बेंगलुरु के मौसम का मिजाज आजकल बदला-बदला नज़र आता है। खिड़की से बाहर देखो तो आसमान में रुई के फाहे जैसे सफेद बादल तैर रहे होते हैं। लगता है कि ये कह रहे हैं -"हम तो बस बैंगलोर देखने आए हैं, बरसने का हमारा कोई इरादा नहीं है।" मौसम विभाग कहता है कि बारिश आने वाली है, और बादल कहते हैं, "रास्ते में हूँ, जरा सबर करो !"
क्या आपने कभी सोचा है कि इस 'मानसून' शब्द कैसे बना? सदियों पहले जब अरब व्यापारी अपनी नावों और जहाजों में बैठकर भारत के साथ व्यापार करने आते थे, तो उन्होंने देखा कि साल के कुछ महीने हवाएँ एक दिशा में चलती हैं और बाकी महीनों में बिल्कुल उल्टी दिशा में!
अरबी भाषा में 'मौसम' या 'ऋतु' को 'मौसिम' (Mawsim) कहा जाता है।
वैसे तो बेंगलुरु का मौसम 'ऑ-सम' (Awesome) होता है, पर शायद हम अनजाने में अरबी शब्द 'मौसिम' को ही याद कर रहे होते हैं। अरब के व्यापारी हवा देखकर जहाज चलाते थे, और हम मानसूनी हवा देखकर पकोड़े ऑर्डर करते हैं!
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| 1. मानसून की शुरुआत हमेशा सफेद और मासूम बादलों से होती है, ठीक वैसे ही जैसे महीने की पहली तारीख को सैलरी की उम्मीद! |
मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने भारत और मानसून के रिश्ते को बड़े कमाल के शब्दों में बांधा है। उन्होंने लिखा था:
"अगर आपको भारत और यहाँ के लोगों को समझना है, तो आपको मानसून को समझना होगा। इसे किताबों में पढ़ना या सिनेमा स्क्रीन पर देखना काफी नहीं है, इसे खुद जीना पड़ता है।"
बिलकुल सही फ़रमाया ! यानी जब तक आप बेंगलुरु की बारिश में भीगकर, सड़क पर हिचकोले खा कर, ट्रैफिक में एक दो घंटे न बिता लें, तब तक आपका मानसूनी अनुभव अधूरा है!
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| 2. सफ़ेद बादलों का एक और रूप - "लगता है आज बरसेंगे, पर नहीं ये रोज़ का भ्रम है |
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| 3. बादलों की लुका छिपी - नो बॉल लेकिन अंपायर नदारद |
जब बेंगलुरु में बारिश नहीं होती, तो समझ जाइए कि दुनिया के किसी कोने में कोई 'एल नीनो' (El Niño) नाम का विलेन एक्टिव हो चुका है। सरल भाषा में कहें तो यह प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) का वो नटखट बालक है, जो वहाँ पानी गर्म करके बैठ जाता है और हमारे मानसून का सिस्टम ही बिगाड़ देता है।
मस्त हवाएँ जो कभी सीधे बेंगलुरु के कैफे और आईटी पार्क्स में सरेआम चली आती थीं वो इस एल नीनो के चक्कर में रास्ता भटक जाती हैं।
मौसम वैज्ञानिक चाहे जितनी बड़ी-बड़ी थ्योरी दे दें, बेंगलुरु वालों के लिए एल नीनो का मतलब बिना बात की उमस और फिल्टर कॉफी देख कर पसीना आना है। हम यहाँ बालकनी में खड़े होकर कड़क चाय के साथ पकोड़े की प्लानिंग करते रह जाते हैं, और एल नीनो दूर बैठकर मुस्कुराता रहता है।
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| 4. बादल घने होने लगे हैं - महाकवि कालिदास का प्राचीन फ्री नेटवर्क |
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| 5. बादलों की कतार - यह संदेश लेकर जा रहे हैं या सिर्फ बेंगलुरु का ट्रैफिक देख रहे हैं? |
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| 6. रंगत बदली है - उम्मीदें जाग रही हैं! |
अब थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं। जब दुनिया में न तो व्हाट्सएप था, न नेटवर्क की झंझट, तब महाकवि कालिदास ने एक कमाल का आइडिया निकाला था। उन्होंने अपने महाकाव्य 'मेघदूत' में एक व्याकुल यक्ष की कहानी लिखी, जो प्रेमिका से दूर दक्षिण भारत में सजा भुगत रहा था। उसने अपनी प्रेमिका को संदेश भेजने के लिए बादल को ही अपना दूत या डाकिया बना लिया। यक्ष ने बादल को रास्ता भी समझाया कि "देखो, फलां नदी , फलां पहाड़ और फलां शहर होते हुए जाना सीधे हिमालय की स्वर्णिम नगरी अलकापुरी पहुँच जाओगे।"
अगर आज के ज़माने में वो यक्ष बेंगलुरु में होता, तो शायद उसका बादल सिल्कबोर्ड या मार्थाहल्ली के ट्रैफिक जाम में ही फंस जाता! यक्ष अपनी प्रेमिका से कहता - "मैंने मेघदूत तो भेजा था, लेकिन वो अल नीनो ने भटका दिया है शायद।"
वैसे कालिदास के बादल बड़े आज्ञाकारी थे, वो संदेश भी पहुँचाते थे और रास्ते में प्यासी धरती को तृप्त भी करते जाते थे। आज के बेंगलुरु के बादलों को देखकर लगता है कि इन्होंने कालिदास की किताब में सिर्फ संदेश ले जाने वाला अध्याय पढ़ा है, बरसने वाला नहीं पढ़ा!
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| 7. बादल घनेरे - अब तो बरसो ! |
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| 8.अबकी बार, पक्का बारिश! - दिल को बहलाने के लिए ये ख़याल अच्छा है! |
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| 9. कारे कारे बदरा - अब भी छलावा ? |
मानसून का इंतज़ार सिर्फ हमारा और आपका ही नहीं है बल्कि हर भारत वासी का है। इसका एक बहुत ही दिलचस्प और ऐतिहासिक कनेक्शन देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से भी है। नेहरू जी को पहाड़ों, प्रकृति और बादलों से कितना प्यार था, यह उनकी किताबों में साफ दिखता है। लेकिन जब बात भारतीय मानसून की आती थी, तो वह भी बेबस हो जाते थे। बॉम्बे (मुंबई) की उमस भरी गर्मी हो या दिल्ली की तपती दोपहर, नेहरू जी अपनी डायरी और चिट्ठियों में अक्सर मानसून के आने का ज़िक्र बड़े ही बेताब अंदाज में करते थे।
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| 10. बिजली चमकी बादल गरजे - हम आ रहे हैं, अपनी गाड़ियाँ अंदर कर लो! |
बॉम्बे की बारिश का इंतज़ार करते हुए उन्होंने एक बार लिखा था कि कैसे पूरा शहर आसमान की तरफ टकटकी लगाए देखता है, जैसे कोई बहुत बड़ा तमाशा होने वाला हो। दिल्ली में जब मानसून लेट होता था, तो नेहरू जी की बेचैनी बिल्कुल वैसी ही होती थी जैसी आज वाई-फाई डाउन होने पर होती है। प्रधानमंत्री के पास देश चलाने की सारी पावर थी, लेकिन बादलों का रिमोट उनके पास भी नहीं था। बादल तब भी अपनी मर्जी के मालिक थे, और आज भी हैं।
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| 11. घने, काले और डरावने बादल - पर सिर्फ नौटंकी! |
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| 12. आएगी ? नहीं आएगी ? नहीं आई 😟 |
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| 13. उम्मीद है की ये असली हैं! |
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| 14. चलिए हलकी फुहार तो पड़ी और इंद्रधनुष के दर्शन भी हुए |
तो साब, कहानी कुल मिलाकर ये है कि चाहे प्रशांत महासागर का एल नीनो हो, कालिदास का मेघदूत हो या नेहरू जी का ऐतिहासिक इंतज़ार—बादलों ने हमेशा इंसानों को अपनी उंगलियों पर नचाया है। इस सीज़न में बेंगलुरु का आसमान भले ही रोज़ नई-नई पेंटिंग्स बनाकर हमारा दिल बहला रहा हो, लेकिन हमारी बालकनी के गमले झमाझम बारिश की दुआ मांग रहे हैं।
तब तक के लिए, मानसूनी बादलों की फोटू खींचते रहिए, फिल्टर कॉफी की चुस्कियां लेते रहिए और आसमान की तरफ देखकर कहिए: "भाया, इब बरस रे हो या खाली रील बणावण खातर पोज़ दे रे हो?"














3 comments:
https://jogharshwardhan.blogspot.com/2026/07/blog-post_12.html
Nice description..Climate change all over the country.
Yes Singh saab. It's not getting due attention.
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