Pages

Monday, 4 January 2016

काली थाली

प्राचीन समय में सेरी नामक शहर में दो व्यापारी रहा करते थे. दोनों गली कूचों में घूम घूम कर कंगन, चूड़ियाँ और सिंगार का सामान बेचते थे. आपस में तालमेल रखने के लिए उन्होंने शहर को दो हिस्सों में बाँट रक्खा था. शहर का बायाँ हिस्सा एक व्यापारी का और दाहिना हिस्सा दूसरे व्यापारी के पास था. पर ये भी तय था की अगर किसी गली में से पहला व्यापारी चक्कर लगा चुका हो तो उसके जाने के बाद दूसरा व्यापारी उस गली में अपना सामान बेच सकता है. अब आप तो जानते ही हैं कि व्यापार में ये सब समझौते करने ही पड़ते हैं वरना आपस में सिर फुटव्वल करने से तो दोनों का ही नुकसान हो जाता है ना ?

एक दिन व्यापारी को गली में आता देख एक छोटी सी लड़की अपनी दादी से लिपट गई और जिद करने लगी कि मुझे चूड़ी दिलवा दो. दादी ने जवाब में सिर हिलाया,
- बिटिया पैसे नहीं हैं तो कैसे लें?
- दादी उसको पैसों के बदले काली थाली दे दो और चूड़ी ले लो बस.
- अरे बिटिया काली थाली पता नहीं वो लेगा भी या नहीं.
- पर दादी आप बात तो करो ना.
दादी ने व्यापारी को बिठाया. व्यापारी ने देखा की दादी पोती गरीब भी हैं और दोनों भोले भाले हैं. दादी ने कहा,
- बिटिया जिद कर रही है और मुद्रा मेरे पास है नहीं. तुम इस थाली के बदले एक चूड़ी दे दो तो ये बिटिया खुश हो जाएगी.
थाली पर चूल्हे के धुंए की कालिख और धूल जमी पड़ी थी. व्यापारी ने हाथ में लेकर देखा. झोले से कसौटी निकाल कर थाली के पीछे रगड़ी तो अवाक् रह गया.
- यह तो सोने की थाली है!
पर उसके मन में खोट आ गया और व्यापारी चालाकी दिखाने लगा,
- अरे इस काली थाली का कुछ मोल नहीं है. बेकार मेरा समय नष्ट कर दिया. इस थाली से तो आधी चूड़ी भी नहीं मिलेगी.
व्यापारी यह कह कर वह चलने के लिए खड़ा हो गया. बुढ़िया और उसकी पोती मन मसोस कर रह गए. पर व्यापारी मन ही मन सोच रहा था कि अगर बुढ़िया दुबारा कहेगी तो इसे एक चूड़ी दे दूंगा. पर सीधी सादी बुढ़िया ने कुछ नहीं कहा. व्यापारी ने सोचा की चलो कल फिर चक्कर लगाऊंगा.

इधर दूसरा व्यापारी अपने इलाके की फेरी लगाने के बाद इस गली की ओर आ निकला. उसे आता देख छोटी लड़की ने दादी को फिर पकड़ लिया,
- दादी इसको काली थाली दिखाओ ये मान जाएगा. इसे दिखा दो ना?
- तू कहती है तो इसे भी दिखा देती हूँ. मानेगा ये भी नहीं तू देख लेना.

व्यापारी ने धुंए सी काली थाली परखी. थाली के पीछे खुरच कर देखा तो हैरान हो गया.
- ये तो सोने की थाली है अम्मां, बोलो क्या लोगी?
- बेटा इसके बदले में जो दे सकता है दे दे. मैं इसे अब क्या करूंगी.
- देखो अम्मां इसके बदले में जो कुछ मेरे पास है मैं दे देता हूँ. साथ में जो मेरी जेब में जो भी सोने चांदी की मुद्राएँ हैं वो भी दे देता हूँ. मुझे नदी पार वापस जाने के लिए नाव वाले को आठ सिक्के देने होंगे मैं केवल वही रख लेता हूँ. बाकी सब कुछ ये रहा.
सौदा निपटा कर उस व्यापारी ने काली थाली झोले में डाली और नाव में बैठ कर नदी पार अपने घर वापस चल पड़ा.

उधर पहला व्यापारी मन ही मन उधेड़ बुन में लगा हुआ था:

- मुझे वो थाली छोड़नी नहीं चाहिए थी. उस काली थाली से कम से कम 50 स्वर्ण मुद्राएँ मिल जाती. बस अब मैं एक निजी दूकान ले लेता और रोज रोज की फेरी लगाने से छुट्टी मिल जाती. मुझे वो थाली छोड़नी नहीं चाहिए थी. अब पता नहीं मिले या ना मिले ? पर बुढ़िया और पोती सीधे से तो हैं. किसी से बात भी नहीं करेंगे. बुढ़िया को मैंने बताया भी तो नहीं की ये सोने की थाली है. उसके लिए तो काली थाली रद्दी है रद्दी. पर मुझे वो थाली छोड़नी नहीं चाहिए थी. इसकी जानकारी तो बस दूसरे व्यापारी को मिल सकती है अगर वो कहीं बुढ़िया की गली में चला गया तो कमबख्त. नहीं नहीं अभी तो शहर के दूसरे हिस्से में भटक रहा होगा सुसरा. और चला गया तो ? मुझे वो थाली छोड़नी नहीं चाहिए थी.

सोचते सोचते उसका सिर घूमने लगा और बदन तपने लगा. उसे पता ही नहीं चला कब वो वापिस फिर बुढ़िया के सामने पहुँच गया.
- लाओ वो थाली दे दो मैं तुम्हें एक चूड़ी दे देता हूँ. तुम भी क्या याद करोगी.
- थाली तो दूसरा फेरी वाला ले भी गया भैया जी.

व्यापारी ये सुन कर घबरा गया. नदी की तरफ दौड़ लगा दी. गिरते पड़ते, हाँफते हाँफते नदी किनारे पहुंचा तो देखा की नाव तो दूसरे किनारे पहुँचाने वाली है और दूसरा व्यापारी उतरने वाला है. वो जोर से चिल्लाना चाहता था पर उसके गले से आवाज़ नहीं निकल पाई. वह नीचे गिरा और वहीं ढेर हो गया.



यह किस्सा एक जातक कथा पर आधारित है और इस किस्से में लालच बुरी बला या फिर Honesty is best policy को दर्शाया गया है. जातक कथाएँ 2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के समय से प्रचलित हुईं. गौतम बुद्ध 35 वर्ष की आयु से लेकर 80 की आयु तक ज्ञान का प्रचार करते रहे. अपने प्रवचनों में अपने जीवन के अनुभव और बहुत सी छोटी छोटी कथाएँ उदहारण के तौर पर बताया करते थे. कुछेक कथाएँ दुसरे अरहंतों की भी हैं. धम्म प्रचार के साथ साथ ये जातक कथाएँ बहुत से देशों - श्रीलंका, म्यामार, कम्बोडिया, तिब्बत, चीन और ग्रीस तक पहुँच गयीं.



Post a Comment