Pages

Friday, 17 July 2026

प्राचीन तमिल नाडु में बौद्ध धर्म का इतिहास

जब हम भारत में बौद्ध धर्म के इतिहास का पन्नों को पलटते हैं, तो हमारी दृष्टि उत्तर भारत के मगध, सारनाथ या फिर आंध्र के अमरावती-नागार्जुनकोंडा पर आकर ठहर जाती है। बहुत कम लोग जानते हैं कि विंध्य पर्वतमाला के सुदूर दक्षिण में, कावेरी के किनारे और मन्नार की खाड़ी के आसपास भी तथागत के विचारों का एक स्वर्णिम युग बीता था।  

तमिल संगम काल में तमिलकम या तमिल देश (विकी से साभार ) 

प्राचीन तमिल देश, जिसे ऐतिहासिक रूप से तमिलकम कहा जाता है, सदियों तक बौद्ध दर्शन, साहित्य, न्यायशास्त्र (Logic) और कला का एक जीवंत केंद्र रहा।

आइए, दक्षिणापथ से आगे बढ़कर कांचीपुरम और नागपट्टिनम के तटों तक फैले तमिल नाडु के इस भूले बिसरे बौद्ध गौरव की यात्रा करते हैं।

1. दक्षिण में बौद्ध धर्म का आगमन और दक्षिणापथ

प्राचीन काल में उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने वाला महान व्यापारिक मार्ग दक्षिणापथ केवल वस्तुओं के लेन-देन का माध्यम नहीं था, बल्कि यह विचारों का महामार्ग भी था। बौद्ध भिक्षु, भिक्षुणियां और सार्थवाह (व्यापारिक कारवां) इसी मार्ग से आगे बढ़ते हुए आंध्र से सुदूर दक्षिण की ओर आते जाते थे।

बौद्ध साहित्य और "महावंश" (श्री लंका में लिखा गया पुरातन इतिहास ग्रंथ) के अनुसार, सम्राट अशोक (राजकाल ईसापूर्व 268 से ईसापूर्व 232 तक) ने अपने पुत्र महेंद्र (पाली भाषा में महिंदा) और पुत्री संघमित्रा (पाली में संघमित्ता), को श्रीलंका में धम्म प्रचार के लिए भेजा था। 

उनकी इस समुद्री यात्रा के दौरान उन्होंने तमिलकम के तटीय क्षेत्रों में भी विश्राम किया और बौद्ध धर्म की नींव रखी। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक, चेर, चोल और पांड्य राजाओं के राज्यों में धम्म का प्रवेश हो चुका था। 

इसका बड़ा प्रमाण हमें प्राचीन पांड्य देश (मदुरै के आस-पास) की पहाड़ियों में मिलता है। मगुलामलाई (मंगुलम) जैसी प्राकृतिक चट्टानी गुफाओं में आज भी ईसा पूर्व तीसरी सदी के तमिल-ब्राह्मी अभिलेख और पत्थरों को तराश कर बनाए गए भिक्षुओं के पत्थर से बने बिस्तर मौजूद हैं। इन गुफाओं की छतों पर विशेष रूप से 'ड्रिप-लेज' (पानी निकालने का रास्ता) बनाई गई थी, ताकि बारिश का पानी अंदर न आ सके। ये दुर्गम पहाड़ियाँ गवाह हैं कि कैसे बौद्ध भिक्षुओं ने इन्हें अपने वर्षावास और कठोर साधना का केंद्र बनाया था।

2. व्यापारिक संपर्क: धम्म और सार्थवाह

प्राचीन तमिलकम में बौद्ध धर्म को फलने-फूलने में यहाँ के समृद्ध व्यापारिक वर्ग शेट्टी (Chetty) या पाली में श्रेष्ठि, ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई। प्राचीन तमिल साम्राज्य के पत्तन रोम, सुमात्रा, जावा और चीन के साथ समुद्री व्यापार के मुख्य केंद्र थे।

कावेरीपूमपट्टिनम (पुहार), नागपट्टिनम और मल्लई (महाबलिपुरम या मम्मलपुरम) जैसे बंदरगाहों से जब बौद्ध व्यापारी जहाजों में बैठते थे, तो वे अपने साथ धम्म की पुस्तकें और मूर्तियां भी ले जाते थे। बौद्ध धर्म का स्वभाव उदार और जातिगत बंधनों से मुक्त था, इसलिए व्यापारियों ने बौद्ध विहारों को दिल खोलकर दान दिया। इन तटीय नगरों में भव्य विहार, चैत्य और बुद्ध के चरणों के प्रतीक (बुद्धपाद) बनाए गए, जो विदेशी नाविकों और स्थानीय निवासियों के लिए आस्था के मुख्य केंद्र बने। 

महाबलीपुरम में लाइटहाउस (प्रकाश स्तम्भ या दीप स्तम्भ)। बायां लाइटहाउस ब्रिटिश राज में बना, दाईं ओर प्राचीन झोंपड़ी नुमा दीप स्तम्भ है जिसे रात में नाविकों की सहायता के लिए लकड़ियां जला कर प्रकाशित किया जाता था


3. तमिल साहित्य में बौद्ध धम्म  

संगम काल और उसके ठीक बाद का तमिल साहित्य बौद्ध धर्म से प्रभावित रहा था। तमिल साहित्य के "पांच महाकाव्यों" (Aimperum-kappiyangal / एम्पेरुम-कापियांगल ) में से दो सीधे तौर पर बौद्ध दर्शन से जुड़े हैं, पहला कुंडलकेसी (जिसके अब केवल कुछ अंश मिलते हैं) और दूसरा महान ग्रंथ है 'मणिमेकलई'

बौद्ध कवि सीत्तलई सत्तनार द्वारा रचित 'मणिमेकलई' केवल एक काव्य नहीं, बल्कि एक दार्शनिक दस्तावेज है। यह महाकाव्य 'शिल्प्पादिकारम' की अगली कड़ी है। मणिमेकलई की कथा संक्षेप में इस प्रकार है: नृत्यांगना माधवी और कोवलन की सुन्दर पुत्री मणिमेकलई, सांसारिक जीवन को छोड़कर बौद्ध भिक्षुणी बन जाती है। उसे एक चमत्कारी पात्र 'अक्षय पात्र' मिलता है, जिससे वह भूखों को भोजन कराती है।

यह ग्रंथ बौद्ध धर्म के 'करुणा' और 'सेवा' के सिद्धांत को रेखांकित करता है। इसके अंतिम अध्यायों में बौद्ध दर्शन के चार आर्य सत्य, प्रतीत्यसमुत्पाद और बौद्ध न्याय (Logic) का ऐसा विशद वर्णन है, जो उस समय के तमिल समाज पर बौद्ध धर्म के गहरे बौद्धिक प्रभाव को दर्शाता है।

4. कांचीपुरम: दक्षिण का 'नालंदा' और ह्वेनसांग का आंखों देखा हाल

अगर उत्तर भारत में नालंदा और पश्चिम में वल्ल्भी शिक्षा के केंद्र थे, तो दक्षिण भारत में कांची (आधुनिक कांचीपुरम) को वही गौरव प्राप्त था। यह बौद्ध अध्ययन का एक वैश्विक विश्वविद्यालय था, जहाँ देश-विदेश से विद्वान आते थे।

सातवीं शताब्दी में जब चीनी यात्री ह्वेनसांग कांची पहुंचे, तो उन्होंने यहाँ के वैभव का विस्तृत वर्णन किया। ह्वेनसांग लिखते हैं:

  • कांचीपुरम में लगभग 100 बौद्ध संघाराम (विहार) थे, जिनमें 10,000 से अधिक भिक्षु निवास करते थे, जो थेरवाद और महायान दोनों परंपराओं का अध्ययन करते थे।

  • उन्होंने यहाँ सम्राट अशोक द्वारा निर्मित एक विशाल स्तूप को भी देखा था।

  • ह्वेनसांग ने उल्लेख किया कि कांचीपुरम के लोग शिक्षा, करुणा और धार्मिक सहिष्णुता के लिए जाने जाते थे।

5. कांची के महान दार्शनिक

कांची की पावन भूमि ने बौद्ध जगत को ऐसे दो रत्न दिए जिन्होंने पूरे विश्व का इतिहास बदल दिया:

आचार्य दिगनाग 

पाँचवीं-छठी शताब्दी में हुए आचार्य दिङ्नाग को न्याय और तर्कशास्त्र का पितामह माना जाता है। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान को चुनौती देते हुए 'प्रमाण समुच्चय' की रचना की। कांची में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे नालंदा भी गए। उनके तर्कशास्त्र ने पूरे एशिया के बौद्ध दर्शन को एक तार्किक आधार दिया।

बोधिधर्म 

छठी शताब्दी के महान बौद्ध भिक्षु बोधिधर्म कांचीपुरम के एक पल्लव राजकुमार थे। उन्होंने राजसी ठाट-बाट छोड़कर ध्यान मार्ग को अपनाया। वे समुद्री मार्ग से चीन पहुंचे, जहाँ उन्होंने चान (Chan) बौद्ध धर्म की नींव रखी, जिसे आज जापान में 'ज़ेन' (Zen) के नाम से जाना जाता है। 

(पाली भाषा का शब्द झान, संस्कृत में ध्यान, चीन में चान, कोरिया में सोन और जापान में ज़ेन कहलाने लगा।) 

भिक्षु बोधिधर्म चीन के प्रसिद्ध शाओलिन मंदिर भी गए, जहाँ उन्होंने भिक्षुओं को ध्यान के साथ-साथ आत्मरक्षा के लिए मार्शल आर्ट्स (कुंग-फू) की शिक्षा दी, जिसकी जड़ें प्राचीन तमिल 'कलरीपायट्टु' या 'सिलंबम' से जुड़ी मानी जाती हैं।

6. चोल काल का नागपट्टिनम

आमतौर पर माना जाता है कि 10वीं शताब्दी के बाद बौद्ध धर्म भारत से लुप्त होने लगा था, लेकिन तमिल नाडु का नागपट्टिनम 11वीं और 12वीं शताब्दी (चोल राजवंश के चरम) में भी बौद्ध धर्म का एक स्वर्णिम द्वीप बना रहा।

इस काल में श्रीविजय साम्राज्य (आधुनिक सुमात्रा, इंडोनेशिया) के शैलेंद्र वंशीय राजा चूड़ामणि वर्मन ने चोल सम्राट राजराजा चोल प्रथम की अनुमति से नागपट्टिनम में एक भव्य बौद्ध विहार का निर्माण करवाया, जिसे 'चूलामणि विहार' कहा जाता है। राजराजा चोल के पुत्र राजेन्द्र चोल प्रथम ने प्रसिद्ध 'लेडन ताम्रपत्र' (Leiden Copper Plates) के माध्यम से इस विहार के रख-रखाव के लिए पूरे आनाईमंगलम गांव को दान में दे दिया था।

नागपट्टिनम अपनी उत्कृष्ट कांस्य बुद्ध मूर्तियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। चोल शिल्पकारों द्वारा बनाई गई ये मूर्तियां कला और अध्यात्म का अनूठा संगम हैं, जिनमें बुद्ध को अभय मुद्रा में, सुंदर प्रभामंडल के साथ दिखाया गया है।

7. बौद्ध धम्म की विस्मृति और आधुनिक पुनरुत्थान

तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दी के बाद भक्ति आंदोलन के प्रसार, शैव और वैष्णव संतों के उभार, और राजकीय संरक्षण की कमी के कारण बौद्ध धर्म तमिल नाडु के जनमानस से धीरे-धीरे ओझल हो गया। 

परंतु, उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में तमिल नाडु में बौद्ध धर्म का एक आधुनिक पुनरुत्थान हुआ:

अयोध्यादास पंडित (Iyothee Thass Pandithar या ईयोथीथास पण्डितार ): वे एक महान तमिल विद्वान, सिद्ध चिकित्सक और समाज सुधारक थे। उन्होंने स्थापित किया कि तमिल नाडु समाज के हाशिए पर पड़े लोग मूल रूप से प्राचीन बौद्ध थे। 1898 में दास अमरीकन बौद्ध कर्नल हेनरी स्टील ओलकॉट की सहायता से श्री लंका गए और दीक्षा ली। उन्होंने श्रीलंका के बौद्ध भिक्षु अनगारिक धर्मपाल की सहायता से मद्रास (चेन्नई) में 'साउथ इंडियन शाक्य बौद्ध सोसाइटी' की स्थापना की। उन्होंने 'ओरु पैैसा तमिळन' नामक अखबार के माध्यम से धम्म के विचारों को पुनर्जीवित किया।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर का प्रभाव: 1956 में जब बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने नागपुर में लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया, तो इसकी गूंज तमिल नाडु में भी सुनाई दी। अयोध्यादास पंडित द्वारा तैयार की गई वैचारिक भूमि के कारण, तमिल नाडु के लाखों लोगों ने बाबासाहेब के आह्वान पर पुनः धम्म की शरण ली, जिससे आज भी यहाँ एक जीवंत बौद्ध समुदाय मौजूद है।

प्राचीन तमिल नाडु का बौद्ध इतिहास हमें सिखाता है कि धम्म केवल एक धार्मिक पहचान नहीं थी, बल्कि यह तमिल संस्कृति, भाषा, कला और वैश्विक संबंधों को गढ़ने वाली एक वैचारिक क्रांति थी। कांचीपुरम के स्तूपों से लेकर शाओलिन मंदिर तक, तमिल नाडु के भिक्षुओं ने जो लौ जलाई थी, उसकी चमक आज भी विश्व इतिहास में बिखरी हुई है।   

महाबलीपुरम में समुद्र किनारे एक मंदिर - Shore Temple या पैगोडा। ये मंदिर 700 -728 में पल्लव राजा नरसिम्हा वर्मन द्वारा बनवाया गया था। यूरोप के व्यापारी नाविक इसे Seven Pagodas के नाम से जानते थे। फिलहाल तो यहाँ एक ही पैगोडा है। 2004 की सुमानी के बाद यहाँ से रेत हट गई और बहुत से गढ़े हुए ग्रेनाइट पत्थरों के अवशेष मिले। हो सकता है कि यहाँ सात मंदिर या पैगोडा रहे हों  

8. चलते चलते 

(क) पांच तमिल महाकाव्य या ऐम्पेरुमकप्पियम
- सिलाप्पादिकारम: यह कवि इलांगो अडिगल की रचना है। यह एक प्रसिद्ध प्रेम और दुःख भरी कहानी है। इसमें कोवलन नाम के व्यापारी को चोरी के झूठे आरोप में मार दिया जाता है। इस पर उस की पत्नी कन्नगी न्याय के लिए लड़ती है और अपनी दैविक शक्ति से पूरे शहर को नष्ट कर देती है। 
मणिमेकलाई: इसके रचनाकार सीतलाई सत्तनार हैं और यह कहानी 'सिलाप्पादिकारम' की अगली कड़ी है। इसमें कोवलन और माधवी की बेटी मणिमेकलाई सांसारिक मोह-माया से दूर होकर, बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को अपनाती है और एक भिक्षुणी बनकर लोगों की सेवा करती है। 
- दैविक सिन्तामणि: (या दैविक चिंतामणि) इसके रचयिता जैन मुनि तिरुत्तक्क देव (या तिरुताक्क देवर) हैं। इसमें दैविक (जिसे सिवक, सीवका या जीवक भी कहा जाता है) नाम के एक राजकुमार की वीरता, बुद्धिमानी और उसकी आठ शादियों का वर्णन है। अंत में सीवका अपने राज्य और धन-दौलत को छोड़कर एक जैन मुनि बन जाता है। 
- कुण्डलकेसी: इसके लेखक नाथाकुत्तनार(या नाटकुटनार) हैं। यह ग्रंथ बौद्ध धर्म के दर्शन पर आधारित है। इस में मुख्य पात्र कुण्डलकेसी नाम की एक घुंघराले बालों वाली महिला है। इस महाकाव्य में जीवन की सच्चाई की खोज का बहुत सुंदर वर्णन किया गया है। इस की मूल प्रति उपलब्ध नहीं है और इसकी जानकारी दूसरे ग्रंथों में दिए गए संदर्भ, श्लोक और भाष्य से मिलती है।  
वलैयापति: रचनाकार का नाम ज्ञात नहीं है। यह पारिवारिक सम्बन्ध, नैतिक शिक्षा देने वाली मान्यताओं और समाज के नियमों पर आधारित है।
(ख) लेडेन ताम्रपत्र (Leiden Copper Plates)
ये ताम्रपत्र ग्यारहवीं शताब्दी के चोल राजवंश के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज हैं, जो राजा राजराजा चोल प्रथम और उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम के शासनकाल से संबंधित हैं। कुल 24 ताम्रपत्रों में तमिल और संस्कृत भाषाओं (ग्रंथ लिपि) में लेख उकेरे गए हैं। इनमें नागपट्टिनम (तमिलनाडु) में बने चूड़ामणि बौद्ध विहार को दान में दिए गए गांवों और जमीनों का विस्तृत विवरण है। 
ये ताम्रपत्र चोल साम्राज्य की धार्मिक सहिष्णुता, प्रशासनिक व्यवस्था और दक्षिण-पूर्व एशिया (श्रीविजय साम्राज्य) के साथ उनके मजबूत व्यापारिक व राजनयिक संबंधों को दर्शाते हैं। लंबे समय तक नीदरलैंड की लेडेन यूनिवर्सिटी में सुरक्षित रहने के बाद, इन ऐतिहासिक पत्रों को पिछले दिनों भारत को वापस सौंप दिया गया है।

(ग ) प्रमुख तमिल बौद्ध विद्वान और भिक्षु

  • आचार्य दिङ्नाग - छठी शताब्दी: कांचीपुरम में जन्मे दिङ्नाग को बौद्ध न्यायशास्त्र (Buddhist Logic) का पितामह माना जाता है। उन्होंने पारंपरिक दर्शन को चुनौती देते हुए अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'प्रमाण-समुच्चय' की रचना की, जिसने पूरे एशिया के बौद्ध दर्शन को एक नया तार्किक आधार दिया। उन्होंने ज्ञान के केवल दो साधन माने - प्रत्यक्ष और अनुमान, और 'हेतुचक्र' की रचना की। 

  • बुद्धदत्त - पांचवीं शताब्दी: थेरवाद बौद्ध परंपरा के यह महान लेखक और टीकाकार चोल साम्राज्य के समकालीन थे। उन्होंने अनुराधापुर (श्रीलंका) के महाविहार में रहकर अध्ययन किया और 'विनय-विनिच्चय' सहित पालि भाषा में कई महत्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथों की रचना की।

  • धर्मपाल - पांचवीं-छठी शताब्दी: यह एक प्रख्यात थेरवाद बौद्ध भिक्षु और भाष्यकार थे, जिनका जन्म तमिल नाडु के चेन्नई तटीय क्षेत्र (बदरतित्थ विहार) में माना जाता है। उन्होंने पालि अट्ठकथाओं (टीकाओं) पर अत्यधिक प्रामाणिक और विशद व्याख्याएं लिखीं, जो आज भी थेरवाद परंपरा का मुख्य आधार हैं।

  • बोधिधर्म - छठी शताब्दी: कांचीपुरम के पल्लव राजवंश के राजकुमार, जिन्होंने राजसी जीवन त्याग कर बौद्ध भिक्षु का मार्ग चुना। वे समुद्री मार्ग से चीन पहुंचे, जहाँ उन्होंने 'चान' बौद्ध धर्म की नींव रखी, जिसे आज जापान और पूरी दुनिया में 'ज़ेन' (Zen Buddhism ) के नाम से जाना जाता है; उन्होंने ही शाओलिन मंदिर में कुंग-फू की शुरुआत की थी।

  • बोधिसेन - आठवीं शताब्दी: कांचीपुरम के एक असाधारण बौद्ध विद्वान और भिक्षु, जिन्होंने चीन की यात्रा की और फिर वहां से जापान चले गए। जापान में उन्हें बोदैसेन्ना या बोरुसेना के नाम से जाना जाता है, जहाँ उन्होंने 752 ईस्वी में नारा के प्रसिद्ध तोडाई-जी मंदिर में विशाल कांस्य बुद्ध प्रतिमा की 'नेत्र-उन्मीलन' (Eye-opening) रस्म का नेतृत्व किया और अपने हाथों से आँखों में रंग भरा था।

  • वज्रबोधि - सातवीं-आठवीं शताब्दी: एक महान तांत्रिक बौद्ध भिक्षु थे जिनका जन्म कुछ इतिहासकारों के अनुसार, प्राचीन तमिलकम में हुआ था। वे कांचीपुरम तथा नालंदा से जुड़े थे। वे श्री लंका और और श्री विजय (सुमात्रा ) होते हुए समुद्री मार्ग से चीन गए और वहाँ तांत्रिक झेनयान बौद्ध धर्म का प्रसार किया। यही शिक्षा जापान पहुँच के 'शिंगोन बौद्ध धर्म' में तब्दील हो गई। वज्रबोधि को शिंगोन बौद्ध धर्म के आठ मूल आचार्यों में गिना जाता है।

  • सीत्तलै सत्तनार: संगम/उत्तर-संगम काल के प्राचीन तमिल नाडु के एक महान बौद्ध कवि और अनाज व्यापारी थे। इन्होंने तमिल साहित्य के अमर महाकाव्य 'मणिमेकलई' की रचना की थी। ये कवी इलांगो आदिगाल के मित्र थे। उनकी इस कृति में बौद्ध धर्म के करुणा, सेवा और प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धांतों का सबसे सुंदर साहित्यिक चित्रण मिलता है।

  • बुद्धमित्र - ग्यारहवीं शताब्दी: चोल राजा वीर राजेंद्र के शासनकाल के दौरान हुए थे। वे एक प्रसिद्ध तमिल बौद्ध व्याकरणविद् थे। उन्होंने 'वीरसोलियम' नामक एक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की, जो बौद्ध परिप्रेक्ष्य से तमिल व्याकरण और काव्यशास्त्र को समझाने वाला एक अनूठा समन्वय है।

(घ) और आगे पढ़ने के लिए : 
  1. Manimekalai — Translated by Merchant, A.S. (A classic English translation of the Tamil Buddhist epic).

  2. Buddhism in Tamil Nadu: Collected Papers — Institute of Asian Studies, Chennai (1998).

  3. The Story of Buddhism in Tamil Nadu — Dr. A. Veluppillai.

  4. Buddhism in South India — D.C. Ahir.

  5. On Yuan Chwang's Travels in India (629-645 AD) — Thomas Watters (For Xuan Zang's descriptions of Kanchi).

  6. Selected Writing of Iyothee Thass — Critical editions on modern Buddhist revival in Tamil Nadu.


9 comments:

Harsh Wardhan Jog said...

https://jogharshwardhan.blogspot.com/2026/07/blog-post_17.html

Ravindra Singh Yadav said...

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शनिवार 18 जुलाई 2026 को लिंक की गयी है....

http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!


!

सुशील कुमार जोशी said...

सुंदर

Harsh Wardhan Jog said...

Dhanyvaad Ravindra Singh Yadav.

Harsh Wardhan Jog said...

Thank you Joshi Ji

Anita said...

तमिलनाडु में बौद्ध परंपरा की जानकारी देता हुआ अत्यंत सुंदर व शोध परक वर्णन !

हरीश कुमार said...

बहुत सुंदर

Harsh Wardhan Jog said...

Dhanyvaad Anita Ji

Harsh Wardhan Jog said...

Dhanyvaad Harish Kumar ji