जीवन का पचहत्तरवां साल पूरा हो गया तो सोचा कि गुजरे दिनों की समीक्षा कर ली जाए। जीवन की रफ़्तार कभी धीमी थी और कभी तेज़ ! क्या कुछ अनुभव हुए उस पर नज़र मार ली जाए।
हम सब एक छोटी सी दुनिया के निवासी हैं पर हम में से हर एक की अपनी अपनी दुनिया है। कोई चाँद तारे चाहता है तो कोई जमीन पर ही रहना चाहता है। अपनी अपनी इच्छाएं , सपने , लोभ , मोह , भावनाऐं और अनुभव हमें अलग-अलग व्यक्तित्व दे देते हैं।
ऐसी ही दुनिया में मैं भी पचहत्तर साल पहले अपनी अलग दुनिया ले कर आ गया। इस यात्रा की एक झलक प्रस्तुत है!
| चलो चलें घूमने! कारवाड़ वॉरशिप म्यूजियम, कर्नाटक। इस पुराने सोवियत जहाज का नाम INS Chapal है |
जन्म देवलाली, महाराष्ट्र में हुआ। वहां पिताजी मिलिट्री डेरी फार्म में कार्यरत थे। इस विभाग में तीन चार साल में ट्रांसफर हो जाना आम बात थी और वो इस तरह से हुईं:
देवलाली > नाशिक > अहमदनगर > मुंबई > सिकंदराबाद > जबलपुर > लखनऊ > कानपुर > मेरठ
बहुत मज़ा आता था नई जगह जाने में - नया शहर , नया स्कूल , नए दोस्त , नए पड़ौसी ! ट्रांसफर होने पर शहर के बाहर कैंट में पुरानी सरकारी बैरकों में क्वार्टर मिला करते थे। वहां कैसे कैसे पड़ोसी मिले : कहीं बनर्जी , कहीं मुथुस्वामी , कहीं अंसारी , कहीं खुराना और कहीं वर्मा ! कभी इडली दोसे की सुगंध और कभी मछली की। इस बदलती दुनिया में रहने का नतीजा ये हुआ कि एक तो घुमक्कड़ी जीवन घुट्टी में शामिल हो गई ओर दूसरे सामाजिक दृष्टिकोण 'न काहु से दोस्ती न काहु से बैर' जैसा बन गया।
पिताजी की नौकरी का आख़री पड़ाव मेरठ था। इस दौरान नया अध्याय शुरू हुआ - मेरी पंजाब नेशनल बैंक में नौकरी लग गई और पहली पोस्टिंग मिली संसद मार्ग नई दिल्ली में। वाह दिल्ली में !
जब मैनेजर बने तो जनवरी 1986 में पोस्टिंग हुई सिल्चर और तेज़पुर (आसाम), फिर वापिस नजफगढ़ , जनकपुरी और जनपथ , नई दिल्ली में काम किया। .ट्रेनिंग के लिए पुणे , कोटा , जयपुर और देहरादून भी जाना हुआ। ऑडिट में पानीपत , भदोही , वगैरह घूमा। चीफ मैनेजर बने तो आगरा , रूड़की , दिल्ली और आखिर में मुज़फ्फरनगर से 2011 में रिटायर हो गए। बीच बीच में क्षेत्रीय कार्यालय, अंचल कार्यालय और प्रधान कार्यालय नई दिल्ली में भी काम किया।
रिटायर होने के बाद कुछ समय दिल्ली में रहे पर फिर वापिस मेरठ में डेरा डाल दिया।
| 1. चलो चलें घूमने - ताड़केश्वर, पौड़ी गढ़वाल |
घुमक्कड़ी
नौकरी के दौरान भी शौक कायम रहा। घूमने के लिए नौकरी के दौरान चार बार मोटर साइकिल खरीदी - राजदूत , बुलेट , थंडरबर्ड और एनफील्ड क्लासिक 500। हरिद्वार , ऋषिकेश , लैंसडाउन , जयपुर और पुष्कर तक की सैर बाइक पर हो जाती थी। फिर कार - पहले मारुती 800 और फिर एस्टीम खरीदी। कार में बच्चों के साथ और दूर तक यात्रा जैसे मसूरी , चंडीगढ़, पौड़ी गढ़वाल , गुप्तकाशी वगैरा आसानी से हो जाती थी।
रिटायरमेंट के बाद ख़याल आया कि भारत दर्शन करना है तो रॉयल एनफील्ड क्लासिक 500 बाइक पर। लेकिन जब आसपास जैसे कि पुष्कर और लांसडाउन घूमे तो महसूस किया की भारत दर्शन की लम्बी यात्रा में बाइक चलाना अब मुश्किल रहेगा। नाज़ुक कमर , धूल - मिट्टी और बढ़ता हुआ ट्रैफिक परेशान करता था और फिर दो सवारियों का सामान रखने की जगह भी कम थी।
बस बाइक छोड़ कर चार चक्के वाली का ही सहारा लेना पड़ा। डीज़ल की फोर्ड ईको स्पोर्ट ली जिसमें राजस्थान , गुजरात , बंगलोर और कन्याकुमारी तक के चक्कर लगे। आजकल टाटा पंच की सवारी हो रही है। 2023 में मेरठ - बैंगलोर - मेरठ यात्रा टाटा पंच पर संपन्न हो चुकी है। इसके अलावा छोटी मोटी यात्राऐं तो चलती रहती हैं।
ऐसा कोई हिसाब तो नहीं रखा की अब तक कितने किमी गाड़ी चलाई होगी पर अंदाजा है की यह आंकड़ा लगभग दो लाख किमी से ज्यादा ही होगा। मोटा मोटा हिसाब इस तरह है कि: मारुती 800 लगभग 120,000 किमी , एस्टीम लगभग 65,000 किमी और ईको स्पोर्ट लगभग 70,000 किमी चलाई। टाटा पंच का मीटर अभी लगभग 20,000 किमी दिखा रहा है। ये कारें बीच बीच में बच्चों ने भी चलाईं।
और हाँ इस हिसाब में मोटरसाइकिलों की यात्रा शामिल नहीं की और सन 2000 से 2011 तक जो बैंक की ऑफिशल कार भी इस्तेमाल की, वो भी शामिल नहीं की हैं !
जहाँ तक विदेश यात्रा का सवाल है वो अब तक केवल एक ही हुई वो भी 1979 में। उन दिनों रुसी भाषा में डिप्लोमा किया था तो भारत - सोवियत मैत्री संघ की ओर 45 दिन की यात्रा का न्योता मिला। इस में ताशकंद , मास्को, लियो टॉलस्टॉय का गांव और सेंट पीटर्सबर्ग (उस वक़्त लेनिनग्राद कहलाता था) देखा।
वैसे भारत में देखने लायक बेहिसाब है और अभी भी काफी कुछ देखना बाकी है! अभी समय है , हौसला है और टाटा पंच भी है - चलाते रहेंगे !
| 2. चलो चलें घूमने - चौंसठ योगिनी मंदिर , मितावली , जिला मोरेना , मध्य प्रदेश |
न काहु से दोस्ती न काहु से बैर
तरह - तरह के शहर देखे और वहां तरह - तरह के बाशिंदे मिले। चूँकि ट्रांसफर होती ही रहती थी तो ज्यादातर लोगों से स्थायी दोस्ती नहीं बन पाई। जब तक दोस्ती होती तब तक तो नई ट्रांसफर आ जाती थी। और इन बदलाव की वजह से यूँ लगता था की ज़िन्दगी एक लम्बी सी यात्रा है और हम मुसाफिर ही तो हैं ! (शब याने रात )
इक शब के मुसाफिर हैं, हम तो, ये दुनिया मुसाफिर खाना है, न अपनी कोई कहानी है, न अपना कोई अफ़साना है
साथ ही भांत - भांत के लोगों के साथ रहना और काम करने का मौका मिला तो सब अपने जैसे ही लगते थे। उम्र के साथ साथ हर इंसान की वही कहानी चलती रहती है - पहले पढ़ाई , फिर नौकरी , फिर शादी और फिर बच्चों की फ़िक्र में रहता है और इसलिए भी सब अपने जैसे एक ही कश्ती के सवार लगते थे। बस कश्तियों के रंग फर्क थे। इन हालात के चलते कभी किसी की जात या धर्म से नफरत नहीं महसूस की।
भारत में तरह तरह का खाना पीना , भाषाएँ , वेशभूषा , त्यौहार , रेगिस्तान , समंदर और बागान देख कर बहुत मज़ा आता है। यह सब मिला कर ही तो हमारी संस्कृति है। इसमें मिलावट या घालमेल कर के एकरस बनाने की कोशिश सही नहीं लगती।
| 3. मजबूत जोड़ ! ग्वालियर के किले में झरोखे से ताका-झांकी ! |
चाय, समोसा और लड़की
हमारे पिताजी अपने माता - पिता की अकेली संतान थे, उनका कोई भाई बहन नहीं था। पिताजी जब रावलपिंडी में नौकरी में थे तब उन की सगाई हो चुकी थी। बटवारे के समय वे सरकारी नौकरी के चलते सरकारी हवाई जहाज में मुंबई पहुँच गए। जबकि हमारी माँ का परिवार बड़ा था। उन के परिवार में हमारे नानी नाना और उन के पांच बच्चे थे। ये सभी सातों 1947 के बटवारे में हिंदुस्तान की तरफ आती बिना छत की मालगाड़ी में किसी तरह कूद कर छुप गए। रास्ते में काफी खून खराबा हुआ और केवल माँ और एक छोटी बहन सलामत पहुंची, बाकियों का पता नहीं लगा। दोनों बहनें किसी तरह मुंबई पहुंची। वहां उनके मामा ने पिताजी को ढूंढा और मौसी के लिए भी लड़का ढूंढ कर बड़ी सादगी से शादियां कर दीं। एक बड़ी त्रासदी के बाद जीवन आगे चल पड़ा।
हम सात भाई बहन हैं - दो भाई और पांच बहनें। मेरी नौकरी लगने के साथ ही शादियों का सिलसिला चालू हो गया। जैसा की आमतौर पर होता है लड़के लड़की के घर देखने आते हैं , हमारे साथ भी वही हुआ। लड़का आएगा तो तैयारी भी करनी होगी - चाय , समोसा , बर्फी , रसगुल्ला सभी कुछ। मुलाकात होने के बाद फिर जवाब मिलने का इंतज़ार करना होगा। जवाब 'हाँ' हो तो जल्दी खबर मिलेगी और 'न' हो तो जवाब आता ही नहीं महीने तक भी। ऐसे केस में दुबारा चाय समोसा वगैरह आएँगे और सब उम्मीद ले कर तैयार रहेंगे !
मन में विचार आया की पता नहीं पुरातन काल में स्वयंवर कैसे हुआ करते थे ? चाय समोसे पर ?
बहरहाल , खुद का विचार पक्का हो गया कि दस मिनट में चाय समोसे खा के किसी लड़की से हाँ या ना नहीं करनी। और फिर ऐसे ही विचारों का साथी भी मिल गया।
वैसे ये भी मज़ेदार बात है कि हम सात भाई बहनों के 13 बच्चे हुए और उन सब की शादियां भी हो चुकी हैं। उन 13 के अभी तक तो 9 बच्चे हैं, आगे भगवान भरोसे !
बैंड, बाजा और बारात
1980 में दशहरे वाले दिन बिना बैंड बाजे के गायत्री भट्ट से शादी हो गई। शादी में किसी जन्मपत्री कोई काम नहीं था। हम दोनों ही पी एन बी की संसद मार्ग शाखा में लगभग एक साल एक साथ कार्यरत थे। मिले, बातचीत हुई और सहमति बन गई।
शादी में लगभग 30 बाराती थे। पंडित जी को कह दिया गया था की शादी में पंद्रह मिनट से ज्यादा समय ना लगाएं। उत्तराखण्ड के पंडित जी गायत्री के रिश्तेदारी में ही थे सो सब काम आसानी और तत्परता से संपन्न हो गया। यहाँ तक कि फोटोग्राफर ने आ कर फिर से फेरे रिपीट करवाए ताकि फोटो ली जा सके !
इस लव मैरिज की चर्चा काफी दिनों तक चलती रही।
कालांतर में दिल्ली में फ्लैट खरीद लिया, दो बेटे हुए और पारिवारिक सिलसिला चल पड़ा। दोनों बेटे अब बैंगलोर में सेटल हैं। और हम अब निश्चिन्त हो कर घूमते रहते हैं।
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| 4. चाय - समोसा 😀 |
जियो और जीवन दो
1996 -97 में पोस्टिंग प्रधान कार्यालय दिल्ली में थी। उन्हीं दिनों घर के पास पार्क में भारतीय योग संस्थान ( जियो और जीने दो इसी संस्था का प्यारा सा स्लोगन है ) की ओर से योग शिविर लगा। बड़ी हैरानी हुई जब पहले ही दिन साठ बच्चे , बुड्ढे और जवान पार्क में दरियाँ बिछा कर हाथ पैर हिलाने लग गए। पहले तो विचार आया की इस छोटी से दरी पर लोट - पोट होने से क्या स्वस्थ रह सकते हैं ? पर अगले दिन हमने भी दरी बिछा दी।
एक ही हफ्ते में साधकों की संख्या घट कर आधी हो गई। पर हमने अभ्यास जारी रखा। तीन महीने बाद योगाभ्यास का शरीर पर असर समझ में आने लगा। दरी पर लोटपोट सही निकली। दिसंबर की ठण्ड में साधकों की संख्या केवल पांच रह गई थी।
पर साब हम दोनों ने जो योगाभ्यास पकड़ा तो आजतक छोड़ा नहीं। टूर पर अगर निकलते हैं तो योग की किट साथ ही चलती है। साल में 365 दिन तो योगाभ्यास नहीं हो पाता, टूर पर या शादी ब्याह में शामिल होने पर कई दिन योगाभ्यास मिस भी हो जाते हैं।
हम तो आपको भी सलाह देंगे कि योग सीखें पर अच्छे गुरु या संस्था से। भारतीय योग संस्थान का दैनिक प्लान बहुत अच्छा है:
शारीरिक अभ्यास- खड़े हो कर , बैठ कर , पीठ के बल लेट कर और पेट के बल लेट कर लगभग 30 से 35 मिनट प्राणायाम - 10 से 15 मिनट तक। अंत में ध्यान और दैनिक प्रार्थना।
इतना अभ्यास काफी है अगर आप नियम से करें और साथ में खाने का भी ख्याल रखें तो और भी अच्छा रहेगा। ये है 'जियो और जीवन दो' का सच !
| 5. वृक्ष आसान |
मैं कौन हूँ ?
रिटायर होने से कुछ साल पहले दिल्ली विश्विद्यालय की एक प्रोफेसर ने गायत्री को बताया था कि उसने विपासना का दस दिन का शिविर किया और आप भी एक बार जरूर जाएं। रिटायर होने के बाद समय मिला तो इंटरनेट पर खोज पड़ताल की। पता लगा की विपासना शिविर बौद्ध दर्शन पर आधारित ध्यान पद्धति सिखाता है। दस दिन के शिविर में ट्रेनिंग दी जाती है। श्री सत्य नारायण गोयनका जी द्वारा यह कार्यक्रम कुछ बरस पहले आम लोगों के लिए शुरू किया था। अब तो इसके ट्रेनिंग सेंटर दुनिया भर में खुल गए हैं।
दस दिन का शिविर—बिना मोबाइल, बिना बातचीत, बिना किताब, बिना अखबार - सिर्फ़ अपने साथ रहना। यह बात पहली बार में थोड़ी अजीब लगी, पर जिज्ञासा जीत गई। 2012 में देहरादून सेंटर में दस दिन के शिविर में बुकिंग करा दी। पहले दो-तीन दिन बहुत मुश्किल लगे—मन भाग रहा था, पीठ में दर्द, घुटने में दर्द, सवाल उठ रहे थे क्या हमने ठीक किया! पर धीरे-धीरे गुरु के निर्देशन में अभ्यास बढ़ा, मन थोड़ा ठहरा, साँसें गहरी हुईं, और शरीर के भीतर संवेदनाएँ महसूस होने लगीं।
शिविर के बाद और आगे जानने की जिज्ञासा हुई तो उसके बाद तीन और शिविर देहरादून , पुष्कर और हस्तिनापुर में किये। इस विषय पर बौद्ध दर्शन की किताबें इकट्ठी की और यूट्यूब पर लेक्चर सुने।
सरल भाषा में कहें तो इन शिविरों में अपने आप से बात करने का मौका मिलता है। अपनी साँस को देखना , अपने शरीर पर होती संवेदनाओं को देखना पर किसी तरह की प्रतिक्रिया ना करना। मन में विचार आएं तो आने देना पर प्रतिक्रिया नहीं करनी।
लगातार मैडिटेशन का अभ्यास करना मन की बैचेनी , विचलन , मानसिक तनाव कम कर सकता है।
'मैं कौन हूँ?' का जवाब मुझे अब भी पूरा नहीं मिला। पर धीरे-धीरे समझ आ गया कि—"मैं मेरा शरीर नहीं, मैं मेरे विचार नहीं, मैं मेरी भावनाएँ नहीं। मैं तो वह हूँ जो इन सबको देख रहा है।"
| 6. पढ़ाई के दिन फिर आ गए |
चलो पाठशाला
अपने आप बौद्ध दर्शन पढ़ कर समझ लेना मुश्किल लग रहा था। इसलिए सोचा कि फिर से किसी कॉलेज के विद्यार्थी बन जाएं और बौद्ध दर्शन की पढ़ाई शुरू करें।
1972 में कॉलेज छोड़ने के बाद 2020 में एम. ए. (बुद्धिस्ट स्टडीज़) में दाखिला ले लिया। इस बीच कोविड 19 जोर पकड़ गया और पढ़ाई कॉलेज में न हो कर ऑनलाइन हो गई।
ऐसी ऑनलाइन पढ़ाई तो कभी नहीं की थी। कभी हमारा इंटरनेट खराब कभी टीचर का , कभी टीचर की आवाज़ नहीं आ रही तो कभी टीचर नहीं दिख रही ! कभी पीपीटी नहीं चल रहा पर टीचर आगे बढ़ती जा रही ! किसी छात्र के स्क्रीन पर गाने की आवाज़ आ रही , कभी किसी छात्र के घर का नज़ारा दिखाई पड़ रहा !
ये भी एक नया मजेदार कॉमिक शो जैसा अनुभव था। कोई प्रश्न पूछना हो तो मुश्किल हो जाती थी। अगर प्रश्न चैट पर डालें तो कई बार टीचर अपने लेक्चर के चलते चैट पढ़ नहीं पाती थी। चलती क्लास में म्यूट बटन का प्रयोग भी बाद में पता चला !
खैर , तीन सेमेस्टर के पेपर ऑनलाइन हुए केवल फाइनल सेमेस्टर का पेपर देने कॉलेज जाना पड़ा। ये भी एक नया अनुभव था। चारों सेमेस्टर के नंबर जोड़ लिए गए - और फिर? फिर पप्पू पास हो गया - एम. ए. की डिग्री मिल गई सर जी !
अब लगता है कि सीखने का जूनून कभी उम्र नहीं देखता।
एही पस्सिको - आओ और देखो
विश्वविद्यालय से डिग्री तो मिल गई पर बौद्ध दर्शन का पूरा ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ। बस एक खाका या आउटलाइन ही हाथ लगी। चलो कुछ तो मिला - बुद्ध की जीवनी , बुद्ध के समय का इतिहास और मुख्य उपदेशों की जानकारी। ये मुख्य उपदेश थे
- चार आर्य सत्य , जीवन के तीन लक्षण , पांच स्कंध , आष्टांगिक मार्ग और द्वादश निदान। इनकी गहराई और रोजमर्रा के जीवन से सम्बन्ध, अच्छी तरह से स्पष्ट नहीं हुआ।
विपासना केंद्र के शिविर में मैडिटेशन की तकनीक सीखी थी। पर फिर भी खुद पढ़ाई करना जरूरी लगा। नया दौर शुरू हो गया - कुछ और किताबें मंगाई , कुछ इंटरनेट से डाउनलोड की और कुछ के प्रिंट निकलवाए। मैडिटेशन के अभ्यास के साथ साथ पढ़ाई भी जारी राखी।
इस महायात्रा में गायत्री का भी पूरा सहयोग मिल रहा है। कई मुद्दों पर हम आपस में बातचीत कर लेते हैं और सन्दर्भ ढूंढने में एक दूसरे की मदद कर देते हैं। हौले हौले ज्ञान बढ़ता जा रहा है और जीवन में सरलता आती जा रही है।
वैसे भी भगवन बुद्ध कहते थे कि उपदेश सुनो , समझो और न समझ आने पर प्रश्न पूछो। उपदेशों को सुन कर या पढ़ कर अनुभव में लाओ। अगर ठीक लगे तभी अपनाओ। अन्धविश्वास नहीं अपने अनुभव को आधार बनाओ। ये बात आजकल के गुरु लोग शायद नहीं कह पाएंगे।
सफर जारी है। एही पस्सिको ही असली खोज है।
| 7. चलो चलें घूमने - नागार्जुन कोण्डा म्यूजियम , आंध्र प्रदेश |
समारोह में डिग्री मिल जाने के बाद हमारी प्रोफेसर से कई बार बात हुई। उनका कहना था कि आपको इतना शौक है पढ़ने का तो आप और आगे पढ़ो और PhD करो। हम तुम्हारे साथ हैं। सुन कर अच्छा भी लगता था और झिझक भी होती थी। पचास साल बाद पढ़ाई और उसके बाद थीसिस की लिखाई बाप रे बाप ! गायत्री ने भी जोश दिलाया और तब ओखली में सिर दे दिया !
फिर सुभारती देहरादून में टीचर्स के साथ लम्बी बातचीत हुई और एक नया अध्याय शुरू हुआ। उन्होंने मेरा शोध का विषय तय कर दिया : Buddhism During the Reign of Emperor Ashoka (c. 268 BCE to 232 BCE)
सुनते आए हैं की उम्र एक नंबर ही है और अब हम चले इसे सिद्ध करने। ओखल में सिर दे ही दिया है तो अब मूसल से क्या डरना !
शोध कार्य जारी है
कुछ दिनों बाद फोन आया की नियमानुसार आपको एक सेमेस्टर में एम ए के छात्रों को पढ़ाना भी है ! सिर मुंडाते ही ओले ! ये भी काम ऑनलाइन करना था - क्लास में आठ छात्र छात्राएं , छे म्यामार याने बर्मा में और दो विएतनाम में।
ये सारे भगवा वस्त्र वाले भिक्खु और भिक्खुणियां जिनके सिर मुंडे हुए और चेहरे गंभीर ! उन्हें हिंदी नहीं आती और उनका इंग्लिश का उच्चारण समझने के लिए बड़े ध्यान से सुनना पड़ता था। वो पढ़ रहे थे या मैं ?
ऑनलाइन क्लास में पढ़ने के लिए पीपीटी चाहिए जो बनाना नहीं आता था। क्लास में पीपीटी के साथ साथ पढ़ाना भी मुश्किल लग रहा था। शुरू में तो पड़ोस में बच्चों से पीपीटी बनवाया जिस पर वो मुस्करा कर कहते - ये बनाना तो बहुत आसान है। मुझे पढ़ा रहे थे ! चौथे लेक्चर के बाद पीपीटी खुद ही बनाना शुरू कर दिया।
पढ़ाने का कोटा पूरा कर के बड़ी ख़ुशी हुई।
अब आदेश आया कि आपको अपने टॉपिक से सम्बंधित दो रिसर्च पेपर लिखने हैं और उन्हें टीचर की स्वीकृति के बाद किसी अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित कराने हैं। कमर कस ली और ये भी हो गया।
अब दो पेपर टीचर द्वारा स्वीकृत होने के बाद किन्हीं दो अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार में पढ़ने हैं। ये भी किया - एक चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ में और दूसरा ऑनलाइन बोधगया में।
अब ये हालत है की पढ़ाई में समय कम लग रहा है, लिखाई में ज्यादा। सोते जागते थीसिस नज़र आ रही है। अर्थात फुर्सत नहीं है - "सावधान थीसिस लेखन जारी है" !
जीवन में सरलता - LET GO
विपासना कैंप भी कर लिए , एम ए भी कर ली , पढ़ाई और मैडिटेशन की प्रैक्टिस भी जारी है तो सवाल उठता है कि अब तक क्या हासिल हुआ ? क्या स्वयं में कुछ अंतर आया ?
सरल से शब्दों में कहें तो बुद्ध का कहना है कि अपने अंदर झांको और देखो किन चीजों से चिपके हुए हो, उन्हें छोड़ो - LET GO. चिपकन घटेगी तो मन की शांति बढ़ेगी।
ये चिपकना क्या है ? चिपकना वो है जो हम बार बार सोचते या कहते या करते हैं। मसलन - मेरे रूपरंग का जवाब नहीं , मेरे विचारों का मुकाबला ही नहीं , मैं दस दिन बिना बोले कैसे रह सकता हूँ ? ,मेरी इच्छा है की बड़ी से बड़ी कार खरीदूं , मैं क्रोध करता हूँ तो सही करता हूँ , एकाध पेग के बगैर डिनर क्या करना ?, वगैरा वग़ैरा। ये सब संस्कार या आदतें , अहंकार के अंश हैं जो हमें सरलता से दूर ले जाते हैं।
अगर हम इन्हें छोड़ना सीखते हैं तो क्या होता है ?
क्रोध कम होता है- पता चलता है, क्रोध से कोई समस्या हल नहीं होती है।
इच्छाएँ घटती हैं- बड़ी कार, बड़ा घर, बड़ा 'मैं' और उस से जुड़ा सब कुछ, ज़रूरी नहीं है।
दूसरों से तुलना बंद होती है- जो मेरे पास है, वही काफी है।
"मैं, मेरा, मुझे" की जगह "हम" आ जाता है।
दस दिन का मौन असंभव नहीं लगता, बल्कि सुकून देने वाला लगता है।
इसके बाद अब हमें कैसा लगता है?
अब लगता है की जीवन धीरे-धीरे सरल और सहज हो गया है। उदाहरण के लिए: कपड़े स्वच्छ और सादे, खाना हल्का और पौष्टिक, मन शांत और विचार स्पष्ट, सांसे गहरी और आराम से।
फिर मिलते हैं
यात्रा की झलक को यहीं विराम। इस मौके पर परिवार के सदस्यों , रिश्तेदारों , मित्रों , अड़ोसी पड़ोसियों और पुराने सहयोगियों से ढेर सारी शुभकामनाएं मिलीं और बहुत आनंद आया।
आप सभी की मंगल कामना के साथ धन्यवाद, फिर मिलेंगे !
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11 comments:
https://jogharshwardhan.blogspot.com/2026/07/75.html
काफी दिलचस्प और संघर्ष मय जीवन रहा।संघर्ष करते-करते जीवन की काफी ऊंचाइयों पर भी पहुंच गए। भगवान आपकी दीर्घायु हो और इसी तरह आप हंसते खेलते जिंदगी में आगे बढ़ते जाएं।
लिखते तो हमेशा ही अच्छा।
Congratulations
Beautiful narration of journey of three quarters of life. Happy 75th birthday & wish you a long, happy and healthy life to come ahead
बहुत खूब !
60 साल कुछ दुनियादारी कुछ ज़िम्मेदारी यानी तक़रीबन एक सी सबसे मिलती जुलती ज़िन्दगी कुछ उतार चढ़ाव के साथ
आपका 60 साल के बाद 15 सालों में किए गये प्रयास व उपलब्धियों बहुत ही सराहनीय है
जैसे की अपने सामर्थ्य को एक नये दृष्टिकोण से जानने व चुनौती देने का प्रयास
मेरी शुभकामनाएँ
पढ़ पढ़ आलिम फ़ाज़िल होइओं,
कदे अपने आप नूं पढ़आई नहीं।
जा जा वड़दा एं मन्दिर मसीतीं,
कदे मन अपने विच वड़्याई नहीं ।
ऐवें रोज़ शैतान नाल लड़नै,
कदे नफ़स अपने नाल लड़्याई नहीं ।
बुल्ल्हे शाह असमानीं उडदियां फड़नै,
जेहड़ा घर बैठा उहनूं फड़्याई नहीं
——गायत्री —-
आप दोनों को सादर प्रणाम।
भगवान से प्रार्थना करता हु कि आप हमेशा स्वस्थ रहें खुश रहे आप दोनों का प्यार ओर आशीर्वाद हमेशा हम पर बना रहे।
पूरी जिंदगी को समेट कर एक लेख में लिख देना भी एक कला है।
योग, मेडिटेशन, यात्राएँ एवं पढ़ने के शौक ने आपकी जिंदगी को काफी रौचक बना दिया है।
आपकी Phd शीघ्र पूरी हो एवं भविष्य में स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें ऐसी कामना एवं प्रार्थना है।
सुधीर निंद्रा जोग, जागृति विहार मेरठ
Beautiful blog written by u dear harshwardan bhai sahab,visualize your childhood to 75 th birtday, this article will touch down every one known to you or not
All the topics you picked very touching particular na kahu ki dosti n kahu berg,Chai samosa or ladki a real story of middle class family also enjoy your band Baja barat, your writing style is very Powerfully, u inspire everyone around you for never ending learning , you prove age is number at this age you pursue PhD and still travelling from delhi to banglore by self driving you prove retirement does not mean slowing down active mind , you have legend of family, happy 75th birtday to true legend and inspiration, 100 saalam hai apko
Rajesh taneja noida
बैंकिंग के साथ जीवन अलग नजरिए से देखना, समझना और जीना, काफी प्रेरणादायक है। बैंकिंग में अपने शौक के लिए समय निकालना आजकल मुश्किल है। लेकिन कहते है जहां चाह वहां राह। मस्त है मेरठ में मिलेंगे।
Very nicely penned, Bhaisahib. Heroic deeds and an adventurous spirit are my key learnings from this wonderful blog. Quite inspiring and worth imbibing. Big kudos for your journey si far. Wishing an even eventful future. Stay blessed, healthy and happy always.
Bharara Rajesh
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