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Thursday, 30 July 2026

अपनी अपनी दुनिया

गोयल साब अंदर आए और अपने जूते खोलने लगे। आपको शायद पता नहीं है की ये वही जूते हैं जो 'वॉक' पर जाने के लिए छोटे बेटे ने अमरीका में दिलवाए थे। पूरी दोस्त मंडली में किसी के पास नहीं हैं ये अठारह हजार वाले जूते। 

हाथ मुंह धोया और किचन में चाय बनाने की तैयारी करने लगे। उन्होंने सोचा संध्या चाय तो कम ही पीती है पर पूछ ही लेता हूँ, अच्छा इम्प्रैशन पड़ेगा। और अगर नहीं पूछा तो तुनक जाएगी। 

- सुनो चाय बना रहा हूँ पियोगी?

- रहने दो। जब पीनी होती है तब तो तुम नज़र नहीं आते। 

- अरे जरा दस मिनट के लिए सैर करने गया था रामेश्वर एंड कंपनी के साथ।  

- संध्या की कंपनी पसंद नहीं आती ना ? जितनी ज्यादा सैर कर रहे हो उतने ही गोलमटोल होते जा रहे हो। 

गोयल साब खीज कर बड़बड़ाए - क्या मुसीबत है! पर लफ़्ज़ जबान पर नहीं आ पाए अंदर ही दफ़न हो गए। 

गोयल साब बैंक में क्लर्क लगे थे और जनरल मैनेजर रिटायर हुए। जब बैंक ज्वाइन किया था तो जैसी कि कहावत है: हीरे की कदर जौहरी ही जानता है, गोयल साब की पहचान उनके होने वाले ससुर जी ने कर ली थी। ससुर जी उस वक़्त बैंक में खुद जनरल मैनेजर थे और अपने जमाई राजा को प्रमोशन और अच्छी पोस्टिंग दिलाने में मदद करते थे। ये बात संध्या और हमारे गोयल साब, दोनों ही अच्छी तरह जानते थे। 

ये बात संध्या जी की सहेलियां भी जानती थीं, क्यूंकि कभी कभी तैश में आकर संध्या बोल पड़ती थी:

- इनके घर था क्या ? कुछ भी नहीं। ये तो पापा का ही आशीर्वाद है - प्रमोशन हो , पोस्टिंग हो या घर का गोल्ड, सब कुछ पापा के परताप से तो है।

पर गोयल साब इसकी चर्चा कभी नहीं करते थे। और क्यों करें ? बैंक के दोस्त यार तो टांग खिंचाई से बाज नहीं आते थे। पर अब रिटायर हो गए तो कोई जिकर नहीं करता। कर भी दे तो अब क्या फर्क पड़ता है। बैंक पीछे रह गया और ससुर जी आगे निकल लिए। हाँ अगर संध्या ये बात छेड़ दे तो उनकी कनपटियां लाल हो जाती थीं पर बोल नहीं पाते थे। बस शीत युद्ध शुरू हो जाता था। अब इस युद्ध के फिर बढ़ जाने की आशंका थी क्यूंकि बड़ी बिटिया और बड़े जमाई राजा बैंगलोर से आने वाले थे। 

बिटिया और जमाई के लिए संध्या तो बस न्योछावर ही हो जाती थी। खाने में, कपड़ों में या फिर घूमने में, दोनों जमाईयों को क्या पसंद है क्या नहीं, सब पता था। उधर गोयल साब कसमसाते हुए अपना बजट देखने लग जाते थे। ऐसे में अक्सर तलवारें खिंच जाती और म्यान में वापिस जाने में देर लगती। 

पिछली बार बड़े जमाई ने मसूरी का नाम लिया तो संध्या ने झट गाड़ी की चाबी पकड़ा दी। साब के कान में फूंक मार दी - कुछ पैसे बिटिया के हाथ रख दो दोनों घूमने जा रहे हैं। दिल पे हाथ रख कर साब ने संध्या को पर्स पकड़ा दिया। खाली होना था, हो गया। बिटिया और जमाई दोनों कमाते हैं, पर पेट्रोल के पैसे सुसरा गोयल देगा। बदले में क्या मिला -  "पापा ये मसूरी में आपके लिए ना इन्होंने गरम जुराबें पसंद की थी !"   

गाड़ी वापिस आई तो भी साब पर्स भर के वर्कशॉप में सारा दिन बैठे गाड़ी ठीक कराते रहे। वहां भी पर्स खाली हो गया। बैंक में रहते हुए बात और थी ,पेंशन में कुछ और, ये बात संध्या को कौन समझाए? इस बार तो बिटिया के साथ जमाई राजा और जमाई जी की अम्मा भी पधार रही हैं। जाहिर है की अब हरिद्वार, ऋषिकेश के भी ट्रिप लगेंगे।

हर हर गंगे 
गाड़ी हरिद्वार पहुंची और पाँचों ने घाट में डुबकी लगाई। उसके बाद घाट के पास ही एक 'मशहूर ढाबे' में गरमा-गरम आलू पूड़ी का मज़ा लिया। घर वापिस पहुंचे तो सब विश्राम के मूड में थे। लेटते ही संध्या ने साब से शिकायत कर दी - 

- ये पूड़ियाँ खा के तो मेरा पेट खराब हो गया है। उलटी ना आ जाए ? हे भगवान् !

- तुम्हें पिछली बार भी यही शिकायत हुई थी। पता तो है फिर क्यों खाई पूड़ियाँ ? 

- हुंह तुम चुप रहो जी। 

- अब चूरन दूँ? या पहले वाली गोली। 

- गोली दे दो और इस बारे में बात नहीं करना समझे ! चाय का टाइम हो गया है? हे भगवान् ! 

- अरे तुम लेट जाओ और दरवाज़ा बंद कर लो। समधन को मैं चाय वाय पिला देता हूँ ! 

- हूँ संध्या को ना पिलाना पर समधन को जरूर पिलाओगे ! 

गोयल सा ने बिटिया से मदद ले कर चाय का बढ़िया बंदोबस्त कर लिया। समधन जी को कह दिया कि संध्या थक कर सो गई है। पर शाम को संध्या को छोटी बिटिया का फोन आ गया कि वे भी एक रात के लिए सबसे मिलने आ रहे हैं। फोन रखते ही आँखों के सामने घूमने लगा घर का इंतज़ाम - फल, सब्जियां, किचन और बिस्तर वगैरह सब ठीक ठाक करने पड़ेंगे। गोयल सा के बस का तो कुछ हैं नहीं सब कुछ मुझे ही देखना पड़ेगा। झटपट लिस्ट बनानी शुरू कर दी और साब को बाज़ार दौड़ा दिया। साब अपनी गाडी में ढेर सारा सामान ले आए पर भुनभुनाते हुए क्यूंकि शाम की ड्राइविंग करना मुश्किल हो गया था। 

अभी वापिस लौटे ही थे कि अगली लिस्ट भी तैयार मिली। बच्चों को वापसी के समय क्या क्या देना है इसकी लिस्ट संध्या ने बना ली थी बोली,

- इसके लिए तो मैं कल आपके साथ चलूंगी। अपने कार्ड वार्ड सारे रख लेना, बाजार में जा कर ये नहीं कहना की कार्ड तो मैं भूल ही गया। 

- हूँ, गोयल सा ने जवाब दिया। मन ही मन हिसाब लगाया कि इस महीने की पेंशन बचने की कितने % सम्भावना है?

खैर साब सबकी बिदाई हो गई, गिफ्ट दे दिए गए और उसके साथ ही गहमा गहमी ख़तम हो गई। अगले दिन संध्या का विश्लेषण शुरू हो गया - समधन ऐसी है वैसी है, जमाई नंबर 1 ऐसा है वैसा है, जमाई राजा नंबर 2 ये कहता है और वो कहता है। हमने जो खातिरदारी की है उसका जवाब नहीं है, गिफ्ट भी एक से एक बढ़ कर दिए हैं याद करेंगे। 

जवाब में गोयल सा ने कहा - हूँ, हाँ, वो तो है, सही है, बिलकुल, इत्यादि। पर मन में उनका अपना ही हिसाब किताब चल रहा था। नौकरी में होते तो खाता फुल रहता था - चाहे महीने की पहली तारिख हो या आखिरी। 

दोनों थके हुए थे इसलिए जल्दी ही डबल बेड पर लेट गए। थोड़ी देर तो संध्या का विश्लेषण जारी रहा पर फिर आवाज़ धीमी पड़ने लगी। दोनों ने करवट ली और एक दूसरे की ओर पीठ कर ली। गोयल सा अपनी और संध्या अपनी ख़याली दुनिया में खो गए। 


4 comments:

Harsh Wardhan Jog said...

https://jogharshwardhan.blogspot.com/2026/07/blog-post_30.html

Anonymous said...

उम्दा, बहुत दिनों बाद लिखा, निरंतर लिखते रहे, गोयल सा का तो कुंडा हो गया , हम सब गोयल सा की हालत समझ सकते हैं चूंकि उन्हीं हालात से गुज़र रहे हैं।

Anonymous said...

शानदार। हकीक़त की जमीन पर गोयल साहेब का कड़वा सच । बहुत बढ़िया - एस के लोहिया

Anonymous said...

एक पेंशनर के परिवार में मेहमान खासकर शादी शुदा लड़की के आने पर होने वाले माहौल का अच्छा वृतांत लिखा।
सुधीर निंद्राजोग
Meerut/Pune