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Thursday, 22 May 2014

बदलता समाज बदलती मान्यताएँ

समय के साथ सामाजिक मान्यतों और रीति रिवाजों में भी परिवर्तन आ रहा है । मसलन आजकल शादी करने की उम्र लगभग 35 की ओर बढ़ रही है । 'बच्चे दो या तीन अच्छे' के बजाय 'हम दो और हमारे दो' और उससे भी आगे 'हम दो हमारा एक' का नारा बुलंद हो रहा है । पुराना फ़ार्मूला की रिटायर होने से पहले पहले बच्चों की शादियाँ कर लो अब फ़ेल हो गया लगता है ।

इसी तरह कुछ बदलाव क़ानून ने भी करवा दिए हैं । लिव-इन सम्बन्ध को क़ानूनी मान्यता मिल चुकी है । बहुत से वयस्क पुरूष और महिलाएँ बिना शादी किए साथ रह रहे हैं । सरोगेट माँ को अब क़ानूनी सहमती है और बहुत से दम्पत्ति किराए की कोख ले कर बच्चा प्राप्त कर रहे हैं । समलैंगिक विवाह की आवाज़ तेज़ हो रही है और देर सबेर मान ली जाएगी । हिजड़ों को तीसरा सेक्स मान लिया गया है । उधर डाईवोर्स भी बढ़ते जा रहे हैं । कुल मिला के आने वाले 20-25 सालों में वयस्क सम्बन्धों में काफ़ी बदलाव आने की संभावना है । किस तरह के बदलाव होंगे इसका तो अंदाज़ा लगाना भी फ़िलहाल मुश्किल है । 

1. किन्नर 
बाराखम्बा रोड, नई दिल्ली का पुराना वाक़या है जहाँ बैंक की नई शाखा का उद्घाटन होना था । औपचारिक तौर पर कार्रवाई ख़त्म होने के बाद अचानक ढोलक बजने लगी और ज़ोरदार तालियों के साथ गाना बजाना शुरू हो गया । 
महाप्रबंधक मुस्कुरा के खिसक लिए । 
उप-महा प्रबंधक -  मेहमानों को संभालो यार, और फूट लिए । 
सहायक महा प्रबंधक - यार साब को छोड़ कर आता हूँ और सटक लिए । 
मुख्य प्रबंधक ने  छोटे प्रबंधक को तलब किया - यार दे दिला के भेजो इनको बहुत शोर मचा रहे हैं । 
छोटे प्रबंधक ने चपरासी को आवाज़ दी - अरे महतो इनको भी चाय पिला दे और 500 का पत्ता दे कर रवाना कर जल्दी से ।
महतो ने चुटकी ली - साब अब ये लोग आएँ हैं तो ज़रा सा बधाई तो सुन लो बढ़िया गा रहे हैं । और आप भी तो आशीर्वाद ले लो भेजूँ आपके पास ? 
छोटे प्रबंधक गुर्राए - चल चल जो कहा है वो कर । और पेमेंट वोचर के पीछे दस्तखत करवा लेना । 
महतो ने 500 का नोट और वोचर हिजड़ों के टीम लीडर को पेश कर दिया । बस फिर क्या था मामला गरमा गया । पूरी टोली छोटे प्रबंधक पर टूट पड़ी - तू दसखत लेगा ? न तू ज़्यादा पढ़ा लिखा है ? तेरा तो दसखत हम लेंगे आजा आजा आजा । फिर जो हल्ला हुआ तो बस 500 के बजाय 700 पर ही मामला निपटा । 

आप महसूस कर सकते हैं की हिजड़ों के बारे में समाज में कुछ अच्छी धारणा नहीं है और इस का कारण उनका अशिक्षित और बेरोज़गार होना भी है । सामाजिक तिरस्कार से इनकी हालत और ख़राब ही हो रही है । पुलिस का रवैया भी ज़्यादातर इन्हें परेशान करने का ही रहा है । 

हिजड़े दूसरे नामों से भी जाने जाते हैं - खुसरे, जनखे, खोजे या किन्नर । प्राचीन ग्रंथों में 'ित्रतीय - प्रकृति' का भी ज़िक्र आया है । पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय ने 'ित्रतीय - प्रकृति' याने तीसरे सेक्स को क़ानूनी जामा पहना दिया और हिजड़ों को एक नई सामाजिक पहचान दे दी । कुछ समय पहले तक इन लोगों को अपने आप को पुरूष या महिला बताना पड़ता था ।  न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिये गये की इन्हें OBC का दर्जा दिया जाए और शिक्षा और रोज़गार में उचित स्थान दिया जाए । 

वैदिक ग्रंथों में भी पुरूष - प्रकृति, स्त्री - प्रकृति और ित्रतीय - प्रकृति का ज़िक्र आया है । महाभारत का  एक पात्र िशखंडी, काशी की राजकुमारी अंम्बा का दूसरा अवतार था । अम्बा के विवाह प्रस्ताव को भीष्म ने प्रतिज्ञा वश नहीं माना । अम्बा ने इस का बदला लेने का प्रण लिया और िशखंडी के रूप में जन्म लिया । महाभारत के युद्ध के दसवें दिन िशखंडी भीष्म पितामह के सामने आ खड़ा हुआ । भीष्म ने उसे अम्बा के रूप में पहचान कर हथियार नीचे कर लिए और तभी अर्जुन के तीरों की बौछार पड़ी और भीष्म वाणों की शैय्या पर आन गिरे । इस तरह अम्बा ने बदला लिया । 

पांडवों के अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में अर्जुन ने स्त्री वेश भूषा धारण कर ली थी । चाहे इसका कारण छद्म वेश रहा हो या कथा में परिहास लाने की कोशिश परन्तु ये तो ज़ाहिर हो जाता है कि त्रितीय - प्रक्रिती की जानकारी उस समय भी थी और उस पर बहुत ज़्यादा तिरस्कार या घ्रणा नहीं थी । 

पर हिजड़ों की हालत 1871 के बाद ख़राब होनी शुरू हुई जब उन्हे criminal tribe कहा जाने लगा और criminal tribes act 1871 के अंतर्गत लाया गया ।  1952 में इस एक्ट को समाप्त कर दिया गया था पर समाज में स्थान सुधरा नहीं । सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हिजड़ों के जीवन में काफ़ी बदलाव आ सकता है । ये लोग मुख्यधारा में भी शामिल हो सकेंगे । 

2. लिव-इन 
आजकल वयस्क स्त्री पुरूष का बिना शादी के साथ रहने का काफ़ी प्रचलन हो गया है । फ़िल्मी सितारों में तो पहले से भी हुआ करता था अब और बढ़ गया है । पर साब इसमें भी कई लोचे हैं और क़ानूनी स्थिती पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है । 

सुप्रीम कोर्ट ने कुछ समय पहले कहा की देश में लिव-इन या बिना शादी किए वयस्क स्त्री का पुरूष के साथ रहना अपराध या पाप नहीं हैं परन्तु सामाजिक तौर पर अभी भी मान्य नहीं है । लेकिन यह भी कहा कि सरकार लिव-इन सम्बन्धों को देखते हुए और सभी पक्षों का ध्यान रखते हुए सरकार नए क़ानून बनाए । 

कोर्ट की तरफ से लिव-इन क़ानूनी होने के लिए कुछ शर्तें है जिसमें यह भी शामिल है की दोनों की उम्र शादी के लायक हो, दोनों गैर शादी शुदा हों और सम्बन्ध स्वैच्छिक हों । 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा की अगर कोई महिला जानते हुए भी किसी शादी शुदा पुरूष के साथ रहती है और पुरूष कई साल बाद उसे छोड़ कर पहली पत्नी के पास वापिस चला जाता है तो लिव-इन महिला या उसके बच्चे मुआवज़े की हक़दार नहीं होंगे । बल्कि पहली पत्नी लिव-इन महिला पर मुआवज़े का दावा कर सकती है ! 

कुल मिला के िस्थती जलेबी की तरह सीधी है ! गीता दत्त का फ़िल्मी गीत याद आ गया:

" बाबूजी धीरे चलना प्यार में ज़रा सँभलना, हाँ बड़े धोखे हैं बड़े धोखे हैं इस राह में "

3. सरोगेट माँ / किराए की कोख स्थानापन्न मात्रत्व
पिछले साल फ़िल्मी सितारे शाहरुख़ खान व उनकी पत्नी गौरी खान ने घोषणा की थी कि वे दोनों एक बच्चे 'अबराम' के माता पिता हैं जिसका जन्म सरोगेट माँ की कोख से हुआ है । शाहरुख़ की शादी 1991 में हुई थी और अबराम के अलावा उनके दो बच्चे और भी हैं । इसी प्रकार अभिनेता आमिर खान और किरन राव भी सरोगेसी से बच्चा पैदा कर चुके हैं । सामाजिक और नैतिक पहलुओं को छोड़िए विचार धारा तो ऊपर से ही नीचे की ओर फ़ैशन की तरह चल पड़ती है । सरोगेसी बढ़ रही है । 

सरोगेसी क़ानूनी है याने कोई भी दम्पत्ति किसी दूसरी महिला की कोख किराए पर लेने का आपसी अनुबंध कर सकता है और शर्तों का ख़ुलासा कर सकता है । अन्य बातों के अलावा सरोगेट माँ 21 से 35 वर्ष की हो, अगर शादी शुदा है तो पति की सहमती होनी चाहिए और वह एक दम्पत्ति के लिए तीन बार से ज़्यादा भ्रूण स्थानांतरित नहीं होगा आदि । बच्चे पर सरोगेट माँ का कोई अधिकार नहीं होगा और जन्म प्रमाण पत्र पर सरोगेट माँ का नाम नहीं लिखा जाएगा । 

देर से याने 35 वर्ष से ऊपर शादी होना, पति पत्नी का व्यस्त होना, दो में से किसी का अस्वस्थ होना, सरोगेट माँ का ग़रीब होना भी सरोगेसी के कारण हो सकते हैं । ख़बरों के अनुसार सरोगेट माँ का 'पैकेज' 8 से 15 लाख तक चल रहा है । हो सकता है की आगे चल कर ये सरोगेसी से बच्चे पैदा कराना एक आम बात हो जाए ! मान लीजिए कि किसी देश में दो पुरूषों ने शादी कर ली और उनमें से एक ने बच्चा पैदा करने के लिए किसी दूसरे देश में सरोगेट माँ ढूँढी जो किसी की पत्नी है । उससे पैदा हुई संतान ने आगे चल कर लिव इन साथी ढूँढ लिया । वग़ैरह । इस सब में परिवार, संस्कार वग़ैरह का क्या स्थान होगा ये तो अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता । 

लगता है की हम वसुधैव कुटुम्बकम की ओर जा रहे हैं । पूरा संसार ही एक परिवार हो जाएगा ?

नई दिशा की ओर





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