सार
यह शोध पत्र सम्राट अशोक के शासनकाल (268-232 ईसा पूर्व ) में महिलाओं की स्थिति, उनकी शक्ति के स्रोतों एवं उन पर लगी सामाजिक सीमाओं का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। शोध का प्राथमिक आधार अशोक के शिलालेख (विशेषकर माइनर शिलालेख, क्वींस स्तम्भ लेख, कलिंग अभिलेख ) हैं, जिनके साथ सहायक स्रोतों के रूप में 'अर्थशास्त्र' तथा समकालीन अथवा प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथों का उपयोग किया गया है। अध्ययन से प्रकट होता है कि अशोक ने बौद्ध 'धम्म' के सिद्धांतों पर आधारित नीतियों के माध्यम से सामाजिक कल्याण एवं नैतिक सुधार का प्रयास किया। इन नीतियों में महिलाओं को एक नैतिक एवं सामाजिक इकाई के रूप में मान्यता प्रदान करना, उन्हें 'धम्म' के प्रचार-प्रसार में भागीदार बनाने का आह्वान तथा सीमित स्तर पर उनके सशक्तिकरण का उद्देश्य निहित था। किंतु, इस पहल के बावजूद, महिलाओं के पारिवारिक अधिकार, संपत्ति पर अधिकार, तथा सामाजिक प्रतिष्ठा उस युग की पितृसत्तत्मक संरचनाओं से नियंत्रित एवं सीमित रह गई। शोध का मुख्य निष्कर्ष यह रेखांकित करता है कि अशोक के उदारवादी और महिला-समावेशी दृष्टिकोण एवं तत्कालीन सामाजिक यथार्थ के बीच एक विरोधाभास विद्यमान था। यही अंतर राजकीय आदेशों के महिलाओं के व्यावहारिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को सीमित कर देता था।
प्रस्तावना
सम्राट अशोक मौर्य साम्राज्य (320 -185 ईसा पूर्व ) के सबसे शक्तिशाली एवं प्रभावशाली शासकों में गिने जाते हैं। उनका शासनकाल न केवल प्रशासनिक व्यवस्था और साम्राज्यिक विस्तार के लिए, बल्कि नैतिक सिद्धांतों पर आधारित एक परिवर्तनकारी दृष्टिकोण अपनाने के कारण भी ऐतिहासिक महत्त्व रखता है। अशोक के 'धम्म' के प्रचार में करुणा, अहिंसा, आत्मसंयम और सार्वजानिक कल्याण जैसे मुद्दे समाहित थे। इन में हाशिए में शामिल शामिल जनता, विशेष कर महिलाओं को प्राथमिकता दी गई थी।
किंतु, अशोक के यह नैतिक प्रयास गहराई से स्थापित पितृसत्तात्मक समाज को पूरी तरह से भेद नहीं पाए। तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के नियम निर्धारित करने वाले ग्रंथों – जैसे कौटिल्य का 'अर्थशास्त्र', 'मनुस्मृति' एवं अन्य धर्मशास्त्रों – में महिलाओं की भूमिका मुख्यतः परिवारिक क्षेत्र, संतानोत्पत्ति तथा पुरुष सापेक्ष सेवा तक सीमित दर्शाई गई है। अशोक के कुछ शिलालेखों में 'महामात्र' जैसे पदों पर नियुक्त महिला अधिकारियों का उल्लेख अवश्य मिलता है, परंतु यह स्पष्ट नहीं है कि ये सामान्य जनसमुदाय की प्रतिनिधि थीं अथवा कुलीन वर्ग की सीमित उपस्थिति। इसी पृष्ठभूमि में यह प्रश्न मुख्य हो जाता है कि अशोक की धम्म-केंद्रित नीतियाँ महिलाओं के लिए व्यावहारिक अधिकारों एवं सामाजिक सत्ता में भागीदारी का मार्ग कहाँ तक प्रशस्त कर सकीं?
इसी जटिलता को समझने के लिए 'थेरीगाथा' जैसे प्रारंभिक बौद्ध साहित्य का साक्ष्य सार्थक है( थेरी अर्थात वरिष्ठ भिक्खुणी)। यह ग्रंथ बुद्ध के समकालीन भिक्षुणियों की आत्मकथात्मक गाथाओं का संकलन है, जो दर्शाता है कि कैसे समाज के विविध वर्गों (यहाँ तक कि निम्न जातियों एवं दलित पृष्ठभूमि) की महिलाएं भिक्षुणी बन कर सामाजिक बंधनों से मुक्ति, आत्मनिर्णय की क्षमता तथा आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त करती हैं।
उदाहरणार्थ, पुण्णा थेरी, एक दासी थी, अपनी गाथाओं में सांसारिक दुःख एवं शोषण से मुक्त होकर धम्म के माध्यम से आंतरिक शक्ति और स्वायत्तता प्राप्त करने के अनुभव को इस तरह व्यक्त करती है:
"सुख से सुख उत्पन्न होता है, दुःख से दुःख ही आता है;
जब मैंने सुख में छिपा हुआ दुःख पहचाना,
तब मैंने दुःख में छिपा हुआ सुख पाया।"
यह पंक्तियाँ सामाजिक दासत्व से परे आत्मिक स्वातंत्र्य की प्राप्ति का उद्घोष करती हैं।
इसी प्रकार, अम्बपाली थेरी, जो एक प्रसिद्ध गणिका (राजनर्तकी) थी, अपने वैभव और यौवन का त्याग करने के पश्चात वैराग्य एवं गहन आत्मशांति की ओर अग्रसर होती है। उसकी गाथा जीवन की अनित्यता की गहन अनुभूति को दर्शाती है जिसमें भौतिक जीवन की क्षणभंगुरता के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है।
वास्तव में जरा (बुढ़ापा), रोग और मृत्यु ही सत्य हैं; इनसे कोई भी व्यक्ति वास्तविक सुख प्राप्त नहीं कर सकता।
इस पत्र का प्रमुख उद्देश्य अशोक की धम्म नीतियों के अंतर्गत प्रस्तावित नैतिक उत्थान के आदर्शों और मौर्यकालीन समाज की वास्तविकताओं के बीच विद्यमान विरोधाभास का विश्लेषण करना है। एक ओर शाही आदेशों में समावेशन तथा नैतिक उन्नयन की भाषा, तो दूसरी ओर पहले से चली आ रही पितृसत्ता के दृढ़ अवरोध – यही द्वैत इस अध्ययन का केंद्रीय बिंदु है। साथ ही, यह भी प्रमुखता से विश्लेषित किया जाएगा कि बौद्ध परंपरा के भीतर, विशेषकर 'थेरीगाथा' के माध्यम से प्रस्फुटित महिलाओं का स्वर और स्वायत्त, अशोक के शासनिक प्रयासों से किस सीमा तक परिवर्तन की संभावना प्रस्तुत करती थी।
अशोक से पूर्व महिलाओं की सामाजिक स्थिति
अशोक के उदय से पूर्व का समाज पूरी तरह से पितृसत्तात्मक ढाँचे में व्यवस्थित था। वैदिक काल (लगभग 1500-500 ईसा पूर्व) के प्रारंभिक स्रोतों में यद्यपि गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषी नारियों के उदाहरण मिलते हैं जो धार्मिक चर्चाओं एवं दार्शनिक विमर्श में सक्रिय भागीदारी दर्शाते हैं, किंतु उत्तरवैदिक एवं विशेषकर मौर्य-पूर्व काल (लगभग 600-321 ईसा पूर्व) में महिलाओं की सामाजिक स्थिति, शिक्षा, तथा आर्थिक स्वायत्तता में उल्लेखनीय ह्रास दिखाई देता है। इस युग में महिलाओं की भूमिका को समझने के लिए कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’, स्मृति साहित्य (विशेषकर मनुस्मृति), तथा आधुनिक विद्वानों जैसे डॉ. भीमराव आंबेडकर के ऐतिहासिक विश्लेषण का साक्ष्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस खंड में इन्हीं स्रोतों की सहायता से पूर्व-मौर्यकालीन सामाजिक संरचना में नारी की स्थिति का विवेचन नीचे दिया जा रहा है।
अर्थशास्त्र: कौटिल्य के अर्थशास्त्र (लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व) में महिलाओं के संबंध में विस्तृत व्यवस्थाएँ मिलती हैं, जो एक सुव्यवस्थित किंतु असमान सामाजिक ढाँचे को दर्शाती हैं:
विवाह एवं विधवा पुनर्विवाह: अर्थशास्त्र आठ प्रकार के विवाहों (ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गांधर्व, राक्षस, पैशाच) का उल्लेख करता है, जिनमें केवल ब्रह्म विवाह को सर्वोत्तम माना गया। विधवा पुनर्विवाह पर स्पष्ट प्रतिबंध न होने के बावजूद, इसका प्रचलन नहीं था और विधवाओं के लिए संयमित जीवन की अपेक्षा की जाती थी।
सामाजिक भूमिका एवं स्थान: महिलाओं की प्राथमिक पहचान पारिवारिक क्षेत्र में सीमित थी — पत्नी, माता, या गृहिणी के रूप में। कुलीन वर्गों में उनकी उपस्थिति के अतिरिक्त, दासियों एवं सेविकाओं के रूप में उनका शोषण भी सामान्य था।
संपत्ति का अधिकार: महिलाओं को स्त्रीधन (विवाह में मिला धन, आभूषण या उपहार) पर अधिकार स्वीकार किया गया था। किंतु, उत्पादक संपत्ति जैसे भूमि, पशुधन या व्यापारिक साधनों पर स्वामित्व या नियंत्रण का कोई अधिकार नहीं था। उनकी आर्थिक निर्भरता पुरुष संरक्षकों पर बनी रही।
स्मृति साहित्य: मनुस्मृति (लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईस्वी) जैसे धर्मशास्त्रों ने महिलाओं के लिए अधीनस्थ एवं नियंत्रित जीवन का वैधानिक ढाँचा प्रस्तुत किया:
पराधीनता : प्रसिद्ध श्लोक "पिता रक्षति कौमार्ये, भर्ता रक्षति यौवने, पुत्रो रक्षति वार्धक्ये; न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति" (मनुस्मृति 9.3) महिला जीवन के समस्त चरणों में पुरुष संरक्षण एवं नियंत्रण की अनिवार्यता को स्थापित करता है, स्पष्टतः उनके स्वतंत्र अस्तित्व (स्वातंत्र्य) को नकारता है।
शिक्षा एवं स्वायत्तता: स्त्रियों के लिए वैदिक अध्ययन या उच्च शिक्षा पर प्रतिबंध लगभग सर्वव्यापी था। स्वतंत्र व्यवसाय या आर्थिक निर्णय लेने का अधिकार भी उनके लिए वर्जित था।
विधवा जीवन पर प्रतिबंध: विधवा पुनर्विवाह को कड़ाई से निषिद्ध माना गया। विधवाओं से कठोर ब्रह्मचर्य, सादा जीवन एवं सामाजिक उपेक्षा सहने की अपेक्षा की जाती थी, जो उनके सामाजिक जीवन को अत्यंत दुष्कर बना देती थी।
डॉ. भीमराव आंबेडकर अपनी पुस्तक "रेवोल्यूशन एंड काउंटर-रेवोल्यूशन इन एन्शन्ट इंडिया" (1956) में एक निर्णायक तर्क प्रस्तुत करते हैं:
"The Buddhist revolution brought women the right to education, to join monastic orders (Bhikkhuni Sangha), to choose their life paths... But the Brahminic counter-revolution systematically eroded those rights and pushed women back into domestic subservience."
("बौद्ध क्रांति ने महिलाओं को शिक्षा का अधिकार, भिक्षुणी संघ में प्रवेश का अधिकार और अपना जीवन पथ चुनने का अधिकार दिया। किंतु ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति ने इन अधिकारों को क्रमशः नष्ट किया और स्त्रियों को पुनः घरेलू अधीनता में धकेल दिया।")
डॉ आंबेडकर के अनुसार, गौतम बुद्ध के काल (छठी शताब्दी ईसा पूर्व) में महिलाओं के लिए सामाजिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के अभूतपूर्व अवसर उत्पन्न हुए। भिक्षुणी संघ ने उन्हें पारिवारिक बंधनों से मुक्ति, शिक्षा और सामुदायिक जीवन का मार्ग दिखाया। किंतु, बौद्ध धर्म के पतन होने के साथ साथ ब्राह्मणवादी विचारधारा ने सामाजिक व्यवस्था पर पुनः अधिकार जमा लिया और महिलाओं को पारंपरिक, अधीनस्थ भूमिकाओं में सीमित करने का प्रयास किया। अशोक के शासन (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) से पूर्व का समय इसी प्रतिक्रियावादी सामाजिक पुनर्गठन से गहराई से प्रभावित था।
मौर्यपूर्व समाज में सामान्य महिलाएँ: मौर्य-पूर्व काल में अधिसंख्यक सामान्य महिलाओं की स्थिति को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है। राजनीतिक-प्रशासनिक बहिष्करण: सामान्य महिलाएँ प्रशासनिक एवं राजनीतिक प्रक्रियाओं से पूर्णतः बहिष्कृत थीं। शाही परिवारों या उच्च कुलों की कुछ महिलाएँ ही दरबार में सीमित प्रभाव रख पाती थीं।
शिक्षा: वैदिक काल की विरल ऋषिकाओं की परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी थी। नियमित शिक्षा का अधिकार पुरुषों का विशेषाधिकार बन गया था; स्त्रियों की शिक्षा (यदि होती भी थी) तो केवल गृहकार्यों एवं सामाजिक आचरण तक सीमित थी।
सैन्य भूमिका: सैन्य क्षेत्र पुरुषों का अनन्य क्षेत्र माना जाता था। यूनानी यात्रियों (जैसे मेगस्थनीज) द्वारा वर्णित राजा की महिला अंगरक्षक टुकड़ियाँ एक अपवाद या प्रतीक तक ही सिमित है। आम महिलाओं की सैन्य भागीदारी नहीं थी।
पूर्व-अशोककालीन भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति सर्वत्र सिमित और पुरुषाधिकार से नियंत्रित थी। अर्थशास्त्र और स्मृति साहित्य जैसे नियामक ग्रंथों में उनके लिए व्यापक सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता, संपत्ति पर वास्तविक नियंत्रण, या राजनीतिक प्रतिनिधित्व के कोई प्रावधान नहीं थे। डॉ. आंबेडकर के ऐतिहासिक विश्लेषण के अनुसार, बुद्धकाल में प्रारंभ हुई स्त्री सशक्तिकरण की संभावनाएँ ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति द्वारा कुंद कर दी गईं। यह ऐतिहासिक संदर्भ अशोक के शासनकाल में महिलाओं के उत्थान के प्रयासों की सीमाओं और चुनौतियों को समझने के लिए अत्यावश्यक है। अशोक की नीतियाँ इसी सुदृढ़ पितृसत्तात्मक संरचना के भीतर कार्यरत थीं, जिसने उनकी प्रभावकारिता को अनिवार्य रूप से सीमित कर दिया।
अशोक की धम्म नीति और महिलाएँ
सम्राट अशोक की धम्म नीति, जिसे उसके शिलालेखों और स्तम्भ लेखों के माध्यम से प्रसारित किया गया, एक सामाजिक-नैतिक सुधार कार्यक्रम था। अशोक का उद्देश्य अहिंसा, सहिष्णुता, सामाजिक कल्याण और नैतिक आचरण जैसे सार्वभौमिक मूल्यों को स्थापित करना था। इस नीति ने परिवारिक संबंधों, कर्तव्यनिष्ठा एवं नैतिक अनुशासन पर विशेष बल दिया, जिसमें महिलाएँ एक चिन्हित समूह के रूप में उभरती हैं। किंतु, क्या यह नीति महिलाओं को केवल सहानुभूति एवं संरक्षण की वस्तु मानती थी, अथवा उन्हें स्वायत्त और सक्रिय सहभागिता के वास्तविक अवसर भी प्रदान करती थी?
धम्म नीति में महिलाऐं : अशोक की धम्म नीति व्यक्तिगत एवं सामाजिक नैतिकता का निर्माण पर केंद्रित थी। न कि धार्मिक वर्चस्व या राजनीतिक अधिकारों का पुनर्वितरण। इस संदर्भ में महिलाओं से संबंधित प्रमुख पहलू थे:
पारिवारिक नैतिकता: शिलालेखों में बार-बार माता-पिता, गुरुजन, पत्नी और सेवकों के प्रति आदर, सद्भाव एवं उचित व्यवहार का आह्वान किया गया है। उदाहरणार्थ, रॉक एडिक्ट III (धम्मपलना) में कहा गया है
"माता-पिता की सेवा, गुरुजनों का आदर, प्राणियों के प्रति दया, सत्यवादिता और शुद्ध जीवन — यही धम्म है।"
यहाँ महिलाएँ (माता, पत्नी) सम्मान एवं सुरक्षा के पात्र के रूप में सामने आती हैं, किंतु यह दृष्टिकोण उन्हें स्वतंत्र नैतिक कर्ता या निर्णायक के रूप में नहीं, बल्कि पारिवारिक व्यवस्था में एक घटक के रूप में स्थापित करता है।
नैतिक अनुशासन: अशोक स्पष्टतः महिलाओं को भी धम्मपालन के योग्य नागरिक मानता था। यह एक नैतिक समावेश का प्रयास था, जहाँ उनसे भी धम्म के सिद्धांतों का पालन करने की अपेक्षा की गई। हालाँकि, इस समावेशन में अधिकारों की बजाय कर्तव्यों और आचरण संहिता पर अधिक जोर था। यह समावेशन सामाजिक-आर्थिक या राजनीतिक सशक्तिकरण नहीं दिखता।
धम्ममहामात्र: अपने शासन के 13वें या 14वें वर्ष (लगभग 256-255 ई.पू.) में अशोक ने 'धम्ममहामात्र' नामक विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की। इनका प्राथमिक दायित्व समाज के विभिन्न वर्गों में धम्म के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार, नैतिक आचरण की निगरानी एवं जनकल्याण कार्यों को सुनिश्चित करना था। कुछ शिलालेखों जैसे V और XII में महिला धम्ममहामात्र बनाए जाने का उल्लेख है।
यह ऐतिहासिक रूप से क्रांतिकारी कदम था क्योंकि यह महिलाओं की औपचारिक राजकीय सेवा में भागीदारी का एक दुर्लभ अवसर दिया जा रहा था। किंतु, यह भूमिका व्यापक प्रशासनिक या न्यायिक शक्ति वाली नहीं थी; यह मुख्यतः नैतिक प्रचार, सामाजिक समन्वय एवं जनसंपर्क तक सीमित थी। यह भी अनिश्चित है कि ये महिलाएँ सामान्य जनता से थीं या उच्च कुलीन वर्ग से संबंधित थीं। हालांकि यह नियुक्ति सामाजिक गतिशीलता का संकेत नहीं देती, बल्कि व्यवस्था के भीतर एक सीमित विस्तार ही दर्शाती है।
शिलालेखों में महिलाओं का उल्लेख
अशोक के अधिकांश शिलालेखों में महिलाओं को एक विशिष्ट श्रेणी या समूह के रूप में अलग से संबोधित नहीं किया गया है। महिलाएं समूहों में जैसे 'प्रजा', 'माता-पिता, रिश्तेदार आदि के अंतर्गत शामिल थीं। अभिलेख IV, VIII, IX, XII (रूपनाथ, शाहबाजगढ़ी, मानसेरा आदि में) में दिए गए नैतिक उपदेश सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होने वाले थे, जिनमें महिलाएँ भी शामिल थीं। किंतु, महिलाओं की विशिष्ट सामाजिक चुनौतियों जैसे विवाह में स्वायत्तता, संपत्ति का अधिकार, विधवा-विवाह, शिक्षा तक पहुँच, या पारिवारिक हिंसा आदि पर कोई प्रत्यक्ष चर्चा या नीतिगत हस्तक्षेप इन शिलालेखों में नहीं मिलता। यह नारी-विशिष्ट मुद्दों के प्रति राजकीय चुप्पी या उदासीनता का संकेत देता है।
अशोक के राज काल या उसके निकटवर्ती बौद्ध परिप्रेक्ष्य में कुछ महिलाओं ने सामाजिक सीमाओं को पार कर आध्यात्मिक एवं सार्वजनिक स्वायत्ततता प्रदर्शित की। ये उदाहरण उस युग की संरचनात्मक सीमाओं के भीतर भी व्यक्तिगत साहस और अवसरों की झलक देते हैं:
महाप्रजापति गौतमी: भिक्षुणी संघ की संस्थापिका (बुद्धकालीन) गौतम बुद्ध की मौसी एवं पालनकर्ता महापजापति गोतमी ने स्त्रियों के लिए भिक्षुणी संघ की स्थापना में निर्णायक भूमिका निभाई। बुद्ध के प्रारंभिक अनिच्छुक रवैये के बावजूद, उनके दृढ़ आग्रह और अनुयायिनियों के साथ दीक्षा ग्रहण ने बौद्ध परंपरा में महिलाओं के लिए आध्यात्मिक स्वायत्तता और सामुदायिक जीवन का द्वार खोला। यह महिला स्वायत्ततता और सामूहिक संघर्ष का एक ऐतिहासिक उदाहरण है, जो अशोक के धम्म की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि को रेखांकित करता है।
देवी: विदिशा निवासी और शाक्य कुल (बुद्ध के वंश) से संबंधित देवी, अशोक की प्रथम प्रेमिका और पत्नी थी। वे सम्राट के पुत्र महेंद्र एवं पुत्री संघमित्रा की माता थी। ऐतिहासिक स्रोत ( दीपवंश, महावंश) सुझाते हैं कि देवी बौद्ध थी और उसने अशोक पर गहरा धार्मिक प्रभाव डाला। यद्यपि उन्हें कभी मुख्य रानी का औपचारिक दर्जा नहीं मिला, किंतु मातृत्व एवं आध्यात्मिक प्रभाव से अशोक के बौद्ध धर्म अपनाने में देवी ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
रानी करुवाकी: कौशाम्बी स्तंभलेख (क्वींस एडिक्ट) अशोक के शिलालेखों में एकमात्र ऐसा प्रमाण है जहाँ किसी रानी (करुवाकी - करुवाकि) का नाम, उसका स्वतंत्र धार्मिक दान, और उसकी इच्छा स्पष्ट रूप से अंकित है। लेख में कहा गया है:
"देवानांपियेन प्रियदसिन राजिना चतुर्थेन वसभिसितेन आनंदने नगरे धम्मयुतेन करितं। करुवाकी अभिसरिका अयपुतस्स तिवरस्स हेतु द्वि-सत विभागे धम्म-मतिके च दिन्ने।"
(रानी करुवाकी ने अपने पुत्र तिवर के कल्याण के लिए आनंदनगर में धर्ममातृका (धार्मिक माताओं) को दो सौ मुद्राएँ दान दिए।)
यह दान रानी की स्वतंत्र इच्छा एवं पहल से किया गया था और राजकीय अभिलेख में उसे पूर्ण मान्यता दी गई। यह प्राचीन भारत में एक रानी की सार्वजनिक और धार्मिक स्वायत्तता का एक अद्वितीय एवं ऐतिहासिक प्रमाण है, जो दर्शाता है कि कुछ शाही महिलाएँ सार्वजनिक धार्मिक जीवन में सक्रिय भागीदारी रख सकती थीं और उनके कार्यों को राज्य की लेखीय परंपरा में प्रामाणिक स्थान मिलता था।
संघमित्रा: अशोक की पुत्री संघमित्रा ने अपने भाई महेंद्र के साथ श्रीलंका (ताम्रपर्णी द्वीप) में बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु ऐतिहासिक यात्रा की। उनका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान श्रीलंका में भिक्षुणी संघ की स्थापना करना और वहाँ की स्त्रियों को दीक्षा प्रदान करना था।
यह केवल धर्म का प्रसार नहीं था, बल्कि नारी आध्यात्मिक नेतृत्व एवं संस्थागत अधिकार का अंतर्राष्ट्रीय विस्तार था। संघमित्रा ने स्त्रियों के लिए धार्मिक शिक्षा, संघ जीवन और नेतृत्व के द्वार खोले। यह अशोक की धम्म नीति के व्यावहारिक अंतर्राष्ट्रीय प्रसार में महिलाओं की सक्रिय एवं निर्णायक भूमिका का स्पष्ट उदाहरण है, हालाँकि यह शाही परिवार की महिला तक ही सीमित था।
विश्लेषण: समावेश बनाम सशक्तिकरण
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अशोक की धम्म नीति महिलाओं को नैतिक सम्मान, सुरक्षा और एक सीमित सार्वजनिक भूमिका (धम्ममहामात्र) प्रदान करती थी, विशेषकर शाही परिवार की महिलाओं को धार्मिक नेतृत्व (संघमित्रा) और सार्वजनिक मान्यता (करुवाकी) का अवसर भी देती थी। किंतु, यह नीति आम महिलाओं के लिए सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक सशक्तिकरण का कोई सुव्यवस्थित ढाँचा प्रस्तुत नहीं करती थी। शिक्षा, संपत्ति का अधिकार, व्यावसायिक स्वतंत्रता या राजनीतिक भागीदारी जैसे मूलभूत साधन महिलाओं को सुलभ नहीं थे।
ये नीतियां व्यापक पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती नहीं देती थी। मनुस्मृति या अर्थशास्त्र में वर्णित महिलाओं की अधीनस्थ स्थिति पर अशोक की धम्म नीति का कोई सीधा प्रहार नहीं दिखता। यह नीतियां महिलाओं को स्वायत्त बनाने में सीमित एवं प्रतीक ज्यादा लगती हैं। करुवाकी या संघमित्रा जैसे उदाहरण अपवाद थे, सामान्य नियम नहीं। यह स्वायत्तता भी अक्सर धार्मिक क्षेत्र या शाही हैसियत से जुड़ी थी, न कि सामान्य नागरिक अधिकारों से।
जैसा कि डॉ. आंबेडकर ने इंगित किया, बुद्धकाल में महिलाओं को शिक्षा और आत्मनिर्णय (विशेषकर भिक्षुणी संघ के माध्यम से) के जो क्रांतिकारी अवसर मिले थे, अशोक के काल (लगभग तीन शताब्दी बाद) तक आते-आते वे अधिकांशतः नैतिक उपदेशों और शाही संरक्षण के सीमित दायरे में सिमट कर रह गए थे।
अशोक की धम्म नीति महिलाओं के लिए नैतिक करुणा, सम्मान और एक प्रतीकात्मक सार्वजनिक उपस्थिति का मार्ग प्रशस्त करती थी। यह उस युग के संदर्भ में निश्चित रूप से एक प्रगतिशील दृष्टिकोण था। किंतु, यह व्यापक सामाजिक सशक्तिकरण – जैसे शिक्षा का अधिकार, उत्पादक संपत्ति पर स्वामित्व/नियंत्रण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, या सामाजिक संरचनाओं को चुनौती देने की क्षमता – प्रदान करने में विफल रही। शिलालेखों में महिलाओं का उल्लेख सैद्धांतिक नैतिकता का हिस्सा था, व्यावहारिक अधिकारों की मांग या गारंटी नहीं। धम्ममहामात्रियों, करुवाकी और संघमित्रा जैसे उदाहरण संभावनाओं के दर्शक अवश्य हैं, परंतु वे इस बात के भी साक्ष्य हैं कि ये संभावनाएँ गहन सामाजिक सीमाओं और विशेषाधिकारों (शाही/कुलीन हैसियत) के दायरे में ही साकार हो सकीं। अशोक की धम्म नीति महिलाओं के लिए नैतिक गरिमा का आश्वासन दे सकी, किंतु सामाजिक न्याय या समान सत्ता की दिशा में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं ला सकी।
थेरीगाथा - प्राचीन गाथा में नारी स्वायत्तता
थेरीगाथा , पालि त्रिपिटक के खुद्दक निकाय का अंग है। यह गाथा बौद्ध साहित्य का एक अद्वितीय एवं क्रांतिकारी ग्रंथ है। यह लगभग 73 भिक्षुणियों की आत्मकथात्मक कविताओं का संकलन है, जिसमें स्त्रियों ने स्वयं अपने जीवन के सामाजिक संघर्ष, आंतरिक पीड़ा, वैराग्य के निर्णय और बौद्ध धम्म द्वारा प्राप्त मुक्ति के अनुभवों को अपने अपने शब्दों में प्रस्तुत किया है। यह ग्रंथ हमें नारी चेतना के आंतरिक लोक से सीधे परिचित कराता है – वह चेतना जो गृहस्थी के बंधनों को तोड़कर आत्मनिर्णय के मार्ग पर चलकर विकसित हुई। इसका रचनाकाल लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है।
इसमें वर्णित भिक्षुणियाँ समाज के अलग अलग वर्गों से आती हैं: ब्राह्मण कुलों (सोमा), शाही परिवारों (अनोपमा), दासियाँ (पुण्णा), गणिकाएँ (अंबपाली), विधवाएँ (पताचारा), निर्धन स्त्रियाँ (सुजाता) या निम्न जातियों (पुण्णिका) की प्रतिनिधि थीं। यह विविधता सिद्ध करती है कि बौद्ध भिक्षुणी संघ ने जाति, वर्ग और लिंग की सामाजिक सीमाओं को तोड़कर सभी स्त्रियों को आध्यात्मिक स्वतंत्रता एवं समान गरिमा का अवसर प्रदान किया।
पुण्णा थेरी: पुण्णा के जीवन का संघर्ष दासत्व से मुक्ति का प्रतीक है। उस की गाथा सांसारिक द्वंद्व की गहरी समझ दर्शाती है:
"सुख से सुख उत्पन्न होता है, दुःख से दुःख ही आता है; जब मैंने सुख में छिपा हुआ दुःख पहचाना, तब मैंने दुःख में छिपा हुआ सुख पाया।"
यह उदाहरण प्रमाणित करता है कि बौद्ध धम्म ने समाज की सबसे निचली पायदान पर खड़ी एक दासी को भी आत्मज्ञान का अधिकार दिया।
अम्बपाली थेरी: अम्बपाली ने भौतिक वैभव का त्याग कर भिक्षुणी बनकर स्त्री देह के वस्तुकरण के विरुद्ध विद्रोह किया:
"वास्तव में जरा, रोग और मृत्यु ही सत्य हैं;इनसे कोई भी व्यक्ति वास्तविक सुख प्राप्त नहीं कर सकता।"
उनका मार्ग आत्मनिर्णय की सर्वोच्च अभिव्यक्ति था। बौद्ध धर्म ने महिलाओं को अभूतपूर्व अवसर दिए जिसे अशोक ने आगे बढ़ाया: संघ में प्रवेश से लेकर निर्वाण तक व्यक्तिगत निर्णय, वेदना, अनित्यता जैसे दार्शनिक विषयों पर स्वतंत्र चिंतन, संघ में जाति/पूर्व पेशा का कोई महत्त्व नहीं और अनुभव और तर्क पर आधारित निर्णय।
(नोट : थेरीगाथा पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी: थेरीगाथा की ऐतिहासिक समयरेखा पर विद्वानों में मतभेद हैं। जबकि इसकी मूल गाथाएँ निस्संदेह गौतम बुद्ध के समय (छठी शताब्दी ईसा पूर्व) से संबंधित हैं, इसका वर्तमान संकलन कई शताब्दियों के विकास का परिणाम है। थेरीगाथा की समय रेखा उसके ऐतिहासिक मूल्य को कम नहीं करती, बल्कि दर्शाती है कि बौद्ध भिक्षुणी परंपरा ने महिला-अनुभवों को स्वीकार किया । अशोक का काल इसकी जीवंत अवस्था थी। अतः, इसे बौद्ध धर्म में स्त्री स्वायत्तता के स्मृति-कोश के रूप में देखा जाना चाहिए, जो अशोक-युगीन सामाजिक चेतना को भी प्रभावित कर रहा था।)
थेरीगाथा में निहित नारी स्वायत्तता के आदर्श का अशोक की धम्म नीति से तुलनात्मक विश्लेषण एक स्पष्ट विसंगति उजागर करता है। अशोक का धम्म नारी को नैतिक सम्मान व प्रतीकात्मक भूमिका (धम्ममहामात्र) देता है। स्वायत्तता शाही पारिवारिक तक ही सीमित रही। इसके विपरीत थेरीगाथा की परंपरा स्त्रियों को पूर्ण आत्मनिर्णय, शैक्षिक समानता, सामाजिक मुक्ति और मोक्ष का मार्ग प्रदर्शित करती है।
थेरीगाथा प्राचीन भारत में नारी स्वायत्तता का एक अप्रतिम साहित्यिक स्मारक है। पुण्णा, अम्बपाली जैसी थेरियाँ प्रमाणित करती हैं कि मौर्यकालीन पितृसत्तात्मक समाज में भी स्त्रियाँ अपने भाग्य की सक्रिय निर्माता बन सकती थीं। जहाँ अशोक की धम्म नीति राज्य-स्तरीय नैतिक समावेश का प्रयास थी, वहीं थेरीगाथा नारी के व्यावहारिक सशक्तिकरण और आत्मसत्ता की गाथा गाती है – यही अंतर इसे अधिक क्रांतिकारी बनाता है।
धम्म नीति की सीमाएँ: नारी -विमर्श का अभाव और नैतिक सुधारों का आधा सच
सम्राट अशोक का धम्म, युद्ध की विभीषिका से उपजी करुणा और सामाजिक न्याय की अभूतपूर्व अवधारणा थी। किंतु इसकी प्रगतिशीलता स्त्री-पुरुष समानता के परीक्षण में विफल रही। धम्म ने महिलाओं को सामाजिक पुनर्गठन के केंद्र में न रखकर, उन्हें पारंपरिक भूमिकाओं के बंधन में ही सीमित कर दिया। यह पत्र अशोक की नीति के उस मौन को उजागर करता है, जिसने महिलाओं के अधिकारों और पहचान को उपेक्षित रखा।
धम्ममहामात्र की नियुक्ति, संघमित्रा का श्रीलंका प्रवास या रानी करुवाकी का दान-लेख – ये सभी उदाहरण राजपरिवार या अभिजात वर्ग से जुड़े हैं। शिलालेखों में ग्रामीण, श्रमिक या निम्नजातीय महिलाओं के जीवन पर धम्म के प्रभाव का कोई उल्लेख नहीं है। स्पष्ट है कि सुधारों की पहुँच सामाजिक ऊँचाइयों तक ही सिमटी थी, जबकि निचले पायदान की महिलाएँ इसके लाभ से वंचित रहीं।
शिलालेखों (जैसे गिरनार, शाहबाजगढ़ी) में 'धम्ममहामात्र' राजकीय पद का उल्लेख है, पर महिला अधिकारियों के नाम, जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि गायब हैं। तत्कालीन सामाजिक संरचना (जहाँ शिक्षा और प्रशासनिक पहुँच उच्च वर्गों तक सीमित थी) यही संकेत करती है कि ऐसे पदों पर केवल कुलीन महिलाएँ ही नियुक्त हो सकी होंगी। (स्रोत: रोमिला थापर, अशोक एंड द डिक्लाइन ऑफ़ द मौर्याज़)
अभिलेखीय उपेक्षा: अशोक के विशाल शिलालेखीय साक्ष्य में केवल रानी कुरुवाकी ही नाम से पहचानी जाती हैं (कौशांबी अभिलेख )। अन्य सभी स्त्रियाँ "माता", "पत्नी" या "परिवार" जैसे संबंधों के माध्यम से ही उल्लिखित हैं। (स्रोत: ई. हुल्ट्स्च, इंस्क्रिप्शंस ऑफ़ अशोक). यह व्यक्तिगत पहचान और नागरिक अधिकारों की अनुपस्थिति को दर्शाता है। महिला का अस्तित्व पुरुष-संदर्भ के बिना राजकीय दस्तावेजों में अदृश्य था।
आर्थिक निष्क्रियता: अशोक की धम्म नीति संपत्ति स्वामित्व, उत्तराधिकार या आर्थिक स्वायत्तता जैसे मूलभूत महिला अधिकारों पर पूर्णतः मौन है। यह उल्लेखनीय है क्योंकि धम्म "सामाजिक कल्याण" का दावा करता था। इस मौन ने पूर्ववर्ती पितृसत्तात्मक व्यवस्था (जैसे अर्थशास्त्र में वर्णित 'स्त्रीधन' की सीमित अवधारणा) को ही बनाए रखा, जहाँ भूमि और प्रमुख संपत्ति पर पुरुषों का एकाधिकार था। (स्रोत: कौटिल्य का अर्थशास्त्र, आर. शामाशास्त्री अनुवाद)
कलिंग युद्ध की विभीषिका: 13वें शिलालेख में कलिंग युद्ध के बाद "डेढ़ लाख लोग निर्वासित, एक लाख मारे गए और अनेक पीड़ित" हुए – पर "अनेक पीड़ितों" में युद्ध की प्रमुख शिकार स्त्रियों का स्पष्ट उल्लेख नहीं। (स्रोत: राधाकुमुद मुखर्जी, अशोक). युद्ध स्त्रियों को परोक्ष या अपयक्ष रूप से से सबसे ज्यादा पीड़ित करता है। बलात्कार, विधवापन, पारिवारिक विघटन और आजीविका संकट की यातनाएँ देता है। इस नारी-त्रासदी पर अशोक की करुणा मौन रही, जो उनकी "सार्वभौमिक" मानवता की सीमा दिखाता है।
साम्राज्यवादी शक्ति बनाम स्त्री: अशोक ने पूरे उपमहाद्वीप में धम्म प्रचार के लिए शिलालेख, धम्म - दूत, अधिकारी और यहाँ तक कि अपनी संतानों (पुत्र महेंद्र, पुत्री संघमित्रा) का भी उपयोग किया। किंतु यही शक्तिशाली सम्राट महिला शिक्षा, संपत्ति अधिकार, विवाह स्वतंत्रता या न्यायिक प्रतिनिधित्व जैसी क्रांतिकारी व्यवस्थाओं का उल्लेख नहीं करता है। यह विरोधाभास दर्शाता है कि धम्म की नैतिकता सामाजिक पुनर्रचना तक नहीं पहुँची।
अशोक का धम्म नैतिक पुनर्जागरण का प्रतीक अवश्य था, पर यह स्त्रियों के लिए कोई संस्थागत क्रांति नहीं ला पाया। इसकी प्रगतिशीलता वर्ग-सापेक्ष, प्रतीकात्मक और पुरुष-केंद्रित बनी रही। शिलालेखों में स्त्रियों का उल्लेख ना होना, महिलाओं के आर्थिक अधिकारों पर मौन, और कलिंग युद्ध की स्त्री-पीड़ा की अनदेखी – ये सब एक ही सत्य की ओर इंगित करते हैं: अशोक का धम्म पितृसत्तात्मक ढाँचे को चुनौती देने में विफल रहा।
यह ऐतिहासिक घटना एक सबक देती है कि नैतिक उद्देश्य तब तक अपूर्ण हैं जब तक वे कानूनी अधिकारों और सामाजिक संरचना में बदलाव के साथ नहीं जुड़ते – खासकर उन वर्गों के लिए जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर हैं। अशोक के धम्म ने मानवता का मार्ग दिखाया, किंतु उस मानवता की परिभाषा में आधी आबादी की स्वायत्त पहचान और समानता शामिल नहीं थी। (स्रोत: बी.आर. आंबेडकर, रेवोल्यूशन एंड काउंटर-रेवोल्यूशन इन एन्शिएंट इंडिया; और संघमित्रा के लिए: महावंस, अनुवाद विल्हेम गाइगर)
उपसंहार
सम्राट अशोक के राज में नारी की सत्ता और सीमाएँ - एक पुनर्मूल्यांकन
नैतिक पुनरुत्थान का द्वंद्व
अशोक का शासनकाल इतिहास में "धम्म" के माध्यम से नैतिक शासन का प्रतीक है। करुणा, अहिंसा और सामाजिक समरसता पर आधारित धम्म नीतियों में नारी को पारंपरिक पारिवारिक भूमिकाओं से आगे बढ़ने का अवसर दिया परंतु यह प्रगति विषमता से बंधी रही। राज परिवार की स्त्रियाँ (जैसे रानी करुवाकी का दान-लेख, पुत्री संघमित्रा का श्रीलंका में बौद्ध संघ स्थापित करना) सार्वजनिक भूमिका निभा सकीं किंतु सामान्य महिलाएँ—विशेषकर ग्रामीण, श्रमिक या निम्नजातीय समूह—धम्म की नैतिक क्रांति से वंचित रहीं। अभिलेखों में उनकी अनुपस्थिति इस सीमा का प्रमाण है।
सत्ता में भागीदारी
धम्ममहामात्र की नियुक्ति से महिलाओं के लिए प्रशासनिक द्वार खोले, किंतु ये पद कुलीन वर्ग तक सीमित थे। शिलालेखों (जैसे गिरनार अभिलेख) में इन महिला अधिकारियों के नाम, जाति या पृष्ठभूमि का अभाव इस वर्गीय सीमा को उजागर करता है। धार्मिक स्वायत्तता बौद्ध ग्रंथ 'थेरीगाथा' में पुण्णा, अंबपाली जैसी भिक्षुणियों का उल्लेख स्त्री चेतना के उद्बोधन को दर्शाता है किंतु राजकीय नीतियाँ इन आदर्शों को कानूनी अधिकारों में नहीं बदल सकीं।
संरचनात्मक सीमाएँ
अशोक की नीतियों की सबसे गंभीर कमी सामाजिक-आर्थिक अधिकारों की उपेक्षा थी। अर्थशास्त्र के अनुसार स्त्रियों का अधिकार "स्त्रीधन" तक सीमित था। धम्म नीति ने संपत्ति, उत्तराधिकार या भू-स्वामित्व जैसे मुद्दों पर कोई परिवर्तन नहीं किया। शिलालेखों में स्त्रियाँ "माता", "पत्नी" या "परिवार" के संदर्भ में ही उभरती हैं स्वतंत्र नागरिक के रूप में नहीं। नारी पहचान का अभाव राज्य द्वारा उनकी स्वायत्त स्थिति की अनदेखी को प्रकट करता है। कलिंग युद्ध के 13वें शिलालेख में "एक लाख मृत, डेढ़ लाख विस्थापित" का उल्लेख है, किंतु बलात्कार, विधवा या नारी पीड़ा पर मौन है जो धम्म की करुणा की सीमा दिखाता है।
ऐतिहासिक विरोधाभास
अशोक एक शक्तिशाली सम्राट था जिसने विशालकाय साम्राज्य में शांति बनाई रखी, व्यापर बढ़ाया, लोक कल्याण के कार्यक्रम चलाए, अपने पुत्र-पुत्रियों को धम्म प्रचार के लिए विदेश भेजा फिर भी, वे पितृसत्तात्मक ढाँचे को चुनौती देने में असफल रहे। शिक्षा, विवाह स्वतंत्रता, या न्यायिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर कोई संस्थागत सुधार नहीं हुए। उस की नीति नैतिक उपदेश और कानूनी सुधार के बीच की खाई को पात नहीं सकी। जहाँ धम्म "मानवता" की बात करता था, वहाँ स्त्रियाँ "मनुष्य" की परिभाषा से बाहर थीं।
अशोक की विरासत
अशोक का युग स्त्रियों के लिए विरोधाभासों का काल था। एक ओर, बौद्ध विचारों ने आध्यात्मिक स्वायत्तता का मार्ग खोला (जैसे भिक्षुणी संघों की स्थापना), दूसरी ओर अशोक की नीतियों ने सामाजिक-आर्थिक बंधनों को ढीला नहीं किया। फिर भी, यह युग भावी स्त्री-मुक्ति आंदोलनों की बीजभूमि बना:
"धम्म की चेतना ने स्त्रियों के आत्मबोध को सिंचित किया। संघमित्रा, करुवाकी जैसे उदाहरणों ने सिद्ध किया कि स्त्री धार्मिक नेतृत्व और बौद्धिक विमर्श में सक्षम है—एक ऐसी विरासत जो गुप्तकाल तक भारतीय नारीवाद की प्रेरणा बनी रही।"
निष्कर्ष
अशोक की धम्म नीति स्त्रियों के लिए प्रतीकात्मक समावेश से आगे नहीं बढ़ सकी। शिलालेखों में नामहीनता, आर्थिक अधिकारों पर मौन, और कलिंग की स्त्री-पीड़ा की अनदेखी पितृसत्ता के स्थायित्व को प्रमाणित करती है। किंतु इस युग ने एक महत्वपूर्ण मोड़ अवश्य निर्मित किया: बौद्ध धर्म ने स्त्री को "गृहस्थ" से "धम्मचारिणी" बनने का आधार दिया—वह चिंगारी जो परवर्ती शताब्दियों में स्त्री-शिक्षा और धार्मिक संघों के माध्यम से प्रज्वलित हुई। अशोक की सीमाएँ हमें याद दिलाती हैं कि नैतिक परिवर्तन तभी सार्थक है जब वह संस्थागत सुधारों से जुड़े—एक सबक जो आज भी प्रासंगिक है।
ग्रंथ सूची
अशोक के शिलालेख – विशेष रूप से रानी करुवाकी का कौशाम्बी स्तंभलेख, माइनर रॉक एडिक्ट I, सेपरेट कलिंग एडिक्ट।
थेरीगाथा – पालि त्रिपिटक, खुद्दक निकाय (भिक्षुणियों की आत्मकथात्मक कविताएँ)।
अर्थशास्त्र – कौटिल्य द्वारा रचित (मौर्यकालीन सामाजिक संरचना एवं महिलाओं की स्थिति हेतु)।
मनुस्मृति – धर्मशास्त्रीय ग्रंथ (पितृसत्तात्मक मानदंडों को समझने हेतु)।
दीपवंश एवं महावंश – श्रीलंकाई बौद्ध ग्रंथ (संघमित्रा एवं भिक्षुणी संघ के प्रसार हेतु)।
अशोकावदान – संस्कृत बौद्ध ग्रंथ (अशोक की रानियों एवं बौद्ध राजत्व हेतु)।
ठापर, रोमिला. अशोक और मौर्य साम्राज्य का पतन. (हिंदी अनुवाद) – अशोक के शासन एवं नीतियों पर मौलिक पुस्तक।
सिंह, उपिंदर. प्राचीन एवं प्रारंभिक मध्यकालीन भारत का इतिहास. नई दिल्ली: पियर्सन, 2008. – मौर्य काल एवं सामाजिक संरचना हेतु मानक पाठ्यपुस्तक।
शर्मा, रामशरण. प्राचीन भारत का इतिहास. (हिंदी अनुवाद) – प्राचीन भारतीय समाज एवं मौर्यकालीन व्यवस्था हेतु।
भटनागर, जे.पी. अशोक का कानून एवं महिलाओं के अधिकार. नई दिल्ली: अशोक लॉ हाउस, 1998. – अशोक के शिलालेखों में महिलाओं से संबंधित नैतिक एवं कानूनी पहलुओं पर विशेष अध्ययन।
स्ट्रॉन्ग, जॉन एस. अशोकावदान: एक अध्ययन एवं अनुवाद. प्रिंसटन: प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस, 1983. – अशोक की रानियों एवं बौद्ध राजत्व की जटिलताओं हेतु।
हैलिसी, चार्ल्स (अनुवादक). Therigatha: Poems of the First Buddhist Women. कैम्ब्रिज: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2015. – थेरीगाथा का अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।
ब्लैकस्टोन, कैथरीन आर. Women in the Footsteps of the Buddha. लंदन: रूटलेज, 1998. – थेरीगाथा में वर्णित महिलाओं की मुक्ति के संघर्ष पर विशेष अध्ययन।
आंबेडकर, डॉ. भीमराव. रेवोल्यूशन एंड काउंटर-रेवोल्यूशन इन एन्शन्ट इंडिया. (हिंदी अनुवाद: प्राचीन भारत में क्रांति एवं प्रतिक्रांति) – बौद्ध काल में महिलाओं के उत्थान एवं ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति के विश्लेषण हेतु।
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