हमारे गोयल साब चिंता में डूबे हुए थे; लोन करूँ या ना करूँ ? नौकरी के बस आखरी आठ महीने रह गए थे और गोयल सा किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहते थे। कहीं जाते जाते बैंक प्रेम-पत्र न थमा दे कि ये लोन क्यों किया ? चाय की चुस्की लेनी चाही तो पता चला कि चाय ठंडी हो चुकी थी। घंटी मारी और दूसरी चाय मंगाई।
फिर लोन फाइल उठा ली और पन्ने पलटने लगे। लोन के कागज़ों में से कविता की फोटो बोल रही थी: "अरे मिस्टर गोयल क्यों सोच में पड़े हो ? ढाई करोड़ का ही तो लोन है कर दो 'यस'। आपकी कलम चलने का इंतज़ार कर रही हूँ मैं !" असल में तो कविता कहना चाहती थी "ओ टकले खूसट जल्दी कर दे!"
इधर गोयल सा मन ही मन बोल रहे थे : "हे सुंदरी तुझे लोन तो दे दूँ पर फंसा ना देना। ये तेरे साथ जो कनकौवा विक्रम आ जाता है वो मुझे विक्रम कम और बेताल ज्यादा लगता है। बात सीधी-सीधी न करके पहेली बुझाता है। और पहेली सुलझाने का टाइम मेरे पास है नहीं।"
तभी गोयल सा के दिमाग में आईडिया आया क्यों ना अपने नए अफसर मनोहर नरूला को इस विक्रम की खोज खबर लेने के लिए भेजा जाए ? नरूला की रिपोर्ट देखते हैं क्या आती है तब तक कविता और विक्रम की लोन फाइल को ठन्डे बस्ते में रख दिया जाए।
पहले आपको गोयल सा से और फिर मनोहर नरूला उर्फ़ मन्नू से मिलवा दिया जाए। हमारे गोयल सा, झुमरी तलैय्या बैंक के मुख्य प्रबंधक हैं। जल्द ही रिटायर होने वाले हैं पर उनके सिर के बाल रिटायर हो चुके हैं। कान से कान तक सफ़ेद बालों की छोटी सी झालर बची है, शिखर पर चार पांच बाल सलामत हैं जो पंखे की हवा में मस्त लहराते हैं। गोयल साब बियर के शौक़ीन हैं और शायद इसलिए पेट काफी बढ़ा हुआ है। बैंक की दी हुई लाल टाई पेट पर विश्राम करती रहती है। अपनी पत्नी संध्या के बार बार कहने के बावजूद कोई सैर या कसरत नहीं करते। क्या ज़रुरत है ?
मनोहर नौजवान अफसर है और दो साल पहले बैंक ज्वाइन किया है। रहन सहन और बातचीत का देसी इस्टाइल है - भई बैंक का भी बेरा ना है. मेरठ वाले को बीकानेर भेज दे है और लखनऊ वाले को मेरठ। यो एच आर डी वाले कुर्सी पे बैठे बैठे पोस्टिंग की जलेबी बना देवे हैं। पर हमें ना फर्क पड़े क्यूं जी ? इब घरआली तो है ना, जहाँ मर्जी भेजो झोला तैय्यार है !
इतने में चपड़ासी आ कर बोला, - साब याद कर रहे आपको।
मन ही मन मनोहर बोलै - घणा अच्छा काम कर रहे साब। कोई छोरी तो याद करती ना है यो टकला ही याद करे है ! केबिन में पहुँच कर बोले - जी सर जी ?
गोयल सा बोले - मनोहर जी ये लोन फाइल कई दिनों से पड़ी है इसे पढ़ लो। एक बार इस पार्टी के घर और फैक्ट्री में विज़िट कर लो और फिर अपनी रिपोर्ट दे दो। एक हफ्ते का टाइम है आपके पास, बस अच्छी तरह से चेक कर लेना।
- जी सर जी। पूरी खोज पड़ताल कर दूंगा सर जी।
गोयल सा का मन थोड़ा शांत हुआ। शाम को घर जा कर बियर खोली और संध्या से बतियाने लगे। आखरी लोन फाइल के बारे में भी बात चल पड़ी। संध्या बोली - देखो जी ज्यादा टेंशन मत लो और शांति से अब बैंक को नमस्ते करो और रिटायरमेन्ट पार्टी करो। एक नई गाड़ी ले लो और बस फिर दोनों भारत दर्शन करने चलते हैं। कुछ टाइम बैंगलोर में बच्चों के साथ भी बिता लेंगे।
गोयल सा ने जवाब दिया - हूँ।
गोयल सा अनुभवी इंसान थे, न तो पत्नी की बात काटते थे और न ही बहस में उलझते थे। वर्ना दो तीन दिनों के लिये हुक्का पानी बंद होने का ख़तरा हो जाता है। उन्हें याद आया कि सुंदरी की लोन फाइल ले कर जब वो उसके घर गए थे तो सुंदरी ने भी ऐसा ही सवाल पूछा था - सर आप रिटायरमेंट के बाद क्या करोगे ? तो उनका जवाब था - सोच रहा हूँ एक गाड़ी ले कर संध्या के साथ भारत दर्शन करने निकल जाऊँगा। आज संध्या ने भी वही बात कर दी।
ख़ैर साब सोमवार को मनोहर अपनी रिपोर्ट ले कर केबिन में आ गया।
- सर जी ये रही लोन फाइल और मेरी रिपोर्ट।
- हूँ। अरे पहले जबानी तो बता दो के किस नतीजे पर पहुंचे- हाँ या ना, फिर पढ़ भी लेता हूँ, गोयल सा बोले।
- सर जी आप तो पेंशन लो, मैडम जी के साथ घूमो फिरो क्या करना है लोन कर के ? दिल की बात बता रहा हूँ सर जी कि यो विक्रम गुप्ता ठीक बंदा ना है। जब मैं इस लोन पार्टी के घर पंहुचा तो विक्रम ने फौरन बोतल खोल दी। सर जी दो पेग तो हमने भी खेंच लिए। बस उसके बाद तो विक्रम लगा फेंकने लम्बी लम्बी। पैसा ऑफर करने लगा और साथ ही बताने लगा के तुम नहीं करोगे तो कोई और बैंक कर देगा। तो सर जी लुब्बो - लुबाव ये कि दूसरे बैंक में जाता है तो जाने दो ! किस्सा ख़तम।
- हूँ।
- तो सर जी मेरी बोतल पक्की है ना ?
- हूँ ?
- थैंक यू सर जी थैंक यू !
घर पहुंच कर गोयल सा ने संध्या को सारी बात बताई कि आखिरी लोन फाइल कैसे बंद कर दी। संध्या बोली,
- चलो टेंशन ख़तम हुई। पर मेरी गले की चेन अब आपको देनी पड़ेगी !
| किस्सा ख़तम ! |
2 comments:
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बहुत अच्छी कहानी
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