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Tuesday, 23 June 2015

घर में जागरण

गोयल साहब आज व्यस्त हैं पर चेहरे पर मुस्कराहट भी है. आज आठ बजे घर से थोडा दूर पार्क में रिश्तेदारों, दोस्तों और साथी व्यापारियों की दावत है और उसके बाद बारह बजे तक देवी माँ का गुणगान होगा. गोयल साहब कलफ़ लगे चकाचक सफ़ेद कुरते पजामे में एक बार सारी व्यवस्था का निरिक्षण कर आए हैं. पंडाल में सजावटी लाइट जल रही हैं. मूर्तियाँ स्टेज पर सजा दी गई हैं. सलाद की प्लेटें, काउन्टर पर बर्तन सजे हुए हैं, वेटर तैयार हैं और हलवाई की कड़ाही गर्म है.

गोयल साहब की उमर 60 के करीब है. मोटा चश्मा लगाते हैं. मटके सा मोटा पेट है. गंजे सर के किनारे किनारे सफ़ेद बालों की एक झालर है जिसे आज उन्होंने काला कर दिया है. श्रीमती और बहुरानी पारलर से तैयार होकर आ चुकी हैं. श्रीमती के कहे अनुसार ही यह आयोजन घर में न होकर पार्क में हो रहा है.

"घर में भीड़ इक्कठा करना कहाँ की समझदारी है जी ? सारा घर तहस नहस हो जावे है. हफ्ता भर फिर समेटते रहो जी. बस अपना बाहर ही बाहर आवेँ, खावें और जावें क्यूँ जी?"

गोयल साहब का हैंडलूम की चादरों, पर्दों वगैरा का शोरूम है. व्यापारी दोस्तों में मियां यासीन भी हैं जिनके यहाँ से हर महीने सामान किफायती रेट पर सप्लाई होता है. मियां यासीन भी पधारे और खाने के बाद चलने लगे तो गोयल परिवार से मुखातिब हुए.

- भई हमें तो अब इजाज़त दें. आप सब लोगों को बहुत बहुत मुबारक हो. बड़ा अच्छा इन्तेजाम किया आपने.
- यासीन भाई साहब रुकने के लिए तो नहीं कहेंगे आपको पर आपने कुछ खाया भी या यूँ ही बोल रहें हैं ? श्रीमती गोयल ने पुछा.
- भाभी जी डट के खाया है मैंने भी और मेरे पोते ने भी. पर एक बात तो बताइए भाभी जी यह कार्यक्रम किस लिए किया?
- ताकि घर में सुख शांति बनी रहे और देवी घर परिवार पर कृपा करती रहें.
- भाभी जी देवी का स्वागत आपने पार्क में किया और पार्क से ही आप देवी को विदा भी कर देंगी तो वो आपके घर कैसे आएँगी ?

गोयल साहब मुस्कराए, श्रीमती गोयल झेंप गईं और बहुरानी ने तय कर लिया की अगला जागरण घर में ही होगा पार्क में नहीं.




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