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Saturday, 31 December 2016

बावला

मंगलवार को हरेंदर ने दो काम करणे थे जी. एक तो ऑफिस के बाद शाम को मंदिर जाणा था जैसा की हरेंदर हर मंगलवार किया करे था. अर दूसरा मंदिर के पास ही रेस्तरां में लड़की से मिलणा था भई शादी ब्या का मामला था ना जी. अब आप तो जाणो के मंदिर में साधारण कपड़े में भी दिक्कत ना है पर जब छोरी देखणी है तो सूट बूट जरूरी है जी.

अब इस ठण्ड के मौसम में सूट तो ठीक है पर सूट के साथ बूट भी जरूरी हैं. बूट कमबख्त नए खरीदे हैं यो लोचा हो गया. मंदिर के बाहर से नए जूते चोरी होणे का पूरा खतरा है और बिना जूतों के सूट का मज़ा ना है. चलो शाम को देखा जाएगा. हरेंदर ने बालों में सरसों का तेल डाला और बाल सेट कर दिए, खुसबू का फुहारा मारा फुस्स फुस्स अर सूट बूट पहन के चल दिया ऑफिस.

शाम को मंदिर और रेस्तरां के बीच आ खड्या हुआ. मुँह पे रुमाल फेरा, बालों में कंघी फेरी अर मुँह में छोटी इलायची रख ली. इलायची चबाते चबाते सोचन लाग्या,
- पहले मंदिर जाणा ठीक है या छोरी से मिलणा?
- ना जी पहले छोरी बाद में मंदिर?
- ना जी पहले मंदिर बाद में छोरी?
पर फिर पैर तो रेस्तरां की तरफ मुड़गे. आटोमेटिक हो गया जी पता ही नहीं लाग्या हरेंदर को.

रेस्तरां में छोरी भाई के साथ बैठी थी. भाई ने हाथ मिलाया और दूसरे टेबल पर जा बैठा. वेटर दो समोसे और दो चाय टेबल पर रख गया. हरेंदर ने लड़की पर नज़र मारी तो जच गई. हरेंदर बोल्या,
- आप मंदिर जाओ जी ?
- जी सुक्करवार जाऊं मैं तो.
- जी मैं तो मंगल का व्रत रक्खूं. समोसा चाय तो ना ले रा मैं. मंदिर जाण के बाद ही व्रत खोलूँगा. और मंदिर जाण का टाइम भी हो रा कुछ बात पूछनी हो तो बताओ.
- जी आप पहले मंदिर क्यूँ ना गए?
सवाल करके छोरी खड़ी हो गई और कुर्सी पीछे धकेल दी. कुर्सी चीं की आवाज़ करती हुई पीछे हो गई. सबका ध्यान एक पल के लिए हरेंदर की तरफ हो गया.
हरेंदर बाहर आ गया. उसकी कनपटी गरम हो गई और चेहरा लाल हो गया. पीछे से उसके कानों में छोरी की आवाज़ पड़ी,
- बावला है यो!

राम राम जी 


Wednesday, 28 December 2016

लिफाफा

सूट, बूट और लाल टाई लगा कर नरूला साब तैयार हो गए. आज श्रीमती के साथ एक शादी में जाना था जो एक मशहूर बैंक्वेट हाल में हो रही थी. वहां का टाइम आठ बजे का था इसलिए घर से आठ बजे चलना ठीक था. वहां तक 40 मिनट में पहुच जाएंगे. पर पहुंचे 60 मिनट में और 20 मिनट लग गए पार्किंग ढूंढने में. नरूला साब गाड़ी पार्क करके बड़े तीन मंजिले बैंक्वेट के सामने आ पहुंचे.

जोरदार सजावट और फ़िल्मी संगीत ने उनका स्वागत किया. बहुत रश था सूट वालों का, साड़ी वालियों का और बच्चों का. कुछ बैंड वाले इंतज़ार में खड़े थे और कुछ गुब्बारे वाले भी थे. उन्हें लगा की यहाँ तो कई शादियाँ हो रही हैं. एक शादी ग्राउंड फ्लोर पर, दूसरी फर्स्ट फ्लोर पर और तीसरी बेसमेंट में. नरूला साब असमंजस में थे की कौन से फ्लोर पर जाना है. श्रीमती जी ने कहा,
- कार्ड देख लो? कार्ड नहीं लाए? हमेशा बोलती हूँ की कार्ड साथ में रख लिया करो पर मानते नहीं हो. बोर्ड पर नाम लिखे हुए हैं वहां पढ़ लो.
- जाता हूँ जाता हूँ, कह कर नरूला साब रिसेप्शन के पास रखे लाल बोर्डों पर नज़र मारने लगे. तीन लाल बोर्ड थे जिन पर सुनहरे अक्षरों में तीन जोड़ों के नाम लिखे हुए थे,

- राहुल *** स्वाति,
- रोहित *** श्वेता और
- राजीव *** सौम्या.

अब नरूला साब को लगा की शादी वाले इन बच्चों के नाम तो पता ही नहीं हैं! उन्हें तो कार्ड दिया था अनिल कुमार ने. उन्होंने बोर्ड पर होस्ट के नाम पढ़ने शुरू किये,

- जुनेजा परिवार,
- सुनेजा परिवार और
- तनेजा परिवार.

ओहो इनमें से अनिल कुमार का परिवार कौन सा है ये भी तो नहीं मालूम! ऑफिस में तो अनिल को अनिल कुमार के नाम से ही जानते हैं. वो जुनेजा है या सुनेजा या तनेजा ये तो मालूम ही नहीं था.
- तुम्हें कुछ पता तो होता नहीं? शादी में शामिल होने आ गए हो कमाल है? ठण्ड में लाकर खड़ा कर दिया.
- रुको तो सही. मैं ग्राउंड फ्लोर में नज़र मारता हूँ शायद अनिल मिल जाए. तुम रुको यहाँ.
नरूला साब को अंदर अनिल कुमार तो नज़र नहीं आया पर उस बड़े से हाल के एक कोने में बार और बोतलें जरूर नज़र आई. एक पेग लेकर गला तर किया और इधर उधर देखा पर अनिल कुमार नहीं नज़र आया. हाल में से निकलने से पहले मन डोल गया एक पेग और खींच लिया. बाहर आकर देखा तो श्रीमती नदारद. मोबाइल मिलाएं तो मिले ना या जवाब मिले की 'ये नंबर पहुँच के बाहर है'. वैसे तो ठीक जवाब ही था पत्नी तो पहुँच के बाहर ही तो होती है?

नरूला साब बेसमेंट वाली शादी में घुस गए. पता चला की श्रीमती जी को श्रीमती गोयल वहां ले गई थी. दोनों आलू टिक्की के चटकारे ले रही थीं और साड़ियों पर कमेंटरी चल रही थी. नरूला साब ने भी नमस्ते करके चाट वाले की तरफ रुख किया. नज़र मारते रहे पर अनिल कुमार कहीं दिखाई नहीं पड़े. श्रीमती को बताया तो वो बोली,
- देखो जी अब यहाँ खा पी लिया था इसलिए मैंने तो लिफाफा दे दिया है. ऐसे अच्छा नहीं लगता है की खा तो लो पर शगुन ना दो. अब आप अनिल कुमार को ढूँढो और दूसरा लिफाफा बना कर दे दो.
- अरे यार ग्राउंड फ्लोर पर अनिल है नहीं, यहाँ बेसमेंट में भी नहीं है तो फर्स्ट फ्लोर पर ही होगा. चलो वहीं चलते हैं.
- चलो. एक तो ये डीजे इतने बज रहे हैं कि कुछ सुनाई ही नहीं पड़ता, चलो चलो.
ऊपर अनिल कुमार मिले तो नरूला साब ने कहा,
- अनिल कुमार जी आप जुनेजा हो मुझे पता नहीं था वो तो बोर्ड देख कर ही पता लगा. आपको बहुत बहुत मुबारक और ये रहा बच्चों के लिए शगुन.
फिर नरूला साब ने श्रीमति जी के साथ इत्मीनान से डिनर लिया और घर की ओर प्रस्थान किया.
रास्ते में नरूला साब सोचते रहे कि एक लिफाफा फर्स्ट फ्लोर पर दे दिया दूसरा बेसमेंट में दे दिया तो तीसरा ग्राउंड फ्लोर पर भी दे आता तो अच्छा था.

मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं 


Tuesday, 27 December 2016

Hampi - a World Heritage Site: Part 2 of 3

Hampi is situated on the south bank of the river Tungbhadra approx 350 Km from Bangalore. Nearest railway station is 15 km away in Hospet in Bellary district of Karnataka. The river Tungbhadra was earlier known as Pampa which became Hampe in Kannada & got anglicised to Hampi.

This village Hampi is situated in erstwhile capital city of Vijaynagar Empire which covered vast tracts of southern India. The Empire was established by two brothers Harihara ( or commonly known as Hakka ) & Bukka Raya in 1363 under guidance of their guru Madhava Vidyarnya. The mighty Empire in its peak time extended from river Krishna to Kanyakumari and from Goa to Odisha.

In ancient times the area was known as Pampa-kshetra, Kishikindha-kshetra or Bhaskara-kshetra. Later it has also been mentioned as Virupakshpura as Virupaksha was the patron deity of Vijaynagara Kings. 

The Empire suffered a major defeat in the year 1565 at the hands of confederation of Deccan sultanates. Thereafter the Empire weakened considerably & collapsed by 1646.   

Hampi is one of the UNESCO World Heritage sites in India. It is a charismatic capital town even in ruins. Large boulders strewn across the landscape, in valleys & on surrounding hills make the backdrop of Hampi unique. Spread around are hundreds of small & large monuments. These include magnificent temples, palaces, pavilions, ancient markets, army quarters, aqua-ducts & water tanks. The list is of monuments in Hampi is endless. This may be called an open museum of a large prosperous capital city which saw glorious days for two centuries from 1363 AD to 1565 AD. 

Trade with foreign countries had increased considerably at the time via Calicut port. Many traders & visitors have recorded about the wealth, culture, architecture, food & life style prevalent at the time in Vijaynagara Empire. Some of them are Abdul Rezzak from Herat who visited in 1443, Nicolo Conti of Italy who visited during 1420, Portuguese traveller Domingo Paes who stayed in the Empire during 1520-22, Portuguese horse trader Fernao Nuniz who was here in 1536-37, Cesare Frederici of Italy who visited in 1567 and Colonel Colin Mackenzie of Scotland who visited in 1799.  

If you love history & have strong legs as they say locally, you can spend weeks in Hampi. The ruined Capital is spread over hilly terrain of 26 sq. km. Bicycles, motorbikes, tonga, golf carts etc are also available in the town on rental basis for excursions. Every turn of the way & every hill holds a surprise for you. 

Some photos: 

Mandapa inside Hazararama Temple

Such pillared Mandapas are spread all over 

Wall surrounding Hazararama Temple

Enclosure wall decorated with engravings of animals, dancers & social scenes

Persian horse traders & above that are women fighters 

Ornate stone pillars, ceilings & on top is brick & mortar wall decorated with figures of kings & idols of Gods

Decoration on the plinth stones 
King Dashrath targeting a deer on the assumption that sound is of an animal drinking water whereas it is in fact Shravana who is filling his pitcher with water after sun set

Lord Rama, Laxmana & Sita leaving for forest. Hundreds of such engravings are there depicting stories from Ramayana

Lord Rama with Lakshmana & guru Drona meeting Ahilya

Various stories from Ramayana

Lotus Mahal( Kamal Mahal or Chitragni Mahal ) in the Zanana Enclosure. Perfect in geometrical lines, designed for comfort in all weathers. Seems to be a socialising centre for women

Well decorated Mughal style Mehrab
Queen's Bath. The pool building has no roof & is surrounded by a canal to stop intruders & to supply water inside the pool. A pleasure area for the royals

Corridor in Mughal style Mehrabs

One of the many watch towers

Elephant Stable. Eleven royal elephants in the army of king Krishnadeva Raya were housed here

Residential quarters near Elephant Stable now converted in to a museum

For more photos you may please click on the following link:

http://jogharshwardhan.blogspot.com/2016/08/hampi-karnataka-world-heritage-site.html
Hampi, Karnataka - a World Heritage site: part 1 of 3




Thursday, 8 December 2016

शौक़ीन

अपने अपने शौक़ हैं साब, किसी को परफ़्यूम का, किसी को कपड़ों को, किसी को पीने का और किसी को गाने का. हमारे मित्र नरूला साब को इन सभी चीज़ों का शौक़ है. परफ़्यूम बढ़िया होनी चाहिए पर ऐसा नहीं है कि एक ही चलती रहे बल्कि पार्टी दर पार्टी बदलनी भी तो चाहिए. कपड़े तो टापो-टाप पहनते ही हैं और अगर पार्टी में फ़रमाइश हो तो नरूला जी गाने को भी तैयार रहते हैं. यूँ तो पार्टी की जान हैं पर मुझे तो लगता है कि पार्टी अटैंड करना ही नरूला साब का असली शौक है.

अभी पिछले दिनों ही एक पार्टी में मिल गए. दो टंगड़ी और तीन पेग के बाद ज़रा सुरूर बना तो नरूला साब फ़रमाने लगे,
- अपने शौक के लिए बंदा क्या नहीं करता या कर सकता, क्यूँ सर? आप पीने का ही शौक़ लो जिस पर जिगर मुरादाबादी ने क्या गजब की ग़ज़ल लिखी है. पूरी ग़ज़ल तो यहाँ नहीं सुना सकता पर हां चंद लाइनें पेश है:

साकी की हर निगाह पे, बल खा के पी गया,
लहरों से खेलता हुआ लहरा के पी गया !
ऐ रहमते तमाम, मेरी हर खता मुआफ,
मैं इन्तेहाए शौक में घबरा के पी गया !

- वाह बहुत खूब. इन्तेहाय शौक में घबरा के पी गया. नरूला साब आपसे पार्टियों में ही मुलाकात होती है कभी वैसे ही घर आ जाइये. गपशप हो जाएगी. वैसे तो बेटे की नौकरी की पार्टी होने वाली है उसमें तो आप को आना ही है. मैं फोन कर दूंगा.
- क्यों नहीं सर. आप कहें और हम ना आएं ऐसा कैसे हो सकता है सर.

पार्टी एक बेंकेट हॉल में हुई और अच्छी रौनक रही. नरूला साब ने जोनी वॉकर से अपनी दोस्ती और मजबूत कर ली. सुरूर में आने के बाद ग़ज़ल भी सुना दी और फ़िल्मी गीत भी. जाते जाते लिपट ही गए,
- सर बहुत मज़ा आया आज. आपने भी मेरे घर चरण डालने हैं जी. वैसे मैं बहुत कम लोगों को घर बुलाता हूँ पर आपने अगले सन्डे जरूर आना है सर. आप के साथ सिटिंग नहीं हुई जनाब, बैठेंगे तो फिर खुल के बातें होंगी.

अगला सन्डे भी आ गया. नरूला साब के घर पहुँच कर देखा बड़ी अच्छी डेकोरेशन थी और सब चीज़ें सलीके और करीने से लगी हुई थीं. कोई शक नहीं नरूला साब शौक़ीन इंसान हैं. स्कॉच खुल गई, गाने बजने लगे और गप्पें चल पड़ीं. नान, बटर चिकन, शाही पनीर और पुलाव के बाद आइसक्रीम आ गई. बाउल उठाया तो ऐसा लगा की उस पर कोई लोगो बना है. ध्यान से देखा तो पूछा,

- नरूला ये क्या ? तुम्हारे आइसक्रीम बाउल पर अशोका होटल का निशान बना हुआ है ?
- हाँ सर हाँ सर. आपने सही पहचाना. मैं हर पार्टी की यादगार जरूर रखता हूँ. ये बाउल विक्की के जन्मदिन की पार्टी का है मैं अशोका से ही लाया था जी. ये जो चम्म्च आपके हाथ में है ना सर ये इंडिया कॉफ़ी हाउस का है जहां सहगल ने प्रमोशन पार्टी दी थी.
- कमाल करते हो नरूला. यार तुम्हें डर नहीं लगता ? ये तो सरासर ....
- सर जी इतने बड़े बड़े होटलों को क्या फर्क पड़ता है दो चार छुरी कांटों से ? फिर हमने कौन सी बेचनी हैं ये चीज़ें बस हमारा तो शौक पूरा हो जाता है. ये देखो सर आपको और भी दिखाता हूँ. ये बियर ग्लास एअरपोर्ट होटल का है जी इकलौता ही रह गया है. दुबारा जाने का मौका ही नहीं मिला जी. ये शुगर बाउल होटल जनपथ का है जी. अब तो वो होटल ही बंद हो गया जी. दिल्ली के दो तीन फाइव स्टार होटल छोड़ के सबकी निशानियाँ हैं जी मेरे पास. कई चीज़ें तो अलमारी में बंद पड़ी हैं. अलमारी खोलूं सर जी ?

पार्टी के लिए तैयार 


Saturday, 3 December 2016

काले बाल

घर में सन्डे के दिन आम तौर पर शान्ति रहती है पर आज थोड़ी हलचल है. आज तीन बजे राजेश ने अपने साथ मम्मी पापा को लेकर मोती बाग जाना है लड़की देखने. राजेश की बड़ी दीदी अपने घर से सीधे वहीँ पहुँच जाएगी. जीजा के पास कार है ना. बड़ी दी ने राजेश को समझा दिया है कौन से कपड़े पहनने हैं और कौन से जूते. मम्मी ने वही बातें चार पांच दफा दोहरा दी हैं और पापा ने भी याद दिला दिया है.

राजेश को अकेले में लड़की से बात करने के लिए पांच सात मिनट ही मिलेंगे इसलिए मन ही मन सवाल जवाब तैयार करता रहा है. स्माइल कैसे देनी है, कौन से पोज़ में पहला सवाल पूछना है और कौन से पोज़ में दूसरा सब तैयार है. पेंट शर्ट धोबी ने प्रेस कर दी थी पर फिर भी घर की प्रेस से एक बार क्रीज़ दोबारा ठीक कर ली है. जूते इतनी बार चमकाएं है की अब जूते को हाथ लगाने का मन नहीं हैं. राजेश को दो साल हो गए बैंक में नौकरी करते करते अब तो काफी कुछ समझ आ गई है !

मोती बाग दूर है और ऑटो महंगा पड़ेगा इसलिए राजेश के स्कूटर पर तीनों बस स्टैंड तक चले जाएंगे और राजेश स्कूटर वहां जमा कर देगा. फिर वहां से ऑटो ले लेंगे. स्कूटर पर तीनों का लड़की के घर जाना अच्छा नहीं लगता, क्या कहते हो ? वापसी में जीजा की गाड़ी है ही.

राजेश को पहली नज़र में, दूसरी नज़र में और फिर अकेले में रीना के लम्बे लम्बे और काले बाल बड़े पसंद आए. उसे लगा की ऐसे बाल पहले कभी देखे नहीं. मीटिंग के बाद 'लड़की पसंद है' की घोषणा हो गई और दिसम्बर के महीने में राजेश और रीना का बैंड बज गया और ज़िन्दगी नए रास्ते पर चल पड़ी.

तीन साल बाद पहला बेटा बंटी, पांच साल बाद पप्पू और सात साल बाद बिटिया आ गयी. राजेश का समय बंट गया - 40 % नौकरी में, 50 % बच्चों में, 5 % सामाजिक कार्यों में और 5 % रीना के लिए. रीना का समय 20 % घरेलु कामों में, 60 % बच्चों की सेवा में, 15 % सामाजिक कामों में और 5 % राजेश के लिए. मियां बीवी के इस 5 % के टाइम शेयर में हंसी मज़ाक, नाराज़गी और लड़ाई झगड़ों के बीच बच्चे पढ़ गए और बंटी की नौकरी कब लग गयी पता ही नहीं चला. सन्डे को बंटी के लिए लड़की देखने जाना था. राजेश और रीना दोनों तैयार हो रहे थे. राजेश ने रीना के बालों को हाथ लगा कर कहा,

- जब तुझे देखने गया था तो तेरे काले घनेरे बाल बहुत पसंद आये थे और तेरी जुल्फों को देख कर मैंने हाँ की थी. अब देख ज़रा अपने झड़े हुए और रंगे हुए बालों को ?

- रहने दो जी ज्यादा जबान ना चलाओ. और अपनी शकल भी देख लो ज़रा शीशे में. कंघी कर कर के टकले हो गए हो !


रब ने बना दी जोड़ी 

... गायत्री वर्धन, नई दिल्ली



Wednesday, 30 November 2016

कम्बल

गली में से किसी फेरी वाले की आवाज़ आ रही थी 'कम्बोल' पर साफ़ तौर पर समझ नहीं आया कि क्या बेच रहा है. बाहर निकल कर देखा तो दो नेपाली कम्बल बेच रहे थे. ये बात है देहरादून की जहाँ नवम्बर में रात में लगभग दस बारह डिग्री ठण्डक हो जाती है . इन दिनों ऊपरी पहाड़ियों पर बर्फ गिरनी शुरू हो जाती है जिसके कारण खेती और दूसरे काम घट जाते हैं. इसलिए उत्तराखंड और नेपाल की ऊँची पहाड़ियों से काफी लोग रोज़गार की तलाश में दो तीन महीने के लिए निचले शहरों में आ जाते हैं. जैसे की ये नेपाली जिन्हें स्थानीय भाषा में दुटियाल भी कहते हैं.

ये दुटियाल पिथोड़ागढ़ के रास्ते लम्बा पहाड़ी सफ़र करके देहरादून पहुंचे हैं. बाएँ सुम्बिद है जो तीन बार पहले भी आ चुका है और दाएं उसका चचेरा भाई पहली बार कमाई करने आया है. चार छे दुटियाल मिलकर शहर के बाहरी इलाके में कम किराए के मकानों में रहते हैं    

ज्यादातर सामान एक ही लाला से कमीशन के आधार पर लेते हैं. इलाका बाँट कर सुबह सुबह 15 - 20 किलो का बोझ लेकर पैदल ही गली मोहल्ले में फेरी लगाते हैं. दो या तीन मिलकर टोली में चलते हैं जिससे कलर और साइज़ में वैरायटी भी हो जाती है और सुरक्षा भी   

सारे काम खुद ही करने पड़ते हैं - आवाज़ लगाना, महिलाओं से मोल भाव करना और आवारा कुत्तों से बचना   

सामान के बोझ से नौसिखिया दोहरा हुआ जा रहा है. अभी उसे हिंदी भी सीखनी है क्यूंकि पापी पेट का सवाल है ना 


Friday, 25 November 2016

करेंसी नोट

जिधर देखो चर्चा है नोट की और नोटबंदी की, अखबार में, टीवी पर, सोशल मीडिया में, गली-मोहल्ले में और बाज़ार में. इस विषय पर तर्क, वितर्क, कुतर्क और चुटकले बाज़ी खूब चल रही है. फिलहाल तो अपन की जेब में एक अदद डेबिट कार्ड है और पेंशन बैंक के खाते में है. डेबिट कार्ड भी सफ़ेद धन है और बैंक में आई पेंशन भी सफ़ेद धन है इसलिए फिकरनॉट !

पेंशन जमा होने के बाद वैसे तो बैंक के खाते से 500 और 1000 के नोट ही निकाले थे पर भई वो तो बियर और चखने के स्टॉक जमा करने में ही फिनिश हो गए. अब जो 100-50 के नोट बचे हैं सो अगली पेंशन तक हुक्का पानी चलता रहेगा इसलिए फिकरनॉट !

फिर बैठे बैठे ख़याल आया की इन्टरनेट पर देखें तो सही माजरा क्या है. करेंसी नोट पर कई मजेदार चीज़ें मिलीं जैसे कि दुनिया में सबसे पहले सिक्के का चलन भारत में ही प्राचीन काल में हुआ था और साथ ही चीन में भी. उससे पहले बार्टर चलता होगा मसलन 'तूने मेरी दाढ़ी बनाई ये ले चार टमाटर' या फिर 'मैं तुझे एक लिटर दूध देता हूँ तू मेरा कुरता सिल दे' वगैरा. फिर किसी आप जैसे सयाने बन्दे ने सिक्के निकाल दिया होगा तो फिर तो दुनिया ही बदल गई.

चाणक्य का नाम जरूर सुना होगा आपने. चन्द्रगुप्त मौर्य ( ईसापूर्व 340-290 ) के समय में चाणक्य ने अपनी पुस्तक 'अर्थशास्त्र' में सिक्कों का वर्णन किया है. रुप्यारुपा याने चांदी का सिक्का, स्वर्णरूपा - सोने का, ताम्ररूपा - ताम्बे का और सीसारूपा सीसे का सिक्का. शायद रूपा शब्द ही रुपया हो गया होगा.

वैसे आधुनिक इतिहास में शेरशाह सूरी ने अपने राजकाल 1540 -1545 में कई तरह के सुधार किये. इनमें से एक था चांदी का सिक्का जारी करना. इस सिक्के का नाम भी रुपया रखा गया.

जनसँख्या बढ़ी तो व्यापार बढ़ा तो सिक्कों की मांग भी बढ़ी. फिर सिक्के बनाने महंगे हो गए शकल सूरत भी बहुत अच्छी नहीं होती थी. इसलिए सिक्कों से कागजी नोट की तरफ चल पड़े. कागजी नोट चीन में 11वीं शताब्दी में नज़र आने लगे थे. भारत में सबसे पहले कागजी रुपये छापे प्राइवेट बैंकों ने. ये बैंक थे बैंक ऑफ़ हिन्दोस्तान (1770 - 1832 ), जनरल बैंक ऑफ़ बंगाल एंड बिहार (1773 - 1775 ) और बंगाल बैंक ( 1784 -1791). शुरू के नोटों में केवल एक साइड ही प्रिंट होता था और दूसरी साइड कुछ भी नहीं. शायद मशीनरी में कमी रही हो.

गोवा, दमन और दीव में पुर्तगालियों ने 1883 में रूपिया नाम से कागजी करेंसी चलाई जो कमोबेश 1961 तक चलती रही.

इसी तरह पोंडिचेरी, माहे, करैकल, यानम और चन्दरनगर के इलाके जो कि फ्रांस के आधीन थे फ्रेंच कागजी रुपये इस्तेमाल करते थे. एक रूपये का नोट प्रथम विश्व युद्ध के बाद और पांच का नोट 1937 में जारी किया गया था.

हैदराबाद राज्य में अपनी कागजी करेंसी का चलन 1916 से था. ये नोट 1939 तक छपते रहे और 1952 तक बाज़ार में चलते भी रहे.

उधर 1944 में जापानियों ने लड़ाई का एक नया हथियार ढूँढ लिया - नकली नोट. इसके बाद से नकली नोटों से बचने के लिए नोटों में वाटर मार्क और सुरक्षा धागे का इस्तेमाल किया जाने लगा.

भारत में 1831 में कागजी करेंसी - Paper Currency एक्ट बना था और 1835 में सिक्का एक्ट Coinage Act बना जिसके तहत पूरे भारत में एक जैसे सिक्के लागू किये गए. 1862 में ब्रिटिश राज के तहत सिक्के जारी किये गए. काफी समय तक सिक्के व नोट ब्रिटेन से छप कर आते रहे फिर 1928 में नाशिक, महाराष्ट्र में नोट छापने की प्रेस लगाई गई.

भारतीय रिज़र्व बैंक पहली अप्रैल 1935 को कलकत्ता में स्थापित किया गया और बैंक को करेंसी नोट का प्रबंधन दे दिया गया. बैंक ने पहले पहल पांच रुपये का नोट 1938 में जारी किया था. स्वतंत्र भारत का पहला नोट एक रूपए का था जिसे 1949 में छापा गया था.

जब कागज़ के नोट छपने शुरू हुए थे तो नोटों की कीमत के बराबर सोना रखा जाता था. परन्तु समय के साथ नोटों की संख्या और मूल्य इतना बढ़ गया कि उतना सोना रखना असंभव हो गया. 1914 से 1928 तक लगभग सभी देशों ने सोने के मानक को हटा दिया और सोने के भण्डार घटा दिए. भारत में 557.7 टन सोना रिज़र्व में रखा गया है जो कि विदेशी मुद्रा समेत कुल रिज़र्व का 6.3 % है.

विश्व में सबसे ज्यादा सोने के रिज़र्व रखने वाले देशों में भारत का स्थान दसवां है.

एक और मजेदार तथ्य भी पढ़ने को मिला -
1948 में डॉलर का मूल्य 01.30 रुपये था,
2000 में डॉलर का मूल्य 43.50 रुपये था,
2014 में डॉलर का मूल्य 59.44 रुपये था और
23.11.2016 को डॉलर का मूल्य 68.56 हो गया था.

रिज़र्व बैंक की 31 मार्च 2016 की रिपोर्ट में बताया गया है की भारत में 16.42 लाख करोड़ रुपये मूल्य के नोट प्रचलन में थे जिसमें से  86% नोट 500 और 1000 के हैं.

नोटबंदी भारत में पहली बार जनवरी 1946 में हुई जिसमें 1000 और 10000 रुपये के नोट बंद कर दिए गए थे. दूसरी बार 16 जनवरी 1978 से 1000, 5000 और 10000 रुपये के नोट बंद कर दिए गए थे. तीसरी बार अब 9.11.2016 से 500 और 1000 रूपए के नोटों की नोटबंदी हो गई.

कभी चकबंदी कभी नसबंदी और कभी नोटबंदी ! दुनिया यूँ ही चलती रहेगी,  आप बर्फ लेंगे क्या ?
दुनिया यूँ ही चलेगी



Sunday, 20 November 2016

काँटा

बैंक का बिज़नेस बढ़ने के कारण झुमरी तलैय्या के रीजनल मैनेजर गोयल साहब की काफी वाह वाही हुई. गोयल साब की नाक ऊंची हो गई और कालर खड़े हो गए. पर बड़े अधिकारियों ने कुछ और ही सोच रखा था. उन्होंने रीजन को बाँट कर दो हिस्सों में कर दिया - झुमरी उत्तर और झुमरी दक्षिण.

कहाँ तो गोयल साब पूरे झुमरी के इकलौते सुलतान थे कहाँ अब उन्हें सिर्फ आधी झुमरी का चार्ज थमा दिया गया. अब ये तो सरासर ज्यादती थी कि गोयल साब बिजनेस बढ़ा रहे हैं और ऊपर वाले सल्तनत का साइज़ घटा रहे हैं. खबर सुनकर मायूस हो गए गोयल साब. पानी पिया और चश्मा उतार कर टेबल पर रख दिया फिर जेब से कंघी निकाल कर टकले सर पर फेरी. चार पांच बाल ही खड़े थे उन्हीं पर कंघी घुमा दी. कंघी करने के बाद वो फिर से यथास्थान खड़े हो गए.

घर में श्रीमतीजी को व्यथा सुनाई तो वे गुस्सा हो गईं,
- अरे तुम इतना काम कर रहे थे और बड़े साब की भी सेवा कर रहे थे तो ऐसा क्यूँ किया उन्होंने ? बात तो करनी थी ? या मैडम से मैं मिलूं ?

- अरे छोड़ ना स्साले को. रीजन छोटा दे दिया सो तो ठीक है पर तीन मोटे अकाउंट जो मैं लाया था वो चले गए दूसरे रीजन में. अच्छी दिवाली हो गई थी वो तेरा डायमंड सेट भी तो उसी में से बना था. पर ऐसा लगता है की अबकी दिवाली फीकी जाएगी.
- सुनो जी झुमरी के दूसरे रीजन में किसकी पोस्टिंग हुई है ?
- सुना है वहां तो कोई धन्नो आ रही है नाम तो मालूम नहीं पड़ा ना ही मैं जानता.
- हाय राम कुछ करो जी ये तो ठीक नहीं वो तो आपके सारे भेद खोल देगी. औरतों के पेट में बात रूकती कहाँ है समय रहते कुछ कर लो आप.
गोयल साब ने बियर का घूँट भरा और बोले,
- वही सोच रहा हूँ मैं भी. कुछ ना कुछ तो करना पड़ेगा जी.

गोयल साब ने अपनी पोस्टिंग बाहर कराने की कोशिश की तो जवाब मिला अगले साल. तीन मोटे लोन खाते अपने रीजन में ट्रान्सफर कराने की कोशिश की पर नाकामयाब रहे. श्रीमती ने कई बार पूछा,
- सुनो जी कुछ बात बनी क्या ?
- लगा हुआ हूँ मैं पर अभी तक तो कुछ नहीं हो पाया. जल्दी कुछ ना हुआ तो गड़बड़ हो सकती है.
- हाँ मुझे भी ठीक नहीं लग रहा है कुछ करो आप.

शनिवार को गोयल साब ख़ुशी ख़ुशी घर आये,
- डार्लिंग चलो आज डिनर करा लाऊँ. और खुशखबरी भी सूना डालूं.
- मामला सुलटा दिया लगता है ?
- देखो अपने ट्रान्सफर बाहर करानी चाही तो नहीं हुई, तीनों खाते अपने रीजन में ट्रान्सफर कराने चाहे तो वो भी नहीं हुए. अब काँटा ही निकाल दिया. दूसरे बैंक के रीजनल मैनेजर से बात करके सारी चीज़ समझाई. आज तीनों खाते हमारे बैंक में बंद हो गए और सोमवार से दूसरे बैंक में चालू. बोलो कैसी रही ?
- वाह बहुत अच्छी रही, ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी !

डायमंड सेट 


Tuesday, 15 November 2016

ड्यूटी

मैनेजर साब ग़ुस्से और बेचैनी में बार बार घड़ी देख रहे थे. 10.20 हो चुके थे और हरेंदर कैशियर का अतापता ही नहीं था. इधर कैश कांउटर पर भीड़ बढ़ती जा रही थी. मैनेजर साब भुनभुना रहे थे,

- आज अगर आया तो इसकी छुट्टी कर दूंगा. सुसरा समझाने से समझता ही नहीं. एक रीजनल मैनेजर है वो भी सुसरा सुनने को तैयार नहीं. कितनी बार कहा है की हरेंदर को बदल दे या इसको अपने ही दफ्तर में रख ले. अपने दफ्तर में रख कर इस हरेंदर को सुधारो तो मान जाएं. ना तो हरेंदर ही सुधर रहा है और ना ही रीजनल मैनेजर मान रहा है. अब इन दो पाटन के बीच में मेरी पिसाई हो रही है.

ये तो अच्छा है कि ये ब्रांच किराड़ी गाँव में है दिल्ली से 200 किमी दूर. यहाँ ग्राहक फोन पर या लिखित में शिकायत नहीं करते वरना और मुश्किल बढ़ जाती. ज्यादातर सीधे सादे लोग हैं दो चार सौ रूपये निकालने या जमा करने के लिए चुपचाप एक घंटा इंतज़ार कर लेते हैं. शहरी बाबू तो लड़ने के लिए तैयार रहते हैं.

दूसरी बात ये है कि गाँव किराड़ी के पास से एक हाईवे बनना है और बहुत से किसानों को जमीन का मुआवजा मिलना है. कुछ को मिल भी चुका है जिनमें से हरेंदर भी एक है. मुआवज़ा लाखों में आ रहा है इसलिए गाँव के बाहर मेला जुड़ता जा रहा है. एक दारु की दूकान खुल गई है, साज़ सिंगार की दूकान आ गई है, ढाबा आ गया है वगैरा. मुआवज़े मिलने के बाद पीने खाने का शौक अब पूरे हो रहे है. हरेंदर क्यूँकर पीछे रहता वो भी मौज लेने लग गया था.

दस बज कर तीस मिनट पर हरेंदर अंदर आया और मैनेजर साब का लेक्चर शुरू हो गया और डांट डपट के बाद उसकी छुट्टी कर दी गई. अब हरेंदर ठेके के तरफ हो लिया. चार पेग लगाने के बाद फिर से ब्रांच में आ गया. अंदर आकर अंग्रेजी बोलण लाग्या,
- मैनजर साब हरेंदर ऑन डूटी... काम करणा है मन्ने... हरेंदर ऑन डूटी... हरेंदर डूटी डेली... हरेंदर डेली डूटी ...
मैनेजर साब ने घंटी मार के गार्ड को बुलाया,
- नफे सिंह इसको बाहर निकालो. ससपेंड कर दिया तो फिर रोता रहेगा ये. जाओ इसे दूर छोड़ के आओ.
गार्ड ने हरेंदर को पकड़ा और ट्यूबवेल के पास छोड़ आया और आकर साहब को बता दिया. हरेंदर ने ट्यूबवेल पर बैठे बैठे दो पेग और खींचे और एक बजे फिर आ गया बैंक में,
- हरेंदर डेली डूटी...डेली...डेली...

इस बार गार्ड और एक पुलिस वाले ने फिर हरेंदर को पकड़ कर ट्यूबवेल के पास वापिस पहुँचा दिया. चार बजे तक ब्रांच में शांति रही. कैश और ब्रांच बंद करने का समय आ गया पर गार्ड नफे सिंह नदारद. उसकी राइफल और कारतूस भी जमा होने थे. अब चपरासी धर्म सिंह को दौड़ाया गया,

- जाओ नफे सिंह गार्ड को देखो ज़रा राइफल लेकर कहाँ घूम रहा है. राइफल भी तो लॉकर में बंद करनी है. बुला के लाओ उसे.

आधे घंटे बाद चपरासी धर्म सिंह गार्ड नफे सिंह की राइफल और कारतूस की बेल्ट लेकर आ गया और साहब से नूं बोल्या,

- साब जी यो री राइफल और यो रे कारतूस. यो तो ली आया जी मैं इब यो तो जमा कर लो जी. अर वे तीनों तो टूवेल पर टुन्न पड़े. हरेंदर बी, गार्ड नफे सिंह बी अर पुलिस वाला बी तिन्नों कतई टुन्न पड़े.

हमप्याला 


Saturday, 12 November 2016

Bargains in Kedarnath

Bargains are part of our lives. Bargaining scenes can be seen in markets, while hiring of autos, purchase of property and so on. Getting lower price after haggling gives a feeling of satisfaction in having won the duel!

Sometime back we were in Kedarnath and had a couple of chances to bargain at an height of 11755 feet which must be eligible for record books! Some examples:

With Nandi in Kedarnath

*** In Guptkashi, we were informed by hotel manager that helicopter service to Kedarnath Temple was still available. It was October end which is usually off-season for tourists because of cold weather setting in. The number of tourists had dropped considerably as doors of the Temple were to be closed in first week of November. Hotel manager added with a smile,
-Try to bargain the chopper fare. They are jobless these days.
It really was an amusing idea to bargain for chopper fare. We walked down for about two kilometres till Fata. There were three helipads where small, colourful 8 seater birds were parked in the backdrop of green hills. Pilots & ground staff were wearing equally colourful T-shirts making the scene interesting. We did bargain with Manager & eventually paid Rs.6000/- per person for return journey instead of normal fare of Rs.7300/-. It was fun to haggle with Helipad Manager & see him lowering the fare as you do with an auto driver in Delhi! Flight was all of 9-10 minutes but was worth watching over beautiful Himalayan range in bright sunshine with cheerful river Mandakini bubbling down below in the valley.

*** On landing at helipad at Kedarnath it was ice-cold winds which welcomed us. We could see snow on the grass here & there. Snow clad peaks were massive & towered over the Temple on three sides. Small cheerful rivulets gurgled from all sides & mingled into Mandakini. We were immediately surrounded by Pandit jis asking simultaneously:
- Which district are you from?
- Which caste?
- Which Gotra?
- From Kerala? From Punjab? From Garhwal?
- Brahmin? Aggarwal?
- Pooja karwani hai?
Though we refused to all of them, one followed us quietly. In between our dialogues he kept informing names, historical & mythical stories about the place. In sanctum he offered to help perform pooja. Here they allow pooja only by couples. Eventually we came out & paid Rs. 500/- but Pandit ji gave unsatisfied look. A bit of argument ensued as he wanted Rs.1000/- but we stuck to our end of bargain & that was it.

*** Near the temple several Sadhus or beggars were sitting on stone floor in a line, having ash (Bhabhoot) smeared all over their bodies and enjoying the warmth of sun. As soon as tourists came out of temple they raised a chorus of 'Jai Bhole Nath'. And then almost shouted:
- Chai ke liye de do,
- Khane ke liye de do,
- kambal ke liye do baba,
- daan karo jodi bani rahegi’etc.
They really looked pathetic yet were vociferous, aggressive, greedy & spoiled the serenity & piousness of the place. We gave them Rs.20/- each. All accepted thankfully except one who shouted ‘isase kya hoga?’ & threw back the note. I picked it up & pocketed back much to amusement of onlookers. Somebody’s loss is somebody’s bargain!

*** Turning back towards helipad we were discussing about behaviour & bargaining by Pandit jis & sadhus living there. Such scenes can be witnessed in practically all Hindu temples. To this discussion my wife replied:

- Chopper-wala bargained with us for profit of his company, his own position & his salary. Pandit ji bargained for more so as to feed his family as temple will remain closed for six months and he will be jobless. Sadhus bargained for they would have to trek back to plains in winter & would be needing money for creature comforts. You bargained with Shiva for a happy life. So everybody bargains.
It is all Maya!

Near Kedarnath Temple


   

Tuesday, 8 November 2016

पहला नम्बर

दुबई के एक भारतीय व्यापारी ने नई रोल्स-रोयस कार का रजिस्ट्रेशन नंबर लेना था. जब कार नम्बर प्लेट "D 5" की बोली लगने लगी तो इन व्यापारी श्री बलविंदर साहनी ने 330 लाख दिरहम की बोली लगा कर नम्बर जीत लिया. डॉलर में कहें तो ये बोली 90 लाख डॉलर की थी और आजकल एक दिरहम लगभग 18 रुपये का है तो आप हिसाब लगा लें की कार की नम्बर प्लेट लेने के लिए कितने पैसे लगे होंगे. साहनी साब का कहना है की उन्हें 9 नम्बर बहुत पसंद है इसलिए उन्होंने D याने 4+5=9 की बोली लगा दी.

एक हम हैं कि कभी साइकिल का नंबर भी नहीं खरीदा फटफटिया या कार का तो दूर रहा. अगर साहनी साहब को 9 नम्बर पसंद है तो भाईसाहब कुछ नम्बर हमें भी पसंद हैं क्यूंकि शायर चचा कह गए हैं,
पसंद अपनी अपनी ख़याल अपना अपना,
सवाल अपना अपना जवाब अपना अपना !

वैसे अपन की पसंद है नम्बर 1वो इसलिए क्यूंकि पेंशन का मैसेज पहली तारीख को आता है इसलिए बड़ा ही प्यारा और शुभ नम्बर  है और वैसे भी 1 नम्बर अपने आप में टापो-टॉप नम्बर है. ये बात और है कि महीने में ये नम्बर केवल एक ही बार आता है और पेंशन भी एक ही बार जमा होती है. और जब इकलौती पेंशन का मेसेज आता है तो 1 बार तो मुस्कराहट भी आ ही जाती है. पहला या अव्वल नम्बर वैसे भी धूमधाम वाला होता है. घर में पहली शादी, पहली नौकरी, पहली तनख्वाह, पहली गाड़ी का नम्बर वगैरा बड़ी देर तक याद रहती हैं. नम्बर 1 का धन भी बड़ा अच्छा है 2 नम्बर के धन के मुकाबले पंगे कम हैं. मन में शांति रहती है. नम्बर 1 से जुड़ी फिल्म भी शायद देखी हो आपने - बीवी नम्बर 1.

और पहला इश्क़ ? फिलहाल तो इस विषय पर मौन रखना ही ठीक है. इस पर आपसे चर्चा तब करेंगे जब आप कल पार्क में मिलेंगे.

अपन का अगला पसंदीदा नम्बर है 8. घड़ी में ये 8 का आंकड़ा दो बार आता है एक बार सुबह और दूसरी बार शाम को. सुबह घड़ी में 8 नम्बर आता है तो नाश्ता लाता है. नहा धोकर डाइनिंग टेबल पर बैठ जाएं, आलू प्याज़ का परांठा हो, अचार हो, दही हो, अखबार हो और एक प्याला चाय का तो साहब पैसा वसूल है. सुबह सुबह इससे याने 8 से बढ़िया कोई नम्बर नहीं दिखता है. क्या विचार है साब ?

शाम का घड़ी का आंकड़ा 8 और भी मज़ेदार है याने 8 PM. दिन भर की थकान दूर करने का एक अच्छा मौका है. इत्मीनान से बैठकर एक छोटा बनाइये और चखने में सलाद, पनीर और नमकीन का सेवन कीजिये. अति उत्तम नम्बर है ये 8 सारे दुःख 9 > 2 > 11 हो जाते हैं !

आपको कौन सा नम्बर पसंद है ?

पहला नम्बर 


Saturday, 5 November 2016

नौकरी

पति की एक्सीडेंट में मृत्यु होने के बाद पत्नी शकुंतला को काफी दौड़ भाग करनी पड़ी पर बैंक में नौकरी मिल ही गई. पति खजांची थे और चूँकि शकुंतला दसवीं पास थी इसलिए उसे भी खजांची के पद पर रख लिया गया. थोड़ी बहुत ट्रेनिंग और स्टाफ की थोड़ी मदद से काम सीख लिया और नौकरी शुरू हो गई. इसके साथ ही शकुंतला के मन में स्थिरता और तस्सल्ली आ गई.

अब शकुंतला का ध्यान इकलौते बेटे पर रहता था जो इस साल दसवीं में आ गया था और अब उसे बोर्ड का इम्तेहान देना था. पढने में तो सामान्य ही था पर शकुन्तला उस पर लगातार डांट कर और दबाव देकर 'राजू पढ़ ले पढ़ ले' करती रहती थी. राजू को लुभाने के लिए मोबाइल फ़ोन इनाम में देने की भी घोषणा कर दी. और अगर बहुत अच्छे नंबर आये तो मोबाइल फ़ोन के अलावा स्कूटी भी देने का वादा कर दिया. 
राजू बेटा दसवीं पास कर गया और मोबाइल फ़ोन का मालिक बन गया. पर स्कूटी के लायक नंबर नहीं आये इसलिए स्कूटी नहीं मिली पर राजू की मांग जारी रही. स्कूल भी बदल कर दूर वाले इंटर कॉलेज में दाखिला ले लिया था जहाँ साइकिल से जाना पड़ता था. अब रोज रोज की झिकझिक होने लगी और किसी किसी दिन माँ बेटे में गरमा गरमी की नौबत भी आ जाती.
स्कूटी के साथ साथ जेब खर्च बढ़ाने की मांग होने लगी. शकुंतला ने लोन लेकर स्कूटी दिलवा दी और जेब खर्च भी बढ़ा दिया. तीन महीने में ही स्कूटी से राजू का जी भर गया और वो कहने लगा ,
- क्या लड़कियों वाली गाड़ी ले कर दी है. मोटरसाइकिल होनी चाहिए थी. लड़के लोग मेरी स्कूटी देख कर हँसते हैं और मज़ाक उड़ाते हैं. ना कोई लड़का मेरे साथ स्कूटी पर बैठता हैं ना कोई लड़की.

समझाने का कोई असर नहीं हो रहा था और राजू की मोटरसाइकिल की मांग तेज़ और ऊँचे सुर में हो रही थी. आखिर दूसरा लोन लेकर ये मांग भी पूरी कर दी. अब कॉलेज का शिमला का टूर आ गया तो राजू ने और पैसे मांगे. शकुंतला ने दे तो दिए पर अब हाथ तंग होने लगा लेकिन कोई सुनवाई नहीं थी. शिमला टूर के बाद राजू घर में एक दो सहेलियां भी लाने लगा तो खर्चा और बढ़ गया. पैसों की मांग बढ़ रही थी और राजू के नंबर घट रहे थे. राजू दिन ब दिन बेलगाम हो रहा था पर शकुन्तला कुछ नहीं कर पा रही थी. जब भी हाथ तंग होने का जिक्र करती तो राजू का पारा चढ़ जाता था. 

बैंक में पेट्रोल पंप वाला मुन्ना अक्सर काफी कैश जमा कराने आता था. इस बार वो पांच लाख जमा कराने लाया. शकुंतला ने दो बार गिने और डरते डरते एक पांच सौ का नोट अपने पैरों के पास गिरा दिया. मुन्ना को आवाज़ लगा कर बोली, 
- अरे मुन्ना भैया पांच सौ का एक नोट कम है इसमें. 
शकुन्तला का मन घबरा रहा था और डर भी लग रहा था. पर जब मुन्ना ने बिना ना नुकुर के एक पांच सौ का नोट और दे दिया तो शकुन्तला की जान में जान आ गई. उस ने एक गिलास पानी पिया और नार्मल हो गई. मुन्ना के जाने के बाद नोट उठा कर पर्स में डाल लिया. दो दिन इंतज़ार किया बैंक में किसी तरह की हलचल नहीं हुई. शकुन्तला आश्वस्त हो गई और फिर चार दिन बाद अगला शिकार करने के लिए तैयार हो गई. इस बार पांच सौ के दो नोट पार कर दिए.

फिर तो हर महीने चार पांच हज़ार के नोट गायब होने लगे और राजू की जेब खर्ची की पूर्ती होने लग गई. पर मैनेजर साब के पास शिकायतें भी आने लग गयी. मुन्ना भैय्या और मैनेजर साब ने एक दिन प्लान बनाकर नोटों के नंबर लिख लिए और छापा मार कर रंगे हाथों पकड़ लिया. शकुंतला को ससपेंड कर दिया गया. जांच के दौरान पता लगा की जिस दिन कैश कम होने की शिकायत होती थी उसी दिन या अगले दिन राजू के खाते में पैसे जमा हो जाते थे. जांच के बाद शकुन्तला को दोषी पाया गया और नौकरी से निकाल दिया गया.     

चाह मिटी चिंता मिटी मनवा बेपरवाह I
जाको कुछ नहीं चाहिए वा ही शहंशाह II - कबीर 



Monday, 17 October 2016

जुड़वां

नई दिल्ली में एक संसद मार्ग है जहाँ अनेक बैंक हैं. इनमें कुछ सरकारी, कुछ प्राइवेट और कुछ फिरंगी बैंक भी हैं. इतने बैंक होने के कारण बैंक कर्मचारियों की संख्या भी काफी है. कर्मचारी ज्यादा हों तो कुछ न कुछ घटनाएं होती रहती हैं. ये कर्मचारी दूर दूर से आते हैं यहाँ. कोई ट्रेन से, कोई बस से, कोई कार से पर अपने नरूला साब अपनी फटफटिया से ही आते हैं. पटेल नगर से शंकर रोड, बंगला साहिब और फिर संसद मार्ग. बस 25-30 मिनट में ऑफिस पहुँच जाते हैं.

अपनी फटफटिया स्टैंड पर लगा कर हेलमेट टांग देते हैं. पिछले पहिये के साथ लगे हुए बॉक्स में से लंच बॉक्स निकालते हैं. पिछली जेब से कंघी निकाल कर बाल सेट करते हैं, कमीज़ और पैंट की क्रीज़ बैठाते हैं और फिर लंच बॉक्स लेकर अंदर जाते हैं. दोस्तों से हाथ मिलाते हैं, महिलाओं को नमस्ते करते हैं और मैनेजर को साष्टांग प्रणाम करते हैं. उनकी राज़ी ख़ुशी जान कर फिर पूछते हैं,
- सर आज कौन सी सीट पर बैठना है ?
- नरूला आज आप पास बुक पर जाओ बहुत पेंडिंग पड़ी हैं. तुम्हारी राइटिंग भी ठीक है जाओ.
- जी सर, जी सर. एक रिक्वेस्ट है सर, प्लीज सर. वो ना घरवाली की डिलीवरी नज़दीक है तो सर 5-10 मिनट पहले निकलूंगा सर.
- वाह खुशखबरी है ! चलो ठीक है तुम पास बुक की सीट संभाल लो एक महीने के लिए. पर कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए ठीक है न ?
- जी सर, जी सर. सीट बिलकुल साफ़ मिलेगी सर एकदम टिच.

दो हफ्ते में ही नरूला जी ने ख़ुशख़बरी सुना दी कि जुड़वां बेटियां हुई हैं. मिठाई भी बाँट दी गई. आप तो जानते हैं बातें रुकती नहीं हैं चलती रहती हैं और बात चलते चलते मिसेज़ सुनीता टंडन तक भी पहुँची जो कि फ़ैमिली वे में थी. उन्हें लगा कि पास बुक सीट का फ़ायदा मिल सकता है. मिसेज़ सुनीता ने मैनेजर साब को अनुरोध किया, 
- सर कभी कभी डाक्टर के पास जाना होता है तो मुझे पास बुक की सीट दे दें आप.
- ठीक है सुनीता जी आप कल से पास बुक की सीट सम्भाल लो. पर कोई शिकायत तो नहीं आएगी ना ?
- आप निश्चिंत रहें सर ऐसा कुछ नहीं होगा.
नरूला साब को पास बुक से हटा कर डे बुक सेक्शन में भेज दिया गया और पास बुक की सीट पर मिसेज़ सुनीता टंडन को बिठा दिया. अगले महीने ख़ुशख़बरी आ गई कि मिसेज़ सुनीता टंडन के जुड़वाँ बेटियाँ हुई हैं साथ ही मिठाई भी बँट गई. अब नरूला साब वापिस पास बुकें बनाने में जुट गए. 

बातें तो चलती हैं और चलते चलते मिसेज़ भाटिया तक भी पहुंची. मिसेज़ भाटिया मैनेजर से मिली और अनुरोध किया कि मुझे पास बुक की सीट दे दी जाए. मैनेजर साब बोले,
- क्यूँ नहीं क्यूँ नहीं ! मिठाई ज़रूर खिला देना ! पर सीट का ध्यान रखना मिसेज़ भाटिया कोई शिकायत ना आए.
- बहुत बहुत शुक्रिया सर ! मैं पूरा ख़याल रखूँगी. 
कुछ दिनों बाद मिसेज़ भाटिया ने भी मिठाई भिजवा दी और साथ में संदेशा भी कि जुड़वाँ बेटियाँ हुई हैं !

मैनेजर साब ने नरूला साब को बुलवाया और बोले,
- ओ भई नरूला ये क्या हो रहा है ?
- जी सर ?
- जबसे आप को पास बुक की सीट पर लगाया था ब्रांच में हलचल शुरू हो गई थी. सभी लेडीज़ को यही सीट पसंद आ रही थी.
- जी सर ?
- और अब कोई लेडी यहाँ बैठने को तैयार नहीं है. ये भी तुम्हारी वजह से है. तुम्हारी जुड़वां बेटियां, फिर मिसेज़ टंडन की जुड़वां बेटियां और अब मिसेज़ भाटिया की जुड़वां बेटियां ! अब कोई भी लेडी यहाँ नहीं बैठना चाहती. अब आप ही पास बुकें बनाते रहो.
- नो सर नो सर ! मैं भी नहीं बैठना चाहता हूँ यहाँ पास बुक की सीट पर. अब अगर जुड़वां मेरे घर दोबारा आ गईं तो ?

जोड़ी 

Friday, 14 October 2016

नापसंद

मिठाई और नमकीन के प्लेटें टेबल पर सजा दी गईं थी. ठंडा पानी, कोल्ड ड्रिंक्स और चाय का इन्तजाम रेडी था. बस अब इंतज़ार था लड़के वालों का. आज उनसे पहली मुलाकात थी. टेलीफोन पर बताया गया था की उनकी तरफ से लड़के समेत पांच लोग आने वाले थे. आएँगे तो पता लगेगा कि लड़के के अलावा कौन कौन हैं.

मेहमान आए तो उनमें एक ही महिला थी याने लड़के की भाभी. उनके आलावा सभी सज्जन पुरुष थे. समधी ने समधी की नाप तौल की, लड़के के भाई ने लड़की के भाई की. और समधन ने समधन के बारे में पूछा तो पता लगा की लड़के की माँ का स्वर्गवास हो चुका है.

पानी, ठंडा और फिर चाय के बाद महफ़िल बर्खास्त हो गई और उसके बाद लड़के पर विचारों का आपसी आदान प्रदान हुआ.
- ठीक ही लग रहा है, नौकरी भी ठीक है, पिताजी बोले.
- मुझे तो बड़ा पसंद आया, मम्मी बोली. और सुन कुक्की तेरी तो सास भी नहीं होगी ! रोज़ रोज़ की चिकचिक ख़तम. तूने वो कहावत सुनी है ना - 'या ते सस चंगी होवे या सस दी फोटो टंगी होवे' ( या तो सास अच्छी हो वर्ना उसकी फोटो टंगी हो ) !

बात में दम था पर फैसला करने से पहले इस पर गंभीरता से विचार किया जाएगा. पर तब तक दूसरा पैगाम आ गया. भई मार्किट में ना लड़कों की कमी है ना लड़कियों की क्यूँ जी ?

इसलिए अगले सन्डे को फिर से मिठाई और नमकीन के प्लेटें टेबल पर सजा दी गईं. पर इस बार आने वाला अकेला लड़का ही था. असल में उन्हीं की तरफ से अनुरोध था की पहले लड़का लड़की से शाम को दस मिनट के लिए कहीं बाहर मिलना चाहता है. उलझन हो गई ये कैसे होगा. यही रास्ता निकला की मजनूं मियाँ आ जाएं और दोनों आपस में बात कर लें और उस वक़्त कोई साथ नहीं होगा.

लड़का आया भी देर से और मिठाई चखना तो दूर पानी का गिलास नहीं छुआ और कुक्की से बोला,
- देखिये जी मैं तो मंगलवार का व्रत रखता हूँ और कनाट प्लेस के हनुमान मंदिर में दर्शन करके ही व्रत खोलता हूँ. ट्रैफिक की वजह से लेट हो गया. आपने कुछ पूछना है?

कुक्की के मन में आया की एक रहपट मारूं इस कमबखत के गाल पे. पर भगवान ने हाथ रोक लिया ! सारी इच्छाएं कहाँ पूरी करता है भगवान. लड़का फटफटिया लेकर निकल गया और दुबारा कभी नज़र नहीं आया.

सिलसिला अगले सन्डे भी जारी रहा. मम्मी पापा कहाँ छोड़ने वाले थे. कुक्की तैयार थी, टेबल तैयार कर दी गई थी और बस मेहमानों का इन्तज़ार था. समय पर सारे आ गए और सबका आपस में परिचय करा दिया गया. रुक रुक के और अटक अटक के बातचीत जारी रही. लड़के की मम्मी ने बताया कि पढ़ाई में बचपन से ही तेज रहा है. लड़के के पप्पा ने बताया कि बैंक वाले इसके काम से बहुत ख़ुश हैं. और तनख्वाह भी अच्छी है. लड़के ने जेब थपथपाई और जेब में हाथ डालकर बैंक की पासपबुक निकाल ली. कुक्की की तरफ देखकर बोला,
- आप भी देख सकते हैं बैलेंस पाँच डिजिट से नीचे नहीं जाता. और शॉपिंग के लिए क्रेडिट कार्ड भी है ये रहा !

कुक्की ने तुरंत मन ही मन इस बैंक वाले लड़के को डिसमिस कर दिया. अब देखते हैं कि अगले संडे कौन सा कनकौवा आता है ?

सब रेडी है 



Tuesday, 11 October 2016

Dussehera

Dussehra or Vijaydashmi( दशहरा / विजयदशमी ) is celebrated on tenth day of the month of Ashvin of Hindu calendar which falls in October / November every year. The day marks victory of Lord Ram over Ravan who had abducted Sita wife of Lord Ram. On this day or rather evening effigies of Ravan, Kumbhkarn and Meghnath are burnt as victory celebrations. With some variations Dussehra is celebrated all over India & Nepal.

In Delhi these effigies are built mainly in Tatarpur area near Rajouri Garden. The size of effigies may range from 5 feet to 100 feet or even more. These effigies are packed with crackers & sparklers so as to give a magnificent display while burning. Cost of an effigy may range from ₹ 5k to 100k or even more depending on size & number of crackers / sparklers placed inside.
Some photos:

Getting ready for Dussehera 

Work in progress 

Semi finished tops to which arms are to be attached

Strong & proportionate legs are required to take load of whole effigy 

Standing skirt & lying top 

Head is getting ready 

There is his face with powerful moustache

Teeth getting final touch

Meantime in an residential area artisans from Teergaran, Meerut have brought three effigies of 15', 13' & 11' for installation
Ravana going up

Largest of the three being installed 

Darkness descends 

Grand finale



Sunday, 2 October 2016

Hampi - a World Heritage Site: Part 3 of 3


Iconic stone chariot of Hampi

Hampi is situated on the south bank of the river Tungbhadra approx 350 Km from Bangalore. Nearest railway station is 15 km away in Hospet in Bellary district of Karnataka. Nearest airport is in Hubli about 145 km. The river was earlier known as Pampa which became Hampe in Kannada & got anglicised to Hampi.

This village Hampi is situated in erstwhile capital city of Vijaynagar Empire which covered vast tracts of southern India. The Empire was established by two brothers Harihara ( or commonly known as Hakka ) & Bukka Raya in 1363 under guidance of their guru Madhava Vidyarnya. The mighty Empire in its peak time extended from river Krishna to Kanyakumari and from Goa to Odisha.

In ancient times the area was known as Pampa-kshetra, Kishikindha-kshetra or Bhaskara-kshetra. Later it has also been mentioned as Virupakshpura as Virupaksha was the patron deity of Vijaynagara Kings. 

The Empire suffered a major defeat in the year 1565 at the hands of confederation of Deccan sultanates. Thereafter the Empire weakened considerably & collapsed by 1646.   

Hampi is one of the UNESCO World Heritage sites in India. It is a charismatic capital town even in ruins. Large boulders strewn across the landscape, in valleys & on surrounding hills make the backdrop of Hampi unique. Spread around are hundreds of small & large monuments. These include magnificent temples, palaces, pavilions, ancient markets, army quarters, aqua-ducts & water tanks. The list is of monuments in Hampi is endless. This may be called an open museum of a large prosperous capital city which saw glorious days for two centuries from 1363 AD to 1565 AD. 

Trade with foreign countries had increased considerably at the time via Calicut port. Many traders & visitors have recorded about the wealth, culture, architecture, food & life style prevalent at the time in Vijaynagara Empire. Some of them are Abdul Rezzak from Herat who visited in 1443, Nicolo Conti of Italy who visited during 1420, Portuguese traveller Domingo Paes who stayed in the Empire during 1520-22, Portuguese horse trader Fernao Nuniz who was here in 1536-37, Cesare Frederici of Italy who visited in 1567 and Colonel Colin Mackenzie of Scotland who visited in 1799.  

If you love history & have strong legs as they say locally, you can spend weeks in Hampi. The ruined Capital is spread over hilly terrain of 26 sq. km. Bicycles, motorbikes, tonga, golf carts etc are also available in the town on rental basis for excursions. Every turn of the way & every hill holds a surprise for you. 

Some photos: 


9 storied Gopuram leads to huge Virupaksha Temple complex which has grown from a cluster of small temples of 7th century AD. It is said to be the oldest functional temple in Hampi. On either side of the approach road is Hampi Bazar under restoration

Pillars in Vittala Temple complex are studded with engravings & carvings based on stories of Ramayana & Mahabharata. Here Krishna has taken away the clothes of womenfolk bathing in the river & has climbed up a tree. They are requesting him to return the clothes



Bali & Sugriva

Lakshmi Narsimha

Counting the teeth of the horse before buying from a Persian horse trader 

Persian horses were premium items for the elite

Their beards, head gears & clothing suggests that they were from South / Central Asia 

Riding a mythical creature. This creature has been used as a emblem of the Empire

Snake charmer

Tiger attacks 

Lord Krishna playing flute & the cows listening with rapt attention

Krishna enjoying butter while mother Yashoda is churning 

Training in progress
Gajjela Mandapa. Not much is known about the purpose & usage of many such stand alone structures

A unique engraving 

Front view of Stone Chariot. The two elephants placed in front of chariot are a later date addition. Originally the chariot was attached to horses

Side view of iconic Stone Chariot used as logo by Karnataka Tourism. All around the platform are mythical battle scenes

Ranga Mantapa - a hall for festivities.  Beautiful decorations on plinth stones, pillars & ceiling are seen in geometrically  perfect design

Rider on mythical creature at the entrance

These thin stone pillars are hollow inside & if struck with wooden stick, generate musical sounds. Dozens of them were said to have been played simultaneously during festivities 

Well laid wide streets & corridors. Another temple & market

Cool corridors on raised platforms

Madhava Ranga Temple constructed in 1545 

Ganigitti Jain Temple. An 'oil women's' temple built in 1386. As per inscription on the Deep Stumbh the temple was commissioned by Irugua (Iruguppa) commander-in-chief of King Harihara II. It is dedicated to Lord Kunthunath the 17th Jain Tirthankara. There is no idol inside the temple.

Some structure on the banks of Tungbhadra get submerged during monsoon. Many more might have sunk in sand & mud over centuries

Inside the Bhima Gate. On the walls are engravings of Draupdi & slaying of Kichchika & Dushasana by Bhima

Bhima Gate. Just in front of entry is another stone wall which is in fact an obstruction for intruders. After entering the gate one turns right, then left & again left to enter the city. 


View from right side of Vittala Temple complex. There are hundreds of such standing pillars & hundreds of them in broken state strewn all over Hampi. Enormous amount of funds & man-days must have gone in to sculpting these. Boulders small & large, give a unique backdrop    

Talarighatta Gate of the capital city Vijayanagara

Entry to the Vittala temple complex. Inside are extravagant show pieces, magnificent works of art on pillars, walls, ceilings & the iconic stone chariot  

For more photos of Hampi you may please click on the following links:

1. http://jogharshwardhan.blogspot.com/2016/08/hampi-karnataka-world-heritage-site.html
Hampi, Karnataka -a World Heritage site: part 1 of 3

2. http://jogharshwardhan.blogspot.com/2016/09/hampi-karnataka-world-heritage-site.html
Hampi - a World Heritage site: Part 2 of 3