Pages

Tuesday, 22 September 2026

किस्सा ज़ीरो का


ग्वालियर किले में चतुर्भुज मंदिर के पास लगा हुआ पत्थर (फोटो स्रोत - लेखक)  

जो कुछ नहीं, वो है काम का!

एक बार की बात है, गणित की दुनिया में एक ऐसा अंक था जिसका अपना कोई वजन नहीं था। यह न एक था, न दो, न तीन... न ही नौ। बेचारा बिल्कुल खाली! बाकी अंक अपनी-अपनी जगह अकड़कर घूमते थे—1, 2, 3... 9। उन्हें लगता था कि गणित की सारी दुनिया उन्हीं से चलती है। फिर एक दिन एक गोल-मटोल-सा मेहमान आया। नाम था-शून्य।

पहली नजर में सबने पूछा—"तुम हो क्या?"

उसने कहा—"कुछ नहीं।"

सब हँस पड़े। लेकिन जल्दी ही पता चला कि यह "कुछ नहीं" बड़ा काम का है। एक-1 के पीछे बैठा तो 1 को 10 बना दिया, 5 के पीछे बैठा तो 50 और 9 के पीछे बैठा तो 90!

यानी शून्य अपना कोई मान नहीं था, लेकिन दूसरों की हैसियत बदलने की ताकत खूब है। आज हम 10, 100, 1,000, 10,000, लाख, करोड़, अरब और खरब जैसी संख्याएँ आसानी से लिख लेते हैं। कंप्यूटर से लेकर अंतरिक्ष-विज्ञान तक, बैंक खाते से लेकर मोबाइल नंबर तक, हर जगह शून्य चुपचाप अपनी ड्यूटी कर रहा है।

लेकिन यह गोल-सा अंक आया कहाँ से?

इसकी कहानी में केवल गणित की कहानी नहीं है बल्कि इसमें सम्राट अशोक के अभिलेख, प्राचीन भारतीय अंक-पद्धति, जैन गणित, बख्शाली की रहस्यमय पाण्डुलिपि, ब्रह्मगुप्त, ग्वालियर का एक मंदिर और फिर अरब दुनिया के रास्ते यूरोप तक पहुँची ज्ञान-यात्रा- सब शामिल हैं। और पहली बात तो यह है कि शून्य किसी एक दिन किसी एक व्यक्ति ने "खोज" नहीं लिया था। उसकी कहानी कई सदियों में बनी।

सबसे पहले शून्य किसने खोजा?

इस सवाल का आसान उत्तर है—ब्रह्मगुप्त। लेकिन इतिहास का सही उत्तर थोड़ा और दिलचस्प है। गौर से देखें तो शून्य के विकास में कम-से-कम तीन अलग-अलग पहलू थे: 

पहली, दशमलव पद्धति: दस-दस के आधार पर गिनती।

दूसरी, स्थान-मूल्य पद्धति: अर्थात् किसी अंक का मूल्य इस बात पर निर्भर है कि वह किस स्थान पर बैठा है, और 

तीसरी, शून्य को एक संख्या मानना और उसके इस्तेमाल पर बाकायदा नियम बनाना।

इन तीनों का पूरा मेल भारत में हुआ। इसलिए शून्य की कहानी को "किसने खोजा?" से ज्यादा सही प्रश्न होगा : शून्य को गणित की दुनिया में पूरी तरह स्थापित किसने किया? इस सवाल पर ब्रह्मगुप्त का नाम सबसे आगे आता है। लेकिन उनसे पहले भी कहानी काफी दूर तक पहुँच चुकी थी।

सम्राट अशोक का अभिलेख 

आइए लगभग तीसरी शताब्दी ईसापूर्व (BCE) में चलते हैं। सम्राट अशोक के पत्थर पर लिखे अभिलेखों में एक रोचक संख्या मिलती है- 256। इस संख्या का अभिलेख Minor Rock Edict I कहलाता है और जो सासाराम बिहार, रूपनाथ मध्य प्रदेश,  बैराट राजस्थान, ब्रह्मगिरि, सिद्धापुर, और जटिंग-रामेश्वर (अन्तिम तीन स्थान कर्णाटक में हैं) आदि में मिले हैं। 

यहाँ कहानी और मजेदार हो जाती है। आज हम 256 लिखते हैं: 2 | 5 | 6, और तुरंत समझ जाते हैं कि 2 का अर्थ 200, 5 का अर्थ 50 और 6 का अर्थ 6 है। लेकिन अशोक के समय की ब्राह्मी लिपि (जिसे सम्राट अशोक धम्मलिपि कहता था) में ऐसा स्थान-मूल्य (place value) नहीं था। 256 को अलग-अलग संकेतों से व्यक्त किया जाता था: अर्थात् 200 का अलग संकेत, 50 का अलग संकेत और 6 का अलग संकेत।  जरा सोचिए, संख्या 256 तो मौजूद थी, लेकिन उसे लिखने का तरीका आज से बिल्कुल अलग था!

और यहीं से हमारे "ज़ीरो" की कहानी में एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है: अशोक के 256 में आज वाला शून्य नहीं था। लेकिन यह उस भारतीय अंक-परंपरा का बहुत पुराना प्रमाण है, जिसमें आगे चलकर दशमलव,  स्थान-मूल्य और शून्य का विकास हुआ।

256 दिन या 256 रात?

यहाँ एक और दिलचस्प पेच है। पुराने अनुवादों में इसे "256 nights" या "256 days" के रूप में अलग-अलग ढंग से बताया गया है। आधुनिक विद्वानों ने भी इसके अर्थ पर अलग-अलग व्याख्याएँ दे कर बहस की है। लेकिन आधुनिक अनुवाद, अशोक के प्रवास या तीर्थ-यात्रा के दौरान 256 रातें बिताने की ओर संकेत करता है। लेकिन यहाँ एक बात बिल्कुल स्पष्ट है की इस संख्या 256 से शून्य का प्रमाण नहीं मिलता है।

शून्य से पहले "खाली जगह"

अब एक सरल उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए आपको 205 लिखना है: यहाँ 2 तो है 200, 5 है 5, लेकिन बीच में क्या है? कुछ नहीं? उस "कुछ नहीं" के लिए एक अंक जरूरी है, क्योंकि अगर उस जगह से अंक याने 0 हटा दें तो 25 रह जाएगा। 

यहीं से एक बहुत महत्वपूर्ण विचार सामने आया: इस स्थान पर कुछ नहीं है, लेकिन एक स्थान तो मौजूद है। इसी को हम आज स्थान - मूल्य कहते हैं। और शून्य की कहानी में यही एक बड़ा मोड़ था।

पिंगल और प्राचीन गणना

प्राचीन भारतीय साहित्य में "शून्य" शब्द गणित के अलावा साहित्य और धर्म ग्रंथों में भी बहुत प्रचलित था। संस्कृत में शून्य का अर्थ खाली, रिक्त या void के तौर पर इस्तेमाल होता रहा है। बौद्ध और जैन दर्शन के प्राचीन ग्रंथों में शून्य शब्द काफी इस्तेमाल किया गया है। लेकिन दर्शन के शून्य और गणित के शून्य में अंतर है।  

पिंगल के छन्दःशास्त्र में छन्दों और लघु-गुरु अक्षरों के संयोजन से जुड़ी जटिल गणना मिलती हैं। आधुनिक लेखों में पिंगल को combinatorics और binary अंकों के सन्दर्भ में भी जाना जाता है।

कुछ विद्वान पिंगल के शून्य शब्द के प्रयोग को शून्य की वैचारिक यात्रा की एक कड़ी मानते हैं। लेकिन यहाँ सावधानी जरूरी है: पिंगल को आधुनिक "0" का आविष्कारक कहना उचित नहीं होगा।

यह कहना ज्यादा अच्छा रहेगा कि प्राचीन भारतीय गणित और छन्द-शास्त्र परंपराएँ उन विचारों की जमीन तैयार कर रही थीं जिनमें शून्य और अंक दोनों एक साथ विकसित हो रहे थे।

जैन गणित और लोकविभाग

इस कहानी में एक और रोचक पड़ाव है: जैन गणित परंपरा का लोकविभाग। लोकविभाग  458 CE की एक निश्चित तारीख से जुड़े होने के कारण इसका विशेष महत्व है। इसमें बड़ी संख्याओं, दशमलव स्थान-मूल्य और गणना की ऐसी परंपरा के संकेत मिलते हैं, जो शून्य के विकास की कहानी को समझने में उपयोगी हैं।

यह हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि यहाँ गणित में स्थान-मूल्य का विकास होता दिखाई देता है। अर्थात् किसी संख्या में किसी अंक का महत्व केवल उसके अपने मान से नहीं, बल्कि उसके स्थान से भी तय होता है।

फिर भी लोकविभाग को सीधे आधुनिक शून्य का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। इसके मूल प्राकृत पाठ और उसकी साहित्यिक स्रोत्र को लेकर विद्वानों के बीच कई सवाल हैं। इसलिए इसे शून्य के इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखना ज्यादा अच्छा है, न कि "दुनिया के पहले शून्य" के प्रमाण के रूप में।

इतिहास में "सबसे पहला" कहना जितना आसान है उसे सिद्ध करना उतना ही मुश्किल है!

आर्यभट्ट

अब आते हैं पाँचवीं शताब्दी के महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट पर। 499 CE में रचित आर्यभटीय ज्योतिष ग्रन्थ, भारतीय गणित और खगोल-विज्ञान का महान ग्रंथ है। आर्यभटीय  में 108 छंद हैं जो चार अध्यायों में विभाजित हैं। यह किताब बहुत ही संक्षिप्त शैली में लिखी हुई है और गूढ़ अर्थ रखती है। इस पुस्तक के गणितपाद अध्याय में 33 छंद हैं। पर इसमें आज जैसा 0 नहीं मिलता। इसलिए उन्हें सीधे "शून्य का आविष्कारक" कहना ठीक नहीं होगा।

लेकिन उनकी गणना-पद्धति और स्थान-मूल्य की भारतीय परंपरा उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी। यानी मंच तैयार था। अब जरूरत थी किसी ऐसे गणितज्ञ की जो कहे: यह खाली जगह भी गणित में बाकायदा काम करेगी। और तब आते हैं ब्रह्मगुप्त।

ब्रह्मगुप्त

सन् 628 CE, राजस्थान के भिल्लमाल क्षेत्र से जुड़े महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री ब्रह्मगुप्त ने ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त की रचना की। यहीं शून्य की कहानी निर्णायक मोड़ लेती है।

ब्रह्मगुप्त ने शून्य को केवल खाली स्थान नहीं माना, बल्कि उसे गणितीय क्रियाओं का हिस्सा बनाया। उन्होंने शून्य और संख्याओं के साथ जोड़, घटाव और गुणा आदि के नियम दिए। मसलन:

5 + 0 = 5

5 − 0 = 5

5 × 0 = 0

और:

0 + 0 = 0

आज ये बातें इतनी मामूली लगती हैं कि स्कूल का बच्चा भी शायद इन्हें सुनकर कहे—"इसमें कौन-सी बड़ी बात है?" लेकिन सातवीं शताब्दी में "कुछ नहीं" को गणित के नियमों वाली संख्या मानना छोटी उपलब्धि नहीं थी। ब्रह्मगुप्त ने शून्य और अन्य संख्याओं को एक व्यवस्था में रखने का सराहनीय प्रयास किया।

हाँ, शून्य से भाग देने के मामले में उनकी गणना आधुनिक गणित के अनुरूप नहीं थी। उन्होंने 0 ÷ 0 को 0 मानने जैसी बात कही थी, जिसे आधुनिक गणित स्वीकार नहीं करता। आधुनिक गणित इसे अपरिभाषित और अनिर्धारित कहता है, क्यूंकि ऐसा करने से तार्किक विरोधाभास अर्थात logical contradiction पैदा हो जाती है। लेकिन ब्रह्मगुप्त के इस विचार का ऐतिहासिक महत्व कम नहीं है। 

महावीराचार्य और भास्कराचार्य

ब्रह्मगुप्त के बाद भारतीय गणितज्ञों ने शून्य की समस्या को छोड़ा नहीं बल्कि खोज जारी रखी। महावीराचार्य ने अपने गणितसारसंग्रह में शून्य से जुड़ी गणितीय क्रियाओं पर विचार किया।

फिर 12वीं शताब्दी में भास्कर द्वितीय, जिन्हें हम भास्कराचार्य भी कहते हैं, ने लीलावती और बीजगणित जैसी रचनाओं में शून्य और अनंत (infinity) से जुड़े प्रश्नों पर विचार किया।

यह बात गौर करने वाली है कि भारतीय गणितग्यों ने शून्य को केवल "यह एक खाली जगह है" कहकर छोड़ नहीं दिया। वे खोजबीन करते रहे कि आखिर इस शून्य के नियम क्या हैं?

अब चलते हैं ग्वालियर 

अब है कहानी का सबसे रोमांचक पड़ाव। मध्य प्रदेश के ग्वालियर किले में चट्टान को काटकर बनाया गया है चतुर्भुज मंदिर। इसके एक अभिलेख की तारीख विक्रम संवत 933 अर्थात् 876 CE है।

अभिलेख में मंदिर के बगीचे के लिए दी गई जमीन का आकार बताया गया है: 270 हस्त लंबा और 187 हस्त चौड़ा। यहाँ फूलों का बगीचा लगाना था और उस बगीचे से मंदिर के लिए प्रतिदिन 50 मालाएँ आनी थीं।   

अब जरा 270 और 50 को देखिए। दोनों में अंतिम अंक है- 0, और यह 0 आज के 0 से मिलता-जुलता संकेत है - 0 । यानी यहाँ का 0 हमारे पास केवल किसी गणित की किताब में लिखी संख्या नहीं, बल्कि पत्थर पर उकेरा हुआ शून्य है।

यही कारण है कि ग्वालियर का अभिलेख शून्य के इतिहास में इतना प्रसिद्ध है। और मुझे इसमें सबसे मजेदार बात यह लगती है कि शून्य यहाँ किसी महान गणितीय सूत्र में नहीं आया। वह आया फूलों के बगीचे और मंदिर की मालाओं के हिसाब में! गणित भी, मंदिर भी और हिसाब-किताब भी, सब एक ही पत्थर पर। लेकिन बख्शाली पाण्डुलिपि ने कहानी और पीछे कर दी। 

बख्शाली पाण्डुलिपि

एक प्राचीन गणितीय पाण्डुलिपि है, जो भोजपत्र (birch bark) पर लिखी गई है। यह 1881 में पेशावर जिले के बख्शाली गाँव के पास मिली थी। आजकल यह क्षेत्र पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रान्त में है। और इसे किसी प्रसिद्ध पुरातत्वविद् ने खोजा था- ऐसा भी नहीं है। 

पाण्डुलिपि एक स्थानीय किसान ने खंडहरनुमा पत्थर की ईमारत में से खोजी थी। बाद में यह प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से यह भारत - प्रेमी जर्मन विद्वान रुडोल्फ होर्नले (A. F. Rudolf Hoernlé) तक पहुँची, जिन्होंने इसका अध्ययन किया। किसी किसान की साधारण-सी खोज बाद में गणित के इतिहास की बड़ी खोज बन गई!

बख्शाली में लिखा क्या है? यह कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं है। यह मूलतः व्यावहारिक गणित की पाण्डुलिपि है। इसमें गणितीय समस्याएँ, गणना की विधियाँ, भिन्न (fractions), माप-तौल, व्यापारिक गणनाएँ, वर्गमूल और गणित की दूसरी पहेलियाँ मिलती हैं।

और सबसे महत्वपूर्ण बात ये थी की इसमें शून्य के लिए एक छोटा बिंदु (dot) दिखाई देता है। आज के 0 की तरह गोल घेरा नहीं बस एक छोटा-सा बिंदु। यानी शून्य का बचपन शायद कुछ ऐसा था - "पहले मैं बस एक बिंदु था!"

2017 में ऑक्सफ़ोर्ड की बोडेलियन लाइब्रेरी (Bodleian Libraries) ने रेडियो कार्बन अध्ययन के आधार पर बख्शाली पाण्डुलिपि के कुछ हिस्सों को बहुत प्राचीन बताया। उस समय यह खबर खूब चर्चित हुई कि शून्य का यह बिंदु तीसरी–चौथी शताब्दी CE तक पुराना हो सकता है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

2024 में ऑक्सफ़ोर्ड के नए रेडियो कार्बन अध्ययन ने पाण्डुलिपि के पाँच अलग-अलग भागों - 15, 16, 23, 33 और 55 की जाँच की। इससे पता चला कि पाण्डुलिपि के विभिन्न हिस्सों की तारीखें अलग-अलग हैं और इसका कालक्रम सीधा सीधा नहीं था। 

इसलिए आज इसे इस तरह कहना ज्यादा सही रहेगा: बख्शाली पाण्डुलिपि शून्य का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण है, लेकिन पूरी पाण्डुलिपि की एक निश्चित तारीख पता नहीं है। यानी इतिहास की कहानी में "सबसे पुराना" शब्द थोड़ा संभलकर इस्तेमाल करना चाहिए। 

भारत से अरब और फिर यूरोप

भारत का विशेष योगदान और गणित में क्रांति यह थी कि: दशमलव का इस्तेमाल, शून्य को एक संख्या मानना, उसे स्थान-मूल्य (place-value) देना और गणित में इन तीनों को व्यवस्थित कर देना।

अब शून्य भारत में ही बैठा नहीं रहा। भारतीय दशमलव और स्थान-मूल्य गणित अरब देशों में पहुँची। वहां के विद्वानों ने इसे समझा, अपनाया, और आगे यूरोप की और बढ़ा दिया।

9वीं शताब्दी के महान गणितज्ञ मुहम्मद इब्न मूसा अल-ख्वारिज्मी (अंदाज़न जन्म 780 - देहांत 850)  भारतीय अंकों और गणना-पद्धति पर एक किताब लिखी अल - जब्र, पर यह मूल अरबी ग्रंथ अब उपलब्ध नहीं है, लेकिन उसके मध्यकालीन लैटिन रूप से भारतीय place-value system और 0–9 अंकों की जानकारी मिलती है। और फिर 13वीं शताब्दी में इटली के गणितज्ञ Fibonacci की Liber Abaci ने भारतीय गणित को पूरे यूरोप में फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यानी हम कह सकते हैं- शून्य ने भारत में अपनी यात्रा शुरू की, अरब दुनिया होते हुए यूरोप जाकर दुनिया भर की गणित की शक्ल बदल दी। 

शून्य आखिर करता क्या है?

इतिहास की इतनी लंबी यात्रा के बाद आइए देखें कि आज हमारा यह छोटा-सा गोल अंक करता क्या है।

1. स्थान बताता है: 205 में 0 बताता है कि दहाई के स्थान खाली नहीं है बल्कि उसका एक मूल्य है। 0 हटा दीजिए तो पूरी संख्या और उसका मूल्य बदल जाएगा।

2. संख्या की ताकत बढ़ाता है: 5 और 50 में अंतर केवल एक शून्य का है। 50 और 500 में भी वही कहानी है।

3. जोड़ में शांत स्वभाव: शून्य कहता है—"मैं कुछ नहीं बदलूँगा।"

25 + 0 = 25

4. गुणा में बड़ा प्रभाव: यहाँ शून्य कहता है—"अब सब मेरे हवाले!"

25 × 0 = 0

5. दशमलव की बारीकी: केवल शून्य की जगह बदलने से संख्या का मान बदल जाता है।

0.5, 0.05 और 0.005

6. आधुनिक विज्ञान में: तापमान 0 हो सकता है। समुद्र तल 0 मीटर हो सकता है। किसी खाते में 0 रुपये हो सकते हैं। और कंप्यूटर? वहाँ तो 0 और 1 की दुनिया ने पूरी डिजिटल सभ्यता खड़ी कर दी!

और आम ज़िन्दगी में आजकल हर शहर में एक 'जीरो माइल स्टोन' की स्थापना हो गई है जिससे उस शहर की दूरी नापी जाती है। दिल्ली में राजघाट, मुंबई में होर्नीमैन सर्किल में ज़ीरो माइल स्टोन मिलेगा। और देखिये नागपुर का ज़ीरो माइल स्टोन अविभाजित भारत का केंद्र बिंदु था जिस से शहरों की दूरियां नापी जाती थी। 
     
नागपुर का ज़ीरो माइल स्टोन और स्मारक मीनार (फोटो स्रोत - लेखक) 

शून्य की सबसे बड़ी खूबी

शून्य की कहानी हमें गणित की एक बहुत सुंदर सच्चाई बताती है: कभी-कभी किसी चीज का महत्व उसकी मात्रा में नहीं, बल्कि उसके स्थान में होता है।

सम्राट अशोक के समय हमारे पास 256 था, लेकिन आज की place-value notation नहीं थी। बख्शाली पाण्डुलिपि में वह छोटे-से बिंदु के रूप में दिखाई देता है। ब्रह्मगुप्त ने उसे गणित क्रियाओं का हिस्सा बनाया। ग्वालियर में वह पत्थर पर गोल निशान बनकर सामने आया। फिर वह भारत की सीमाओं से निकलकर अरब दुनिया और यूरोप तक पहुँचा। और आज? आज वही छोटा-सा शून्य गणित में है, विज्ञान में है, बैंक में है, मोबाइल में है और कंप्यूटर में भी है।

शून्य अकेला खड़ा हो तो कहता है, "मेरे पास कुछ नहीं।"

लेकिन सही जगह बैठ जाए तो कहता है, "अब देखो मेरा कमाल!"

शायद शून्य की पूरी कहानी को एक ही वाक्य में कहना हो तो वह यह होगा, "शून्य खुद कुछ नहीं है, लेकिन उसके बिना आधुनिक गणित में भी कुछ नहीं है।"

और इसीलिए गणित की दुनिया में कभी-कभी सबसे महत्वपूर्ण किरदार इसी का है जो दिखता बिल्कुल खाली है।


और आगे पढ़ने के लिए

  • Kim Plofker, Mathematics in India: 500 BCE–1800 CE, Cambridge University Press, 2009.
  • George Gheverghese Joseph, The Crest of the Peacock: Non-European Roots of Mathematics, Princeton University Press.
  • University of St Andrews, MacTutor History of Mathematics — Zero.
  • University of Oxford, Radiocarbon Dating of the Bakhshālī Manuscript, 2024.

अशोक के 256 वाले अभिलेख के लिए: J. C. Wright, “Aśoka's 256-night campaign,” Journal of the Royal Asiatic Society.