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Tuesday, 29 August 2017

विपासना शिविर में दूसरा दिन

घंटी की आवाज़ से पता लगा की सुबह के चार बज गए हैं और अब उठ जाना ही ठीक है. अगर बिस्तर छोड़ कर लाइट नहीं जलाई तो दरवाज़े के बाहर घंटी बजाने वाला सेवादार घंटी बजाना बन्द नहीं करेगा. इसके बाद साढ़े चार बजे घंटी फिर बजेगी और कहेगी 'पधारो मैडिटेशन हॉल में' ! अगर तो आप स्वेच्छा से और स्वाभाविक रूप से पहली घंटी की आवाज़ से उठ जाते हैं तो बहुत ही अच्छी बात है और अगर नहीं तो शायद आपको थोड़ा बहुत लगाव है नींद से. ये लगाव या राग आगे जाने में रुकावट है और इसे त्यागना होगा. मुझे लगता है कि धीरे धीरे त्यागा भी नहीं जाता एक झटके में ही त्यागना ठीक रहता है.

असल में शिविर में आने से पहले रहने-सहने, खाने-पीने और सोने का एक स्टाइल था. ये स्टाइल गलत था या सही वो तो अलग बात है पर जो भी था हम तो उसी के ही गुण गाते थे और उसे ही सही बताने का यतन भी करते थे. भाई मैं तो ग्यारह बजे से पहले सो नहीं सकता और सात बजे से पहले उठ नहीं सकता. मैं सही हूँ और नहीं बदल सकता बस यही अटल सत्य है ! बहरहाल यहाँ आकर अटल सत्य का भ्रम या नींद का लगाव टूट गया और नींद से प्रेम में कमी हो गई है.

वैसे तो दिन भर का काम तो हल्का ही था कौन से हल चलाने थे. मैडिटेशन हॉल में अपने आसन पर बैठना और बैठकर फिर से सांस को देखना है. पर जब करने बैठे तो कमर और घुटने में फिर से दर्द होने लग गया. लगातार बैठा नहीं जा रहा था पर बैठना ही था. कुछ क्षणों के लिए साँस देखते फिर मन सांस से हटकर दाएं बाएं भाग जाता. फिर भटकते मन को खींच कर बार बार सांस पर लाना पड़ता. बीच बीच में उकताहट होने लगती और मन बैचैन हो जाता. दर्द से कराह भी नहीं सकते थे. आचार्य जी से भी कहा की घुटने बुरी तरह से दर्द कर रहे हैं. जवाब में उन्होंने संक्षिप्त उत्तर दिया कि अभ्यास करते रहिये ठीक हो जाएगा. उस वक़्त तो ये जवाब सुनकर तसल्ली नहीं हुई.

वैसे तो कहा हुआ था कि आँखें बंद रखनी है पर चोरी चोरी कनखियों से हॉल में नज़र मारी. इक्का दुक्का को छोड़कर सभी महिलाएं हिल जुल रही थीं और बैचेन लग रही थीं. पुरुष वर्ग का भी वही हाल था. लेकिन कुछ मानुस अपने स्थान पर पूरी गंभीरता से डटे हुए थे. दो एक ऊँघ भी रहे थे. मन थोड़ा आश्वस्त हुआ कि ज्यादातर साधक लोग हमारी तरह हिचकोले ही खा रहे हैं! गौर फरमाइए चूँकि दूसरे लोग डांवांडोल हैं तो हमें कुछ संतोष हुआ.

एक और समस्या खड़ी हो गई थी. खड़ी क्या हो गई बल्कि खुद ही खड़ी कर ली थी. रात सात बजे के बाद कोई डिनर विनर तो होता नहीं इसलिए मन में ये ख़याल आया की नाश्ता थोड़ा ज्यादा कर लिया जाए. नाश्ते में फल, दूध,चाय, के अलावा अंकुरित दालें और पोहा भी था. पोहा ज्यादा खाया ये सोच कर की पिछली शाम भी डिनर नहीं था और आज शाम भी नहीं होगा. इस भारी नाश्ते के बाद की बैठकों में ढंग से बैठा नहीं गया. पर उस दिन के बाद फिर दोबारा ऐसी गलती नहीं की.

यह  सोच कर ही अजीब लग रहा था की हम बैठे सांस को देखे जा रहे हैं जबकि पूरा दूसरा दिन भी गुज़र गया और बुद्ध के उपदेशों के बारे में कुछ बताया ही नहीं जा रहा? ये सांस को देखने का काम तो घर में ही कर लेते? पर फिर ये भी समझ आने लगा कि सिद्धार्थ गौतम की साधना कितनी कठिन रही होगी. हम तो ए सी कमरे में बढ़िया से गद्दे पर बैठे आधा अधूरा ध्यान लगाते हैं तब तक हमारे लिए कोई खाने पीने का इन्तेजाम करता है पर सिद्धार्थ गौतम के लिए ऐसा कुछ भी नहीं था.

शाम के गोयनका जी के वीडियो में यही सब सवालों पर चर्चा हुई और तीसरे दिन के लिए फिर से ज्यादा मेहनत करने के लिए कहा गया.

सबका मंगल होए 


नोट: बतौर जिज्ञासु गौतम बुद्ध का बताया मार्ग समझने की कोशिश कर रहा हूँ. भूल-चूक के लिए क्षमा 




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