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Wednesday, 14 November 2018

बटेसर मंदिर, मोरेना


बटेसर के मंदिर, मोरेना 

कई मन्दिरों के सामने नंदी की खंडित मूर्तियाँ हैं. इनके सिर और कूबड़ टूटे हुए हैं. इन सभी पर एक ग्वाला या रखवाला भी बना हुआ है 


बटेसर या बटेश्वर मंदिरों का एक बड़ा ग्रुप जिला मोरेना, मध्य प्रदेश में हैं. इनमें से एक बड़े मंदिर को भूतेश्वर मंदिर भी कहा जाता है. ये मंदिर मोरेना शहर से लगभग 30 किमी और ग्वालियर से लगभग 40 किमी दूर हैं. इस ग्रुप या समूह में 200 से ज्यादा मंदिर थे जो 25 एकड़ के इलाके में फैले हुए हैं. आसपास घना जंगल और पहाड़ियां हैं. ये स्थान चम्बल घाटी के पुराने किले के अंदर है. किला तो लगभग गायब ही हो चुका है.

आना जाना ग्वालियर से आसान है पर बसों की कमी है और सर्विस भरोसेमंद भी नहीं हैं. अपनी गाड़ी या टैक्सी बेहतर रहेगी. आस पास कोई रेस्तरां या ढाबा भी नहीं है इसलिए खाने पीने का अपना इंतज़ाम करके चलना ठीक रहेगा. दोपहर की धूप यहाँ तीखी है और अगर उमस भरा मौसम हो तो परशानी हो सकती है. आप चाहें तो एक दिन में बटेसर मंदिरों के अलावा गढ़ी पड़ावाली, चौंसठ योगिनी मंदिर, मोरेना और शनिचरा भी देख सकते हैं. अफ़सोस है की इन सुंदर धरोहरों पर गाइड नहीं मिलते माली या गार्ड जो बता दें वही सुन कर संतोष करना पड़ता है!

सभी मंदिर हल्के लाल बलुआ पत्थर याने sand stone के बने हुए हैं. मंदिर छोटे छोटे हैं और शिव, शक्ति और विष्णु को समर्पित हैं. कई मंदिरों में शिवलिंग है और मंदिर के सामने नंदी बैठा हुआ है परन्तु ज्यादातर क्षत विक्षत हैं. इन मंदिरों में से जो ठीक ठाक नज़र आ रहे हैं वो पुरातत्व विभाग याने ASI द्वारा पुनर्स्थापित किये गए हैं.

इतिहासकारों के अनुसार ये मंदिर सन 750 से लेकर सन 1100 तक के दरम्यान बने होने की सम्भावना है. लेकिन कैसे ये मंदिर गिरे या टूटे या तोड़े गए इस के बारे में पुख्ता जानकारी नहीं है. करीबन तेरहवीं शताब्दी के बाद से ये मंदिर झाड़ झंखाड़ और जंगलों से ढके रहे. 1882 में अलेक्ज़ंडर कन्निन्घम ने पड़ावली की पहाड़ियों में 100 से ज्यादा सुंदर मंदिरों के बारे में बताया था. 1920 में पुरातत्व विभाग अर्थात ASI ने इसे संरक्षित जगह घोषित किया. 1968 में एक फ़्रांसिसी इतिहासकार ने मंदिरों पर विस्तृत पेपर प्रकशित किया. 2005 में पुरातत्व विभाग के भोपाल क्षेत्र के अधिकारी श्री के के मोहम्मद की पचास आदमियों की टीम ने लगभग साठ मंदिरों को फिर से स्थापित करना शुरू किया.

वहां के एक कर्मचारी ने एक किस्सा बताया जो की स्थानीय अखबारों में भी छपा था, की जब काम शुरू हुआ तो एक आदमी वहां बीड़ी के सुट्टे मारता हुआ कारवाई देखने लगा. मोहम्मद साब ने उसे डांट दिया कि मंदिर में बीड़ी ना पिए. इस पर उनकी टीम के सदस्य ने बताया की इस आदमी से ना उलझें ये चम्बल का नामी डाकू है! पर जब डाकू को पूरी बात पता लगी तो उसने और उसकी 'टीम' ने भी मंदिर के काम में सहयोग दिया.

ये मंदिर गुर्जर-प्रतिहार शैली के हैं. नक्काशी का काम खजुराहो के मंदिरों जैसा सुघड़ नहीं हैं. शायद ये गुर्जर-प्रतिहार कला का शुरुआती दौर रहा होगा. श्री के के मोहम्मद के अनुसार इन मंदिरों की वास्तु संस्कृत में लिखे दो पुराने ग्रंथों के अनुसार है - मानसारा वास्तु शास्त्र और मायामत वास्तु शास्त्र जो की चौथी और सातवीं शताब्दी के हैं. उनकी टीम ने खंडहरों के टूटे, बिखरे पत्थर तरतीब से एक पहेली याने jig saw puzzle की तरह जोड़ना शुरू किया पर बहुत सा काम अभी बाकी है.

फिलहाल इन मंदिरों में कोई पूजा पाठ नहीं होता है. बीच में एक बड़े पत्थर पर बनी हनुमान की गेरुए रंग से रंगी मूर्ति जरूर है जो बिलकुल अलग ही नज़र आती है. शायद बाद में रखी गई होगी. और हाँ गूगल में ढूंढेंगे तो एक और बटेसर या बटेश्वर मंदिर मिलेगा जो की उत्तर प्रदेश में है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो और वीडियो. वीडियो ब्लॉग में पोस्ट नहीं हो पाए. इनको अपनी यूट्यूब चैनल में पोस्ट किया है और लिंक अंत में दिए हैं:


घने जंगल और पहाड़ियों के बीच मंदिरों के खंडहर 

ये सुंदर मंदिर दूसरे मन्दिरों से थोड़ा दूर है और बड़ा है. चार हिरन सड़क पार कर रहे थे पर जब तक मोबाइल से फोटो क्लिक की तब तक तीन तेज़ी से दूसरी तरफ निकल गए. यहाँ मोर भी बहुत हैं   
इन खम्बों पर शायद कभी बड़े मंदिर की छत रही हो 

बनावट छोटे किले या गढ़ी जैसी है. रहने का स्थान रहा होगा  

सभी मन्दिर ऊँचे चबूतरों पर बने हैं और इनमें दरवाज़े नहीं हैं 

फिर से जोड़ कर बनाया गया मंदिर 

छोटे से मंदिर में शिवलिंग 

मूर्तियाँ जाने क्या कहती हैं 

रख रखाव की तरफ और ध्यान की जरूरत है 

मन्दिरों के लिए पानी का इन्तेजाम भी है 

बहुत कुछ करना बाकी है 

यूट्यूब के वीडियो लिंक:




Sunday, 11 November 2018

दिल्ली-बैंगलोर कार यात्रा

दिल्ली से बंगलुरु की लम्बी कार यात्रा की तैयारी चल रही थी. अपनी गाड़ी इको स्पोर्ट्स को फोर्ड की वर्कशॉप में ले गए - बैटरी, लाइटें, इंजन आयल, गियर आयल, ब्रेक, बैलेंसिंग चेक कराई और टंकी में डीज़ल टनाटन भरवा लिया.

अब पानी की बोतलें, बिस्कुट, नमकीन, ड्राई फ्रूट, शहद, ग्लूकोस, लौंग,सौंफ, इलायची वगैरा पैक हो गए. इस्तेमाल करके फेंकने वाले गिलास, प्लेटें और चम्मचे रख लिए. योगा की चटाइयां रख लीं. फिर भी एहतियातन डॉ तनेजा से गोलियों का एक पैकेट बनवा लिया - खांसी जुकाम, बदहजमी, बदन दर्द वगैरा के लिए जो वैसा का वैसा वापिस आ गया.

हम तीन यात्री थे - हर्ष 68, गायत्री 64 और यश 32. छुट्टी का सवाल केवल यश के लिए था हम साठ से ऊपर वालों के लिए छुट्टी का कोई झगड़ा नहीं था. तीन बैग तैयार हो गए. रास्ते का मौसम गर्म ही रहना था इसलिए कम कपड़े ही पैक किये. टोपियाँ और चश्मे भी ले लिए. तीन मोबाइल, एक आई पैड, एक कैमरा, एक हॉटस्पॉट, एक पॉवर बैंक और इन सब के चार्जर का एक थैला तैयार कर लिया. दस दस के काफी सारे नोट रख लिए. टोल देने में, स्मारकों के टिकट लेने में और टिप वगैरा देने में काम आते हैं. यहाँ तक का पैकिंग का काम तो आसान था क्यूंकि ऐसी कई लम्बी लम्बी यात्राएं पहले की हुई थीं.

अब सवाल था कि कौन से रूट से जाना है? कई बार नक़्शे देखे और कई रूट बनाए. राजस्थान - गुजरात होते हुए जाएँ या फिर मध्य प्रदेश होते हुए? पहला रूट देखा हुआ था और दूसरे रूट का मतलब था कि ग्वालियर, मोरेना भोपाल होते हुए. अब मोरेना के नाम पर ब्रेक लग रही थी. कई दिनों तक विचार होता रहा और बहस चलती रही पर आखिर में मोरेना होते हुए जाने का प्रस्ताव पास हो गया. जो होगा देखा जाएगा. चलने से पहले हज़ार तरह के सवाल खोपड़ी में घूमते हैं सर भारी हो जाता है. पर जब घूम घाम के डेरे पर वापिस आ गए तो लगता है कि खामखा सर पर बोझा उठाया हुआ था.

फाइनल रूट तैयार था जिसमें जरूरत पड़ने पर चलते चलते फेर बदल भी किया जा सकता था:
दिल्ली > ग्वालियर > खजुराहो > भोपाल > नागपुर > हैदराबाद > बंगलुरु. 
फैसला ठीक ही रहा. रास्ते में दाएं बाएं छोटे पड़ाव भी डलते रहे और देखने को अच्छी जगहें भी मिली. मसलन: मितावली, पड़ावली, बटेसर, दतिया, ओरछा, रानेह, भीमबेटका, साँची, उदयगिरी, नैनागिरी, बोर डैम, सेवा ग्राम, कद्दम, कुरनूल, उरवाकल, लिपाक्षी, देवनहल्ली वगैरा.

यात्रा अठारह दिन चली और 2434 किमी लम्बी रही. ना गाड़ी ने और ना किसी सवारी के स्वास्थ्य ने परेशानी दी. इस यात्रा के कुछ फोटो ब्लॉग लिख कर फेसबुक, ट्विटर और गूगल + में डाल दिए हैं. कुछ अभी लिखने बाकी हैं. यात्रा में तरह तरह के ऐतिहासिक किले, स्मारक, मंदिर और सुंदर कुदरती नज़ारे देखने को मिले. यात्रा की कुछ फोटो प्रस्तुत हैं.

कमाल की विभिन्नता, खूबसूरती और गजब की धरोहर है हमारे भारत की.

उदयगिरी की गुफाएं, जिला विदिशा, मध्य प्रदेश.  

उर्वाकल की सिलिका चट्टानें जिला कुरनूल, आन्ध्र प्रदेश 

ज़ीरो माइल स्टोन नागपुर 

खजुराहो 

चार मीनार हैदराबाद, तेलंगाना  

गाँव मितावली, जिला मोरेना, मध्य प्रदेश 

रानेह जल प्रपात जो कि केन नदी पर है, जिला छतरपुर, मध्य प्रदेश 


ग्वालियर किले में यात्री 

भीमबेटका रॉक शेल्टर्स जिला रायसेन, मध्य प्रदेश 

साँची जिला रायसेन, मध्य प्रदेश 
गोलकोंडा हैदराबाद, तेलंगाना 
बोर डैम रिसोर्ट, जिला वर्धा, महाराष्ट्र   

देवनहल्ली मंदिर, बंगलुरु

आखरी पड़ाव बंगलुरु, कर्नाटक

दिल्ली - बंगलुरु यात्रा 18 दिन और 2434 किमी