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Tuesday, 21 April 2015

मील के पत्थर

मील का पत्थर या मीलपत्थर अंग्रेज़ी के शब्द milestone का पर्याय है जिसकी परिभाषा यूँ है : a stone or a post at the side of the road that shows the distance to various places, especially to nearest large town. यात्रा करते हुए अगर बीच बीच में मील पत्थर नजर आते रहें तो मन आश्वस्त रहता है की सही दिशा में जा रहे हैं। 

प्राचीन काल में रास्ता नापने के लिए 'कोस' शब्द का इस्तेमाल होता था जो चार हज़ार हाथ या दो मील या तीन किमी के क़रीब था। और मील के पत्थरों की जगह थी कोस मीनारें। एक मुहावरा तो अभी भी प्रचलित है नौ दिन चले अढाई कोस पर इसके पीछे क्या क़िस्सा है यह तो पता नहीं लगा। आपको पता हो तो बताएँ।प्रस्तुत हैं विभिन्न यात्राओं के दौरान चलते चलाते लिए गए कुछ चित्र :

राष्ट्रीय राजमार्ग 1 करनाल के पास एक मील का पत्थर या 'कोस मीनार'। यह राजमार्ग भारत का सबसे पुराना और लम्बा राजमार्ग है जो कलकत्ता को अमृतसर और पेशावर, पाकिस्तान से जोड़ता है। यह कोस मीनार सोलहवीं सदी में में बनने शुरू हुए। कहा जाता है की मुगल काल में विभिन्न राजमार्गों पर 3000 मीनारें थीं। हरियाणा और पंजाब में लगभग 70 मीनारें बची हुई हैं और लाहौर में भी कुछ बची हुई हैं। यह मीनार 30 फ़ुट ऊँचीं हैं जिन पर चूने और मौरंग का पलसतर किया हुआ है

बेलगाम रोड पर मील का पत्थर जो बरसाती घास में नजर नहीं आ रहा। ऐसे सुनसान बियाबान रास्ते पर मील पत्थर ही ढाढ़स बँधाता है। पर ऐसा मील का पत्थर जो छुपा हुआ हो उसका यात्री को क्या फ़ायदा ?

यह मील का पत्थर फिर भी बेहतर है दूर से पढ़ा जा सकता है और कमर टिकाने के भी काम आता है !

कर्नाटक टूरिज़म ने एक अच्छा काम किया है। आमतौर पर जो मील के पत्थर सड़कों के किनारे लगे हुए हैं उनके अलावा इस तरह के मीलपत्थर टूरिस्ट स्थानों पर अलग से लगाए हैं जिनसे सैलानियों को बड़ी सुविधा हो जाती है। तीनों नामों के साथ साथ बाँए किनारे पर सांकेतिक चित्र भी  बनाए हुए हैं

और अब यात्रा की रफ़्तार बढ़ गई है इसलिए मील के पत्थर की जगह ले ली साइन बोर्ड ने जो रात में चमकते भी हैं और चलती गाडी में से आसानी से पढ़े जा सकते हैं




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