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Sunday, 25 June 2017

मेहरानगढ़ जोधपुर - 2/3

जोधपुर अब दस लाख से ज्यादा आबादी वाला महानगर है. दिल्ली से इस शहर की दूरी 615 किमी है और जयपुर से 354 किमी. जोधपुर रेल, सड़क और हवाई सेवा से भली प्रकार जुड़ा हुआ है. थार रेगिस्तान में होने के कारण दिन में तेज़ धूप होती है और रात में ठंडक. पर्यटन के लिए अक्टूबर से मार्च अच्छा है.  

शहर के बीच एक ऊँची पहाड़ी है जिसका पुराना नाम भोर चिरैय्या था. इस 125 मीटर ऊँची पहाड़ी पर एक किला है जिसका नाम मेहरानगढ़ है. इस किले की नींव राव जोधा द्वारा 12 मई 1459 को रखी गई थी. यह भीमकाय किला लगभग पांच वर्ग किमी में फैला हुआ है. इसकी ऊँची, चौड़ी और मज़बूत दीवारों की लम्बाई लगभग 10 किमी है. महाराजा जसवंत सिंह (1638 - 1678) के समय किले का काम पूरा हुआ था. 

किले के आठ बड़े गेट या पोल हैं इनमें से एक गुप्त है और चार घुमावदार पहाड़ी सड़कों से ऐसे जुड़े हुए हैं की दूर से किले के गेट या पोल दिखते ही नहीं हैं. फ़तेहपोल महाराजा अजीत सिंह ने 1707 में मुग़लों को हराने के बाद बनवाया था जबकि जयपोल महाराजा मान सिंह ने 1806 में जयपुर और बीकानेर पर जीत की खुशी में बनवाया था.

किले के अंदर कई सुंदर महल हैं जैसे मोती महल, फूल महल, शीश महल. साथ ही दौलत खाना, सिलेह खाना, तोप खाना वगैरा भी हैं. बहुत बड़े भाग में म्यूजियम है जहां अपने समय के सुंदर और शानदार शाही कपड़े, फर्नीचर, कालीन, हथियार, पालकियां, हौदे आदि रखे गए हैं. किले के अंदर की ऊँचाई सात आठ माले के बराबर है. लिफ्ट का भी इन्तेजाम है और अंदर ही बहुत सुंदर दस्तकारी की दुकानें भी हैं. लिफ्ट और म्यूजियम के प्रवेश के लिए टिकट हैं. 

किले की व्यवस्था और रख रखाव बहुत सुंदर है. कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:

छोटे छोटे झरोखे और सुंदर छज्जे ख़ास राजस्थानी अंदाज़ में 

महल में इस तरह की कई छतरियां या स्मारक हैं  जो उन शूरवीरों की याद में बनाई गईं जिन्होंने महल की सुरक्षा में जान दे दी 

गणेश मंदिर और एक दूसरी छतरी 

पथरीली चट्टान पर एक स्मारक 

महल के दो भागों को जोड़ता हुआ छज्जा

किला ऊपर और शहर नीचे या दूसरे शब्दों में राजा ऊपर और प्रजा नीचे 

स्थानीय पत्थर पर शानदार नक्काशी 

महल के बीच  आँगन 

ऊँचाई से शहर पर नज़र 

महल का एक और आँगन 

महल की खिड़कियाँ और नीचे नज़र आता शहर 

महल के इस हिस्से में छोटे बच्चे रहते थे. छोटे राजकुमार के लिए छोटा सिंहासन  

गढ़ के कोने में एक बुर्ज 

पर्यटक 


मेहरानगढ़ पर फोटो ब्लॉग का पहला भाग इस लिंक पर उपलब्ध है:
http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/06/1.html




Friday, 23 June 2017

मेहरानगढ़, जोधपुर - 1

थार रेगिस्तान में बसा जोधपुर अब दस लाख से ज्यादा आबादी वाला महानगर है. इस क्षेत्र का ऐतिहासिक नाम मारवाड़ है. दिल्ली से इस शहर की दूरी 615 किमी है और जयपुर से 354 किमी. अक्टूबर से फरवरी मौसम पर्यटन के लिए अच्छा है. जोधपुर रेल, सड़क और हवाई सेवा से भली प्रकार जुड़ा हुआ है.

शहर से 125 मीटर ऊँची पहाड़ी पर किला है जिसका नाम मेहरानगढ़ है. पुराना शहर इसी किले के तलहटी में बसा हुआ है. इस किले की नींव राव जोधा द्वारा 12 मई 1459 को रखी गई थी. यह भीमकाय किला लगभग पांच वर्ग किमी में फैला हुआ है. इसकी ऊँची, चौड़ी और मज़बूत दीवारों की लम्बाई लगभग 10 किमी है. महाराजा जसवंत सिंह (1638 - 1678) के समय किले का काम पूरा हुआ था.

किले के आठ बड़े गेट या पोल हैं इनमें से एक गुप्त है और चार घुमावदार पहाड़ी सड़कों से जुड़े हुए हैं. जयपोल महाराजा मान सिंह ने 1806 में जयपुर और बीकानेर पर जीत के बाद बनवाया था. फ़तेहपोल महाराजा अजीत सिंह ने 1707 में मुग़लों को हराने के बाद बनवाया था.

किले के अंदर कई सुंदर महल हैं जैसे मोती महल, फूल महल, शीश महल. साथ ही दौलत खाना, सिलेह खाना, तोप खाना वगैरा भी हैं. बहुत बड़े भाग में म्यूजियम है जहां अपने समय के सुंदर और शानदार शाही कपड़े, फर्नीचर, कालीन, हथियार, पालकियां, हौदे आदि रखे गए हैं. किले के अंदर की ऊँचाई सात आठ माले के बराबर है. लिफ्ट का भी इन्तेजाम है और अंदर ही बहुत सुंदर दस्तकारी की दुकानें भी हैं. लिफ्ट और म्यूजियम के प्रवेश के लिए टिकट हैं.

भारत के प्राचीन किलों में सबसे सुंदर रख रखाव शायद इसी किले का है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

विशालकाय, मजबूत और सुंदर 

किले की पूर्वी दीवार. चट्टान पर स्थित मजबूत और भरी भरकम पत्थरों से बनी हुई 

मोरनुमा विशाल किला - मेहरानगढ़ 

किले के अंदर का एक दृश्य. अलग अलग रंग के पत्थरों का सुंदर उपयोग  

किले के अंदर की मजबूत विशाल दीवार 

तोपचियों का निवास और गोला बारूद रखने की जगह. ऊपर छत पर तोपें हैं 

किले की दीवार पर सुरक्षा के लिए तोपें 

किला भी देखिये और संगीत का भी आनंद लीजिये 

सरदार मार्किट से मेहरानगढ़ का एक दृश्य 




Wednesday, 21 June 2017

योग दिवस

अन्तराष्ट्रीय योग दिवस पर सभी को बधाई!
योगाभ्यास लगातार करते रहें तो डॉक्टर और कड़वी गोलियों से काफी हद तक बचे रह सकते हैं. शरीर चुस्त और फुर्तीला रहता है. लगातार आसन और प्राणायाम के अभ्यास से मन भी शांत होने लगता है.
अगर अभी तक नहीं किया तो शुरू कर दें ! शुभकामनाएं!


उष्ट्र आसन. घुटनों के बल खड़े हो जाएं. कन्धों के बराबर घुटनों में फासला रख लें. दोनों हाथों के अंगूठे रीढ़ की हड्डी पर और उँगलियाँ आगे की ओर कर लें. गर्दन और कमर पीछे झुकाते हुए हथेलियाँ एड़ियों पर रख लें. कुछ देर रुकें और फिर धीरे धीरे वापिस आ जाएं. इस आसन से गर्दन, रीढ़ की हड्डी प्रभावित 

मत्स्य आसन की एक स्थिति

सुप्त वज्र आसन 

गौमुख आसन 




Saturday, 17 June 2017

करणी माता मंदिर, बीकानेर

बीकानेर गए तो पता लगा कि लगभग 30 किमी दूर देशनोक नामक स्थान पर करणी माता का मंदिर है. ये एक ऐसा मंदिर है जहाँ हजारों चूहे घूमते रहते हैं. हम तो घर में एक भी चूहा घुस आए तो डंडा लेकर मारने दौड़ते हैं और यहाँ इस मंदिर में हजारों चूहे? मन में पहले तो अविश्वास हुआ फिर देखने की इच्छा हुई. पहले इंटरनेट पर देखा और फिर जाना तय कर लिया. वैसे करणी माता के दो और मशहूर मंदिर भी हैं एक अलवर में बाला किले के पास और दूसरा उदयपुर में माछला पहाड़ी पर. पर यह मूषक मंदिर अपने चूहों के कारण ज्यादा चर्चा में रहता है.

बीकानेर से देशनोक जाने के लिए सड़क अच्छी है और बसें, टैक्सी आसानी से उपलब्ध हैं. मंदिर की बड़ी मान्यता है इसलिए बहुत से भक्त और साधक आते जाते रहते हैं. रुकने के लिए मंदिर के आस पास धर्मशालाएं भी हैं. साल में दो बार नवरात्रों में यहाँ मेले भी लगते हैं.

सफ़ेद संगमरमर से बना मंदिर आकर्षक है और राजस्थानी / मुग़ल शैली में की गई नक्काशी बहुत सुंदर हैं. मंदिर का निर्माण कार्य बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने पंद्रहवीं शताब्दी में शुरू कराया था. मंदिर में चांदी के पत्रे वाले दरवाज़े हैं उन पर भी चूहे बने हुए हैं. मंदिर में चूहों के लिए चांदी की प्लेटें हैं जिनमें पीने के लिए दूध डाल दिया जाता है. मजेदार बात ये है कि मंदिर के बाहर चूहे नजर नहीं आते. मंदिर के चूहों को काबा कहा जाता है. प्लेग जैसी कोई दुर्घटना भी यहाँ कभी नहीं हुई जबकि ये चूहे प्रशाद में भी घुसे रहते हैं!

करणी माता को माँ जगदम्बा का अवतार माना जाता है. कहा जाता है की करणी माता के आशीर्वाद से बीकानेर और जोधपुर रजवाड़ों की स्थापना हुई. बीकानेर राजघराने की कुलदेवी भी करणी माता ही हैं.

करणी माता का जन्म 1387 में चारण राजपूत परिवार में हुआ और इनका बचपन का नाम रिघुबाई था. इनकी शादी दीपोजी चारण से हुई जबकि इनकी वैवाहिक जीवन में रूचि नहीं थी. इन्होनें अपनी छोटी बहन गुलाब की शादी अपने पति से करवा दी ताकि पति का वैवाहिक जीवन चलता रहे. दो साल ससुराली गाँव में रहने के बाद बंजारों का जीवन शुरू कर दिया. पशुओं और कुछ भक्तों के साथ जंगलों में चरवाहों की ज़िन्दगी व्यतीत करने लगी. पशु चराते चराते जहां रात हुई वहीं छावनी डाल दी जाती थी.

एक बार इनका काफिला जांगलू नामक गाँव में पहुंचा. इस इलाके का शासक राव कान्हा था. शासक के कारिंदों नें पानी पीने और पशुओं को पिलाने से मना कर दिया. करणी माता ने अपने एक अनुयायी राव रिदमल को वहां का शासक नियुक्त कर दिया. राव कान्हा और उनके सैनिकों ने करणी माता का विरोध किया और भला बुरा कहा. करणी माता ने एक रेखा खिंची और राव कान्हा से रेखा पार ना करने के लिया कहा. पर वो ना माना और वह परलोक सिधार गया.

सन 1453 में राव जोधा ने करणी माता के आशीर्वाद से अजमेर, मंडोर और मेड़ता के इलाकों को जीत लिया था. राव जोधा के बुलावे पे करणी माता ने जोधपुर किले का नींव पत्थर 1457 में रखा.

वैसे तो करणी माता का पहला मंदिर उनके जीवन काल में अमर चारण द्वारा 1472 में ही बना दिया गया था. इसी साल में करणी माता ने राव बिका ( जिन्होनें बीकानेर बसाया ) की शादी रंग कुंवर से करवा दी. रंग कुंवर राव शेखा की बेटी थी जो भाटियान राजपूत थे. ऐसा करने से बहुत देर से चली आ रही राठोड़ - भाटियान परिवारों की दुश्मनी समाप्त हो गई. 1485 में करणी माता ने बीकानेर किले का नींव पत्थर रखा.

मंदिर में चूहे होने का एक किस्सा आसपास के दुकानदारों ने बताया कि किसी लड़ाई में हार के कारण 20000 सैनिकों का एक जत्था मैदान छोड़ कर भाग कर करनी माता की शरण में आया. जंगी मैदान छोड़ने की सजा तो मौत थी और ये लोग बचना चाहते थे. करणी माता ने कहा कि बचना है तो चूहे बन कर रहना होगा. तभी से यहाँ चूहे घूम रहे हैं और मंदिर परिसर के बाहर नहीं दिखते हैं.

मार्च 1538 में करणी माता महाराजा जैसलमेर से मिलकर बीकानेर की ओर वापिस आ रही थीं. रास्ते में कोलायत तहसील के गडियाला गाँव के पास पानी पीने के लिए पड़ाव डाला गया. इस पड़ाव के बाद वे ज्योतिर्लीन हो गईं और फिर कभी देखी नहीं गईं. उस वक़्त उनकी उम्र 151 साल बताई जाती है. तब से ही लगातार उनकी पूजा अर्चना की जा रही है.

प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :


करणी माता मंदिर, देशनोक, बीकानेर  

मुख्य द्वार के दाहिनी ओर संगमरमर पर नक्काशी 

मुख्य द्वार के बाईं ओर नक्काशी. झरोखे पर चांदी के पल्ले चढ़े हुए हैं और उस पर भी चूहे बने हुए हैं 

 द्वारपाल 

दूसरा द्वारपाल सो रहा है. सुंदर बना है पर पता नहीं सोता हुआ क्यूँ बनाया 

 मंदिर का आँगन जालियों से ढका हुआ है ताकि चील या गिद्ध जैसे पक्षी चूहों का शिकार न कर सकें  

प्रशाद बनाने के कढ़ाहे 

मंदिर के बाईं ओर का चांदी का दरवाज़ा 

बताया जाता है की लगभग बीस हज़ार चूहे मंदिर में रहते हैं. अगर आप को सफ़ेद चूहा दिखे तो आप किस्मत वाले हैं 

चांदी के परात में दूध. चूहों की बड़ी तादाद के कारण इसे चूहों का मंदिर भी कहा जाता है  

दूध पीते चूहे. मंदिर में चलते हुए ध्यान से पैर रखें. बल्कि पैर घसीट कर चलें. आप के पैर के आसपास घूम रहे चूहों में से कोई दब ना जाए. दबने का मतलब है अपशगुन. अगर दब कर मर गया तो बदले में चांदी का बना चूहा दान करना होगा 

कबूतरों से बचने के लिए जालीयां भी लगी हुई है पर फिर भी चुग्गा दाना ढूंढते ढूंढते कबूतर अंदर स्टोर में भी पहुँच जाते हैं.   

दर्शानर्थी




Friday, 16 June 2017

महंगा मोबाइल

चीफ साब बैंक जाने के लिए तैयार खड़े थे. उनके मोटे पेट पर लाल टाई इत्मीनान से सजी हुई थी. पिछले सन्डे को ही चीफ साब ने अपने बचे खुचे बालों की झालर पर काला रंग चढ़ाया था. ड्राईवर ने बैंक की गाड़ी चमका दी थी. ब्रीफकेस और लंच का डब्बा रख कर इंतज़ार कर रहा था. पर साब तो तभी निकल सकते हैं जबकि उनकी चंद्रमुखी इस बात की आज्ञा दे. 

- आज जरूरी मीटिंग है चंद्रमुखी इसलिए आज तुम्हारे मोबाइल की शौपिंग नहीं हो सकती. जाना जरूरी है. कल चलेंगे और ले लेंगे. एक ही दिन की तो बात है. 
- अच्छा! यूँ मत कहो. समझते नहीं हो कोई सहेली आ गई और हाथ में सुंदर सा मोबाइल ना हुआ तो? हाथ में होना जरूरी है चाहे चले या ना चले समझे. अपने वाला दे दो?
- क्या बात कर रही हो! नौकरी करने दोगी या नहीं?
- मुझे नहीं पता तुम्हारी मीटिंग शीटिंग का. दोपहर को गाड़ी भेज देना. कमलेश के साथ मोबाइल देख कर आती हूँ. पसंद कर लूंगी तुम लेते आना. 
- चलो महतो को बोल देता हूँ दोपहर को गाड़ी ले आएगा. चले जाना. जल्दी फ्री हो गया तो आज नहीं तो कल ठीक है ?
- हुंह! 

मैडम ने कमलेश को फोन करके प्रोग्राम बना लिया. गाड़ी आई तो दोनों मॉल पहुँच गईं. बहुत सारे मॉडल देखे मोबाइल फोन के. फिर दूसरी मोबाइल शॉप की ओर प्रस्थान कर दिया. दूसरी दुकान में ज्यादा रश था. दुकानदार महिलाओं के देखकर तपाक से बोला,

- आइये मैडम आइये. इस तरफ आ जाइए. कौन सा मॉडल दिखाऊं?
- हमें तो बढ़िया वाला दिखाइये.
- कितना बजट है मैडम?
- कमाल है अब तक तो कुछ दिखाया भी नहीं और पूछ रहे हैं बजट कितना है?
- मैडम आपको बढ़िया वाला ही दूंगा जी जो आपकी पर्सनेलिटी को सूट करे. कोई ऐरा गैरा मॉडल थोड़ा ही देना है आपको!
- हाँ हाँ  बिलकुल बढ़िया ही लेंगे. हो सकता है की 50 हज़ार का ही ले लें. ये तो पसंद आने की बात है ( हमारे साब झुमरी तलैय्या बैंक के चीफ ऐसे ही थोड़ी हैं. पागल कहीं का ! ).
- जी जी बिलकुल सही कहा आपने. ये देखिये... और यह भी देखिये...छोटे दो ठन्डे लाना.
- ये वाला सुंदर है. है ना कमलेश?
- वाकई सुंदर है मिसेज़ चंद्रमुखी. पर भाई साहब को बता तो दो.
- ओ हो कमलेश! भाई साब मना थोड़ा ही कर सकते हैं! पसन्द कर लिया सो कर लिया. थैंक्यू भैया साब आते ही होंगे उनको बस मॉडल नंबर भेजना है. तब तक हम गोलगप्पे खा के आते हैं.

दोनों बतियाते हुए बाहर निकली गोलगप्पे वाले की तलाश में. पर पीछे से एक लड़के ने झपट कर मैडम का पर्स छीन लिया और पतली गली में भाग लिया. दोनों मैडम सकपका गईं. फिर कमलेश मैडम चिल्लाई,
- ले गया..ले गया.. पकड़ो पकड़ो!!

हल्ला मच गया और लोग इकट्ठा हो गए. एक जवान छोरा मदद करने को तैयार हो गया. उसने भी गली में दौड़ लगा दी. आनन फानन में हांफता हुआ पर्स लेकर आ गया. हांफते हांफते बोला,
- मैडम ये लो .. ये लो..जी अपना पर्स. वो बदमाश पर्स फेंक कर बोला पांच सौ का मैला सा नोट इसमें पड़ा है और पचास हज़ार की बात करती है!

मैडम चंद्रमुखी का एक रंग आए एक जाए. माथे पर पसीना आ गया. इज्ज़त का कबाड़ा! तुरंत पार्किंग की ओर भागीं और गाड़ी में बैठ कर लम्बा साँस लिया. रास्ते में सोचती रही मैडम और सोच सोच कर इस नतीजे पर पहुंची की इस दुर्घटना के जिम्मेवार हैं चीफ साब. आज साथ आ जाते तो मोबाइल मिलता या ना मिलता पर इज्ज़त का कचरा तो न होता.

महंगे मोबाइल 





Wednesday, 7 June 2017

टेहरी गढ़वाल यात्रा पर एक फोटो-ब्लॉग

दिल्ली से टेहरी 320 किमी की दूरी पर है. पहाड़ी सड़क ऋषिकेश से शुरू हो जाती है पर इस सड़क में आड़े टेड़े घूम और कट कम हैं. इसलिए हमें अपनी गाड़ी ले जाने में दिक्कत नहीं हुई. बीच बीच में चौथा और पांचवां गियर भी लग गया था.

टेहरी की उंचाई लगभग 2000 मीटर है और तापमान गर्मी में 30 तक और सर्दी में 2 डिग्री तक जा सकता है. सालाना बारिश 70 सेंमी तक हो जाती है याने ठंडी जगह है. गर्मी में भी आधी जैकेट की ज़रुरत पड़ सकती है.

टेहरी का पुराना नाम त्रिहरि बताया जाता है. उससे भी एक पुराना नाम है गणेशप्रयाग. यहाँ भागीरथी और भिलांगना नदियाँ मिलती हैं और मिलकर ऋषिकेश की ओर चल पड़ती हैं.

टेहरी का नाम टेहरी बाँध से जुड़ा हुआ है. इस बाँध की परिकल्पना पहले पहल 1961 में की गई. बहुत सी सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी बाधाओं को पार करने के बाद 2006 में परियोजना चालू हुई. भारत का सबसे ऊँचा और विश्व में पांचवे नंबर का ऊँचा बाँध है जो 2400 मेगावाट बिजली, 102 करोड़ लिटर पीने का पानी और 2,70,000 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई की क्षमता रखता है. सुरक्षा कारणों से अंदर जाना मना है और अगर किसी उच्च अधिकारी की सिफारिश पर पहुंच भी गए तो फोटो खींचना मना है. बाँध बनने के बाद पुराना टेहरी शहर और किला डूब गए थे. अब टेहरी का मतलब हैं नई टेहरी.

बाँध से दूर बहुत बड़ी झील है जिस में बोटिंग, वाटर स्कीइंग वगैरा की जा सकती है. झील के बीच में नाव की सवारी रोमांचक है. पर जब नाविक ने बताया की कहीं कहीं पानी की गहराई 800 मीटर तक भी है तो एक बार तो नौका सवारी भयभीत और रौंगटे खड़े करने वाली लगती है.

सन् 888 तक गढ़वाल में छोटे छोटे 52 गढ़ हुआ करते थे जो सभी स्वतंत्र राज्य थे. इनके मुखिया ठाकुर या राणा या राय कहलाते थे. एक बार मालवा के राजा कनक पाल सिंह बद्रीनाथ दर्शन के लिए आये. एक गढ़ के राजा भानु प्रताप ने अपनी इकलौती बेटी की शादी कनक पाल सिंह से कर दी. इसके बाद कनक पाल सिंह और उनके उत्तराधिकारियों ने धीरे धीरे सारे गढ़ जीत कर एक गढ़वाल राज्य बना लिया. 1803 से 1815 तक गढ़वाल में नेपाली राज रहा. ईस्ट इंडिया कंपनी और स्थानीय छोटे राजाओं ने एंग्लो-नेपाल युद्ध में नेपाली शासन को हरा दिया और टेहरी रियासत राजा सुदर्शन शाह को दे दी गयी.

सुदर्शन शाह और उनके वंशजों ने रियासत का भारत में विलय होने तक राज किया. इनमें से प्रमुख थे प्रताप शाह जिसने प्रताप नगर बसाया, कीर्ति शाह जिसने कीर्ति नगर बसाया और नरेंद्र शाह जिसने नरेंद्र नगर बसाया. ऋषिकेश से टेहरी जाते हुए नरेंद्र नगर रास्ते में देखा जा सकता है.

रास्ते में आते जाते हुए ली गई कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:

1. हमारे जैसे लोगों का पहाड़ों पर खाली हाथ चलना भी मुश्किल होता है और इन्हें देखिये सिर पर लकड़ी या घास के गट्ठर. कितनी सरकारें आईं और चली गईं पर सिर का बोझ कम ना हुआ      

2. सुहाना सफ़र. चालक और उड़न खटोला. ऋषिकेश से टेहरी तक सड़क बहुत अच्छी है   

3.  सबला ! चलते चलते महिला पर नज़र पड़ी तो गाड़ी रोक ली और इनसे आज्ञा लेकर ही ये फोटो खिंची. पशुओं के लिए पेड़ों से पत्ते इकट्ठे कर रही थी     

4. एक और सबला दूसरे पेड़ पर चढ़ी हुई थी 

5. सबलाएं आपस में बतिया भी रही थीं और चारा भी इकठ्ठा करती जा रहीं थी

6. खतरनाक उंचाई पर 

7. तीन सहेलियां धूप सेकते हुए. ज्यादातर पुरुष फौजी हैं या मैदानों में नौकरी करते हैं क्यूंकि यहाँ नौकरियां कम हैं  

8. बहुत कठिन है डगर पनघट की. पीने के पानी की समस्या सभी जगह है  

9. नरेंद्र नगर का सुंदर बाज़ार 

10. नंदी की मूर्ती नरेंद्र नगर में. बैंक और नगर दोनों का रक्षक   

11. टेहरी गेट राइफलमैन गब्बर सिंह नेगी विक्टोरिया क्रॉस मरणोपरांत के सम्मान में बनाया गया. राइफलमैन नेगी को यह सम्मान 1915 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान न्यू चेपल, फ्रांस में जर्मनी के खिलाफ युद्ध में असाधारण वीरता दिखाने के लिए मिला था 

12. स्कूल की छुट्टी 

13. गंगा, ऋषिकेश और जंगल 

14. चंबा में कोहरा 

चंबा की ये नेकी की दीवार पसंद आई. जिसे जरूरत नहीं है वो रख जाए जिसे जरूरत है वो ले जाए 


नई टेहरी गढ़वाल के कुछ और फोटो इस लिंक पर क्लिक करके देखे जा सकते हैं : >
http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/04/blog-post_27.html


राइफलमैन गब्बर सिंह नेगी, विक्टोरिया क्रॉस मरणोपरांत पर एक लेख इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है : >
http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/04/blog-post_17.html