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Sunday, 5 July 2026

पुरातन आंध्र में बौद्ध धर्म

 जब हम बौद्ध धर्म की चर्चा करते हैं, तो हमारी कल्पना में प्रायः बोधगया, सारनाथ, राजगृह और नालंदा जैसे नाम आते हैं। परन्तु यदि कोई पूछे कि भारत में बौद्ध धर्म ने सबसे लंबे समय तक कहाँ अपनी उपस्थिति बनाए रखी, तो जवाब में आंध्र का नाम प्रमुखता से आएगा। गोदावरी और कृष्णा नदियों के तट, अमरावती का महास्तूप, नागर्जुनकोण्डा की पहाड़ियां और अनूपु का शांत बौद्ध विहार परिसर आज भी प्राचीन बौद्ध जगत की याद दिला देते हैं। इस संक्षिप्त लेख में हम आंध्र के बुद्ध कालीन गुरु बावरी से लेकर नागार्जुन और हुएनत्सांग की चर्चा करेंगे। 


नागार्जुन कोंडा म्यूजियम से लिया गया फोटो। शिष्यों से घिरे हुए गौतम बुद्ध अभय मुद्रा में। अमरावती शैली में चूना पत्थर पर नक्काशी  

दक्षिणापथ: श्रावस्ती से अमरावती का जोड़ 

प्राचीन भारत में "दक्षिणापथ" का अर्थ केवल एक राजमार्ग ही नहीं था, बल्कि विंध्याचल के दूसरी ओर का सारा इलाका था। उत्तर और दक्षिण भारत के बीच व्यापार, संस्कृति और धर्म के आदान-प्रदान की मुख्य धुरी दक्षिणापथ का राजमार्ग ही था। इसी मार्ग से व्यापारी, यात्री और भिक्षु सदियों तक आना जाना था। इस प्राचीन मार्ग के प्रमुख नगर थे:

  • श्रावस्ती
  • कौशाम्बी
  • प्रयाग
  • वाराणसी
  • विदिशा
  • उज्जयिनी
  • माहिष्मती
  • प्रतिष्ठान (पैठण)
  • अश्मक महाजनपद की राजधानी पोटलि
  • धान्यकटक
  • अमरावती
  • कांचीपुरम्

यदि हम आजकल का नक्शा देखें, तो यह मार्ग उत्तर प्रदेश से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश होते हुए दक्षिण भारत तक फैला हुआ था। बुद्ध के समय से ही यह मार्ग बौद्ध धर्म के प्रसार का प्रमुख माध्यम बन गया था।

अश्मक महाजनपद: दक्षिण का अकेला महाजनपद

बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में वर्णित सोलह महाजनपदों में केवल एक ही राज्य विंध्य पर्वत के दक्षिण में स्थित था—अश्मक, जिसे पाली में अस्सक कहा जाता है।  

अश्मक का क्षेत्र वर्तमान महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और तेलंगाना के कुछ भागों तक फैला माना जाता है। इसकी राजधानी "पोटलि", "पोतन" या "पौदन्य" थी, जिसे अनेक इतिहासकार वर्तमान बोधन (तेलंगाना) से जोड़ते हैं। कुछ विद्वानों ने इसे प्रतिष्ठान या पैठण से भी जोड़ा है। उस समय की उत्तर-दक्षिण यात्रा लगभग इन शहरों से होकर जाती होगी:  

श्रावस्ती → कौशाम्बी → विदिशा → उज्जयिनी → माहिष्मती → प्रतिष्ठान → पोटलि (अश्मक) → गोदावरी घाटी → धान्यकटक

यह मार्ग केवल व्यापार का मार्ग नहीं था बल्कि यही वह रास्ता था जिससे बौद्ध विचार दक्षिण भारत तक पहुँचे।

बावरी और उसके सोलह शिष्य : बुद्ध की खोज में 

आंध्र के बौद्ध इतिहास की सबसे रोचक और भावुक कथा गुरु बावरी की है। यह कथा हमें बौद्ध ग्रन्थ सुत्तनिपात के पारायणवग्ग में पढ़ने को मिलती है। 

गुरु बावरी एक वृद्ध ब्राह्मण तपस्वी थे जो गोदावरी नदी के किनारे अपने आश्रम में निवास करते थे। एक दिन उन्हें ज्ञात हुआ कि उत्तर भारत में एक सम्यक सम्बुद्ध प्रकट हुए हैं जो जीवन से दुःख दूर करने का रास्ता -'अष्टांगिक मार्ग ' बताते हैं। गुरु बावरी स्वयं लम्बी यात्रा करने की स्थिति में नहीं थे इसलिए उन्होंने अपने सोलह प्रतिभाशाली शिष्यों को बुद्ध से शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा। इनमें प्रमुख थे—

  • अजित
  • तिस्समेत्तेय्य
  • पुण्णक
  • मेट्टगू
  • धोतक
  • उपसीव
  • नन्द
  • हेमक
  • तथा पिङ्गिय (पिंगिया)

ये सभी भगवान बुद्ध के पास एक लम्बी यात्रा करके पहुँचे। हर एक शिष्य ने बुद्ध से एक एक प्रश्न पूछा और धर्मोपदेश प्राप्त किया। इस कथा का सबसे मार्मिक भाग पिंगिया का है। वह बुद्ध-वचन सुन कर गुरु बावरी के पास वापिस आया और उन्हें सारी बातें बताई।  

गुरु बावरी के आश्रम का कोई पुरातात्विक अवशेष अभी तक नहीं मिला है और न ही कोई उनका कोई स्मारक बनाया गया है। कुछ विद्वान आश्रम को गोदावरी घाटी से जोड़ते हैं। कुछ अन्य विद्वान आश्रम को बासर, जिला निर्मल, तेलंगाना अथवा बोधन, जिला निज़ामाबाद, तेलंगाना से जोड़ते हैं।

जो भी हो, यह कथा इस बात का अद्भुत प्रमाण है कि बुद्ध के जीवनकाल में ही दक्षिण भारत के लोग उनके बारे में जानने लगे थे।

धान्यकटक और अमरावती 

यदि उत्तर भारत में सारनाथ बौद्ध धर्म का महान केन्द्र था, तो दक्षिण भारत में यह स्थान धान्यकटक और अमरावती को प्राप्त था। कृष्णा नदी के तट पर स्थित धान्यकटक (आधुनिक धरणीकोट) और अमरावती लगभग ईसापूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर ईस्वी चौथी शताब्दी तक बौद्ध धर्म के प्रमुख केन्द्र रहे।

यहाँ का महास्तूप प्राचीन भारत की सबसे महान स्थापत्य उपलब्धियों में गिना जाता है। अमरावती कला शैली की विशेषताएँ थीं—

  • श्वेत चूना-पत्थर का प्रयोग,
  • जातक कथाओं का चित्रण,
  • बुद्ध के जीवन प्रसंग का चित्रण,
  • प्रतीकात्मक बौद्ध कला,
  • तथा बाद के काल में बुद्ध प्रतिमाओं का विकास।

आज भी अमरावती की मूर्तियाँ विश्व के प्रमुख संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं। 

महाचैत्य अमरावती, आंध्र प्रदेश 

महायान, नागार्जुन और आंध्र

प्राचीन आंध्र बौद्ध धर्म का केन्द्र होने के साथ साथ बौद्ध दर्शन की एक प्रयोगशाला भी था। एक मान्यता के अनुसार महान बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन का सम्बन्ध आंध्र प्रदेश से माना जाता है। नागार्जुन ने कई पुस्तकें लिखीं जिनमें से एक सुहृल्लेखा (मित्र के नाम पत्र) भी थी। माना जाता है कि यह पुस्तक सतवाहन वंश के राजा गोमतीपुत्र के लिए लिखी गई थी। नागार्जुन के प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं, तथापि यह निर्विवाद है कि आंध्र महायान और माध्यमिक दर्शन के विकास का एक प्रमुख केन्द्र था।

नागार्जुन के "शून्यवाद" दर्शन ने चीन, जापान, तिब्बत और सम्पूर्ण पूर्वी एशिया को प्रभावित किया, उसका एक महत्वपूर्ण विकास-क्षेत्र आंध्र ही था। 

अमरावती में नागार्जुन की प्रतिमा। यह मूर्ति दलाई लामा द्वारा दी गई थी और इसका अनावरण तेज़िन ग्यात्सो द्वारा 2006 में किया गया

नागार्जुनकोंडा और अनूपु बौद्ध विहार 

कृष्णा नदी की घाटी में स्थित नागार्जुनकोंडा (कोण्डा = पहाड़ी) भारतीय बौद्ध पुरातत्त्व का एक महत्वपूर्ण स्थल है। तीसरी और चौथी शताब्दी में यह बौद्ध शिक्षा, दर्शन और कला का प्रमुख केन्द्र था। यहाँ बहुत से अवशेष मिले मिले हैं:

  • महास्तूप,
  • विहार,
  • चैत्यगृह,
  • शिक्षण संस्थान,
  • आवासीय परिसर,
  • तथा अनेक अभिलेख।

नागार्जुन बाँध का जलाशय बनने के कारण , इन अवशेषों को एक म्यूजियम बना कर पुनर्स्थापित किया गया।

निकटवर्ती अनूपु गांव में प्राचीन विश्वविद्यालय परिसर और रंगमंच का पुनर्निर्माण भी अवशेषों से किया गया है। जब कोई व्यक्ति वहाँ खड़ा होता है, तो सहज ही कल्पना कर सकता है कि लगभग अठारह सौ वर्ष पूर्व यहाँ बौद्ध भिक्षु तर्कशास्त्र, दर्शन और ध्यान का अध्ययन कर रहे होंगे। 

अनूपु बौद्ध विहार का रंगमंच 

चीनी यात्री ह्वेनसांग

सातवीं शताब्दी में आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने धान्यकटक का विस्तृत वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है:

"इस देश में अनेक संघाराम (अर्थात बौद्ध विहार) उजड़ चुके हैं, किन्तु लगभग बीस विहार अब भी सक्रिय हैं। यहाँ का महाचैत्य अत्यंत भव्य और प्रसिद्ध है।"

यह विवरण हमें बताता है कि सातवीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म जीवित था, हालांकि उसका स्वर्णकाल समाप्त हो चुका था। ह्वेनसांग ने यह भी लिखा कि बौद्ध और ब्राह्मण दोनों परम्पराएँ यहाँ साथ-साथ विद्यमान थीं। 

अनूपु बौद्ध विहार का एक दृश्य 

भाषा, अभिलेख और जनता का सहयोग 

आंध्र के बौद्ध अभिलेख मुख्यतः ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में हैं। बाद के काल में संस्कृत का भी प्रयोग दिखाई देता है। महत्वपूर्ण अभिलेखीय स्थल हैं:

  • अमरावती,
  • नागार्जुनकोंडा,
  • भट्टिप्रोलु,
  • जग्गय्यपेट,
  • घंटशाला,
  • गुंटुपल्ली,
  • सालीहुंडम।

इन अभिलेखों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें केवल राजाओं का ही नहीं, बल्कि सामान्य लोगों का भी उल्लेख मिलता है। आंध्र में बौद्ध धर्म की सफलता का रहस्य केवल राजकीय संरक्षण नहीं था, बल्कि समाज के सभी वर्गों की सहभागिता थी। यहाँ के दो राज घराने बहुत प्रसिद्द हैं जिन्होनें बौद्ध धम्म के प्रचार प्रसार में योगदान दिया: 

सतवाहन वंश (ईसापूर्व पहली शताब्दी से ईस्वी तीसरी शताब्दी), इस वंश के कुछ प्रमुख नाम हैं: गौतमीपुत्र सतकरणी, वाशिष्ठीपुत्र पुलुमावी और यज्ञश्री सतकरणी 

इक्ष्वाकु शासक (ईस्वी तीसरी-चौथी शताब्दी): सतवाहनों के पतन के बाद इश्वाकु शासकों ने कृष्णा-गुंटूर (आंध्र प्रदेश) क्षेत्र में शासन किया। इस वंश की राजधानी विजयपुरी (आधुनिक नागार्जुनकोंडा) थी। इनके प्रमुख राजा थे: वसिष्ठीपुत्र चान्तमूल, वीरपुरुषदत्त, एहुवुल चान्तमूल

अभिलेखों में वर्णित प्रमुख महिला दानदाता इस प्रकार हैं: रानी चामतिश्री, भट्टिदेवी, रुद्रधर, भट्टारिका। इसके अतिरिक्त अनेक सामान्य दानदाताओं जैसे कि श्रेष्ठी, नाविक, गृहस्थ, भिक्षु और भिक्षुणियों का भी उल्लेख अभिलेखों में मिलता है। 

वास्तव में आंध्र का बौद्ध धर्म जनता का बौद्ध धर्म था।

आंध्र में बौद्ध धर्म का पतन 

इतना विशाल और समृद्ध धर्म धीरे-धीरे क्यों समाप्त हुआ? इसके कई कारण थे : 

  • राजकीय संरक्षण का समाप्त होना,
  • मंदिर आधारित भक्ति परम्पराओं का विकास,
  • व्यापार मार्गों में परिवर्तन,
  • बौद्ध संस्थाओं की आर्थिक सहायता में जख्मी,
  • सम्प्रदायों का विभाजन,
  • तथा सामाजिक संरचना में परिवर्तन।

सातवीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म कमजोर पड़ने लगा था और लगभग बारहवीं शताब्दी तक उसका संगठित स्वरूप आंध्र से लगभग समाप्त हो गया।

आज अमरावती, नागार्जुनकोंडा और अनूपु के अवशेषों को देखकर लगता है कि इतिहास कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता।

गोदावरी के किनारे बैठे बावरी की जिज्ञासा, पिंगिया की श्रद्धा, अमरावती के कलाकारों की कल्पना, नागार्जुनकोंडा के आचार्यों की विद्वत्ता और हजारों ज्ञात अज्ञात दानदाताओं की उदारता—ये सब आज भी आंध्र की मिट्टी में कहीं न कहीं जीवित हैं।

यदि बोधगया बुद्ध के ज्ञान का प्रतीक है, तो आंध्र प्रदेश उस ज्ञान के प्रसार, संरक्षण और सृजनात्मक विकास का प्रतीक है।  

अनूपु बौद्ध विहार का स्तूप। नागार्जुन सागर बाँध बनने के कारण बुद्ध विहार से सम्बंधित अवशेषों को इकठ्ठा करके स्तूप का पुनर्निर्माण किया गया

और आगे पढ़ने के लिए:

  1. Sutta Nipāta (Pārāyanavagga), Pali Text Society.
  2. Samuel Beal, Buddhist Records of the Western World.
  3. Romila Thapar, Aśoka and the Decline of the Mauryas.
  4. A. K. Warder, Indian Buddhism.
  5. H. C. Raychaudhuri, Political History of Ancient India.
  6. K. A. Nilakanta Sastri, A History of South India.
  7. K. Krishna Murthy, Nāgārjunakoṇḍa: A Cultural Study.
  8. B. S. L. Hanumantha Rao, Religion in Andhra.
  9. Epigraphia Indica
  10. Corpus Inscriptionum Indicarum, Vol. I.
  11. A. Ghosh (Ed.), An Encyclopaedia of Indian Archaeology.
  12. K. R. Subrahmanian, Buddhism in South India and Andhra.


1 comment:

Harsh Wardhan Jog said...

https://jogharshwardhan.blogspot.com/2026/07/blog-post_05.html