेगी और दूसरी तरफ बाहर पोस्टिंग पर जाना पडेगा. और प्रमोशन की किसे परवाह है - अपना मकान है, सुविधाजनक दूरी पर दफ़्तर है, बीबी कमाऊ है और दोनों बेटियों का ख़्याल रखने के लिये घर में दादा दादी हैं.

बस इसी तरह की बाबूगिरी में कुन्दरा जी की ज़िन्दगी आराम से गुज़र रही थी. १५ साल हो चले थे एक ही डिपार्टमेंट में. सुबह बड़े ही सलीक़े से तैय्यार होकर अपने दुपहिया से दफ़्तर आते. हैलमेट को स्कूटर में लॉक करते और जेब से कंघी निकाल कर बालों को क़रीने से माथे पर सजा देते. फिर अपने तीन डिब्बे वाला टिफ़िन लेकर दाएं बाएं देखते हुए अपने डिपार्टमेंट की ओर चल देते. कुन्दरा जी थे तो ४५ साल के पर अपने आप को २५ साला नौजवान समझते थे. नज़रें बहुत पैनी थी डिपार्टमेंट के दरवाज़े से ही हाल का पूरा मुआयना कर लेते थे. 

अंदर पहुँच कर टिफ़िन के दो डिब्बे हाट-केस में रखते और दही वाला डिब्बा ए.सी. के सामने सजा देते. टेबल व कुर्सी पर हल्का सा कपड़ा फेरते और रोज चपरासी शंकर को ठीक से काम करने की नसीहत जरूर देते. दाहिनी तरफ़ रखी कैबिनेट से १०-१२ फ़ाइलें निकाल कर टेबल की बांई ओर सजा देते. सुन्दर सा पैन स्टेंड, पेपर वेट और पानी का गिलास टेबल पर क़रीने से सज जाता तो कहते,
- चलो जी आज की हाजरी तो लग गई !

दाएं बाएँ हाल मे नज़रें घुमाकर मुआयना करते. कौन आया कौन नहीं. किसने कैसी साड़ी पहनी है और किसकी शर्ट नई है. दिन की शुरुआत महिलाओं से बात करके हो तो दिन अच्छा गुज़रता है. सो श्रीमति मलिक को नमस्ते करके बोले ,
- होर जी मलिक साब दा की हाल है ?
श्रीमती मलिक कुर्सी पर पैर समेटे बैठी हुई थी और मैडम दुआ के साथ पराँठे अचार का आनंद ले रही थी. तपाक से बोली,
- मलिक साब नू की होणा है ? ना मलिक साब कोई कम करदे नें ना कुड़ियां कुछ कर दीयां ने.
कुन्दरा जी ने तुरंत श्रीमती मलिक को सलाह दी,
- कुड़ियां कोलो कम कराया करो. लड़कियों ने दूसरे घर नहीं जाना है ?
- ओ जी अस्सां ते टोर देणियां ने आप्पे निबेड़न गे ससुराल वाले ( हमने तो विदा कर देनी हैं ससुराल वाले अपने आप निपटते रहेंगे )! कह कर श्रीमती मलिक कुछ मुस्कुरा दी.
कुन्दरा जी ने फिर श्रीमती दुआ की तरफ रूख किया और हाल चाल पूछा,
- दुआ मैडम जी कोई लड़का मिला ? कुड़ी वास्ते किधरे गल बनी ?
- हंजी ईक मुन्डा वैख्या ते है गल बात चलदी पई है. कुड़ी त्यार हो गई है.
- अच्छा है जी आजकल कुड़ियां जल्दी नहीं तैयार होती. बस जल्दी मुहं मिठ्ठा कराओ जी.

कैंटीन वाला १२ बजे की चाय कुन्दरा जी की टेबल पर रख गया. कुन्दरा जी चाय और समोसे का आनन्द ले ही रहे थे कि चपरासी शंकर के साथ एक २३ -२४ साल की महिला को अपनी ओर आते देखा. फटाफट कंघी निकाली और बाल सैट किए. क़मीज़ के कालर की नोक ठीक की फिर आस्तीनों की क्रीज़ बिठाई. इस दौरान नज़रें महिला पर टिकी रहीं. शंकर ने महिला का परिचय  कराया,
- ये मिस मालती है. ये ट्रेनिंग लेने आई हैं. साहब ने आपके पास ट्रेनिंग के लिए भेजा है.

कुन्दरा जी ने मिस मालती को ऊपर से नीचे देखा तो मिस मालती सावंले रंग की छरहरे बदन की आकर्षक महिला लगी. बड़े अच्छे तरीके से टेबल की दूसरी ओर अपने सामने बिठा लिया. पानी मँगवाया और मिस मालती का इन्टरव्यू लेने लगे - कहाँ रहती हो, पहले नौकरी कहाँ की है, शादी का क्या स्टेटस है. ख़ास सवाल ये था कि मिस मालती कितने दिन उनके पास ट्रेनिंग लेगी. जवाब मिला कि एक सप्ताह उनके साथ काम सीखेंगी.

कुन्दरा जी का अगला हफ्ता बड़ा व्यस्त गुज़रा पर शानदार गुज़रा. पूरे हफ्ते खुश नज़र आए. पर ट्रेनिंग देते देते कुन्दरा जी का खर्चा बढ़ गया - एक परफ्यूम की शीशी , एक डिब्बा नया पाउडर, एक बोतल हेयर कलर, जूता पोलिश वगैरा लेनी पड़ गई. धोबी का बिल बढ़ गया. हेलमेट और स्कूटर धुलवा के पोलिश करवाया शायद मिस मालती को बिठाने का चांस मिल जाए ! कैंटीन वाले को चुपके से कह दिया कि एक हफ्ते तक मीठी चाय पिलाए कमबख्त शुगर बढ़ती है तो बढ़े. निकम्मे दोस्तों ने भी कई बार चुस्की ली और बदले में चाय समोसे गटक गए.

गाड़ी तैयार है 

कुन्दरा जी मन ही मन सोच रहे थे कि ट्रेनिंग तो अब ख़तम हो जाएगी. कॉफ़ी हाउस चलने को कहता हूँ मानेगी या नहीं ? मान जाएगी ? हाँ ? ना ? अगर कहेगी कि लेट हो जाउंगी तो कहूँगा स्कूटर किस लिए है. फिर हिम्मत कर के कह दिया,
- ट्रेनिंग तो अब ख़तम हो रही है मिस मालती. तो फिर हमारी पार्टी भी तो होनी चाहिए ?
- हाँ हाँ क्यूँ नहीं. अभी कैंटीन में इण्टरकॉम करती हूँ.
- ना जी ना मिस मालती यहाँ की चाय थोड़ी पीनी है. हम तो कनाट प्लेस में कहीं बैठेंगे.
- हाँ हाँ कल चलिए ऑफिस के बाद.

कुन्दरा जी मुस्कराए भई कमाल कर दिया मिस मालती ने. उम्मीद तो नहीं थी ! पुरानी नसों में नया खून दौड़ने लग गया . मन में गुदगुदी होने लगी. अगला दिन कितना लम्बा हो गया ? पांच ही नहीं बज रहे थे कमबख्त. किसी तरह से ऑफिस का समय समाप्त हुआ और कुन्दरा जी ने चैन की साँस ली. हाथ मुंह धोया. बाल सेट किये, पर्स में पैसे चेक किये और मिस मालती के साथ ऑफिस के बाहर आ गए. पार्किंग से स्कूटर निकालने लगे तो मिस मालती ने रुकने का इशारा किया.
- जी क्या हुआ ?
- एक मिनट रुकिए.
सामने से फटफटिया आकर रुकी. सवार ने हेलमेट उतारा तो मिस मालती ने परिचय कराया,
- ये हरेंदर सिंह हैं मेरे मंगेतर और आप हैं कुन्दरा साब.

कुन्दरा जी के मन के गुब्बारे में सुई चुभ गई और सारी हवा निकल गई. मुंह का स्वाद कसैल गया. मन की गुदगुदी खुजली में तब्दील हो गई. भारी मन से बोले,
- मुझे कुछ सामान ले जाना था एक्चुली, आप लोग एन्जॉय करो.
कुन्दरा जी को मन ही मन मिर्ज़ा ग़ालिब का शेर याद आ गया :

' हैरां हूँ दिल को रोऊँ कि पीटूं जिगर को मैं,
  मक्दूर हो तो साथ रखूं नौहागर को मैं !'

* मक्दूर - बस में
* नौहागर - मातम मनाने वाला

ये शेर एक ग़ज़ल का मुखड़ा है जो मिर्ज़ा ग़ालिब ने लिखी थी. इस ग़ज़ल को कई कलाकारों ने गाया है जिनमें से एक हैं सी. एच. आत्मा. उनकी आवाज़ में ये ग़ज़ल यूट्यूब पर उपलब्ध है जिसका लिंक है :
https://youtu.be/B-5aQtAzExM?list=PLJeNQvgQ4Sl-8_Sck2cOqnQ0thnaLR3fs

- - - गायत्री वर्धन नई दिल्ली.



Monday, 22 August 2016

भूत

दिल्ली से अपने गांव जिबलखाल, जिला पौड़ी गढ़वाल आये कुछ दिन बीत चुके थे. अब तक गांव के भूगोल की भी जानकारी हो गई थी. मसलन मकान के दायीं ओर से नीचे जाने वाली तंग पगडण्डी पानी के स्रोत की तरफ जाती थी. बायीं ओर से खेतों की मुंडेर पर चल कर नीचे नदी की तरफ जा सकते थे. अगर मकान की बालकनी में कुर्सी डाल कर बैठ जाएं तो बाईं तरफ के खेतों में अलग अलग और दूर दूर चार मकान थे. दाहिनी ओर उंचाई पर लगभग सौ मीटर की दूरी से जंगल शुरू हो जाता था.

घर के निचले कमरों मे रसद व ईंधन का गोदाम था. सामने बड़ा सा आहता था जिसमें  किनारे किनारे मुँडेर पर अमरुद और अनार के पेड़ थे. एक कोने पर केले के पेड़ों का झुण्ड था. सामने नीचे की और सीढ़ीनुमा खेत थे जो नदी तक फैले हुए थे. नदी के उस पार वाली पहाड़ी पर घना जंगल शुरू हो जाता था. उस छोटी पहाड़ी के पीछे और ऊँची ऊँची पहाड़ियाँ थी और उनसे ऊपर नीला आसमान था. लगता था कि इन पहाड़ियों के पीछे दुनिया होगी ही नहीं.

रविवार के दिन नौकरी पर जाने वाले घर पर ही थे. रोज़गार के लिये लोग या तो ऊपर लैन्सडाउन या नीचे दुग्गडा जाते हैं. दोनों जगह पर कुछ सरकारी महकमे हैं. कुछ लोग मारवाड़ी लाला लोगों की नौकरी बजाते हैं. लाले भी पहाड़ों मे रच बस गये है पहाड़ी ग्राहक देखते ही पूछते हैं,
- भुली के चैणू ( बहन क्या चाहिये ) ?

दोपहर में काका बरामदे मे बैठे फ़सलों की निगरानी कर रहे थे. जैसे ही कोई लंगूर या बंदरों की टोली खेत में आती तो भोटी कुत्ते को उनके पीछे दौड़ा देते. भोटी भौंकता तो बंदर भाग जाते. कुछ बन्दर पेड़ पर चढ़कर ऊपर से घुड़की देते रहते. कभी कभी कोई लंगूर या बंदरों का सरदार बहादुरी से पेड़ से उतर कर कुत्ते को चांटा लगा देता. कुत्ता तो कूं कूं करता घर की तरफ़ दौड़ लेता और सरदार का झुंड पर दबदबा बन जाता. कभी पास के पेड़ पर नए पक्षी की आवाज़ सुनाई पड़ती. मतलब ये की समय बड़े मज़े से जा रहा था.

दोपहर को बाडा जी ( ताऊ जी ) के पोते प्रकाश और चुन्नु मिलने आ गये. बुआ जी चरण स्पर्श कहकर शर्माते हुए एक ओर बैठ कर बतियाने लगे, कुछ हिंदी और कुछ पहाड़ी में. ताऊ जी को भूत की बात बता रहे थे. 

- बाडा दो भूत सफ़ेद कपड़ों मे देर रात चीड़ के जंगल में दिखाई दिये. हमर पिछने पोड़ गे अर हम ऐथर ऐथर भूत हमर पैथर पैथर ( हमारे पीछे पड़ गए और हम आगे आगे भूत पीछे पीछे ). भागने पर रास्ता रोकने लगे. दोनों भूत बीड़ी माँग रहे थे और माचिस भी. हमने तो दी नहीं पता नहीं अगर दे देते तो वो पीछा ही नहीं छोड़ते. पर हमर पिछने सरा रास्ता खड़बड़-खड़बड़ होणी रै ( पर हमारे पीछे सारे रास्ते खड़बड़-खड़बड़ होती रही ).

मेरे लिये तो अनोखी व हास्यप्रद बात थी. मुझे मुस्कुराता देख दोनों भांप गये कि मैंने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया. चुनांचे भूत होते है यह दिखाने के लिये देर रात को वहीं बरामदे में इकट्ठा होने का प्रोग्राम बना लिया.

रात्रि भोजन के बाद नौ बजे प्रकाश, चुन्नु और मैं बरामदे की मुँडेर पर बैठ गये. चारों और घना काला अंधेरा और गहरा सन्नाटा छा गया. एक ओर चाँद की हलकी सी रोशनी में गॉव के बीच से गुज़रते रास्ते के पत्थर चमक रहे थे. दूसरी ओर निचले घरों के छत के पटले ( छत पर लगे ढलवाँ पत्थर ) भी चमक रहे थे. पहाड़ों के सिरे और ऊँचे पेड़ चांद की रोशनी मे धुँधले से दिखाई दे रहे थे. हम सब अंधेरे मे आँखें गड़ाए बैठे थे जबकि पूरा गाँव गहरी नींद में जा चुका था. अपनी खुद की आवाज़ भी डरावनी लग रही थी. जंगल से कभी अचानक सूखे पत्तों की सरसराहट होती तो तेंदुए या बाघ का होने का डर जगा देता था. सब चद्दरों को और मजबूती से पकड़ लेते और सिमटने की कोशिश करने लग जाते.  

बैठे-बैठे रात के 11 बज गये. ऊपर स्याह काला आसमान एक फीका सा चाँद और टिमटिमाते तारे. बहुत ही सुन्दर सीनरी थी पर जब नज़रें सामने फैले घुप्प अंधेरे में जंगल की तरफ़ जाती तो कुछ न दिखता. जैसे जैसे रात बढ़ रही थी डर महसूस होने लगा था. पास से हवा का झोंका बहता तो लगता कोई पास से गुज़रा है. केले के पत्ते हवा से हिलते तो चांदनी उस पर उलटे सीधे डिज़ाइन बना देती देख कर अजीब सा लगता. 

सभी अनमने और उतावले से हो रहे थे कि तभी प्रकाश फुसफुसाया,
- वो देखो नदी से मशाल की लपट उठ रही है, दिखी ? वो गई उप्पर. उन्द जाणी उब आणी ( उप्पर जा रही है निच्चे आ रही है ). दिखी क्या ? अरे ध्यान से देखो ना.

पहले तो समझ नहीं आया. पर फिर ध्यान से देखा तो कुछ मशालें लप-लप करती हुई ऊपर नीचे हो रहीं थीं. ऐसा लगा कि पेड़ों के ऊपर ही ऊपर मशालें तेजी से इधर उधर नाच रहीं हैं. जंगल के इस भाग में जहाँ ये लप-लप डांस हो रहा था ठीक उसी के नीचे नदी किनारे मरघट याने शमशान घाट भी तो था.

सारे बदन में सिहरन फ़ैल गई और रोंगटे खड़े हो गए.

छोटी छोटी सी लपलपाती लपटें पेड़ों के ऊपर कूद रहीं थीं. लपटें पहाड़ की चोटी तक पहुँच रहीं थी और कुछ बीच में ही बुझ रही थीं. कई लपटें ऊपर से नीचे नदी की तरफ आ रही थी और बीच में ही कुछ कुछ लपटें बुझती जाती थी. वाक़ई इतनी तेजी से ऊपर नीचे लपटों का आना जाना समझ नहीं आया. किसी मनुष्य द्वारा तो यह संभव नहीं है फिर ये कैसे हो रहा है ? 

क्या ये सब कोई भूत प्रेत कर रहे थे ? सच में भूत हैं ? ये एक ही स्थान पर ही क्यूँ हो रहा था ? या कोई वहम था ? या मीथेन जैसी कोई गैस जल रही थी ? या मरघट में जले हुए कंकालों से फोस्फोरस की अधिकता हो जाती हो जिसके कारण फोस्फीन गैस बनकर लपटें निकल रही हों ? मन में अनेक प्रश्न चिन्ह लग गये. जाहिर है कि बाकी रात जाग कर कटी.

गाँव की शाम 
इस बात को अब 35-40 बरस हो गए हैं. गाँव में कई बार जाना हुआ पर रात को ठहरने का मौका नहीं मिला. इसलिए दोबारा वैसा दृश्य नहीं देखा.  
--- गायत्री वर्धन, नई दिल्ली.

Tuesday, 16 August 2016

न्योता

दोपहर टीवी चलाया तो समाचार मे गुजरात पर दलितों पर हुए अत्याचार पर बहस चल रही थी. देखते देखते मन 70 के दशक मे चला गया. अपने गाँव जिबलखाल, जिला पौड़ी गढ़वाल में चाचाजी के घर की पूजा समारोह की याद आ गई.

हमारा गाँव जिबलखाल, तहसील लैंसडाउन से थोड़ी दूरी पर है. दस बारह घरों का छोटा सा गाँव है जो एक पहाड़ी की ढलान पर है. आस-पास सीढ़ीनुमा खेत हैं और नीचे एक पहाड़ी नदी नज़र आती है. लैन्सडाउन कभी ब्रिटिश वायसराय का समर रैसिडेंस था पर अब वहां सेना की बड़ी छावनी है.

चाचाजी ने गाँव के सभी परिवारों को कुल-देवता की पूजा और प्रीतिभोज का न्योता दिया था. चाचीजी दूसरे गाँव में रिश्ते-नाते को भी न्योता दे आई थी. छोटे से गाँव के सभी घरों में सुबह से ही चहल पहल शुरू हो गई. बक्सों में से सबने अपने बेहतरीन वस्त्रों को निकाला. सबसे पहले बच्चे रंग बिरंगे कपड़ों में तैयार हो कर बाहर आये उनमें ज्यादा उत्साह था.

फिर महिलाएं निकलीं बढ़िया साड़ियों में. महिलाओं ने तो अपने अपने जेवर भी निकाल लिए थे ख़ास तौर पे नथ. पहाड़ी समाज में जिस महिला की नथ जितनी बड़ी होगी तो मानें कि उसका परिवार उतना ही संपन्न होगा.

अब पूजा समाप्त होगी तो उसके बाद प्रीतिभोज होगा. उसकी तैयारी भी सुबह से चालू हो गई. गाँव में टेंट लगाने या हलवाई बुलाने का कोई चक्कर नहीं होता. बिना कहे बड़े बड़े चूल्हे तैय्यार होने लग गए. बड़े बड़े बर्तन आ गए और शुरू हो गई भोजन पकाने की तैय्यारी. बच्चों ने सूखी लकड़ियाँ जो पहले ही जंगलों से पेड़ काट कर सुखा ली गई थी ,चूल्हे के पास डालनी शुरू कर दी. महिलायें पानी भरने व पत्तल बनाने के काम पर लग गई और पुरूषों ने भोजन व्यवस्था संभाल ली. मसलन गाँव के फकीर भैजी ( भाई जी ) सूजी का हलवा बहुत अच्छा बनाते हैं तो हलवा उनके जिम्मे कर दिया गया. दाल और सब्ज़ी शम्भू और जयनंद भैजी के जिम्मे थी और पूड़ियाँ तलने का काम महिलाओं के जिम्मे रहा.

घर के अन्दर पूजा लगभग समाप्त हो चुकी थी और भोग लगने के बाद मेहमानों को भोजन परोसने की तैय्यारी शुरू हो गई. बच्चों ने दौड़ दौड़ कर दरियां बिछा दी और पत्तलें लगा दी. सब पुरुष पंगत मे बैठने लगे. उसके बाद नम्बर था बच्चों का और फिर महिलाओं ने भोजन किया.

पर इस दौरान देखा कि घर के आंगन के बाहर खेत की मुँडेर से लग कर भजनी काका अपने दोनों छोटे छोटे बेटों के साथ खड़े थे. भजनी काका का घर गाँव के बाहर ऊँची वाली पहाड़ी पर था और उनका पानी भी अलग था. लेकिन खेतों में हल व बुवाई के समय गाँव वाले उनसे काम करवाते थे और दान मे कुछ अनाज या पैसे दे देते थे बस मेरे पास उनका इतना ही उनका परिचय था. मैंने भजनी काका को आँगन में आने का इशारा किया पर उन्होंने अनदेखा कर दिया. मैंने फिर पिताजी को उन्हें बुलाने को कहा.
- वह नहीं आएगा चाहो तो तुम ही बुला लाओ. जाओ कोशिश करो.
भजनी काका के पास जाकर भोजन ग्रहण करने का न्योता दिया पर वो और उनके दोनों बच्चे अपनी जगह से नहीं हिले. भजनी काका बोले ,
- न न यखी ठीक च ( न न यहीं ठीक है ). 

जब सारा गाँव भोजन कर चुका तब भी भजनी काका और दोनों बेटे मुंडेर पर ज़मीन पर पंजों के बल ही बैठे थे. भजनी और उसके बच्चों को वहीं पत्तल पर भोजन दे दिया गया. तीनों ने वहीं पर शांतिपूर्वक भोजन किया. उन्हें घर के लिए भी पत्तल बाँध दी गई. पिताजी से कारण पूछने पर पता चला की भजनी काका निम्न जाति के हैं इसलिए उसे खाना वहीं देना पड़ता है. दिल्ली में ऐसा नहीं देखा था और गाँव में पहली बार जात के भेदभाव को देखा और महसूस किया जो बड़ा विचित्र लगा.

कुछ ने ये सब देखा और समझाया कि बराबरी करने का कोई फायदा नहीं है. तुम तो चार दिन बाद शहर वापस चली जाओगी पर भजनी को तो यहीं इसी व्यवस्था मे रहना है !

मेरा गाँव मेरा देस 

- गायत्री वर्धन, नई दिल्ली.


Sunday, 7 August 2016

गाँव की ओर

स्कूल की शिक्षा पूरी हो चुकी थी और कॉलेज जाने के बीच कुछ अन्तराल था. सो कुछ समय गाँव मे रहने का मन बना लिया. खादी के एक झोले में टूथब्रश डाला, कुछ कपड़े डाले आैर बस गाँव जाने की तैयारी हो गई. पैकिंग आसान तो यात्रा आसान.

मौसम तो गरमी का था पर पहाड़ी गांव होने के कारण दोपहर बाद ठंडक रहती है. लैंसडाउन से बहुत दूर नहीं है. लैंसडाउन कभी ब्रिटिश वायसराय का 'समर रेसीडेंस' हुआ करता था पर अब वहां फ़ौज की काफी बड़ी छावनी है. एक महीने के लिए हमारी भी 'समर राजधानी' गाँव में बसेगी ! गाँव में ज्यादा घर नहीं हैं बस दस बारह घरों का छोटा सा गांव है. घर ढलान पर हैं और आस पास सीढ़ीनुमा खेत हैं घर से दूर नीचे घाटी में नदी दिखाई देती है.

गाँव जाने के लिये रेल की सवारी रात दिल्ली स्टेशन से शुरु हुई अौर तड़के कोटद्वार स्टेशन पर खत्म हो गई.  कोटद्वार एक छोटा सा शहर है जो ऊपर पहाड़ों पर जाने का द्वार है. यहाँ से लैंसडाउन, पौड़ी और श्रीनगर की ओर जा सकते हैं. यूँ कहें की कोटद्वार पहाड़ों की तलहटी याने foothills में बसा है.  इससे आगे पहाड़ी सफ़र के लिये बस, जीप या टैक्सी आसानी से उपलब्ध है.

पहाड़ियाँ और घाटियाँ 

कोटद्वार मुख्य रूप से ऊपर के पहाड़ी लोगों का बाज़ार है. मैंने भी बाज़ार से रास्ते के लिये गुड़, भुने चने व लड्डू ले लिये. खुद भी खाएंगे और गांव के बच्चों को भी खिलाएंगे. बस स्टॉप नजदीक ही था. जब बस में सवारियां लद गयीं और गढ़वाली गाने बजने लगे तो लगा की गांव पास आ गया है।

एक घंटे के सफ़र में ड्राइवर ने कई गढ़वाली गीत सुनवा दिए. इन लोक गीतों का अपना ही मज़ा है. ये गीत या तो प्रेम रस पर, किसी फ़ौजी की शहीदी पर या फिर सास बहु के किरदारों पर होते हैं. इनमें लोकल पहाड़ी वाद्यों का संगीत मजेदार लगता है. एक गीत 'कन भग्याना मोटर चली सरा-रारा प्वां प्वां' अभी भी कानों में गूँज जाता है तो चेहरे पर मुस्कराहट आ जाती है  साथ ही खिड़की से हरे भरे पहाड़ और जंगल नज़र आने लगे ठंडी हवा के झोंकों ने दिल्ली की धूल भरी गर्मी को भुला दिया. पर बस के हिचकोलों से कमर दोहरी हो गई. बस जब ऊपर की ओर मोड़ काटती तो लगता कि हो गयी जय राम जी की !

ऊँची नीची राहें 

ख़ैर एक घंटे के सफ़र के बाद ऊपर सड़क पर अपने गांव के नज़दीक उतर लिये. अपना झोला कन्धे पर डाला और सड़क के किनारे थोड़ा चहल कदमी कर के पैर सीधे किये. ठंडी और ताज़ी हवा में गहरी और लम्बी साँसें ली. अब उस पगडण्डी पर नज़रें टिका दी जिस पर पौन घंटा नीचे की तरफ चलना होगा.

सुबह की हवा में ठंडक थी, आस पास सुनसान बियाबान था और दूर दूर तक न कोई आदम न आदम जात. नीचे जाती पगडण्डी कहीं पथरीली थी कहीं मिट्टी वाली. सालों से लगातार उस पर आवाजाही के कारण पत्थर चिकने हो गए थे और पैर फिसल रहा था.

कुछ देर के बाद मोड़ लेते ही चीड़ का घना जंगल शुरु हो गया। चीड़ के ऊँचे लम्बे पेड़ पहाड़ियों को जकड़े खड़े थे. हवा में चीड़ की एक ख़ास महक थी. इन पेड़ों के पत्ते सुइयों जैसे होते हैं जिनमें से हवा बहने की हलकी सी सरसराहट आ रही थी. तेज़ हवा आती तो कभी सीटी बजती सुनाई पड़ रही थी. मन एकदम तरोताज़ा हो गया. एक पत्थर पर बैठ कर सुस्ताने लगी. सुबह से कुछ खाया भी नहीं था तो अब गुड़ चने का आनंद लिया जाए. अपना झोला झाड़ी पर लटकाया और वही बैठ गई. खा पीकर शरीर में चेतना आ गयी.

दूर दूर तक कोई नहीं था बस एकदम सुनसान. कभी कभी पक्षियों की आवाज़ या फड़फड़ सुनाई पड़ रही थी. पहाड़ के एक तरफ़ घना जंगल, दूसरी ओर एक गांव और सामने नीचे सीढ़ीनुमा खेत थे. ठण्डी हवा के झोंको का आनन्द लेते हुए नीचे ढलान की तरफ़ चल पड़ी. ज़मीन चीड़ की सुई जैसी पत्तियों से ढकी थी. पत्तियों पर चलने से कहीं कहीं पैर फिसल रहा था. जिम कोर्बेट अभयारण्य भी इन पहाड़ीयों से मात्र दस पंद्रह किमी दूर है सो जंगली जानवर यदा कदा टहलने भी आ जाते हैं - ख़तरा !

रास्ता अब सीढ़ीनुमा खेतों और फलदार पेड़ों के बीच से होकर गुजर रहा था. एक के बाद एक खेत उतरते हुए पगडण्डी गोलाई में घुम गई और सामने पथरीली खड़ी उतराई आ गयी. नीचे पानी की एक पतली धारा बह रही थी. उस तरफ उतरना शुरु किया तो लगा पुरा वज़न पंजो पर आ गया है. चढ़ाई चढ़ना तो मुश्किल है ही उतरना भी कम मुश्किल नहीं है.

बहुत कठिन है डगर गाँव की  

नीचे पानी के पास पहुँचते ही जूते खोल कर पैर पानी में डाल दिये. हाथ मुँह धो कर ताजगी आ गयी. बैठे बैठे विचार आता रहा कि यहाँ का जीवन कितना कठिन है. पानी की धारा को लांघ कर फिर नीचे उतरना शुरु किया. अब गांव के घर नज़र आने लगे थे और कुछ कुछ आवाज़ें भी सुनाई पड़ने लग गई थी. चूँकि गाँव में आने जाने वाले कम होते हैं इसलिए नए आने वाले पर सबकी नज़र रहती है. दूर से ही ताई ने देखा कोई लड़की आ रही है. तुरंत हथेलीयों से आँखों पर दूरबीन बनाई और एकटक देखती रही. फिर पहचान भी गई. एक सेकंड में खबर गांव में फैल गई.

गांव के इस छोर पर पहला ही मकान हमारा है. जब तक वहां पहुंचती गाँव के बच्चे व बड़े बूढ़े पहले ही इकट्ठे हो चुके थे. थोड़ी देर के लिए शांत से गांव में शोर मच गया. बच्चे हाथ लगा लगा कर शोर मचाने लगे,
- बुआ आ गई !
- दीदी आ गई!
- कन तेर बोई बुबा न अकेला भेजी ( तेरे माँ बाप ने अकेला भेज दिया ) ?
- डोर नी लग ( डर नहीं लगा ) ?
- भलू कार ,पढया छिन ,अपड़ देस देखण चैंद ( भला किया, पढ़ी लिखी है, अपना देस देखना चाहिए ) !
- ख़ूब बणिया रऔ ( खूब सुखी रहो ) !

बड़ों के पैर छुए, बच्चों को गुड़ चने बांटे तब तक चाय आ गयी.

बुआ के साथ 



- गायत्री, नई दिल्ली.



Sunday, 24 July 2016

वो काटा

अगस्त का महीना आते ही दुकानों में  रंगे बिरंगी पतंगें और साथ में माँझे में लिपटी चरखियाँ दिखाई देने लगती हैं. पतले पतले रंगीन काग़ज़ और बांस की बनी हल्की फुल्की पतंग पतले से धागे के सहारे हवा भर के जब ऊपर उड़ती है तो वाह बस वो गाना याद आ जाता है, 
- चली चली रे पतंग मेरी चली रे ......
उड़ती पतंग, हथेलियों पर सरकते मांझे के साथ साथ पतंगबाज का मन भी आसमान छूने लग जाता है. 

पतंगों का इतिहास २००० वर्ष पूर्व चीन से जुड़ा हुआ है. चीनी पतंगे बड़ी होती हैं और इन्हें बनाने के लिये रेशमी धागा और बांस के हलकी और मजबूत खपचियां उस समय आसानी से उपलब्ध थीं. चीन से चली ये पतंग उड़ते उड़ते जापान, कोरिया, और थाईलैंड होती हुई भारत पहुँच गई. और यहाँ तक की पतंगबाजी नेता जी नगर नई दिल्ली के हमारे सरकारी क्ववाटर में घुस गई. 

हमारे भैय्या जगदीश पतंगबाजी के पक्के फैन थे और साथ में था उनका एक लंगोटिया यार चंदू. दोनों सातवीं क्लास में इकट्ठे पढ़ते थे. दोनों पतंग उड़ाने में, पेंचे लड़ाने में और पतंग लूटने में कॉलोनी में मशहूर थे. स्कूल की छुट्टी हुई और उनकी पतंगबाजी की तैयारी शुरू हो जाती थी. दोनों के पास पंतगबाजी के अनेक रंगीन क़िस्से थे जो पतंगबाज़ी को अनूठा रूप देते थे. उनसे सुन कर ऐसा लगता था कि इससे मज़ेदार तो कोई और खेल है ही नहीं. पतंगबाज़ी का उनका शौक़ किसी मौसम या दिन का मोहताज न था. 

सुबह सुबह माँझे पर शीशे का चूरा और चावल की लेई लगा कर धूप में टांग देते थे. कहते थे कि सूख कर मज़बूत हो जाएगा. बहुत से टेक्निकल शब्द प्रयोग करते थे - सद्दी, मांझा, कन्नी वगैरा. उनका दावा था की क्या मजाल किसी की पंतग उनसे ऊपर चली जाये. 

भैय्या पतंग उड़ाते तो चंदू चरखी थामते. पेंच लड़ते ही ऐसा शोर मचता जैसे जंग छिड़ गई हो ! छत पर आगे पीछे दौड़ लगती.
- अबे ढील छोड़ ढील.
- लपेट जल्दी लपेट. अबे यार सद्दी लपेट !
पेंच लड़ने के बाद पतंगें कभी अलग हो जाती या कभी कट जाती और हवा में बहने लग जाती. छतों पर धम-धम होने लगती तो आस पड़ोस की आंटियों से भी डांट पड़ती पर जोश में रत्ती भर फ़र्क़ न पड़ता. 

पेंच लड़ाने वालों के आस पास पतंग लूटने वाले भी होते जो हाथ मे डंडे या कँटीली झाड़ लेकर झपटने को तैय्यार रहते. पतंग लूटना भी एक अच्छी खासी कला है जो पतंगों के साथ लुप्त होती जा रही है. पतंग कटते ही लुटेरों की नज़रें आसमान में लहराती पतंग पर और दौड़ ज़मीन पर. इस भागमभाग में कुछ पता नहीं कि आगे गाड़ी है या गड्ढा है. बस जिसने लूट ली वो ही सिकंन्दर !

भैय्या चाहे अपनी पंतग कटी हो या दूसरे की अपना मांझा और चरखी दोस्त के पास फेंक के कटी पतंग के पीछे दौड़ पड़ते. रोज़ हाथ पैरों में चोटें और खरोंचें लगी रहती. पतंग के शौक़ के चलते ऑंखों पर चश्मा भी लग गया. पर पतंग का शौक़ बरक़रार रहा. 

एक दिन स्कूल से छुट्टी होने पर दोनों दोस्त घर वापिस आ रहे थे कि 'वो काटा' सुनाई पड़ा. ऊपर देखा तो हवा में तैरती कटी पतंग दिखाई पड़ी. बस फिर क्या था दोनों लपके. जब पतंग हवा से आगे बढ़ी तो दोनों ने रफ़्तार बढ़ा दी. इस दौड़ में दूसरों से धक्का मुक्की भी चल रही थी. पतंग हवा का झोंका लगते ही ऊपर उठ गयी. बस्ते का भार अब पतंग और उनके बीच रुकावट बनता जा रहा था. पतंग को हाथ से जाता देख दोनों ने बस्ते वहीं फैंक दिए. मामला करो या मरो का रूप ले चुका था. लम्बी दौड़ और मशक्कत के बाद कटी पतंग हाथ लग गई. चेहरे पर पसीने के साथ साथ युद्ध-विजेता का भाव आ गया.

वापिस बस्ते उठाने आए तो दोनों बस्ते गायब ! बहुत खोजने पर भी नहीं मिले तो बग़ैर बस्ते के रोनी सूरत लेकर घर मे घुसे. घर में तो भूचाल आ गया. दोनों को झापड़ लगे ताड़-ताड़ और खूब डांट पड़ी.

बस्ते की तलाश मे २ - ३ टीमें इधर उधर दौड़ी. एक टीम ने सूचित किया की कॉपियां तो कबाड़ी को बिक गई हैं और किताबें बस्ते सहित पुरानी किताबों की दुकान वाले को किसी ने बेच दी हैं.

माँ पैसे लेकर भागी. वही बस्ते, किताबें और कॉपियां दुबारा खरीद कर लाई. घर आकर तलाशी शुरू हुई. कोने कोने में से पतंग, चर्खियां, सद्दी, मांझे को इकठ्ठा किया गया. सारा सामान घर के बाहर रख कर सबके सामने तहस नहस कर दिया गया.

उस दिन के बाद हमारे घर से पतंगबाज़ी चीन वापिस चली गई !

- गायत्री, नई दिल्ली. 

पतंग 

Saturday, 16 July 2016

बारिश

कॉलेज की पढ़ाई के उपरान्त नई सरकारी नौकरी लग गई थी. दफ़्तर भी कनॉट प्लेस में था इसलिए दिन भर रौनक़ ही रौनक़. ख़ास बात यह भी थी कि चाहें तो भीड़ में भी एकान्त ढूँढ लें या फिर भीड़ का हिस्सा बन जाएँ.

एकाकी स्वभाव-वश शाम को अवकाश के बाद कंधे पर झोला लटकाये पैदल ही दाये बायें निकल जाया करती थी. घर से दफ़्तर का समय बस से मात्र ८-१० मिनट का था तो बस पकड़ने की कोई जल्दी नहीं होती थी. कभी पैदल जनपथ, कभी हनुमान मंदिर या कभी बंगला साहिब की ओर निकल पड़ती थी. वहां से भी घर के लिए सवारी मिल ही जाती थी. याने की ज़िंदगी बिना भागम-भाग के मधुर गति से आगे बढ़ रही थी.

अगस्त का महीना था पर तारीख़ तो याद नहीं शायद १५ अगस्त के आस पास थी. मौसम ख़ुशमिज़ाज था कुछ काले बादल आसमान में तैर रहे थे. पैदल ही घूमते-घामते संसद भवन होते हुए इंडिया गेट के बस स्टैण्ड पहुंची. बस के इंतज़ार में वहां सामान्य से अधिक भीड़ थी. कुछ समय यूँ ही बस की इंतज़ार में बीत गया और इधर बूंदा-बांदी होने लगी. तभी पास मे आकर एक फटफटिया रूकी. पहले तो ध्यान नहीं दिया पर जब सवार ने हैलमैट उतारा तो पता लगा - अरे मिस्टर एच ? ये यहाँ क्यों ? शायद बारिश से बचने के लिये रुके हों या भीड़ में इनका कोई परिचित होगा. यह सोच कर नज़रें घुमा ली. पर उत्सुकता वश नज़रें फिर उस तरफ चली गईं. मिस्टर एच से नज़रें मिलते ही फट से मुख़ातिब हुए, 
- लगता है काफी देर से इंतज़ार कर रही हो. चलो बैठो मैं छोड़ देता हूँ.
लग रहा था कि फटफटी नई है ओर सवार नौसिखिया. सो टालने के लिए कहा 'धन्यवाद'. तो जवाब आया:
- जल्दी बैठो ये पेट्रोल नहीं मेरा दिल जल रहा है हाहाहा !
- अच्छा तो ये धुआं दिल जलने से है ! सवारी के साथ गाड़ी चलानी आती भी है क्या ?
- धग धग की आवाज़ तो सुनो, कहते हुए फटफटीया को जोर से रेस दे दी.
- अरे सब कुछ अंडर कण्ट्रोल है. जल्दी बैठो.
आस पास के कुछ लोग तिरछी नज़र रख रहे थे और लैला - मजनूँ की वार्ता का मजा ले रहे थे. इसलिए बात और ज्यादा न बढ़ाते हुए पिछली सीट पर ड्राइवर से कुछ दूरी रख कर बैठ गई.

विजय चौक के पास बारिश तेज़ हो गई. मिस्टर एच. ने फटफटीया का रूख फ़व्वारे के नीचे बने रेस्तराँ की तरफ कर दिया. बाइक कोने में खड़ी करके रेस्तरां के अन्दर भागे. वहाँ पर भीगे चेहरे को साफ़ किया और एक कोने वाले टेबल पर जा बैठे.

रेस्तरां में मद्धम सी रोशनी थी, बाहर भी अँधेरा और तेज़ बारिश. सिहरन सी हो गयी. इस नई स्थिति में मन में उथल पुथल शुरू हो गई. इसके साथ क्यों आई ? साफ  मना क्योँ नहीं किया ? पता नहीं कैसा व्यक्ति है ? घर देर से पहुंची तो माँ क्या कहेगी ? वेटर कैसे घूर रहा है ?

तभी वेटर ने पुछा,
- चाय या ठंडा ?
मिस्टर एच. ने एपल जूस की तारीफ करते हुए तपाक से दो ग्लास का आर्डर कर दिया. काफी देर ऐपल जूस की चुस्कियो के साथ इधर-उधर की बातें जो सामान्यतः दो अजनबियों के बीच होती हैं चलती रही. समय का कुछ ध्यान न रहा. जैसे ही बारिश रुकी मैंने पर्स उठा लिया.

बैरा बिल ले आया मिस्टर एच. ने तपाक से बिल पकड़ लिया. जेब से पर्स निकाला और खोला. अब मिस्टर का सारा ध्यान पर्स में चला गया. पूरे पर्स की तलाशी लेने के बाद चेहरे की रंगत बदलने लगी. पतलून की साइड और पीछे के खीसे देखने के बाद भी कुछ नहीं निकला. अब क़मीज़ की जेब टटोली और तब तक चेहरा लाल सुर्ख हो गया. खैर हमने भी भाँप लिया की जेब खल्लास थी. मिस्टर की खिसियाहट भरी मुस्कान पर हंसी आ गयी. हँसते हँसते बिल मिस्टर के हाथ से ले लिया और बैरे को पैसे दे दिए. बैरे ने मिस्टर एच. को देखा फिर उनकी फटफटिया को देखा और फिर व्यंग्य भरी मुस्कान फैंकी जैसे कह रहा हो की,
- तेरे जैसे कई देखे हैं !

जाहिर था कि मिस्टर एच. में मजनूं की आत्मा प्रवेश कर गई थी. और इस दीवानगी में फटफटिया के अलावा सब कुछ आउट ऑफ़ कंट्रोल था. इतना तो आभास हो गया था की पिछली सीट की सवारी की तलाश चल रही थी और खाली सीट भरने का इरादा अटल लग रहा था.

बारिश रुक चुकी थी और आसमान भी साफ़ हो गया था. मिस्टर मजनूँ ने झेंपते हुए कहा,
- कभी कभी ऐसा भी हो जाता है ! और फटफटिया स्टार्ट की. और मैं फिर से पिछली सीट पर सवार घर की ओर निकल पड़ी.
पर मुझे साफ़ आसमान की तरह ये भी साफ़ हो गया था की जल्द ही चाय पे बुलावा आने वाला है.

लम्बे सफ़र की शुरुआत 
-- गायत्री, नई दिल्ली.

Thursday, 7 July 2016

जामुन

जुलाई के बरसाती मौसम में बाहर गली में जामुन वाले की आवाज सुनाई पड़ी,
- जामुन काले काले रा !
- जामुन बड़े रसीले रा !
फट से बाहर निकली तो देखा कि रेड़ी पर हरे हरे पत्तों के ऊपर जामुन की छोटी सी ढेरी लिये भाई आवाज लगा रहा था. जामुन ताज़ा और बड़े बड़े थे. काले- जामुनी रंग में सुंदर लग रहे थे. पर दाम भी कम नहीं था २०० रू किलो. पाव भर के पैसे दिये और नमक की पुड़िया के साथ जामुन ले लिये. 

जामुन बरसाती मौसम का तोहफ़ा है. इसे काला जामुन, जम्बू, जम्बुल, राजमन या ब्लैकबेरी भी कहते हैं. वैसे विज्ञान में इसका नाम है - Syzygium cumin. यह भारत के अलावा दक्षिण एशिया के कई देशों में पाया जाता है. जामुन का पेड़ सदाबहार, घना और काफी बड़ा होता है. अगर आप इंडिया गेट गए हों या फिर 26 जनवरी की परेड देखी हो तो जामुन के पेड़ ज़रूर देखे होंगे. जामुन के पेड़ के पत्ते, पेड़ की छाल, फल और गुठली, सभी बड़े उपयोगी हैं. जामुन में, प्रोटीन, कैल्शियम और कार्बोहायड्रेट भी हैं. मधुमेह का एंटी है. 

घर आकर जामुन धो कर नमक के साथ आनंद लिया. जामुन चाहे कितना ही मीठा हो खा कर मुंह का स्वाद थोड़ा कसैला सा हो जाता है और जीभ जामुनी हो जाती है. स्वाद ठीक रखने के लिए हल्का सा नमक सही रहता है.

जामुन खाते खाते बचपन का ख़्याल आ गया. पिताजी की पोस्टिंग एयर फ़ोर्स स्टेशन, रेस कोर्स, नयी दिल्ली में थी. वहीँ सरकारी क्वार्टर में रहते थे. वहाँ पर इमली और जामुन के बहुत से बड़े बड़े पेड़ थे. घर से सिर्फ सौ मीटर दूर एक ट्यूब वैल था जिसके अहाते में भी जामुन के पेड़ थे जो पके जामुनों से लदे हुए थे. वायु सेना का पड़ाव होने के कारण यह निषिद्ध क्षेत्र था और वहां का रास्ता गार्ड रूम के सामने से था. गार्ड वहां से अंदर जाने को मना करते थे पर पेड़ के पके जामुन हमें न्यौता देते थे कि आ जाओ !

स्कूलों की तो उन दिनों गर्मी की छुट्टियाँ थी. भैय्या ने कहा,
- देखो सुबह पांच बजे तो गार्ड सोया रहता है. चुपचाप गार्ड रूम के पीछे से अंदर घुस जाएंगे. अगर तुम दोनों तैयार हो तो कल सुबह हमला बोला जाए ?
सुबह सुबह भैय्या ने हम दोनों बहनों को जगा दिया अभी बादलों के वजह से पूरा उजाला भी नहीं हुआ था.
- चुपचाप चल पड़ो. गार्ड रूम में इस वक़्त कोई भी नहीं है अभी. कोई चद्दर ले लो. जामुन ऊपर से टपकेंगे तो उस में इकट्ठे कर लेना. जल्दी कर लो.

रात को जो चादर ओढ़ी थी वही चादर लेकर हम निकल पड़े. भैय्या ने चप्पल उतारी और फुर्ती से पेड़ पर चढ़ गए. ऊपर चढ़ कर भैय्या ने पेड़ की डाल हिलानी शुरु कर दी. जामुन की टपाटप बरसात होने लगी. हम दोनों बहनों ने चादर फैला कर दो-दो सिरे पकड़ लिए. चादर में जामुन जमा होने लगे. भैया बन्दर की तरह जिस डाल की तरफ बढ़ते, हम भी चादर फैला कर उसी तरफ फुदकने लग जाते. पर इतने में दूर कहीं गाड़ी की आवाज़ आई.
- भैया उतरो उतरो कोई आ रहा है !
- आया आया तुम लोग निकल लो.
चादर के चारों कोने इकट्ठे करके गठरी बना कर मैंने कंधे पर डाल ली और हम दोनों घर की और दौड़े. पीछे मुड़ कर देखा तो भैय्या भी पेड़ से कूद कर नंगे पैर भागे आ रहे थे और चप्पलें हाथों में पकड़ी हुई थीं.

घर पहुँचने पर जोरदार स्वागत हुआ. चद्दर खराब करने पर खूब डांट पड़ी और एक हफ्ते तक डांट चलती रही. अनुशासन तोड़ने और बिना आज्ञा फल तोड़ने पर भैय्या को एक करारा चांटा लगा और डांट और भी लम्बी चली - शायद दस बारह दिन तक लगातार चलती रही.

पर मीठे रसीले जामुनों के साथ थोड़ा सा नमक तो चलता है !
जामुन काले काले रा !