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Thursday, 13 August 2015

कामरेड का चुनाव प्रचार

सितम्बर 1979 में बैंक में बतौर क्लर्क काम कर रहा था और तभी कम्युनिस्ट पार्टी भी ज्वाइन कर ली थी. इन्हीं दिनों बैंक में प्रमोशन का टेस्ट भी हुआ और नवम्बर 1979 में ऑफिसर बन गया था. इस ख़ुशी में बुलेट 350 मोटर साइकिल भी खरीद ली.

उन दिनों राजनीति में भी काफी उथल पुथल हो रही थी. 1977 में जनता पार्टी की सरकार आपसी झगड़ों में लड़खड़ा कर गिर गई. जून 1979 में प्रधान मंत्री चरण सिंह की सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था क्यूंकि बहुमत नहीं था. और जनवरी 1980 में सातवीं लोक सभा का चुनाव होना तय हो गया था.

सितम्बर 1979 में कम्युनिस्ट पार्टी ज्वाइन करने के बाद दो तीन मीटिंग में शामिल हुआ. लोक सभा के चुनाव आ रहे थे और दिल्ली सदर से कामरेड प्रेम सागर गुप्ता ने पर्चे दाखिल करने थे. प्रचार के लिए पैसे, बन्दे, पर्चे, पोस्टर वगैरा की तैयारी हो रही थी. मुझे प्रचार के लिए पार्टी के करमपुरा दफ्तर में जाने के लिए कहा गया.

बुलेट पर किक मारी और वहां जा पहुंचे. ऑफिस एक गोदाम में था और वहां तीन वालंटियर बैठे थे. हावभाव और कपड़ों से तीनों किसी फैक्ट्री के वर्कर लग रहे थे. मैंने परिचय दिया तो उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे देखा. जीन, सफ़ेद शर्ट और मोटर साइकिल देख कर एक बोला
- यहाँ तो हम लोग संभाल लेंगे आप ऐसा करो की राजौरी गार्डन ऑफिस चले जाओ वहां के लोगों से आप ढंग से बात कर लोगे.
फिर बुलेट को किक मारी और फटफट करते अपन वहां पहुँच गए. राजौरी गार्डन इलाका थोड़ा सा पॉश और बेहतर इनकम वालों का था. पंजाबी लोग ज्यादा थे. ऑफिस किसी के घर के वरांडे में बना रखा था. वहां तीन लोगों की टीम बनी, हैण्ड बिल्स लिए और चल पड़े घर घर की घंटी बजाने. वहां के लोगों से हुई वार्तालाप के कुछ नमूने पेश हैं.

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घंटी बजाई तो माताजी निकलीं. हैण्ड बिल दिया और अपने उमीदवार को वोट डालने का निवेदन किया. माताजी ने हैण्ड बिल तो नहीं पढ़ा पर बोलीं -
- काका हमारी तो नालियाँ कोई साफ़ ही नहीं करता. देखो ना कितने मच्छर हो रहे हैं.
इतने में फिर दरवाज़ा खुला और माताजी का 40-45 साल का बेटा आया और माताजी के हाथ से हैण्ड बिल ले कर पढने लगा. पढ़ कर बोला -
- माताजी इन बिचारों ने कभी राज तो किया नहीं ना करना है ये नालियाँ क्या साफ़ कराएंगे.

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एक गेट पर घंटी बजाई तो सरदार जी निकले. हैण्ड बिल पढ़ते ही तमतमा गए.
- आप यहाँ से जाते हैं या कुत्ते खोल दूं?

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एक सज्जन निकले, हैण्ड बिल पढ़ा और हंसने लगे.
- आप लोग इतनी मेहनत कर रहे हो पर कुछ होना नहीं है. चाय वाय पीनी है तो आ जाओ. आपको वोट तो हमने देना नहीं है.

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एक गेट पर नाम के साथ स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया भी लिखा हुआ था. हमें लगा कि यहाँ दाल गल जाएगी. सज्जन बाहर निकले हैण्ड बिल पढ़ा और बोले-
- भई मैं यूनियन में जरूर हूँ पर ये मतलब नहीं की मैं कम्युनिस्ट हूँ. हाँ जब भी यूनियन कहती है तो मैं स्ट्राइक पर भी जाता हूँ. पर वोट की बात अलग है. मेरी  पार्टी तो जनता पार्टी है और वोट तो उसी को ही देना है.

उस चुनाव में कामरेड प्रेम सागर गुप्ता को लगभग 30 हजार वोट मिले और शायद जमानत भी जब्त हो गई थी. जगदीश टाईटलर भारी बहुमत से जीते. उस सातवीं लोक सभा में स्कोर था > कांग्रेस(INC) - 353, सीपीएम - 37, सीपीआई - 10 और जनता पार्टी (सेक्युलर) - 41.

इंदिरा गाँधी 1980 के चुनाव में भाषण देते हुए . चित्र khabar.ibnlive.in.com के सौजन्य से 


Tuesday, 4 August 2015

खजांची का बेटा

बैंक के अंदर प्रवेश करते ही बांये हाथ पर मेरा केबिन था. उससे लगा हुआ एक लम्बा काउंटर था और उसके बाद खजान्चियों के लिए तीन जालीदार केबिन बने हुए थे. पहले दो में कैश जमा होता था और तीसरे केबिन में हैड कैशियर याने प्रधान रोकड़िया बैठता था. आप कभी मिले हमारे हैड कैशियर से या नहीं? तो चलिए मैं ही आपका परिचय करा देता हूँ.

हैड केशियर का नाम मनोहर है पर ज्यादातर स्टाफ के लोग प्यार से उसे 'हैड' पुकारते थे. 'हैड ये पेमेंट कर देना', 'हैड ये नोट बदल देना' वगैरा. हैड का कद छोटा पर गठा हुआ शरीर और रंग गोरा था. हैड अपने सिर के बालों में कोई सुगन्धित सा तेल लगा कर बाल पीछे की ओर कर के रखता था. उमर 60 के नजदीक थी पर बाल घने और बहुत कुछ काले थे. हर वक़्त मुंह में पान वो भी 300 नंबर तम्बाकू वाला रखता था. हैड के पान की एक ख़ास तरह की सुगंध आती थी जो मुझे नापसंद थी. उसके होटों के दोनों कोरों में हमेशा लाली रहती थी. कभी कभी आँखों में सुरमा या काजल सी कोई चीज़ डाल कर आता था. कई बार पूछने पर भी हैड ने आँखों के काले रंग का राज़ नहीं बताया बस हंस कर टाल दिया.

इत्तेफाक से एक बार हैड ने घर में एक धार्मिक अनुष्ठान किया तो सारी ब्रांच को निमंत्रण मिला. उस दिन पहली बार उसके घर जाने का मौका मिला. चावड़ी बाज़ार से गली चूड़ी वालान और उसके अंदर कोई और पतली गली कभी बाएँ और कभी दाएं. आगे आगे हैड चलता जा रहा था और गली मोहल्ले के इतिहास का व्याख्यान करता जा रहा था. मुझे लग रहा था कि अभी कोई इस भूल भुलैया में से बाहर निकलेगा और कहेगा मैं यहाँ का बादशाह हूँ! पता नहीं कभी इन गलियों में धूप भी आई थी या नहीं? हैड की भाषा भी ध्यान देकर समझनी पड़ती थी 'विसने कई' याने उसने कहा और 'आरिया' याने आ रहा हूँ. स्टाफ वाले उसका मज़ाक भी उड़ाते थे 'हैड ना आरिया ना जारिया खड़ा खड़ा मुस्करा रिया'.

दो मंजिले घर में पहुंचे तो धुप अगरबत्ती की खुशबू फैली हुई थी और पंडित जी मन्त्र पढ़ रहे थे. घर में बेटे से मुलाकात हुई. पता लगा कि दसवीं पास करके खाली बैठा था और आदतें बिगड़ रहीं थीं. शकल से और बात करने से भी वह चालाक सा ही लग रहा था. बेटा हैड की चिंता का विषय था. हैड उसके लिए काफी दौड़ भाग कर रहा था. खैर कथा समाप्त हुई प्रशाद बनता और सबनें घर की और प्रस्थान किया. कुछ महीनों बाद जब हैड ने लड्डू बांटे तो पता लगा की हैड ने जनरल मैनेजर से कह कहा के किसी तरह बेटे को भी बैंक में कैशियर लगवा दिया था.

बेटे की नौकरी के बाद हैड संतुष्ट सा नज़र आता था. अब उसे लगता था की बेटे की जल्दी शादी करके फिर रिटायर होकर आराम से जी सकूँगा. आजकल हैड कुछ ज्यादा ही तैयारी से ब्रांच में आने लगा था. प्रेस किये हुए चकाचक कपड़े और कुछ परफ्यूम भी. उड़ती उड़ती खबर पहुंची की हैड ने फिर से मुजरा देखना शुरू कर दिया था और शनिवार को जीबी रोड के कोठों पर जाना शुरू कर दिया था. मुजरों की आड़ में वहां तो हर तरह के काम होते थे. पर इन बातों से मैनेजर को क्या लेना देना था और फिर हैड के काम में भी तो कोई शिकायत नहीं थी.

एक शनिवार शाम को हैड मुजरा देखने पहुंचा गया. चकाचक कपड़े, मुंह में पान की गिल्लोरी और जेब में नोट. गाने की धुन और घुंघरू की छन छन पर दरी पर बैठ और मसनद पर कुहनी टिका के हैड मस्ती में सिर हिला रहा था. सुरूर धीरे धीरे बढ़ रहा था. इस बीच मुजरे के दौरान दरवाज़ा खुला तो हैड ने उत्सुकता वश कनखियों से दरवाज़े की ओर देखा. कौन कमबखत बीच में आ टपका? पर नज़र पड़ते ही हैड की सांस रुक गई और शरीर ठंडा पड़ने लगा. हैड का बेटा ही अंदर आ रहा था. बेटे को अंदर आता देख कर घबराहट से आँखों के आगे अँधेरा छा गया. कुछ पलों बाद संभला और तेज़ी से चोर दरवाज़े से दूसरी तरफ निकल गया. 

बाहर निकल कर देखा तो नंगे पैर था. जूते तो लेने अब नहीं जा सकता. नंगे पैर ही चल पड़ा. जाने कब तक इधर उधर भटकता रहा. फिर दिल्ली स्टेशन पर जा कर एक बेंच पर लुढ़क गया. क्रोध, ग्लानि, खीझ, और शर्म से उसका सिर घूम रहा था. बहुत देर तक सर पे हाथ रख कर ऐसे ही पड़ा रहा और फिर सिसकने लगा. आंसू निकल आये तो मन कुछ हल्का हुआ. हरिद्वार जाने वाली गाड़ी प्लेटफार्म पर आई तो अनजाने ही उस में बैठ गया.

महीने भर तक परिवार और पुलिस को उसका कोई सुराग नहीं मिला. तरह तरह की अटकलबाजी लगीं - आत्महत्या? एक्सीडेंट? पर कोई खबर नहीं. एक दिन मैं ऑफिस में लेट बैठा हुआ था की फोन की घंटी बजी. हैड बोल पड़ा. रोते रोते उस ने अपनी कथा और व्यथा सुनाई. 
अगले दिन हैड के कहे अनुसार उसकी पत्नी को बुलवाया. हैड का भी फोन आ गया और दोनों की बात भी करा दी. कुछ पैसे पत्नी को दे दिए. 

बेटे की शादी करने के बाद पत्नी भी हैड के पास हरिद्वार चली गई थी.

पिछले कई सालों से हैड से बात नहीं हुई है.  

जीवन धारा