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Thursday, 31 March 2016

दूसरी पारी

रिटायर हो चुके लोगों की तरफ से ना-रिटायर हुए लोगों के लिए एक शेर पेश है:
तुम काम करते हो
मैं आराम करता हूँ,
तुम अपना काम करते हो,
मैं अपना काम करता हूँ!

मतलब ये के बहुत काम कर लिया, बहुत ट्रांस्फरें झेल ली, कामचोर और चमचे देख लिए, अड़ियल और मरियल बॉस देख लिए, नखरेलु और पकाऊ जूनियर देख लिए. यूनियन के नेता और अभिनेता भी देख लिए. फाइलें देखीं जो चलती ही नहीं थी और ऐसी भी देखीं जो रूकती नहीं थी. तो अब क्या आराम भी ना फरमाएं?

दूसरी पारी की शुरुआत अपने देश में कहीं 60, कहीं 62 और कहीं 65 साल के बाद शुरू होती है. अन्य देशों में भी एक जैसी न होकर अलग अलग है जैसे कि:

देश           पुरुष           महिलाएं 

चीन          60               50-55
डेनमार्क    65-67          65-67
इजराइल   67               62      
यू के         65               60
यू एस ए    62-67          62-67
नोर्वे          67               67

इन्टरनेट में ये भी पाया कि यूरोप में 2040 तक रिटायरमेंट 70 साल तक पहुँच जाएगी. सब ठीक ठाक चलता रहा तो भारत में भी रिटायरमेंट ऐज धीरे-धीरे बढ़ सकती है.

पर रिटायर होने के बाद समय काफी होता है जिसका उपयोग घूमने, पढ़ने, गाने-बजाने, क्लब या किसी सामाजिक  कार्य में लगाया जा सकता है. इस तरह की कई चीज़ें जिनके लिए पहले इच्छा तो थी पर समय नहीं था अब की जा सकती हैं.

विकसित देशों में रिटायरमेंट के बाद घुमने की प्रथा बहुत है. तो आप भी उठाइए चाबी गाड़ी की. या फिर रेल या जहाज का टिकट कटाइये और घूमना शुरू कर दीजिये. अकेले या ग्रुप में. भारत विशाल देश है, समंदर, रेगिस्तान और बर्फीले पहाड़ सभी कुछ हैं यहाँ. मंदिर, महल और किले हैं, जंगल, नदियाँ और तीर्थ हैं कहीं न कहीं तो दिल लग ही जाएगा. रहने के लिए होटल, गेस्ट हाउस, होम-स्टे या धर्मशाला सभी स्थानों में मिल जाती हैं. कहीं कहीं वरिष्ट नागरिक को छूट भी मिल जाती हैं. इसी तरह फल, डबल रोटी, और हर तरह का हल्का खाना भी मिल जाता है. इसलिए घूमिये खूब घूमिये.

यूरोप की तरह यहाँ ओल्ड ऐज होम या मुफ्त मेडिकल वगैरा की सुविधा नहीं हैं. वहां सीनियर्स को सुविधाएं ज्यादा हैं पर हमारे यहाँ कम हैं क्यूंकि इस ओर ध्यान कम दिया गया है. सीनियर्स का और टूरिज्म का बढ़िया मेल हो सकता है जो सबके लिए फायदेमंद हो सकता है अगर सरकार ध्यान दे तो. पर फिकर-नॉट सरकार तंगदिल हो तो हो फिर भी हम तो यही कहेंगे:

तेरी तंगदिली जानता हूँ साकी,
ओक से पीता हूँ इसलिए,
कहीं तुझे अंदाज़ न हो !

टिम्बर ट्रेल, परवानू, हिमाचल 



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