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Friday, 22 September 2017

हिंदी दिवस की पार्टी

साब ने अपने मटके जैसे पेट पर लाल टाई सेट की और शीशे में नज़र मारी. टाई ओके है. सिर पर आठ दस बाल बचे थे पर फिर भी आदतन उन बालों में कंघी घुमा दी. बेल्ट दुबारा से बाँधी. ये कमबख्त परेशान करती थी. दिन में दो तीन बार खोलकर फिर बांधनी पड़ती थी. क्या किया जाए बियर की चियर्स तो शाम को करनी ही होती है. और अब फर्क भी क्या पड़ता है जी रिटायर होने में चार महीने ही बाकी हैं. अब मेकअप की आखरी आइटम थी फुसफुस. दोनों साइड खुशबू स्प्रे करके सरकारी गाड़ी में बिराजमान हो गए. ड्राईवर से बोले,

- ऑफिस चलो. और सुनो 11 बजे मंत्री जी की फ्लाइट आनी है. हिंदी अफसर को ले जाना और रास्ते में दो ढाई सौ का एक बुक्के बनवा लेना. उनके नाम की तख्ती भी बनवा कर साथ ही ले जाना. निर्मला को बोल देना कंप्यूटर से हिंदी में कागज़ पर सुंदर सा नाम छाप देगी. तुम तख्ती पकड़ना और निर्मला बुक्के पकड़ लेगी. बुक्के का बिल संभाल लेना.

हमारे साब बड़े सिस्टम से चलते हैं तभी ना झुमरी तलैय्या के रीजनल मैनेजर हैं. झुमरी तलैय्या बैंक का सबसे बड़ा रीजन है और यहाँ बड़े बड़े लोन हैं. साब की बैंक के चेयरमैन साब के साथ अच्छी पटती है. साब बड़े बड़े लोगों के साथ शाम को क्लब में बैठते हैं. कभी कभी मेमसाब भी साथ जाती हैं.
ऑफिस पहुँच कर साब ने एक नज़र हॉल में मारी फिर अपने केबिन में घुस कर सिंहासन पर बैठ गए. चाय की चुस्की लेकर घंटी मार दी.
- निर्मला को भेजो.
- निर्मला जी गुड मोर्निंग. वाह ये अच्छा किया आज आप साड़ी पहन कर आई हैं. आज हिंदी अधिकारी लग रही हैं. वर्ना जीन वीन पहन कर आती हैं तो अंग्रेज़ी भाषा की अफसर लगती हैं. ऐसा है कि मंत्री जी की 11 बजे की फ्लाइट है. ड्राईवर आपको ले जाएगा. मंत्री जी को आप बुक्के दे देना और ढंग से ले आना. अच्छी रिपोर्ट लेनी है उनसे. डीएम ऑफिस जाना है वरना मैं खुद ही जाता. खैर उनको शाम को मैं छोड़ दूंगा. और क्या तैय्यारी है आज की ?
- जी बारा साढ़े बारा बजे मुख्य अतिथि को कार्यालय का निरीक्षण करा देंगे और मैनेजरों से मिलवा देंगे. कोई फाइल वगैरा देखना चाहें की हिंदी में काम हो रहा है या नहीं वो दिखा देंगे. एक बजे से दो बजे तक कांफ्रेंस रूम में मीटिंग होगी जिसमें आप मुख्य अतिथि का परिचय और सम्मान कर देंगे. दस मिनट के लिए उनके आशीर्वचन सुन लेंगे. प्रतियोगिता के पुरस्कार उनसे दिलवा देंगे. फिर आप की बारी है. अंत में मैं धन्यवाद प्रस्ताव रख दूंगी. उसके बाद लंच.
- ठीक-ए ठीक-ए. हमारे ऑफिस की कमजोर कड़ी कौन कौन हैं ?
- वेंकटेश जी उन्हें तो हिंदी लिखनी नहीं आती थोड़ा बहुत पढ़ लेते हैं और बोल लेते हैं. दूसरे हैं कपिल मोहन जी जो अच्छी हिंदी जानते हुए भी फाइलों में इंग्लिश में ही टिपण्णी करते हैं. मानते नहीं हैं. बाकी स्टाफ ठीक है.
- अच्छा. एक काम करो इन दोनों को कोई स्पेशल प्राइज दिलवा दो मंत्री जी से. कुछ भी बहाना मार देना कि हिंदी के लिए बड़ी मेहनत कर रहे हैं ये दोनों प्रबंधक. गिफ्ट में कोई पेन सेट वेट दिलवा देना. और हाँ मेरी तो आख़री स्पीच है अगले हिंदी दिवस में तो मेरी पेंशन लग चुकी होगी. एक पर्चे पर ज़रा स्पीकिंग पॉइंट्स लिख देना बाकी मैं संभाल लूंगा.
- जी सर.

मंत्री जी द्वारा ऑफिस के निरीक्षण के बाद कांफ्रेंस चालू हुई. इनाम बांटे गए और मंत्री जी द्वारा हिन्दी में काम करने पर शाबाशी दी गई और राष्ट्र भाषा के प्रचार प्रसार पर जोर दिया गया. हिंदी अधिकारी ने अनुरोध किया कि क्षेत्रीय प्रबंधक दो शब्द कहें तो उस पर आर. एम. साब जो बोले उसके कुछ अंश:

- माननीय मंत्री जी हमारा तो दिन अंग्रेजी के अखबार से शुरू होता है और शाम टीवी की अंग्रेजी न्यूज़ पर जाकर ख़तम होती है. ऐसा नहीं है कि हिंदी पढ़ लिख नहीं सकते पर अगर आसान सी हिंदी होती तो शायद जल्दी बदलाव आ जाता. पहले बैंक में इंग्लिश के सर्कुलर निकलते थे फिर महीने बाद उनका हिंदी वर्शन आता था. अब दोनों एक साथ आने लगे हैं. लेकिन हिंदी सर्कुलर के अंत में एक लाइन लिखी होती है की विवाद की स्थिति में इंग्लिश सर्कुलर ही मान्य होगा ! चलिए हिंदी लागू हो गई. एक और बात है मंत्री जी जापान में जापानी भाषा अधिकारी नहीं है, रूस में रूसी भाषा अधिकारी नहीं पर हिन्दुस्तान में हिंदी भाषा अधिकारी है. एकाधा हिंदी अफसर नहीं है हजारों की संख्या में हैं चाहे उनके बच्चे इंग्लिश माध्यम स्कूलों में पढ़ते हों. खैर धीरे धीरे लागू हो जाएगी. हमारी ये पारी तो समाप्त हो रही है अगले हिंदी दिवस में मुलाकात नहीं हो पाएगी. सभी को शुभकामनाएं और धन्यवाद.

सभा समाप्त हुई और चूँकि एयरपोर्ट जाने में काफी समय था तो क्षेत्रीय प्रबंधक ने माननीय मंत्री जी से झुमरी तलैय्या क्लब में चलकर बैठने का अनुरोध किया जो स्वीकार कर लिया गया. गपशप हुई और अंग्रेजी के दो दो पेग लगाए गए. माननीय मंत्री जी हवाई जहाज में बैठ कर घर चले गए और क्षे.प्र. सरकारी गाड़ी में बैठ कर घर चले गए.

घर की ओर 
 


Sunday, 17 September 2017

विपासना शिविर का छठा और सातवाँ दिन

विपासना मैडिटेशन के पांच दिन हो चुके थे और अब सुबह चार बजे उठने में कोई दिक्कत नहीं थी. अधिष्ठान में लगातार बिना हिले जुले बैठने में भी अभ्यस्त हो गए थे. वैसे भी तो ये बात कहते तो किससे कहते ? बोलती तो बंद थी पांच दिनों से ! देख लीजिये दुखड़े तो दुखड़े अपने छोटे मोटे सुखड़े भी किसी को बता नहीं पाए. इसलिए कुछ हद तक अपने अंदर के उबाल से छुटकारा हो गया. ये भी एक अनुभव था जिसका महत्व उस वक़्त समझ में नहीं आया पर अब विचार करने पर लगता है की अपनी कथा व्यथा सुनाने को मन कितना आतुर हो जाता है और मानसिक बैचेनी का कारण बनता है. जैसे कि 'मैं और मेरे साथ जो हुआ वो तो दुनिया से अलग है ! स्पेशल है !' जबकि ऐसा बहुत से लोगों के साथ होता ही रहता है.

पांच दिन गुजरने के बाद दूसरे साधकों पर ध्यान जाना भी घट गया था. कोई ऐसे कर रहा है या वैसे उस पर नज़र जानी स्वत: ही बंद हो गई. दूसरों को क्या देखें पहले खुद से तो निपट लें ! आचार्य जी ने दिन में एक एक घंटे की छूट भी दी कि या तो आप अपने कमरे में अभ्यास कर लें या फिर पगोडा में. अपने कमरे में किया तो बीच बीच में विघ्न पड़ा किसी बाहरी कारण से नहीं बल्कि अपने ही मन की हलचल से.

जहां तक पगोडा की बात है यह मंदिर नुमा बड़ा गोल हॉल था. इसमें किनारे किनारे गोलाई में शायद 30-40 छोटे छोटे कमरे या कक्ष या कोठरियां थीं. कोठरी इस लिए की इसमें आप या तो खड़े हो सकते थे या बैठ सकते थे परन्तु लेट नहीं सकते थे. सामने की दीवार में लगभग छे फुट की ऊँचाई पर एक गोलाकार रोशनदान था. अगर कक्ष के बीचो बीच फर्श पर आप बैठ जाएं तो दो फुट आगे, दो फुट बाएं और और दो फुट दाएं सफ़ेद दीवार और पीठ के दो फुट पीछे दरवाज़ा बंद. अटपटा सा लगा, घुटन सी महसूस हुई और लगा जेल में आ गए ! ठीक से ध्यान नहीं लगा. इस ध्यान कक्ष की पहली बैठक का अनुभव अलग ही रहा. बोलती बंद, आँख बंद, शरीर की हलचल बंद, तीन तरफ से दीवारें बंद और पीठ पीछे दरवाज़ा बंद याने * ? "x" @ # % $* ! उस वक़्त की भावनाओं के लिए शब्द कम पड़ गए ! पर अगले दिन जब उसी कक्ष में साधना की तो मन की स्थिति सामान्य रही.

छठे दिन और सातवें दिन एक बार फिर से पद्मासन लगा कर, कमर गर्दन सीधी रख कर और आँखें बंद करके शरीर में होने वाली संवेदनाओं पर ध्यान लगाना शुरू कर दिया. शुरू में तो स्थूल वेदनाएं ही समझ में आ रही थीं जिसमें से सबसे बड़ी तो थी घुटने का दर्द जो लगातार बैठने से हो रहा था. कन्धों में और रीढ़ का हड्डी में कुछ महसूस ही नहीं होता था. पर अभ्यास के बाद बारीक और सूक्ष्म संवेदनाएं भी पकड़ में आने लगीं. किसी किसी अंग में दबाव या खिंचाव पर भी ध्यान जाने लगा. छाती और फेफड़ों की हलकी सी हरकत भी पहचान में आने लगी. वो दोहा याद आ गया :

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान,
रसरी आवत जात के सिल पर परत निसान !

पगडंडियाँ 




Thursday, 14 September 2017

लेमन झील, स्वित्ज़रलैंड

स्विट्ज़रलैंड लगभग चौरासी लाख की आबादी वाला देश है जो ऐल्प्स के बर्फीले पहाड़ों में बसा हुआ है. यह देश चारों ओर से दूसरे देशों - इटली, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया और लिकटेंस्टीन से घिरा हुआ है. शायद इसीलिए यहाँ वायु सेना और थल सेना तो है परन्तु जल सेना नहीं है. स्विट्ज़रलैंड में चार राजभाषाएँ - फ्रेंच, जर्मन, इटालियन और रोमान्श इस्तेमाल की जाती हैं.

स्थानीय करेंसी का नाम स्विस फ्रैंक है. वर्ष 2016 के अनुमान के अनुसार प्रति व्यक्ति आय सामान्य GDP के अनुसार 78245 अमरीकी डॉलर है और इसके मुकाबले भारत की 2016-17 अनुमानित प्रति व्यक्ति आय सामान्य GDP पर आधारित फ़ॉर्मूले के अनुसार 1800 अमरीकी डॉलर है. याने हिन्दुस्तानियों को अभी बहुत मेहनत करनी है !

इस ठन्डे और खुबसूरत देश की कुछ फोटो यश वर्धन के सौजन्य से प्रस्तुत हैं:

लेमन झील ( अंग्रेजी में Lake Geneva और फ्रेंच में  le lac leman ) के किनारे सुंदर मूर्ति समूह 

लेमन झील के किनारे गायक फ्रेड्डी मरकरी की मूर्ति 

लौसने Lausanne की झील 

लौसने शहर में एक मूर्ति - समुद्री घोड़े की सवारी 

झील में एक मज़ेदार कृति 

झील का एक दृश्य

झूला 

लौसने शहर में 

Contributed by Yash Wardhan.





Saturday, 9 September 2017

बुद्ध के समकालीन धार्मिक विचार

राजकुमार सिद्धार्थ गौतम अब से ढाई हजार साल पहले अपना परिवार और महल छोड़ कर जंगलों की ओर सत्य की खोज में निकल पड़े थे. उनकी उम्र उस वक़्त 29 वर्ष की थी. उस समय के ज्ञानी साधुओं, सन्यासियों और विचारकों से मिले, विचारों का आदान प्रदान किया. पहले पहल मिलने वालों में से प्रमुख थे आलार कालाम और उद्दक रामपुत्र. इनसे उन्होंने योग ध्यान और समाधि में बैठना सीखा पर दुःख से मुक्ति पाने का संतोषजनक मार्ग ना पाने के कारण वे आगे बढ़ते गए.

उस समय वेद, पुराण और उपनिषद का प्रचलन था. उस समय के समाज में वर्ण व्यवस्था भी प्रचलित थी अर्थात समाज चार भागों में विभाजित था- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र. राजकुमार सिद्धार्थ स्वयं क्षत्रिय थे. साथ ही उस समय जीवन को चार भागों या आश्रमों - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास में बांटने का भी प्रचलन था जिसका जिक्र जातक कथाओं में आया है.

वेद, पुराण और जैन धर्म ग्रंथों का समय-क्रम पक्का नहीं है. इनका रचनाकाल सम्भवतः 1500 से 75000 वर्ष ईसापूर्व में कब रहा होगा कहना मुश्किल है क्यूंकि इस पर इतिहासकारों में मतभेद हैं. पर यह तो जाहिर है कि उस समय आत्मा, परमात्मा, दर्शन और धर्म की बहुत सी विचार धाराएं साथ साथ ही चल रहीं थीं. वैदिक साहित्य में उस समय के जीवन के मूल विषयों पर मन्त्रों और श्लोकों में जो चर्चा है वो किसी ना किसी रूप में आज भी हमें प्रभावित करती हैं. वैदिक साहित्य को चार मुख्य भागों में बांटा जा सकता है :
'संहिता' में मन्त्रों और स्तुतियों का संग्रह है जैसे कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद.
'ब्राह्मण' ग्रंथों में यज्ञ करने की विभिन्न विधियाँ, उनके उद्देश्य और उनसे फल प्राप्ति की चर्चा है.
'आरण्यक' ग्रंथों में वानप्रस्थ और आध्यात्म की चर्चा है और
'उपनिषद' में आत्मा, ब्रह्म और आध्यात्म की चर्चा है.
वेदों पर आधारित 6 मुख्य दर्शन हैं जो सभी आस्तिक दर्शन कहलाते हैं. इनकी संक्षिप्त रूप रेखा इस प्रकार है:

* न्याय दर्शन जिसमें परमात्मा को सर्वव्यापी और निराकार कहा गया है. प्रकृति को अचेतन और आत्मा को शरीर से अलग कहा गया है. यह दर्शन महर्षि गौतम द्वारा रचित है.

* वैशेषिक दर्शन में वेदों को ईश्वर का वचन माना गया है. मनुष्य के कल्याण और उन्नति के लिए धर्म पर चलना आवश्यक बताया गया है. महर्षि कणाद के अनुसार जीव और ब्रह्म अलग अलग हैं और एक नहीं हो सकते.

* सांख्य दर्शन महर्षि कपिल द्वारा रचित है. इसमें कहा गया है कि प्रकृति अचेतन और शाश्वत है पर मनुष्य चेतन है और प्रकृति को भोगता है. असत्य से सत्य की उत्पति नहीं होती और सत्य कारणों से ही सत्य कार्य होते हैं.

* योग दर्शन में परमात्मा और आत्मा का मिलन यौगिक क्रियाओं द्वारा कराने की बात कही गई है. इन्द्रियों को अन्तर्मुखी कर ध्यान और समाधि लगाने से आत्मा और परमात्मा का 'योग' संभव है. अंतःकरण शुद्धि पर महर्षि पतंजलि ने ज्यादा जोर दिया है.

* महर्षि जैमिनी द्वारा रचित मीमांसा दर्शन वेद मन्त्र और वैदिक क्रियाओं को सत्य मानता है. यह दर्शन उन्नति के लिए पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों पर ज्यादा जोर देता है.

* वेदांत दर्शन या उत्तर मीमांसा महर्षि व्यास द्वारा ब्रह्मसूत्र में रचित है. इसमें कहा गया है कि ब्रह्म सर्वज्ञ है पर निराकार है और जन्म-मरण से ऊपर है पर आत्मा से अलग है. मीमांसा में भी आगे चल कर कई धाराएं चल पड़ी - द्वैत, अद्वैत, विशिष्ठाद्वैत.

इन दर्शन शास्त्रों के अतिरिक्त नास्तिक विचार भी उस समय प्रचलित थे. ईश्वर और परलोक ना मानने के कारण इस दर्शन को लोकायत भी कहा जाता है. परलोक को ना मानने वाले, केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण मानने वाले और वेदों से असहमति रखने वाले दर्शन हैं: चार्वाक, माध्यमिक, योगाचार, सौतांत्रिक, वैभाषिक और आर्हत.

जैन दर्शन में भी नास्तिकता का पुट है. जैन दर्शन में ऐसा माना गया है कि सृष्टि शाश्वत है और सृष्टि का कोई सृष्टिकर्ता नहीं है. जीव स्वयं अपने पिछले जन्मों के कर्मों से सुख-दुःख पाते हैं. जैन धर्म में अहिंसा परम धर्म है. साथ ही मन, वाणी और काया पर जीत करने वाला 'जिन' या अरहंत कहलाता है. इन्हीं जिन के मंदिर बनाए जाते हैं और किसी भगवान के नहीं.

कुल मिला के इस तरह की आस्तिक और नास्तिक वादों की 60-65 विचार धाराएं राजकुमार सिद्धार्थ के सन्यास लेने के समय में प्रचलित थीं. मोटे तौर पर इन्हें दो धाराओं में बांटा जा सकता है. पहली धारा वैदिक ज्ञान और मान्यताओं से जुड़ी थी. दूसरी धारा उन लोगों की थी जो वैदिक कर्मकांडों से अलग प्रकृति के नियमों में जीवन यापन करना चाहते थे. इन्हें श्रमण या श्रमन कहा जाता था और ये लोग मूलतः जिज्ञासु रहे होंगे. चूँकि श्रमणों का प्रकृति पर ज्यादा जोर था इसलिए वो ज्यादातर समाज से दूर जंगलों में ही विचरते रहते थे और अपने साथ कम से कम सुविधाएँ रखते थे. शायद जिज्ञासु राजकुमार सिद्धार्थ महल छोड़ने के लिए इनसे प्रभावित हुए हों.

जैन मंदिर, कमल बस्ती, बेलगाम, कर्नाटक

नोट: मैं एक जिज्ञासु की तरह गौतम बुद्ध का मार्ग समझने की कोशिश में हूँ. भूल-चूक के लिए क्षमा.




Friday, 8 September 2017

विपासना शिविर का पांचवां दिन

मैडिटेशन सीखने का पांचवां दिन आ गया. पद्मासन, या आलथी पालथी या चौकड़ी लगाकर, कमर गर्दन सीधी रखकर सांस पर ध्यान देना है और फिर अपनी काया पर हो रही संवेदनाओं को जानना है. सर से लेकर पैर तक और फिर पैर से लेकर सर तक. विभिन्न अंगों में विभिन्न तरह की संवेदनाएं हो सकती हैं जैसे कि अंगों पर दबाव, खिंचाव, गर्म होना, ठंडी हवा का लगना, कपड़े का स्पर्श, दर्द होना और कहीं किसी भाग में कुछ भी महसूस ना होना. पर अधिष्ठान में फिर बैठने से पहले क्यों ना पिछ्ले चार दिन के अनुभवों की समीक्षा कर ली जाए :

- लगातार आनापान करने से महसूस हुआ कि एकाग्रता बढ़ी है.
- जब तक सांस पर ध्यान रहता था तो विचार हट जाते थे और शरीर का कष्ट भी भूल जाता था. ऐसा लगा कि अगर लगातार अभ्यास किया जाए तो विचारों को देर तक रोका जा सकता है.
- जब जब सांस पर से ध्यान हटता था विचारों की विडियो चल पड़ती थी. ये विडियो या तो पुरानी घटनाओं पर आधारित थे या भविष्य की कामना पर. मतलब कि सांस पर ध्यान टिका रहना वर्तमान में रहना है.

फिर से आसन पर बिराजमान हो गए और शुरू कर दिया काम. कमर में, घुटनों में और गर्दन में दर्द होना ही था पर अब शरीर आदी हो गया था. दूसरे शब्दों में कहें तो शरीर ने मन को इस्तीफ़ा दे दिया था की अब मैं शिकायत नहीं करूँगा ! घंटे भर के अधिष्ठान के अलावा कभी कभी मामूली सा हिलना जुलना हो जाता था. पर वो भी बहुत ही धीरे से स्लो मोशन में ताकि पड़ोसी या फिर अपना ही मन बुरा ना मान जाए.

पहली बार के विपासना शिविर में इसी में उलझे रहे कि थकावट हो रही है या दर्द हो रहा है. दूसरे शिविर में ये सोच घट गई थी. वाणी तो अब शांत ही थी क्यूंकि चार दिन से किसी से बात नहीं हुई और ना ही किसी को आँख से आँख मिलाकर देखा, शरीर की क्रियाएं भी कम से कम हो गईं और शरीर स्थिर रहने लगा. मन भी एकाग्र होने लगा था. पहली बार में ये बातें बड़ी और भारी भरकम लगीं जबकि दूसरी बार में नहीं. ये सब तो आगे जाने का रास्ता ही था.

इसलिए अभ्यास करते ही जाना था. काया में होने वाली संवेदनाओं को देखना था. सिर से पैर तक और पैर से सिर तक. अब काया के भी दो भाग कर लीजिये ! याने बाहिरी काया और अंदरूनी काया. बाहर की संवेदनाएं देखते चलें और फिर अंदर की शुरू कर दें.

कहना आसान था पर करते हुए हंसी आ रही थी कि शरीर के अंदर मन को ले जाएं? मन अब ज्यादा भटक रहा था. बार बार सांस पर फोकस करना पड़ता था. पर धीरे धीरे मन इस प्रक्रिया में चल पड़ा.

सबका मंगल होए 





Tuesday, 5 September 2017

मस्जिद पीटर वाली, मेरठ

मेरठ कैंट में एक वेस्ट एंड रोड है जिसके एक तरफ चार पांच बड़े बड़े स्कूल हैं और दूसरी तरफ कुछ रिहायशी मकान और एक मस्जिद है. वहां से जब भी गुज़रना हुआ तो मस्जिद पर लगा हुआ नाम पढ़ा मस्जिद पीटर वाली तो अजीब सा लगा कि पीटर तो किसी ईसाई का नाम है फिर मस्जिद पीटर के नाम पर कैसे?

मस्जिद के दरवाज़े के ऊपर एक संगमरमर के पत्थर पर लिखा है 'मस्जिद पीटर दर्जी वाली'. ना जाने कौन थे और कब रहे होंगे ये पीटर दर्जी? इन्टरनेट पर सुन्नी बोर्ड(  upscwb.org ) भी तलाशा पर इस मस्जिद का रिकॉर्ड नज़र नहीं आया.

एक दिन गाड़ी रोक कर दुकान में पूछा तो पप्पू भाई ने बताया कि उनका परिवार 1978 से ये दुकान किराये पर चला रहा है. बहुत से लोग यही सवाल पूछते हैं पर उन्हें पीटर के बारे में जानकारी नहीं है. इस मस्जिद को वैसे पीतल वाली मस्जिद भी कहते हैं क्यूंकि बुर्जियों पर पीतल लगा हुआ है. पप्पू भाई ने बताया कि आजकल जो मौलवी हैं वे बिहार से आए हुए हैं इसलिए उन्हें भी पता नहीं होगा.

बहरहाल पीटर दर्जी का राज़ खुला नहीं खोज जारी है. आपको कुछ खबर हो तो बताएं.

मस्जिद पीटर वाली  

पीतल वाली मीनार 

मस्जिद के अंदर पप्पू भाई के साथ 

 'मस्जिद पीटर दर्जी वाली' 




Sunday, 3 September 2017

जैसलमेर किला

जैसलमेर का किला भाटी राजपूत महाराजा जैसल द्वारा 1156 में बनवाया गया था. थार रेगिस्तान में बसा जैसलमेर शहर जयपुर से लगभग 560 किमी दूर है और दिल्ली से 780 किमी. रेगिस्तान होने के कारण गर्मियों में तापमान 50 के नज़दीक पहुँच जाता है और सर्दियों में शून्य के नज़दीक पहुँच सकता है. एक पुरानी कहावत जैसलमेर के हालात बयान करती है:

बख्तर कीजे लोहे का,
पग कीजे पाषाण !
घोड़ा कीजे काठ का,
तब देखो जैसान !

याने यात्री कपड़ों के बजाए लोहे का बख्तर पहन लें जो ना मैला हो और ना फटे, पैर पत्थर के बना लें जो तपती रेत में झुलसे नहीं और ना ही थकें, घोड़ा लकड़ी का ले लें जो ना कभी थके और ना पानी मांगे और तब जैस्सल राजा का स्थान देखने निकलें ! अब बख्तर और घोड़ा तो पुरानी बात हो गई पर आप जैसलमेर जाते समय अपनी गाड़ी का कूलैंट और ए.सी. जरूर चेक कर लें !

अठारहवीं सड़ी तक इराक, ईरान, अफगानिस्तान, चीन जैसे देशों से व्यापारी ऊँटों के कारवां लेकर चलते थे और जैसलमेर सिल्क रूट के व्यापारियों का एक पड़ाव था. अफीम, सोने, चांदी, हीरे जवाहरात, सूखे मेवों वगैरा का व्यापार हुआ करता था. यहाँ के राजा इन व्यापारियों से टैक्स वसूला करते थे. 

त्रिकुटा पहाड़ी पर बने किले की चौड़ाई 750 फुट है और लम्बाई 1500 फुट. त्रिकुटा पहाड़ी की ऊंचाई जमीन से लगभग 250 फुट है. किला बनने के बाद 1276 में और फिर 1306 में किले की मरम्मत हुई और कई बदलाव किये गए. किले की सुरक्षा के लिए चारों ओर तीन ऊँची और चौड़ी दीवारों का घेरा है. चार बड़े दरवाज़े हैं और पचास से ज्यादा बुर्जियां और परकोटे हैं. इनमें साढ़े तीन हज़ार से ज्यादा सैनिक रहते थे. 

किले के अंदर महल हैं, दुकानें हैं, सात जैन मंदिर हैं, पचास के करीब रेस्तरां हैं और लगभग 4000 लोग अब भी रहते हैं. इसलिए ये किला 'जीता जागता' किला है! 2013 में इसे World Heritage Site बना दिया गया है. किले में स्थानीय हलके पीले पत्थर का खूब प्रयोग किया गया है. सुबह और शाम के सूरज की किरणों में ये पत्थर सुनहरे लगते हैं जिसके कारण इस किले को सोनार किल्ला भी कहा जाता है. 
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

किले के अंदर महल 

प्रवेश द्वार 

प्रवेश से पहले पूजा 

संकरा रास्ता और ऊपर रक्षा चौकियां 

सुंदर कारीगरी - लक्ष्मी नाथ जी का मंदिर 

किले की संकरी गलियाँ 

किले की दीवार से नज़र आता शहर 

जैन मंदिर 
जैन मंदिरों की नक्काशी अद्भुत है 


जैन मंदिर की दीवार 

जैन मंदिर कमाल की कारीगरी 

नीचे एक दुकान और ऊपर ख़ास राजस्थानी शैली में छज्जा 

ऊँची नीची राहें 

किले के निवासियों की महफ़िल 

गाइड के साथ गपशप 

तोप के बगैर तो किला अधूरा है 

प्रवेश के पास किले की दीवार. ढलान पर रोड़े पत्थरों का ढेर सुरक्षा के लिए अच्छा है  





Saturday, 2 September 2017

विपासना शिविर का चौथा दिन

विपासना शिविर की तीसरी शाम को गोयनका जी के एक घंटे के वीडियो प्रवचन में साधकों के मन में उठे सवालों की चर्चा की गई और समझाया गया. जैसा की रोज़ होता है उसी प्रवचन में अगले दिन की रूप रेखा भी बता दी गई. चौथे दिन की विशेष बात थी अधिष्ठान. शिविर में वैसे तो पूरे दिन कार्यक्रम एक से ही हैं. चार बजे उठना, साढ़े चार से लेकर साढ़े नौ बजे रात तक लगातार मैडिटेशन करना. हाँ बीच बीच में नाश्ते, खाने के अलावा छोटे छोटे ब्रेक थे और शाम को एक घंटे का प्रवचन जिसमें अधिष्ठान पर बैठने के लिए बताया गया.

अधिष्ठान का शाब्दिक अर्थ अगर इन्टरनेट में देखें तो कई पर्याय मिलेंगे : abode, establishment, installation, site, situation, fixed rule, वास स्थान, आधार, आश्रय और संस्थान. इनमें से मुझे installation शब्द ठीक लगा क्यूंकि अब हमें अपने आसन पर जम कर बैठना था. किसी भी सूरत में एक घंटे तक हिलना नहीं था. अपने को धरती में गड़े खम्बे की तरह install कर लेना था. अगर कान में मच्छर गाना गाने लगे, शरीर पर कोई मक्खी बैठने लगे, खुजली हो, पसीना आ जाए या घुटने में दर्द हो तो भी हिलना नहीं था. हिलना नहीं बस हिलना नहीं!

परीक्षा तो अब शुरू हुई. किस्से कहानियों में पढ़ते थे कि तप करते करते सन्यासी के शरीर पर लताएं चढ़ गईं, सांप बिच्छू चलने लग गए या चींटियों ने बाम्बी बना ली. कुछ ऐसा ही होने वाला था क्या? पर नहीं हम तो पार्ट टाइम संत बनने निकले हैं. केवल एक घंटे की तो क्लास थी. इस अधिष्टान का दूसरा भाग वही था सांस को देखते रहने का अभ्यास. अब तीसरा भाग भी आ गया था: ऊपर से नीचे तक शरीर के हरेक भाग पर ध्यान लगाते जाना याने शरीर की मानसिक यात्रा करना. इसका क्या मतलब? मतलब ये कि शरीर के अंगों में हो रही संवेदनाओं को महसूस करना या उन पर ध्यान देना. किसी अंग में दर्द है, किसी में गर्मी है, किसी भाग में खुजली है, किसी अंग में कम्पन है, किसी में पसीना है, किसी अंग को कपड़ा छू रहा है, किसी अंग पर दबाव है या फिर किसी अंग पर खिंचाव है उसको महसूस करना. हो सकता है किसी अंग में कुछ महसूस ही नहीं हो रहा हो. जो भी हो रहा है उसे महसूस करना. इस यात्रा को तरीके से करना है याने ऊपर से शुरू होकर हरेक अंग की संवेदना को देखते हुए धीरे धीरे नीचे की ओर जाना है. फिर पैर के अंगूठे से धीरे धीरे हरेक अंग की संवेदना को महसूस करते हुए ऊपर की ओर वापिस. सिंपल!?

पिछले तीन दिनों के आनापान के अभ्यास ने अब साथ दिया. अनापान लगातार करने से एकाग्रता बढ़ गई थी. ये भी जानकारी थी की कमर, गर्दन और घुटनों में दर्द होगा. ये भी जानकारी थी कि मन लगातार फोकस नहीं रह पाएगा भटकन भी होगी और लगातार बैठने से मन में उकताहट भी होगी. एक घंटा स्थिर न रह पाया तो? मैं करूँगा सोच कर डट कर बैठ गया. सहायता योगाभ्यास से भी मिली जो हम दोनों 20 सालों से करते आ रहे थे. योगासनों के बाद शव आसन कराया जाता था जिसमें आसन पर पीठ के बल लेट कर शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ना होता है. शवासन में भी शरीर की मानसिक यात्रा कराई जाती थी - सर के बाल,माथा, भोंहें, आँखें, पलकें, नासिका, होंठ, ठुड्डी, गला, छाती, भुजाएं, कलाई, हथेलियाँ, उँगलियाँ, उदर, जननेंद्रियाँ, जंघाएँ, घुटने, पिंडलियाँ, टखने, पैर, उंगलियाँ, नाख़ून और फिर इसी तरह ऊपर की ओर वापिस.

प्रयत्न के बावजूद मन भटका और कई ख़याल आए कि अन्य धर्मों और समाजों की तरह ये कोई रस्म है? अगर मैं ना करूँ तो क्या होगा? अगर मैं कर लूँगा तो क्या होगा? क्या गौतम बुद्ध ने भी इसी तरह किया था या केवल हम से करवाया जा रहा है? शरीर तो मेरा ही है इसमें संवेदनाएं भी आती जाती रहती हैं महसूस भी की हैं तो इनमें अब क्या देखना है?  ऐसा भी लगा कि मैं एक थर्ड परसन हूँ दूर से अपने शरीर को देख रहा हूँ उस शरीर में आती जाती सांस को भी दूर से देख रहा हूँ! रोंगटे खड़े हो गए! बड़ा अजीब सा लगा तो झटके से सांस पर ध्यान लगाया और फिर मानसिक यात्रा जहां रुकी थी वहां से शुरू कर दी. एक घंटे की बैठक में आखिर के 15-20 मिनट असहनीय दर्द में गुज़रे. ध्यान हट कर एक ही बात पर केन्द्रित था - घंटी अब बजी के अब बजी. अंत में जब गोयनका जी की आवाज़ गूंजी तो आह कितना आनंद आया. जेल से छूटे! घुटने खोल दिए और आँखें भी खोल ली. आलथी पालथी से उठकर खड़े होने में भी वक़्त लगा. पर अस्संभव लगने वाला काम हो ही गया.

बाद के अध्ययन से पता लगा कि काया की संवेदनाओं को समझना विपश्यना का एक महत्वपूर्ण अंग है इसे कायानुपश्यना कहते हैं याने अपनी काया को जानना.

सबका मंगल होए 

नोट: जिज्ञासा -वश गौतम बुद्ध का बताया मार्ग समझने की कोशिश कर रहा हूँ. भूल-चूक के लिए क्षमा 




Friday, 1 September 2017

नास्तिकवाद

 बुद्ध का जन्म ईसापूर्व 563 में हुआ और महानिर्वाण ईसापूर्व 443 में. 29 की आयु में महल और परिवार त्याग कर वन की ओर प्रस्थान किया और 6 वर्ष तक सत्य की खोज में लगे रहे. उस समय वेद, पुराण और उपनिषद का प्रचलन था. साथ ही नास्तिकवाद भी प्रचलित था. और नास्तिक वाद में भी कई तरह की विचार धाराएं चल रहीं थीं. इन नास्तिकों का कोई बड़ा संगठन या ग्रुप नहीं था. फिर भी नास्तिक विचारकों या उनके शिष्यों की कमी नहीं थी. ये ज्यादातर वैदिक ज्ञान और कर्मकांड को नकारते थे और वेदों से अलग हट कर जीवन के उद्देश्य की खोज में लगे हुए थे. ज्यादतर भिक्षा पर या जंगल के कंद मूलों पर निर्वाह करते थे, नंगे या कम से कम कपड़े और सामान रखते थे. इन्हें श्रमण या शर्मन कहा जाता था.

इन नास्तिकों में चार्वाक का नाम प्रसिद्ध है. ये कौन थे इसकी ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है. चार्वाक कोई व्यक्ति था या केवल एक विचार धारा ये भी पता नहीं. चार्वाक शब्द का मूल चारू+उव्वाच याने सुंदर वाक्य भी बताया जाता है जिन्हें बोल कर लोगों को कर्मकांड के विरुद्ध बताया जाता था! जो भी हो इस विचार धारा में प्रभु, परलोक, आत्मा या परमात्मा का अस्तित्व नहीं है. चेतन शरीर के समाप्त होते ही सब कुछ विलीन हो जाता है. इसलिए यह कहा गया कि किसी भी तरह के वैदिक कर्मकांडों की आवश्यकता नहीं है. चार्वाक की एक कहावत प्रसिद्ध है - "ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत, यावाज्जिवेत सुखं जीवेत!" अर्थात जब तक जियो सुख से जियो, घी पियो चाहे ऋण ही लेना पड़े.

चार्वाक के अतिरिक्त कुछ और नास्तिक सन्यासियों का किसी ग्रन्थ या कथा में जिक्र किया गया है वो हैं:

* अजीत केशकामब्ली जो 'अक्रियावाद' के पक्षधर थे. उनके अनुसार ब्रह्माण्ड धरती, वायु, जल और अग्नि का मेल है. मृत्यु के पश्चात कोई जीवन नहीं है. किसी की हत्या करने में पाप नहीं है और किसी भी तरह से आनंद लेने में बुराई नहीं है.

* संजय वैरात्रिपुत्र के अनुसार जो होना है वो होता है और होनी अनहोनी को रोका नहीं जा सकता. आत्मा, परमात्मा और किसी भी तरह के सिद्धान्त के कोई मायने नहीं हैं. इस धारा को विक्षेप्वाद या 'अज्ञान' वाद भी कहा गया है.

* निर्गंठ नटपुत्र जैन दर्शन के उपासक थे और तीर्थांकर पार्श्व के शिष्य कहे जाते थे. ये नंगे रहते और विश्चास करते थे की इस जन्म में जो हो रहा है वह पिछले जन्मों के कर्मों का फल है. घर बार सब कुछ त्याग करके अगर तपस्या करें और ब्रह्मचारी रहें तो पिछली गलतियाँ सुधारी जा सकती हैं. उनका कहना था कि अहिंसा परम धर्म है.

* मख्खाली गोसाल भी नग्न सन्यासियों में थे. कहा जाता है की मख्खाली जैन तीर्थांकर महावीर के अनुयायी थे. उनके अनुसार मनुष्य की कोई स्वतंत्र इच्छा या कर्म नहीं हैं बल्कि नियति के अनुसार सभी बंधे हुए हैं और सभी को संसार की हरेक योनि में से गुजरना है. नियति के आधार पर ही संसार में आवागमन चलता रहता है.

* पूरण कश्यप भी अक्रियावाद के समर्थक थे. उनके अनुसार मनुष्य को हत्या या चोरी करने से पाप नहीं लगता और भला कार्य करने से पुण्य नहीं मिलता.

* पाकुड़ कात्यायन के अनुसार सात तत्व स्वयंभू हैं ना बनाए जा सकते हैं और ना ही मिटाए जा सकते हैं. ये हैं पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, सुख, दुःख और जीव. मनुष्य का शरीर इन्हीं तत्वों में विलीन हो जाता है और सब कुछ यहीं समाप्त हो जाता है.

जैन और बौद्ध धर्मों में भी नास्तिकवाद का पुट है. गौतम बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व पर ना हाँ कहा ना ही ना. उन्होंने ये कहा की पहले बताये मार्ग पर चलो बाद में पूछना.

प्रकृति की गोद में 

नोट: मैं एक जिज्ञासु की तरह गौतम बुद्ध का मार्ग समझाने की कोशिश कर रहा हूँ. भूल-चूक के लिए क्षमा.



Thursday, 31 August 2017

विपासना शिविर में तीसरा दिन

तीसरे दिन सुबह चार बजे दरवाज़े के पास फिर घंटी बजने लग गई. पर इस बार देर नहीं की और तुरंत बिस्तर छोड़ दिया. ठन्डे पानी में गोता भी मार लिया और साढ़े चार बजे की घंटी से पहले ही मैडिटेशन हाल में अपने आसन पर विराजमान हो गए. आज मन बना लिया था कि साढ़े चार से साढ़े छे बजे तक के( पांच मिनट का ब्रेक है बीच में ) जो दो सेशन होते हैं वो दोनों सीरियसली करने हैं. पहला सेशन बेहतर रहा काफी देर तक मन को सांस पर जमाए रखने में सफलता मिली. पर मन की भटकन बीच बीच में आती रही. पर अब ऐसा आभास हुआ कि लगातार अभ्यास अगर किया जाए तो मैडिटेशन किया जा सकता है. ब्रेक के बाद दूसरा सेशन ज़रा ढीला चला. जो भी कारण रहा हो ध्यान बार बार हट रहा था और मन को खींच कर सांस पर लाना पड़ रहा था.

साढ़े छे के बाद एक घंटे का अवकाश नाश्ते वगैरा का था. जल्दी से पहले कपड़े धो लिए और फिर डाइनिंग हॉल में पहुंचे. आज नाश्ता ज्यादा नहीं लिया ताकि बाद में लगातार बैठने में असुविधा ना हो. नाश्ते के समय भी किसी से बात नहीं करनी थी इसलिए अपनी थाली लेकर दीवार की तरफ मुंह करके चुपचाप खा लिया. प्लेट, कटोरी, चम्मच और गिलास खुद ही धोने होते हैं सो धोकर रख दिए और बाहर आकर दस मिनट की चहलकदमी की.

ये सैर भी परिसर के अंदर ही करनी होती है इसलिए शांतिपूर्वक हरी हरी घास देखते हुए की. इस सैर में ख़याल आया कि यहाँ का खाना सादा सा है मिर्च मसाले हैं नहीं और तला हुआ कुछ भी नहीं है पर फिर भी अच्छा लग रहा है. घर में मिर्च्च ज्यादा डल जाए या मनपसन्द चीज़ ना बने तो कैसे बवाल होता है. घर में कभी बर्तन धोये नहीं यहाँ बर्तन भी अच्छी तरह चमका के धो दिए. बर्तन धोकर रखे भी इस तरह की आवाज़ ना हो. आश्रम में लगभग सौ से ज्यादा लोग थे पर कोई आवाज़ नहीं थी. केवल बीच बीच में चिड़ियों की आवाजें आती थी. अपने आप से बात करने का अच्छा मौका था. कभी इस तरह से स्वयं से बात की भी नहीं थी याने अपने आप से ही अनजान?

शायद हर धर्म में कहा गया है कि अपने को पहचानो पर पढ़ कर या सुनकर ये बात वहीं ख़तम हो जाती है. फुर्सत कहाँ है और कौन कोशिश करता है अपने को पहचानने की ?  यहाँ तो अखबार भी नहीं था, टीवी या रेडियो भी नहीं था तो पूरी शान्ति थी. मैच कौन जीता या मैच हुआ भी या नहीं ये भी नहीं पता. किसी से बहस नहीं, बात नहीं तो और ज्यादा शांति. मन में आया कि इस तरह से भी तो शान्ति के साथ घर में भी तो रहा जा सकता है. पर हम चाहें और निश्चय कर लें तभी ना! बच्चों का फोन नहीं आया और ना ही आ सकता था. हमने भी फोन नहीं किया ना ही कर सकते थे. मतलब की यहाँ मेरी दुनिया में मैं हूँ और बच्चे अपनी दुनिया में हैं. ये भी भ्रम टूटने लगा की उन्हें हमारी जरूरत है या हमें उनकी जरूरत है. फिर भी मन में उथल पुथल तो जारी रही.

दस मिनट के लिए कमरे में जाकर कमर सीधी की तो देखा कि दूसरे सज्जन जो मेरे साथ पार्टनर थे सामान समेत जा चुके हैं. अब पूछें किससे और बताएं किसको? 50-55 की उमर रही होगे रात को गोली खाकर सोते थे और उनकी खिड़की में तीन तरह की दवाई की शीशियाँ रखी हुई थी जो अब नहीं थी. बहरहाल यहाँ के नियमानुसार हमारी वार्तालाप भी नहीं हुई थे. उसके बाद कभी मुलाकात भी नहीं हुई. कोर्स की समाप्ति के बाद जानकारी मिली कि कुछ लोग कोर्स बीच में ही छोड़ कर चले भी जाते हैं. तीसरा और चौथा दिन महत्वपूर्ण दिन है और कहा जाए की साधक के परीक्षा के दिन हैं तो ठीक रहेगा.

पर हमने तो ठान लिया था की पूरे दस दिन लगाने हैं और बिना घबराए अच्छे से लगाने हैं. अपने को कुछ तो नए वातावरण में ढाल लिया था और आगे भी ढाल लेंगे. तीनों दिन असुविधा भी हो रही थी और जो होनी ही थी. और ऐसा भी लगा कि तीन दिन में ऐसी कोई क्लास नहीं हुई जिसमें बुद्ध और उनके मार्ग के बारे में कुछ बताया गया हो. दिन के अभ्यास के अंत में गोयनका जी का वीडियो भाषण होता है उसी में दिन की कारवाई पर चर्चा होती  है और अगले दिन के लिए इशारा कर दिया जाता है.  लेकिन बाद में जो जब दूसरा शिविर किया और बीच में पढ़ाई भी की तो समझ में आया की हमने यहाँ आकर क्या किया. ये भी विचार आया की अपने कपड़े, खाने, और रहने के तौर तरीके बदल कर खुद को भी बदला है. ये कदम मन की शांति की ओर ले जाने वाले कदम हैं, सरल जीवन की ओर जाने वाले कदम हैं.

सबका मंगल होए 



Tuesday, 29 August 2017

विपासना शिविर में दूसरा दिन

घंटी की आवाज़ से पता लगा की सुबह के चार बज गए हैं और अब उठ जाना ही ठीक है. अगर बिस्तर छोड़ कर लाइट नहीं जलाई तो दरवाज़े के बाहर घंटी बजाने वाला सेवादार घंटी बजाना बन्द नहीं करेगा. इसके बाद साढ़े चार बजे घंटी फिर बजेगी और कहेगी 'पधारो मैडिटेशन हॉल में' ! अगर तो आप स्वेच्छा से और स्वाभाविक रूप से पहली घंटी की आवाज़ से उठ जाते हैं तो बहुत ही अच्छी बात है और अगर नहीं तो शायद आपको थोड़ा बहुत लगाव है नींद से. ये लगाव या राग आगे जाने में रुकावट है और इसे त्यागना होगा. मुझे लगता है कि धीरे धीरे त्यागा भी नहीं जाता एक झटके में ही त्यागना ठीक रहता है.

असल में शिविर में आने से पहले रहने-सहने, खाने-पीने और सोने का एक स्टाइल था. ये स्टाइल गलत था या सही वो तो अलग बात है पर जो भी था हम तो उसी के ही गुण गाते थे और उसे ही सही बताने का यतन भी करते थे. भाई मैं तो ग्यारह बजे से पहले सो नहीं सकता और सात बजे से पहले उठ नहीं सकता. मैं सही हूँ और नहीं बदल सकता बस यही अटल सत्य है ! बहरहाल यहाँ आकर अटल सत्य का भ्रम या नींद का लगाव टूट गया और नींद से प्रेम में कमी हो गई है.

वैसे तो दिन भर का काम तो हल्का ही था कौन से हल चलाने थे. मैडिटेशन हॉल में अपने आसन पर बैठना और बैठकर फिर से सांस को देखना है. पर जब करने बैठे तो कमर और घुटने में फिर से दर्द होने लग गया. लगातार बैठा नहीं जा रहा था पर बैठना ही था. कुछ क्षणों के लिए साँस देखते फिर मन सांस से हटकर दाएं बाएं भाग जाता. फिर भटकते मन को खींच कर बार बार सांस पर लाना पड़ता. बीच बीच में उकताहट होने लगती और मन बैचैन हो जाता. दर्द से कराह भी नहीं सकते थे. आचार्य जी से भी कहा की घुटने बुरी तरह से दर्द कर रहे हैं. जवाब में उन्होंने संक्षिप्त उत्तर दिया कि अभ्यास करते रहिये ठीक हो जाएगा. उस वक़्त तो ये जवाब सुनकर तसल्ली नहीं हुई.

वैसे तो कहा हुआ था कि आँखें बंद रखनी है पर चोरी चोरी कनखियों से हॉल में नज़र मारी. इक्का दुक्का को छोड़कर सभी महिलाएं हिल जुल रही थीं और बैचेन लग रही थीं. पुरुष वर्ग का भी वही हाल था. लेकिन कुछ मानुस अपने स्थान पर पूरी गंभीरता से डटे हुए थे. दो एक ऊँघ भी रहे थे. मन थोड़ा आश्वस्त हुआ कि ज्यादातर साधक लोग हमारी तरह हिचकोले ही खा रहे हैं! गौर फरमाइए चूँकि दूसरे लोग डांवांडोल हैं तो हमें कुछ संतोष हुआ.

एक और समस्या खड़ी हो गई थी. खड़ी क्या हो गई बल्कि खुद ही खड़ी कर ली थी. रात सात बजे के बाद कोई डिनर विनर तो होता नहीं इसलिए मन में ये ख़याल आया की नाश्ता थोड़ा ज्यादा कर लिया जाए. नाश्ते में फल, दूध,चाय, के अलावा अंकुरित दालें और पोहा भी था. पोहा ज्यादा खाया ये सोच कर की पिछली शाम भी डिनर नहीं था और आज शाम भी नहीं होगा. इस भारी नाश्ते के बाद की बैठकों में ढंग से बैठा नहीं गया. पर उस दिन के बाद फिर दोबारा ऐसी गलती नहीं की.

यह  सोच कर ही अजीब लग रहा था की हम बैठे सांस को देखे जा रहे हैं जबकि पूरा दूसरा दिन भी गुज़र गया और बुद्ध के उपदेशों के बारे में कुछ बताया ही नहीं जा रहा? ये सांस को देखने का काम तो घर में ही कर लेते? पर फिर ये भी समझ आने लगा कि सिद्धार्थ गौतम की साधना कितनी कठिन रही होगी. हम तो ए सी कमरे में बढ़िया से गद्दे पर बैठे आधा अधूरा ध्यान लगाते हैं तब तक हमारे लिए कोई खाने पीने का इन्तेजाम करता है पर सिद्धार्थ गौतम के लिए ऐसा कुछ भी नहीं था.

शाम के गोयनका जी के वीडियो में यही सब सवालों पर चर्चा हुई और तीसरे दिन के लिए फिर से ज्यादा मेहनत करने के लिए कहा गया.

सबका मंगल होए 


नोट: बतौर जिज्ञासु गौतम बुद्ध का बताया मार्ग समझने की कोशिश कर रहा हूँ. भूल-चूक के लिए क्षमा 




Saturday, 26 August 2017

विपासना की शुरुआत

विपासना शिविर में हर तरह के लोग मसलन देशी और फिरंगी, अलग अलग धर्म के और अलग अलग आयु वर्ग के नज़र आये. कुछ को अंग्रेजी नहीं आती और कुछ को हिंदी. खैर एक दूसरे की मदद से फॉर्म भरकर पंजीकरण की कारवाई हो जाती है. पंजीकरण के बाद कमरा नंबर बता दिए गए. पर रुकिए सबसे जरूरी काम तो अब करना है. एक पोटली में अपना पर्स, मोबाइल, चाबियाँ, कैश जमा करने हैं और उस पोटली पर नाम की पर्ची चिपकानी है. पोटली जमा और आप खाली जेब याने निहत्थे! यूँ समझिये कि आपने दस दिन के लिए गृह त्याग दिया.

आश्रम में साधकों के लिए कोई मूर्ती, मंदिर, टीवी, अखबार या इन्टरनेट की सुविधा नहीं है. कमरों के बल्ब जीरो वाट के हैं तो आप कुछ पढ़ भी नहीं सकते. पहली मीटिंग में सभी को बता दिया जाता है कि आपस में बात ना करें, एक दूसरे को देखें नहीं. चार बजे सुबह की घंटी बजेगी तो बिस्तर छोड़ दें और साढ़े चार बजे मैडिटेशन हॉल में अपना स्थान ग्रहण करें. पद्मासन, या आलथी पालथी या चौकड़ी लगाकर आसन पर बैठें और सांस को देखने का प्रयास करें अभ्यास करें.

इससे आसान क्या बात हो सकती है कि आप आराम से बैठकर सांस को देख रहे हैं बहुत सिंपल - ना सांस को घटाना है, ना सांस को बढ़ाना है बस केवल देखना है. सांस चल रही है और आप देख रहे हैं. आप कितनी देर तक ये कारवाई कर सकेंगे? मुझे तो शायद दो तीन मिनट सांस पर ध्यान रहा होगा और फिर ध्यान हट कर दूसरी बातों में लग गया. माथे पर लगातार एक विचारों की विडियो चलती रहती है और ध्यान उसमें चला गया. मन को खींच कर फिर वापिस सांस पर लाया तो दो चार मिनट सांस पर रहा और फिर भटक गया! ये सिलसिला पूरा दिन ही जारी रहा. इतनी सरल सी बात पर काम करना कितना कठिन है.

ध्यान पर इन्टरनेट और किताबों में बहुत सामग्री मिलेगी. ध्यान लगाने के लिए प्राचीन काल से ही श्वास या सांस का एक महत्वपूर्ण आधार रहा है. तन, मन और श्वास का सामंजस्य या synchronisation जरूरी है. वैसे भी श्वास है तो जीवन है और श्वास रुका तो छुट्टी! सांस पर देर तक नियंत्रण पा लेना या सांस पर देर तक नज़र रख पाना एक तरह से प्रारम्भिक कदम है जो आगे ध्यान और समाधि लगाने में सहायक है. ध्यान देने वाली बात है कि ध्यान शब्द के माने attention और meditation दोनों ही तरीके से लिए जाते हैं सन्दर्भ को ध्यान में रखना होगा. दूसरी बात यहाँ मन शब्द का अर्थ है चित्त या mind या दिमाग.

प्राचीन काल में सांस पर ध्यान लगाने की तीन विधियाँ प्रचलित थीं - प्राणायाम, आनापान सति और समाधि. प्राणायाम अष्टांग योग का एक महत्वपूर्ण अंग है. अष्टांग योग के आठ अंग हैं - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि. योगाभ्यास में प्राणायाम कई प्रकार से किया जाता है जैसे की अनुलोम विलोम, कपाल भाति, भस्त्रिका, भ्रामरी गुंजन आदि. प्राणायाम की इन क्रियाओं से सांस को स्थगित करना और नियंत्रण में लाना आसान हो जाता है. फलस्वरूप ध्यान लगाने में आसानी हो जाती है. योग में ध्यान का मतलब इस तरह से कहा गया है की शरीर स्थिर और मन शांत होने के बाद मन के विचारों का शून्य हो जाना.

आनापान सति विधि में सांस पर नियंत्रण की बात नहीं कही गई है. स्वाभाविक रूप से जो सांस आ रहा है या जा रहा है उसके प्रति जागरूक रहना है. सांस को बढ़ाने या घटाने की कोशिश नहीं करनी है. हो सकता है कि सांस एक नासिका से आए या दोनों नासिकाओं से, सांस छोटी हो या लम्बी, ठंडी आए या गर्म पर हमें किसी भी दशा में सांस से छेड़ छाड़ नहीं करनी है बल्कि उसे केवल जानना है, उसके प्रति जागरूक रहना है या यूँ कहिये कि सांस के प्रति चैतन्य रहना है. आनापान सति की ये विधि गौतम बुद्ध के बताए मार्ग का प्रारम्भिक पर बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है.

सांस को खींच कर अंदर भर लेना और देर तक रोके रखना( आतंरिक कुम्भक ) या फिर सांस को बाहर निकाल कर देर तक सांस ना लेना( बाहरी कुम्भक ) बहुत ही कठिन है पर इस विधि से भी ध्यान और समाधि लगाने का जिक्र कई ग्रंथों में हुआ है.

विपासना का पहला दिन सांस को देखने में ही गुज़रा. बीच बीच में नाश्ते या खाने या शाम की चाय के लिए छुट्टी मिली पर उसके अलावा एक ही काम था बैठना और सांस पर ध्यान देना. शाम सात बजे के बाद खाना नहीं मिलता है. शाम को लगभग एक घंटे का गोयनका जी का विडियो चलाया जाता है जिसमें आज की गई कारवाई से उठे प्रश्न और विचारों की समीक्षा की जाती है और अगले दिन की कारवाई की जानकारी भी दी जाती है. दिन में कोई अलग से लेक्चर नहीं होता है. पर आचार्य हॉल में मौजूद रहते हैं उनसे ब्रेक के दौरान अलग से बात की जा सकती है.

सारा दिन एक ही तरीके से बैठने से कमर, कंधे, गर्दन, एड़ियां और घुटने दुखने लगे. थोड़ा बहुत हिलने से कुछ मिनटों के लिए आराम मिलता पर फिर थकावट और दर्द शुरू हो जाता. इस दौरान एक बात जरूर नोटिस की कि अगर ध्यान सांसों पर रहता है तो दर्द भूल जाता है. जैसे ही सांसों से ध्यान हटता है तुरंत दर्द याद आ जाता है और ऐसा लगता है कि दर्द बढ़ गया है. दर्द से मन को खींच कर अगर वापिस सांस पर ले आएं तो दर्द घटा हुआ महसूस होता है या गायब ही हो जाता है. मन की इस स्थिति पर विचार करें कि ऐसा क्यूँ होता है? ये आगे चलकर बहुत काम आएगा.

नोट: जिज्ञासा -वश गौतम बुद्ध का बताया मार्ग समझने की कोशिश कर रहा हूँ. भूल-चूक के लिए क्षमा 


सबका मंगल होए 



Wednesday, 23 August 2017

मकड़ी का जाल

घर के बाहर बच्चों का शोर हो रहा था. जाकर देखा तो वो सब एक मकड़ी के जाल को देख रहे थे और उस मोटी मकड़ी को डंडा मारने की तैयारी में थी. किसी का कहना था कि जहरीली है किसी का कहना था नहीं कुछ नहीं कहेगी. लगभग 8 फीट की उंचाई पर दो पेड़ों के बीच में काफी बड़ा जाल था. और मकड़ी क्या थी काफी बड़ा मकड़ा था जो पहले कभी नहीं देखा. मकड़े का जाल सुबह हुई हलकी बूंदा बांदी भी झेल गया था.

इन्टरनेट की जानकारी के अनुसार बर्फीले इलाकों के अलावा ये सभी जगह पाई जाती है. मकड़ियां लगभग 46000 प्रकार की पाई गई हैं और पिछले 20 करोड़ साल से चली आ रही हैं. इनके अवशेष पुरानी चट्टानों में अक्सर पाए जाते हैं. इनमें से कुछ प्रजातियों की आयु दो साल से लेकर 20 साल तक भी पाई गई है. 2008 में एक शाकाहारी प्रजाति भी रिकॉर्ड की गई है. अन्यथा तो ये कीट पतंगे का शिकार करती हैं. ऑस्ट्रेलिया की एक मादा मकड़ी ऐसी भी है जो मिलन के दौरान अपने नर पार्टनर का भी शिकार कर डालती है!
हमारी इस नई पड़ोसन की कुछ फोटो:


बड़ी मेहनत से जाल में अलग से चार खुबसूरत भुजाएं बनाई हुई हैं . इस फोटो में मकड़ी का निचला हिस्सा दिखाई पड़ रहा है 

जाल की लम्बाई कहीं तीन फुट कहीं चार और कहीं पांच फुट है. इसी तरह चौड़ाई भी अलग अलग है. कुर्सी पर खड़े होकर सामने से लिया हुआ फोटो 

बैकग्राउंड में प्लेन काला कागज़ रख कर ये फोटो खींची ताकि जाल के बारीक ताने बाने दिखाई पड़ सकें 

मकड़ी की उंचाई लगभग साढ़े सात आठ फुट होगी इसलिए कुर्सी का इस्तेमाल करना पड़ा

पैरों के बीच 5 - 6 सेंटीमीटर का फासला है चार पैर छोटे हैं और चार लम्बे 

video



मकड़ी याने Spider के बारे में वैज्ञानिक सूचना:

Kingdom - Animalia
Phylum - Arthropoda
Sub phylum - Chelicerata
Class - Arachnida
Order - Araneae
113 families
46000 species




Sunday, 20 August 2017

हम चले विपासना करने

पेंशन मिल जाने के बाद बैंक की रोज़मर्रा की व्यस्तता ख़त्म हो गई. अब नाश्ते का समय 8 बजे से खिसक कर 9 बजे पहुँच गया. अखबार जो कभी दस मिनट में निपट जाता था अब दो तीन घंटों तक खींचता चला जाता है. दफ्तर जाना नहीं तो क्या जूते चमकाने और क्या टाई लगानी. अब लोगों को जल्दी जल्दी दफ्तर जाने की तैयारी करते देख कर मुस्कराहट आ जाती थी - बच्चू और तेज़, और जल्दी कर, और भाग और कमा ले. कभी हम भी तेरी तरह दफ्तर की तरफ दौड़ते थे, बच्चों के स्कूल में रिजल्ट लेने जाते थे और श्रीमती को शौपिंग कराते थे. अब आराम करते हैं, घूमते रहते हैं और दोस्तों यारों से गप्पें मारते हैं. किसी का पुराना शेर है,
तुम काम करते हो मैं आराम करता हूँ,
तुम अपना काम करते हो मैं अपना काम करता हूँ !

गप्पों की महफ़िल में कभी कभी सीरियस धार्मिक मुद्दे भी आ जाते हैं. धर्म की बहस अगर शुरू हो जाए तो बहुत लम्बी और टेढ़ी मेढ़ी चलती है. नास्तिकवाद से लेकर कट्टरवाद, स्वर्ग से लेकर नर्क और योगासन से लेकर जिम तक याने सब कुछ ही शुरू हो जाता है. और मजे की बात है की ज्यादातर दोस्त यारों ने धार्मिक ग्रन्थ पूरी तरह पढ़े भी नहीं. और अगर पढ़े तो मनन नहीं किया. कुछ ज्ञान तो टीवी धारावाहिक को सच मान कर ही ले लिया. मेरे से पूछें तो मुझे पता नहीं भगवान है या नहीं. ग्रन्थ कभी पढ़े नहीं क्यूंकि भारी भरकम हैं और चलते फिरते नहीं पढ़े जा सकते. पूजा पाठ कभी किया नहीं कभी कभार दिवाली में या किसी हवन जागरण में हाथ जोड़ दिए और कुछ पैसे डाल दिए कथा समाप्त. कभी किसी को गुरु बनाने या समझने की कोशिश भी नहीं की. भगवान से कभी ना लगाव हुआ और ना ही डर लगा. ना नास्तिक ना आस्तिक अर्थात जैसा चल रहा है सब ठीक है. मन शांत है तो सब ठीक है.

ऐसी ही एक गप्प गोष्ठी में मैडिटेशन की बात चल पड़ी. किसी ने कहा ध्यान लगाने से बहुत शांति मिलती है, एक सज्जन ने बताया कि कुंडलिनी जाग जाएगी, दूसरे ने कहा ईश्वर के नज़दीक पहुँच जाएंगे वगैरा वगैरा. किसी दोस्त ने किसी बाबा का कार्यक्रम बताया और किसी ने दूसरे, तीसरे और चौथे बाबा का नाम बताया. ध्यान के बारे में थोड़ी सी ही जानकारी थी जो योगाभ्यास सीखने के समय बताई गई थी. 1995 में जब दिल्ली में भारतीय योग संस्थान से योग सीखा तो उसमें प्राणायाम भी सीखा. योगासन और प्राणायाम करने के बाद चौकड़ी मार कर बैठने के लिए कहा जाता था. फिर कमर गर्दन सीधी, आँखें कोमलता से बंद करके दोनों आँखों के बीच माथे पर आज्ञा चक्र पर ध्यान देने को कहा जाता था. वैसा ही करते भी थे. पर फिर नौकरी में इधर उधर ट्रांसफर होती रही तो योगासन और प्राणायाम तो जारी रहा पर ध्यान बंद हो गया.

घर आकर श्रीमती से जिक्र हुआ तो उन्हें एक सहेली की याद आई जो दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थी और जिसने दस दिन का विपासना मैडिटेशन कोर्स किया था. और प्रोफेसर ने दस दिन का कोर्स बहुत मुश्किल कोर्स बताया था. ये भी पता लगा कि तिहाड़ जेल में भी विपासना कराई जाती है. यहाँ ज़रा सा खटका लगा की शायद अपराधियों के लिए कोई मनोवैज्ञानिक कार्यक्रम चलाया जाता होगा? ऐसे शिविर में जाना ठीक रहेगा क्या ?

और जानकारी के लिए गूगल बाबा की सहायता ली तो हजारों पेज हाजिर हो गए. मालूम हुआ कि सत्य नारायण गोयनका जी के दस दस दिन के कोर्स दुनिया भर में जगह जगह होते हैं. भारत में भी 40 - 45 केंद्र हैं. हमने देहरादून चुना और दोनों ने एप्लाई कर दिया. शर्तें कठिन थी. दस दिन मौन रखना होगा. चलिए मान लिया. किसी से इशारे से या आँखों से भी बात नहीं करनी है याने आर्य मौन. इसका तो पालन कर लेंगे. श्रीमती दस दिन चुप रहेंगी ये तो वाकई देखने वाली बात है! पुरुष और महिलाएं अलग अलग रहेंगे. ये भी साधारण सी शर्त है जो मान्य है. शरीर ढका रहेगा और परफ्यूम नहीं लगाएंगे. कोई दिक्कत नहीं. सात बजे के बाद डिनर नहीं होगा. चलिए ये भी मान लिया. तो बस फिर रेडी? बाकी जो होगा वहीँ जाकर देखा जाएगा. जो विपासना में अनुभव हुए वो आपसे शेयर करते चलेंगे.

गौतम बुद्ध के समय पाली भाषा प्रचलित थी जिसमें पस्सना शब्द का अर्थ है देखना और विपस्सना का अर्थ है अच्छी तरह देखना याने reality check. यह विपासना एक ध्यान या मैडिटेशन की पद्धति है जिसे गौतम बुद्ध ने ढाई हज़ार साल पहले पुनः जीवित कर दिया था. संस्कृत में इन शब्दों का पर्याय है पश्यना और विपश्यना और अब आम तौर पर कहा जाता है विपासना. गौतम बुद्ध स्वयं कहते थे,
'इहि पस्सिको!' अर्थात
'आओ और ( स्वयं ) देखो!'

शाक्यमुनि गौतम बुद्ध 



   

Wednesday, 16 August 2017

गौतम का गृह त्याग

गौतम बुद्ध का जन्म ईसापूर्व 563 में लुम्बिनि में हुआ था. उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया था और चूँकि गोत्र गौतम था इसलिए सिद्धार्थ गौतम कहलाए. सिद्धार्थ कपिलवस्तु राज्य के राजकुमार थे जो शाक्य वंश का राज्य था और राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के पिता शुद्धोधन वहां के राजा थे. सिद्धार्थ को बचपन में राजकुमारों जैसी शिक्षा दीक्षा दी गई. उन्हें अस्त्र शास्त्र का ज्ञान दिया गया और अभ्यास भी कराया गया. राजकुमार की शादी 18 वर्ष की आयु में एक स्वयंवर में यशोधरा से हुई जो 16 वर्ष की थी. राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के लिए पिता शुद्धोधन ने तीन महल बनवा दिए थे एक सर्दी के लिए, दूसरा गर्मी के लिए और तीसरा वर्षा ऋतु के लिए. स्वस्थ, सुंदर और नौजवान दास दासियाँ उनकी सेवा में रहती ताकि राजकुमार को किसी भी तरह का कष्ट ना हो ना ही कोई कष्ट से पीड़ित इंसान देखने को मिले. उनके बारे में भविष्यवाणी की गई थी कि या तो वे चक्रवर्ती राजा बनेंगे या फिर बहुत बड़े संत.

गौतम बुद्ध के जीवन के बारे में इस तरह के लेख स्कूलों और अन्य किताबों में आम हैं. कुछ ऐसी घटनाओं का भी वर्णन है जिनके कारण सिद्धार्थ के मन में विरक्ति जागी और वो राज पाट, महल और परिवार छोड़ कर सत्य की खोज में निकल पड़े. यूँ तो सिद्धार्थ विलासिता में रहते थे पर जब अपने रथ पर सवार होकर महल से बाहर निकले तो चार ऐसे दृश्य उन्हें देखने को मिले जिन्हें देख कर सिद्धार्थ को लगा की शरीर और जीवन नश्वर ही है और दुःख से पूर्ण है.

* पहली घटना में राजकुमार सिद्धार्थ को एक बूढ़ा व्यक्ति दिखाई पड़ा जिसकी कमर झुकी हुई थी और चेहरे पर झुर्रियां पड़ी हुई थीं. राजकुमार को आश्चर्य हुआ और उन्होंने अपने रथवान चन्ना से पूछा कि ये मनुष्य ऐसा क्यूँ है? चन्ना ने बताया कि सभी मनुष्य बूढ़े होते हैं और ऐसा सभी के साथ होता. राजकुमार का मन ये सोच कर खिन्न हो गया की मैं भी ऐसा हो जाउंगा?

* दूसरे दृश्य में उन्हें एक बीमार व्यक्ति दिखा जो पीड़ा से कराह रहा था. राजकुमार ने दुखी मन से रथवान से पुछा तो चन्ना ने बताया बीमारी तो किसी भी मनुष्य को लग सकती है और इसी तरह पीड़ा दे सकती है.

* तीसरी यात्रा में राजकुमार को एक शव दिखा. इस बार भी चन्ना ने जवाब दिया कि मृत्यु तो एक ना एक दिन सभी की होती है और मृत शरीर ऐसा ही हो जाता है. इन तीन अप्रिय घटनाओं को देखकर राजकुमार का मन बड़ा दुखी हुआ.

* चौथी बार उन्हें एक संतुष्ट सन्यासी दिखा. राजकुमार को लगा की सन्यासी दुःख तकलीफों से छुटकारा पा चुका है और खुश है. अगर वह स्वयं भी इसी तरह सन्यास धारण कर लें तो अप्रिय दुखों से बच जाएगें.

इन घटनाओं के अतिरिक्त एक और घटना का जिक्र डॉ भीम राव अंबेडकर की पुस्तक 'भगवान् बुद्ध और उनका धम्म' में है जो काफी हद तक तर्क संगत लगती है. इस घटना का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है. बौद्ध कालीन उत्तरी भारत में राजनीति और शासन कैसे चलता था इसके बारे में जानकारी कम है. इतिहासकारों के अनुसार कुछ राज्य बड़े थे और जनपद कहलाते थे जैसे की काशी, कौशल, मगध इत्यादि. वहां राजा थे और वंश के आधार पर राज करते थे. कुछ संघ या गण कहलाते थे जो छोटे थे और शायद वहां कुलीन घराने राज करते थे. ये संघ या गण किसी न किसी जनपद के राजा के आधीन हुआ करते थे.

शाक्यों का संघ कपिलवस्तु भी कुछ ऐसा ही छोटा संघ रहा होगा. कपिलवस्तु की सीमा से लगा हुआ एक और संघ कोलियों का था. इस कोलियों का संघ रामगाम कहलाता था. ये दोनों संघ कौशल राजा के आधीन कहे जाते थे. इन दोनों राज्यों  के बीच रोहिणी नदी थी जो एक सीमा रेखा थी. नदी का पानी शाक्य और कोली दोनों ही खेती के लिए इस्तेमाल करते थे पर यदा कदा पानी के उपयोग को लेकर दोनों पक्ष आपस में झगड़ भी पड़ते थे. आरोप प्रत्यरोप लगाते की पानी का ज्यादा उपयोग दूसरे पक्ष ने कर लिया.

ऐसे ही एक झगड़े की सूचना एक दिन कपिलवस्तु के दरबार में पहुंची कि नदी के पानी को लेकर दोनों ओर के लोग झगड़ पड़े हैं और हताहत भी हुए हैं. इस पर शाक्य सेनापति ने शाक्य संघ की मीटिंग बुलाई जिसमें सिद्धार्थ गौतम भी शामिल हुए. सेनापति ने घटना के बारे में सूचना दी और कोलियों पर आक्रमण करने का प्रस्ताव किया. इस पर राजकुमार सिद्धार्थ ने युद्ध का विरोध किया और कहा,

- युद्ध से समस्या का हल नहीं होगा. इससे एक नए युद्ध का बीजारोपण हो जाएगा. जो किसी की हत्या कर देता है उसकी हत्या करने कोई और आ जाता है, जो किसी को लूटता है उसे लूटने कोई और आ जाता है. अवैर से ही वैर शांत हो सकता है.

परन्तु सेनापति का आक्रमण का प्रस्ताव बहुमत से मान लिया गया जबकि सिद्धार्थ का फलसफा भरा प्रस्ताव नहीं माना गया. युद्ध की घोषणा हो जाने के बाद युद्ध का विरोध करना दण्डनीय अपराध था. अब युद्ध के विरोधी होने के कारण सिद्धार्थ के लिए कठिन स्थिति पैदा हो गई. अब तो सामने तीन रास्ते थे,
- युद्ध में भाग लेना अन्यथा,
- फांसी पर लटकना या देश निकाला स्वीकार करना या फिर
- परिवार का बहिष्कार सहना और खेत खलिहान से भी हाथ धोना.

राजकुमार सिद्धार्थ ने संघ को सूचित किया की वे युद्ध में भाग नहीं लेंगे चाहे जो भी सजा दे दी जाए - फांसी या देश निकाला. साथ ही राजकुमार सिद्धार्थ का ये निर्णय अपना है इसलिए परिवार को इसमें कोई दोष नहीं दिया जाए. परिवार को जीवन निर्वाह के लिए खेती बाड़ी जरूरी है उसे ना कब्जाया जाए.

सेनापति को फांसी या देश निकाला ही ठीक लगा पर इस सज़ा पर अमल करना बड़ा मुश्किल काम था. कौशल नरेश को भी अपनी कारवाई के बारे में जवाब देना होगा. फिर सिद्धार्थ साधारण व्यक्ति नहीं थे और उनके जनता जनार्दन से मधुर सम्बन्ध थे और वे सभी सिद्धार्थ का साथ दे सकते थे. इतने लोगों के साथ होने से कोई अप्रिय घटना भी हो सकती थी. सिद्धार्थ ने स्थिति को भांपते हुए सेनापति से कहा,
- इस पर भी अगर कठिनाई है तो मैं संन्यास ले लेता हूँ और परिव्राजक बन जाता हूँ और देश के बाहर चला जाता हूँ. यह भी तो देश निकाला ही है.
सेनापति को संदेह था की बिना माता, पिता और पत्नी की अनुमति के ये भी नहीं हो पाएगा. सिद्धार्थ ने विश्वास दिलाया की अनुमति मिले या ना मिले देश छोड़ दूंगा. इस आश्वासन पर सेनापति और संघ ने सिद्धार्थ की बात मान ली.

लेकिन सिद्धार्थ के माता पिता सिद्धार्थ के सन्यास के प्रस्ताव के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे. उनका कहना था कि इससे तो अच्छा है कि पूरा परिवार शाक्य देश छोड़कर कौशल जनपद में चला जाए. सिद्धार्थ ने ये बात नहीं मानी क्यूंकि ऐसी स्थिति लाने के लिए वे स्वयं को जिम्मेवार मानते थे. उधर पत्नी यशोधरा ने सिद्धार्थ के निर्णय का समर्थन तो किया परन्तु नवजात पुत्र राहुल के कारण साथ जाने के लिए तैयार नहीं हुई. सिद्धार्थ अपने फैसले पर अडिग रहे.

सिद्धार्थ अपने रथवान चन्ना के साथ भारद्वाज ऋषि के आश्रम पहुंचे जहां पर तब तक भारी भीड़ जमा हो चुकी थी. वहां उन्होंने सिर मुंडवाया क्यूंकि संन्यास के लिए आवश्यक था. पुराने वस्त्र उतार कर चन्ना को दिए और भिक्खुओं जैसे वस्त्र पहन लिए. एक भिक्षा पात्र हाथ में ले लिया. भारद्वाज ने संस्कार पूरे करके सिद्धार्थ को सन्यासी घोषित कर दिया.
सजा का पहला भाग पूरा हो गया अब दूसरे भाग में सन्यासी सिद्धार्थ को देश छोड़कर बाहर जाना था. राजकुमार ने माता, पिता, पत्नी और कपिलवस्तु की जनता से विदा ली और अनोमा नदी की ओर प्रस्थान किया. पीछे पीछे जनता भी चली तो उन्हें देख कर सिद्धार्थ ने उनसे कहा,

- भाइयों और बहनों मेरे पीछे आने से क्या लाभ? मैं शाक्यों और कोलियों के बीच झगड़ा ना निपटा सका. लेकिन यदि तुम समझौते के लिए जनमत तैयार कर लो तो तुम सफल हो सकते हो. कृपा कर के वापिस लौट जाओ.

गृह त्यागने के समय राजकुमार सिद्धार्थ गौतम की आयु 29 वर्ष थी.  

शाक्यमुनि 

  

Sunday, 13 August 2017

Nandi Hills, Karnataka

Bangaluru & nearby towns are situated on hilly plateau called Deccan Plateau. Average elevation of the Plateau is 3020 feet above mean sea level. Bangaluru has Arabian Sea on one side & Bay of Bengal on the other side both roughly 350 km away. Due to elevation & proximity to seas Deccan Plateau enjoys breezy & equable climate throughout the year. Temperature rarely goes below 12 or over 30 degrees. Several small & large hills dot the Plateau & Nandi Hills are one such example.

Nandi Hills - 4851 feet high, are located in Chikkaballarpur district approx 60 km from Bangaluru. It is 20 km off NH 7 near new Bangaluru airport.   These hills are source of rivers like Penner, Ponnaiyar, Palar & Arkavathy. Mornings are misty & cold here & you might need a jacket to ward off cold breeze. As you drive up there are a few sharp curves therefore cautious driving is suggested. Some photos:

Dense morning fog engulfs the hills
Morning mist begins to rise 

As you go up the mist thickens 

Entrance to  the Nandi Fort 

Road disappears in fog

Mystery morning mist 

Fog thickens as you go up 
Tail lights flicker in fog
On the top of the hill 
Tourists

Morning mist all around

video