अध्याय 3: बदलाव की प्रक्रिया
पिछले पन्नों में ( https://jogharshwardhan.blogspot.com/2026/02/12.html ) हमने समझा कि आदतों की जड़ें कितनी गहरी होती हैं - संस्कार, तृष्णा और अनुशय के रूप में।लेकिन अब सवाल यह है कि ये आदतें बनती कैसे हैं? क्या यह कोई रहस्यमयी प्रक्रिया है जो हमारी समझ से बाहर है? या फिर इसे देखा समझा जा सकता है?
बुद्ध कहते हैं - आदतें एक पल में नहीं बनतीं, और न ही एक पल में टूटती हैं। यह एक क्रम है, एक प्रक्रिया है।और इस प्रक्रिया को समझ लेना ही आदतों पर विजय पाने की पहली सीढ़ी है।
बौद्ध दर्शन में इस प्रक्रिया को बड़े विस्तार से समझाया गया है - जिसे 'प्रतीत्यसमुत्पाद' या 'आश्रित समुत्पाद' या dependent-origination कहते हैं। यह थोड़ा जटिल जरूर है, लेकिन डरने की जरूरत नहीं। हम इसे आसान भाषा में, अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी के उदाहरणों से समझेंगे।
आदत बनने की प्रक्रिया को चार चरणों में समझा जा सकता है - स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान।ये चार चरण इतनी तेजी से घटित होते हैं कि हमें पता ही नहीं चलता।लेकिन अगर हम सजग होकर देखें, तो इन्हें पहचान सकते हैं।और पहचानते ही आदत की जंजीर कमजोर पड़ने लगती है।
स्पर्श (contact)- जहाँ से शुरुआत होती है
स्पर्श यानी संपर्क। हमारी पाँच इंद्रियाँ और मन - ये छह द्वार हैं जिनसे किसी विषय से संपर्क होता है, तो उसे स्पर्श कहते हैं।
आँख का किसी वास्तु से संपर्क - स्पर्श।
कान का किसी आवाज़ से संपर्क - स्पर्श।
नाक का किसी गंध से संपर्क - स्पर्श।
जीभ का किसी स्वाद से संपर्क - स्पर्श।
शरीर का किसी स्पर्श से संपर्क - स्पर्श।
मन का किसी विचार या भावना से संपर्क - स्पर्श।
यह स्पर्श हर पल हो रहा है। अभी इस वक्त आपकी आँखें इन शब्दों के संपर्क में हैं।आपके कान आसपास की आवाज़ों के संपर्क में हैं। आपका शरीर कुर्सी या बिस्तर के संपर्क में है। यही सब स्पर्श है।
लेकिन ध्यान दीजिए - स्पर्श मात्र से कोई आदत नहीं बनती। स्पर्श तो बस दरवाजे पर दस्तक की तरह है।असली खेल उसके बाद शुरू होता है। उदाहरण के लिए:
मान लीजिए आप सड़क पर चल रहे हैं। रास्ते में हलवाई की दुकान दिखी। शीशे के पीछे रंग-बिरंगी मिठाइयाँ रखी हैं। आपकी नज़र उन पर पड़ी (आँख + मिठाई > स्पर्श)।
अभी तक कुछ नहीं हुआ। सिर्फ नज़र पड़ी है।
वेदना (sensation)- अनुभव का जन्म
स्पर्श होते ही एक और चीज़ घटित होती है - वेदना (या संवेदना) यानी अनुभूति। तीन तरह की वेदना हो सकती है - सुखद, दुखद, और तटस्थ (ना सुखद ना दुखद)।
मिठाई देखते ही क्या हुआ? मन में एक सुखद अनुभूति हुई - "अरे, कितनी अच्छी लग रही हैं।खाने का मन कर रहा है।" यह सुखद वेदना है। सुखद वेदना हमें खींचती है।
अगर रास्ते में कोई गंदगी दिख जाए, तो मन में अप्रिय अनुभूति होती है - "छि:, कितना गंदा है।" यह दुखद वेदना है। दुखद वेदना से हम दूर भागते हैं।
और अगर रास्ते में कोई छोटा मोटा पत्थर दिख जाए, तो न अच्छा लगता है, न बुरा। यह तटस्थ वेदना है।तटस्थ वेदना हमें उदासीन बना देती है
वेदनाएँ बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहीं से आदत की शुरुआत होती है।
तृष्णा (craving) - चाहत का जन्म
अब असली मोड़ आता है। सुखद वेदना होते ही मन में एक चाहत पैदा होती है - इस सुखद अनुभव को दोहराने की, इससे चिपके रहने की। यह चाहत ही तृष्णा है।
मिठाई देखकर सुखद अनुभूति हुई। अब मन कहता है - "यह मिठाई खाऊँ।" यह तृष्णा है।
ध्यान दीजिए, अभी तक आपने मिठाई खाई नहीं है, सिर्फ देखा है, उससे सुखद अनुभूति हुई है, और अब उसे खाने की चाहत जागी है। यह चाहत चाहे तेज हो या हल्की लेकिन मन में आती जरूर है।
इसी तरह, अगर कोई अप्रिय चीज़ दिखे और दुखद वेदना हो, तो उससे दूर भागने की तृष्णा होती है।
उपादान (clinging)- पकड़ और चिपकाव
अब है आखिरी चरण। जब यह चाहत तेज हो जाती है, जब हम उस चीज़ को पाने के लिए जोरदार प्रयत्न करने लगते हैं, उससे चिप-क जाते हैं, तो इसे उपादान कहते हैं। उपादान यानी पकड़, आसक्ति, लालसा या चिपकाव।
मिठाई खाने की तेज तृष्णा हुई तो आप दुकान में घुस गए, मिठाई खरीदी, और खाने लगे। यह उपादान है।इतना ही नहीं, एक टुकड़ा खाने के बाद दूसरे की इच्छा होना भी उपादान है।
यहीं पर आदत पक्की होती है। जब आप बार-बार इस पूरे चक्र से गुजरते हैं - स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान -तो एक दिन यह चक्र इतना तेज हो जाता है कि बिना सोचे-समझे चलने लगता है और तब समझ लीजिये कि आदत बन गई है।
पूरा चक्र
सिगरेट पीने की आदत को ले कर पूरे चक्र को एक साथ देखते हैं:
स्पर्श - ऑफिस में काम का तनाव है। सहकर्मी ने सिगरेट जलाई। उसका धुआँ आपकी नाक तक आया या फिर आपने किसी को सिगरेट पीते देखा या बस याद आ गई कि अब सिगरेट का समय हो गया।
वेदना - इस स्पर्श के साथ कैसी अनुभूति हुई? कहीं गहरे में एक हल्का-सा सुखद एहसास हुआ - पुरानी यादें, वह सुकून जो सिगरेट देती थी। या फिर तनाव के कारण दुखद वेदना थी, और सिगरेट उससे छुटकारा दिलाती थी।
तृष्णा - अब मन में चाहत जागी - "एक सिगरेट पी लूँ।" यह तृष्णा है।
उपादान - हाथ मशीनी तौर से जेब की तरफ बढ़ा, सिगरेट निकाली, जलाई, पीनी शुरू कर दी। यह उपादान है।
यह पूरा चक्र कितने समय में घटित होता है? एक सेकंड के छोटे से हिस्से में। इतनी तेजी से कि हमें पता ही नहीं चलता। और इसीलिए हम लाचार हो जाते हैं।
इसी तरह से मोबाइल देखने की आदत है।
स्पर्श - जेब में फोन की हल्की-सी वाइब्रेट हुई या फिर बोरियत हुई और नज़र फोन पर पड़ गई।
वेदना - "क्या पता किसी ने मैसेज किया हो?" - यह जिज्ञासा सुखद है या फिर ये बोरियत दुखद है, उससे छुटकारा चाहिए।
तृष्णा - "एक बार देख लूँ।" यह चाहत है।
उपादान - फोन उठाया, अनलॉक किया, स्क्रॉल करना शुरू किया। और फिर एक घंटा कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला।
इस चक्र को समझना क्यों जरूरी है?
क्योंकि जब तक हम इस चक्र को नहीं समझेंगे, तब तक हम आदतों में उलझे रहेंगे। और जैसा कि हमने पिछले अध्याय में देखा, लड़ने या उलझने से बात नहीं बनती।
लेकिन एक बार हम इस चक्र को समझ जाएँ, पहचानने लगें कि कैसे स्पर्श से वेदना, वेदना से तृष्णा, तृष्णा से उपादान होता है, तो हम इसमें हस्तक्षेप कर सकते हैं। हम इस चक्र को तोड़ सकते हैं।
एक बार एक व्यक्ति ने बुद्ध से पूछा, "भगवान, मेरा मन बहुत चंचल है। एक विचार आता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा। मैं क्या करूँ?"
बुद्ध ने कहा, "मान लो कोई जंगल में जा रहा है। रास्ते में कई रास्ते मिलते हैं - एक बाएँ जाता है, एक दाएँ, एक सीधा। उसे पता होना चाहिए कि उसे कहाँ जाना है, नहीं तो वह भटक जाएगा। ठीक वैसे ही, जब स्पर्श हो, तो ध्यान रखो कि कहाँ जाना है। वेदना को पहचानो, लेकिन उसके पीछे मत भागो।"
यही सजगता है - इस पूरे चक्र को देखना, पहचानना, लेकिन उसमें बह नहीं जाना।
बुद्ध के समय की बात है, एक बहुत अमीर सेठ थे। उनकी एक आदत थी - हर रात सोने से पहले मिठाई खाते थे। वैद जी ने मना भी किया फिर भी सेठ से रहा नहीं जाता था।
एक दिन वे बुद्ध के पास गए और बोले, "भगवान, मैं जानता हूँ यह आदत बुरी है, फिर भी नहीं छूटती। कोई उपाय बताएँ?"
बुद्ध ने कहा, "आज रात जब मिठाई खाने का मन करे, तो एक काम करना। पूरी सजगता से देखना - पहले मन में क्या होता है? कैसे विचार आता है? कैसे हाथ मिठाई की तरफ बढ़ता है? मिठाई कैसे मुँह में जाती है? कैसा स्वाद लगता है? और फिर क्या होता है?"
सेठ ने वैसा ही किया। रात में जैसे ही मिठाई खाने का मन हुआ, उसने ध्यान से देखना शुरू किया। देखा कि मन में पहले एक हल्की-सी बेचैनी हुई। फिर एक तस्वीर उभरी - मिठाई की। फिर एक चाहत जागी - खाने की। फिर हाथ बढ़ा, मिठाई उठाई, मुँह में डाली। पहला कौर मुँह में गया तो बहुत अच्छा लगा। दूसरे में थोड़ा कम मजा आया । तीसरे में और कम। चौथे तक आते-आते स्वाद ही नहीं रहा, फिर भी हाथ चल रहा था।
इस तरह देखते-देखते उन्हें एक बात का एहसास हुआ - असली सुख तो सिर्फ पहले या दूसरे कौर में था, बाकी तो सिर्फ आदत के मारे खाते चले गए। यह एहसास होते ही उनकी आदत कमजोर पड़ गई।
यह है सजगता की ताकत। यह सजगता हमें आदत से बाहर निकालने में मदद करती है। हम समझने लगते हैं, आदत में बह नहीं जाते।
अब हम जान गए कि आदतें बनती कैसे हैं - स्पर्श से वेदना, वेदना से तृष्णा, तृष्णा से उपादान के इस क्रम से। लेकिन अब असली सवाल यह है कि इस चक्र को तोड़ा कैसे जाए? उपादान को रोका कैसे जाए? तृष्णा को कम कैसे किया जाए? अगले अध्याय में देखते हैं।
लेकिन उससे पहले, एक छोटा-सा अभ्यास। आज रात सोने से पहले, जब भी आदत वाला काम करने का मन करे - एक बार रुककर देखिए। देखिए कि कैसे स्पर्श होता है, कैसे वेदना उठती है, कैसे तृष्णा जागती है, और कैसे उपादान शुरू होता है। सिर्फ देखिए, जज मत कीजिए। यही देखना आदतों को बदलने की पहली सीढ़ी है।
अध्याय 4: आदतों से छुटकारा
पिछले अध्याय में हमने देखा कि आदतें कैसे बनती हैं - स्पर्श से वेदना, वेदना से तृष्णा, तृष्णा से उपादान का सफर। यह सफर इतनी तेजी से होता है कि हमें पता ही नहीं चलता और हम अपनी आदत के गुलाम बन जाते हैं।
अब सवाल यह है कि इस चक्र को तोड़ा कैसे जाए? कैसे हम उपादान यानी उस पकड़ से बाहर निकलें जो हमें जकड़े हुए है?
बुद्ध कहते हैं - इसका एक ही तरीका है: सजगता। सजगता यानी जागरूकता, mindfulness। यही वह चाबी है जो आदत के ताले को खोल सकती है।
सजगता का हथियार
समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं। आप सड़क पर चल रहे हैं। रास्ते में एक कन्फेक्शनरी की दुकान है। मिठाइयाँ सजी हैं (स्पर्श)। देखते ही मन में सुखद अनुभूति हुई (वेदना)। अब मन कहता है - "खाऊँ, मिठाई खाऊँ" (तृष्णा)। अब तक सब सामान्य है।
लेकिन अब एक फर्क कीजिए। तृष्णा होते ही तुरंत दुकान में घुसने (उपादान) के बजाय, एक पल रुकिए। और उस पल में सजगता से देखिए - "अरे, यह तो तृष्णा है। यह मिठाई खाने की चाहत मेरे मन में उठी है।"
बस इतना-सा देख लेना, इतनी-सी पहचान - "यह तृष्णा है, यह मैं नहीं हूँ" - यही सजगता है। और यही वह पल है जहाँ आदत की जंजीर कमजोर पड़ती है।
गौर कीजिए, अभी तक आपने मिठाई खाई नहीं है। आपने सिर्फ तृष्णा को पहचाना है, उसे देख कर नमस्ते की है। और इतना भर करने से क्या होता है? तृष्णा, जो अब तक आपको धकियाकर ले जा रही थी, एक पल के लिए रुक जाती है। वह कमजोर पड़ती है।
बुद्ध ने एक उदाहरण दिया: मानो कोई आदमी जंगल से गुजर रहा है। रास्ते में उसे एक जहरीला साँप मिल जाता है। अब वह दो काम कर सकता है - या तो डरकर भागे, या फिर साँप को मारने की कोशिश करे। लेकिन दोनों ही तरीके खतरनाक हैं। भागने पर साँप पीछा कर सकता है और मारने की कोशिश में सांप उसे डस सकता है।
समझदार आदमी क्या करता है? वह साँप को दूर से ही पहचान लेता है। वह जान लेता है - "यह साँप है और यह जहरीला है।" और फिर वह सावधानी से उससे बचकर निकल जाता है। न भागना, न लड़ना - सिर्फ पहचानना और सावधान हो जाना।
बिलकुल यही बात तृष्णा के साथ है। तृष्णा आए, तो उससे न तो भागो और न ही उससे लड़ो। बस उसे पहचानो - "यह तृष्णा है।" और यह पहचान ही काफी है।
स्पर्श और वेदना के बीच का फासला
आदतों को तोड़ने का एक और गुर है - स्पर्श और वेदना के बीच एक छोटा-सा फासला या गैप बनाना।
याद कीजिए पिछले अध्याय का क्रम - स्पर्श से तुरंत वेदना होती है। यह बहुत तेजी से होता है। लेकिन अगर हम सजग हो जाएँ, तो इसी बीच एक पल का गैप आ सकता है।
एक बार फिर मिठाई का उदाहरण लेते हैं।
आँख का मिठाई से संपर्क हुआ (स्पर्श)। अब सामान्यतः अगले ही पल मन में सुखद अनुभूति उठेगी (वेदना)। लेकिन अगर आप सजग हैं, तो इसी बीच आप देख सकते हैं - "स्पर्श हुआ। अब देखते हैं क्या होता है।" यह देखना, यह प्रतीक्षा करना - यही वह फासला है।
इस फासले में आप देखेंगे कि वेदना उठती है, लेकिन आप उसमें बह नहीं जाते। वेदना को देखना और वेदना में बह जाना - इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।
एक बार एक शिष्य ने बुद्ध से पूछा, "भगवान, जब सुखद अनुभूति होती है, तो मन उससे चिपक जाता है। जब दुखद होती है, तो मन भागना चाहता है। इससे कैसे बचें?"
बुद्ध ने कहा, "वत्स, जैसे एक कुशल नट रस्सी पर चलता है, हर कदम सजगता से रखता है और एक पल के लिए भी असावधान नहीं होता। ठीक वैसे ही, स्पर्श और वेदना के बीच में सजग रहो। एक पल की भी असावधानी तुम्हें गिरा सकती है।"
आहार का सिद्धांत
बुद्ध ने एक और गहरी बात कही - सब कुछ आहार पर टिका है। जैसे शरीर को भोजन चाहिए, वैसे ही आदतों को भी आहार चाहिए। जिस आदत को आहार दोगे, वह बढ़ेगी।
तीन तरह के आहार हैं जो आदतों को पोषित करते हैं:
1. कर्म आहार - हम जो करते हैं, वही हमारी आदतों का आहार है। सिगरेट पीने की आदत को सबसे बड़ा आहार मिलता है - सिगरेट पीकर। हर बार जब आप सिगरेट पीते हैं, आदत को 'खाना' मिलता है, वह ताकतवर होती जाती है।
2. मनो-आहार - हम जो सोचते हैं, जो कल्पना करते हैं, वह भी आदतों का 'खाना' है। सिगरेट के बारे में सोचना, उसकी तस्वीर मन में लाना, उसके सुख की कल्पना करना - यह सब भी आदत को बढ़ावा देता है।
3. विज्ञान आहार - हम जो जानते हैं, जो मानते हैं, वह भी आदतों को प्रभावित करता है। अगर आप मानते हैं कि "सिगरेट से तनाव कम होता है" या "सिगरेट के बिना मैं काम नहीं कर सकता" - तो यह धारणा भी आदत को मजबूत करती है।
अब अगर हमें आदत छोड़नी है, तो हमें इसका आहार बंद करना होगा।
सिगरेट की आदत छोड़नी है तो: कर्म आहार बंद करो - सिगरेट मत पीओ।
मनो-आहार बंद करो - सिगरेट के बारे में मत सोचो, मन में उसकी तस्वीर मत लाओ।
विज्ञान आहार बदलो -यह धारणा बदलो कि "सिगरेट पीने से टेंशन दूर होती है।" समझो कि यह नुकसान ही नुकसान है।
बिलकुल यही बात आदत के साथ है। अगर आप आदत को आहार देना बंद कर दो, तो वह धीरे-धीरे कमजोर होगी, और एक दिन खत्म हो जाएगी।
रास्ते के रोड़े: पछतावा, आलस्य, असंतोष
आदतें छोड़ते समय हमें कुछ बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। बुद्ध ने इन्हें 'नीवरण' या बाधाएँ कहा है। इनमें से तीन बाधाएँ आदतें छोड़ने के समय खासतौर पर सामने आती हैं।
1. पछतावा
जब हम कोई पुरानी आदत छोड़ने की कोशिश करते हैं, तो अक्सर पछतावा होता है - "काश मैंने यह आदत पहले न डाली होती। काश मैंने पहले ही छोड़ दी होती।" यह पछतावा हमें कमजोर करता है।
बुद्ध कहते हैं - पछतावा मत करो। जो हो गया सो हो गया। अब वर्तमान में जियो। पछतावा भी एक तरह की आदत है - अतीत में जाकर खुद को कोसने की आदत। इसे भी छोड़ो।
एक युवक बुद्ध के पास आया। वह बहुत दुखी था। बोला, "भगवान, मैंने बहुत बुरे काम किए हैं। अब पछतावा होता है। क्या करूँ?"
बुद्ध ने पूछा, "बेटा, अगर तू काँटे भरे रास्ते पर चल रहा था, और तेरे पैरों में काँटे चुभ गए, तो अब क्या करेगा?"
युवक बोला, "अब तो काँटे निकालूँगा और आगे सावधानी से चलूँगा।"
बुद्ध बोले, "ठीक कहा। पीछे मुड़कर यह मत सोच कि काश मैं इस रास्ते पर आया ही न होता। अब काँटे निकालो और सावधानी से चलो।"
यही उपाय है पछतावे का - उसे पहचानो, लेकिन उसमें मत उलझो। काँटे निकालो और आगे बढ़ो।
2. आलस्य
आदतें छोड़ते समय आलस्य सबसे बड़ा दुश्मन हो जाता है। मन कहता है - "आज नहीं, कल से शुरू करूँगा।" या "एक बार और कर लूँ, फिर छोड़ दूँगा।"
बुद्ध कहते हैं - आलस्य से लड़ो। छोटे-छोटे कदम उठाओ। एक बार में बहुत बड़ा बदलाव मत लाओ। लेकिन आज ही शुरू करो, कल पर मत टालो।
एक बार एक भिक्षु ने बुद्ध से कहा, "भगवान, मैं ध्यान करना चाहता हूँ, लेकिन बहुत आलस्य आता है। सुबह उठने का मन नहीं करता।"
बुद्ध ने पूछा, "जब तुझे भूख लगती है, तो क्या उठने का मन करता है?"
भिक्षु बोले, "हाँ, तब तो उठ ही जाता हूँ।"
बुद्ध बोले, "तो समझ ले कि आदतें छोड़ना भी भूख जैसी जरूरत है। अगर तूने इसे जरूरी नहीं समझा, तो आलस्य आएगा ही। पहले इसे जरूरी समझ, फिर देख आलस्य कैसे भागता है।"
3. असंतोष
जब हम कोई पुरानी आदत छोड़ते हैं, तो एक खालीपन महसूस होता है। जैसे कोई चीज़ छिन गई हो। यह असंतोष हमें वापस पुरानी आदत की ओर खींचता है।
बुद्ध कहते हैं - इस असंतोष को भी सजगता से देखो। यह भी एक वेदना है। इसे भगाओ मत, इससे डरो मत। बस देखो कि यह कैसे आती है, कैसे रहती है, कैसे जाती है।
एक बार एक सेठ ने बुद्ध से पूछा, "भगवान, मैंने शराब छोड़ दी। लेकिन अब एक खालीपन सा लगता है। दोस्त भी कम हो गए। क्या करूँ?"
बुद्ध ने कहा: "वत्स, जब तू घर बदलता है, तो पुराने घर की याद आती है न? लेकिन नए घर में बसते ही याद कम हो जाती है। ठीक वैसे ही, पुरानी आदत का खालीपन नई अच्छी आदतों से भर जाएगा। बस थोड़ा धैर्य रख।"
छोड़ने की कला - Art of Letting Go
तो फिर आदतें छोड़ने की कला का सार क्या है?
सजगता से देखना। स्पर्श को देखना, वेदना को देखना, तृष्णा को देखना, और उपादान को रोकना। यह कोई लड़ाई नहीं है, यह एक समझ है। जैसे ही समझ आती है, आदत की पकड़ ढीली हो जाती है।
बुद्ध के एक शिष्य ने पूछा, "भगवान, आदत छोड़ने में कितना समय लगता है?"
बुद्ध ने कहा, "एक क्षण में भी छूट सकती है, और जन्मों-जन्मों में भी नहीं छूटती। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि तू कितनी गहराई से देख रहा है।"
शिष्य ने पूछा, "यानी?"
बुद्ध बोले, "मान लो एक अँधेरे कमरे में तू बैठा है। कमरे में एक साँप है, लेकिन तू उसे देख नहीं पा रहा। तुझे सिर्फ डर लग रहा है। अब कोई दीया जलाकर ले आए। दीया जलते ही तू देख लेगा - साँप है, लेकिन वह कोने में पड़ा है, तुझसे दूर। डर अपने आप चला जाएगा। देखने में कितना समय लगा? एक पल। लेकिन उस एक पल के लिए दीया जलाना पड़ा।
ठीक वैसे ही, सजगता का दीया जलाओ। एक पल की सजगता में आदत की असलियत दिख जाएगी।और दिखते ही उसकी पकड़ कमजोर पड़ जाएगी।"
यही है छोड़ने की कला - सजगता का दीया जलाना।
अगले अध्याय में हम बात करेंगे कि पुरानी आदतें छोड़ने के बाद नई और कुशल आदतें कैसे डाली जाएँ। क्योंकि आदतों से मुक्ति का मतलब आदत-विहीन होना नहीं है, बल्कि अच्छी आदतों को अपनाना है।
अध्याय 5: नई और कुशल आदतों का निर्माण
अब तक हमने आदतों को समझा, उनके बनने की प्रक्रिया जानी, और यह भी देखा कि पुरानी आदतों से कैसे मुक्ति पाई जाए। लेकिन क्या आदतों से मुक्ति का मतलब यह है कि हम आदत-विहीन हो जाएँ? क्या जिंदगी बिना किसी आदत के चल सकती है?
बिलकुल नहीं। आदतें जिंदगी का हिस्सा हैं। इन्हें पूरी तरह खत्म करना न तो संभव है और न ही जरूरी। असली बात है - अकुशल (unhealthy ) आदतों को कुशल (healthy ) आदतों से बदलना। जैसे एक खेत में झाड़ - झंखाड़ को उखाड़कर फूलों के पौधे लगाना। कुशल आदतें हमारे और दूसरों के लिए कल्याणकारी हैं।
संकल्प की भूमिका
नई आदत डालने का पहला कदम है - संकल्प। संकल्प यानी दृढ़ इच्छा, ठान लेना। लेकिन यह संकल्प कोई साधारण इच्छा नहीं है। यह गहरी समझ से उपजा संकल्प है।
बुद्ध ने कहा - "चित्त का स्वभाव है कि वह जैसा संकल्प करता है, वैसा ही बन जाता है।" यानी हम जैसा सोचते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। अगर हम सच्चे मन से ठान लें कि हमें अच्छी आदत डालनी है, तो हमने आधी लड़ाई जीत ली।
एक बार की बात है। एक युवक बुद्ध के पास आया और बोला, "भगवान, मैं रोज़ सुबह उठकर ध्यान करने का संकल्प करता हूँ, लेकिन तीन-चार दिन बाद सब भूल जाता हूँ। क्या करूँ?"
बुद्ध ने पूछा, "बेटा, अगर तुझे पता हो कि तेरे घर के बाहर खजाना गड़ा हुआ है, तो क्या तू उसे निकालने की कोशिश करेगा?"
युवक बोला, "हाँ, जरूर।"
बुद्ध बोले, "तो पहले यह समझ ले कि ध्यान ही असली खजाना है। जब तक यह बात समझ नहीं आएगी, संकल्प कमजोर रहेगा। पहले समझ पैदा कर, फिर संकल्प अपने आप मजबूत हो जाएगा।"
छोटी सी शुरुआत
नई आदत डालने में सबसे बड़ी गलती यह होती है कि हम बहुत बड़ा लक्ष्य रख लेते हैं। सोचते हैं - "आज से रोज़ एक घंटा व्यायाम करूँगा।" और जब पहले ही दिन एक घंटा नहीं हो पाता, तो निराश होकर छोड़ देते हैं।
बुद्ध का तरीका इससे बिलकुल उलट है। वे कहते हैं - छोटी शुरुआत करो, लेकिन लगातार करो।
एक बार एक भिक्षु ने बुद्ध से पूछा, "भगवान, ध्यान कितनी देर करना चाहिए?"
बुद्ध ने कहा, "जितनी देर तक तुम्हारा मन लगा रहे। लेकिन अगर मन नहीं लगता, तो पाँच मिनट भी काफी है। लेकिन रोज़ करो।"
यह बहुत गहरी बात है। पाँच मिनट रोज़ - यह छोटी सी शुरुआत है। लेकिन जब यह पाँच मिनट रोज़ का हो जाता है, तो धीरे-धीरे आदत बन जाती है। फिर दस मिनट, फिर पन्द्रह, फिर आधा घंटा।
सजगता से निर्माण
नई आदत डालते समय सबसे महत्वपूर्ण बात है - सजगता। आदत डालने का मतलब यह नहीं कि हम रोबोट की तरह वह काम बार - बार करते जाएँ। बल्कि पूरी सजगता के साथ, पूरी उपस्थिति के साथ करें।
समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए आपने रोज़ सुबह टहलने की आदत डाली।अब अगर आप बिना सजगता के, बस यांत्रिक ढंग से टहलते रहे, तो यह एक आदत तो बनेगी, लेकिन उसका असर कम होगा। लेकिन अगर आप सजगता से टहलें - हर कदम को महसूस करें, हवा को महसूस करें, सूरज की किरणों को महसूस करें - तो यह टहलना एक ध्यान बन जाता है। और इसका असर कहीं गहरा होता है।
बुद्ध ने कहा - "जो कुछ भी करो, पूरी सजगता से करो। चाहे खाना हो, चाहे चलना हो, चाहे बैठना हो।सजगता ही कर्म को पवित्र बनाती है।"
एक बार एक गृहस्थ ने बुद्ध से पूछा, "भगवान, मैं रोज़ सुबह पूजा करता हूँ लेकिन मन कहीं और भटकता रहता है। क्या करूँ?"
बुद्ध ने कहा, "जब तू फूल चढ़ाए, तो फूल को देख। उसकी सुंदरता को देख, उसकी खुशबू को महसूस कर।अगर तेरा मन भटके, तो उसे वापस फूल पर ले आ। यही सजगता है। यही असली पूजा है।"
मित्रों का सहारा
बुद्ध ने एक और बहुत महत्वपूर्ण बात कही - अच्छी संगति, यानी कल्याणमित्र का होना।जैसे बुरी संगति से बुरी आदतें बनती हैं, वैसे ही अच्छी संगति से अच्छी आदतें बनती हैं।
अगर आप सुबह जल्दी उठने की आदत डालना चाहते हैं, तो ऐसे दोस्त बनाइए जो सुबह जल्दी उठते हैं। अगर आप ध्यान करना चाहते हैं, तो किसी ऐसे समूह से जुड़िए जहाँ ध्यान होता है। अगर आप स्वस्थ खाना चाहते हैं, तो ऐसे लोगों के साथ रहिए जो पौष्टिक खाना खाते हैं।
धैर्य और करुणा
नई आदत डालते समय सबसे जरूरी चीज़ है - धैर्य और अपने प्रति करुणा। हम अक्सर बहुत जल्दी में होते हैं। चाहते हैं कि कल ही आदत बन जाए। और जब नहीं बनती, तो खुद को कोसते हैं। यह सही तरीका नहीं है।
बुद्ध कहते हैं - अपने प्रति करुणा रखो। अगर एक दिन छूट जाए, तो निराश मत हो। अगले दिन फिर से शुरू करो। यह यात्रा है, मंजिल नहीं।
एक शिष्य ने बुद्ध से पूछा, "भगवान, मैं रोज़ ध्यान करता हूँ, लेकिन कई दिन ऐसे होते हैं जब मन बहुत भटकता है। तब बहुत निराशा होती है।"
बुद्ध ने कहा, "बेटा, मान ले कि तू एक बाग में जाता है। वहाँ कई तरह के फूल हैं। कुछ खिले हैं, कुछ कलियाँ हैं, कुछ मुरझा रहे हैं। क्या तू उन फूलों से नाराज़ होता है जो नहीं खिले?"
शिष्य बोला, "नहीं भगवान।"
बुद्ध बोले, "तो अपने मन को भी ऐसे ही देख। कभी खिला, कभी मुरझाया। यह स्वाभाविक है। बस धैर्य रख और देखता रह।"
तो नई आदतें डालने के लिए हमें चार चीज़ें चाहिए:
1. गहरा संकल्प - समझ के साथ ठान लेना कि यह आदत मेरे और दूसरों के लिए अच्छी है।
2. छोटी शुरुआत - बहुत बड़ा लक्ष्य न रखना, छोटे से शुरू करना, लेकिन लगातार करना।
3. सजगता - हर काम को पूरी जागरूकता के साथ करना, मशीन की तरह नहीं।
4. कल्याणमित्र - अच्छे लोगों की संगति, अच्छे माहौल का सहारा।
5. धैर्य और करुणा - खुद के प्रति नरमी, गिरने पर उठने का हौसला।
निष्कर्ष
हमने बिच्छू और मेंढक की कहानी से शुरू किया सफर जो
कि हमें आदत की गहराइयों तक ले गया।हमने देखा कि आदतें कैसे बनती हैं, कैसे हम पर हावी होती हैं, और बुद्ध के बताए रास्ते पर चलकर कैसे हम इनसेमुक्ति पा सकते हैं और नई कुशल आदतें डाल सकते हैं।
आइए, मुख्य बातों को एक बार फिर दोहरा लें:
पहला, आदत का मतलब है - बिना सोचे-समझे किए जाने वाले काम। ये हमारी जिंदगी के 'ऑटोपायलट' हैं। इन्हें छोड़ने के आम तरीके - जैसे नए साल के संकल्प, महँगे गैजेट, दोस्तों के सामने ऐलान - अक्सर काम नहीं करते, क्योंकि ये लक्षणों का इलाज करते हैं, जड़ का नहीं।
दूसरा, बौद्ध दृष्टिकोण में आदत का अर्थ है - संस्कार, तृष्णा और अनुशय। संस्कार यानी बार-बार के कर्मों से बने मानसिक निशान। तृष्णा यानी - काम, भव और विभव की प्यास, चाहत,लालसा।अनुशय यानी गहरी पड़ी प्रवृत्तियाँ जो जन्मों-जन्मों से साथ हैं।
तीसरा, आदत बनने की प्रक्रिया - स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान। यह चक्र इतनी तेजी से चलता है कि हमें पता नहीं चलता लेकिन सजग रह
कर से इसे देखा जा सकता है।
चौथा, आदतों से मुक्ति का रास्ता - सजगता। स्पर्श और वेदना के बीच फासला बनाना, तृष्णा को पहचानना, उपादान को रोकना। आहार का सिद्धांत समझना - जिस आदत को खिलाओगे, वह बढ़ेगी। और रास्ते के रोड़ों - पछतावा, आलस्य, असंतोष - से सजगता से निपटना।
पाँचवाँ, नई कुशल आदतों का निर्माण - गहरे संकल्प से, छोटी शुरुआत से, पूरी सजगता से, अच्छी संगति से, और धैर्य एवं करुणा के साथ।
इस पूरी यात्रा में एक ही सूत्र बार-बार आया - सजगता। यही बुद्ध की सबसे बड़ी देन है।सजगता हमें आदत के मशीनी चक्र से बाहर निकालती है। यह हमें देखने वाला - दृष्टा - बनाती है, बहने वाला नहीं।
बिच्छू ने आखिरी साँस में कहा था - "मैं क्या करूँ, डंक मारना तो मेरी आदत है।" लेकिन क्या सच में बिच्छू मजबूर था? क्या आदत इतनी शक्तिशाली है कि उसे बदला ही न जा सके?
बुद्ध कहते हैं - नहीं। आदत बदली जा सकती है। क्योंकि आदत कोई स्थायी चीज़ नहीं है। यह क्षण-क्षण बनने वाली, बदलने वाली प्रक्रिया है। जैसे नदी का बहाव हर पल नया पानी ले कर आता है और हम उस बहाव को सजगता से देख सकते हैं, और धीरे-धीरे उसकी दिशा बदल सकते हैं।
एक आखिरी कहानी।
बुद्ध के समय में अंगुलिमाल नाम का एक खूंखार कातिल था। वह इतना क्रूर था कि लोगों की उँगलियाँ काटकर माला पहनता था। उसकी हत्या करने की आदत इतनी खतरनाक थी कि लोग थर थर
कांपते थे।
एक दिन बुद्ध उसके रास्ते से गुजरे। अंगुलिमाल ने उन्हें मारने की सोची।लेकिन बुद्ध की सजगता और करुणा ने उसे इतना प्रभावित किया कि वह रुक गया।बुद्ध ने उसे धम्म का रास्ता बताया। अंगुलिमाल ने सजगता से अपनी आदतों को देखा, समझा, और धीरे-धीरे बदला। वही अंगुलिमाल आगे चलकर एक संत बना।
यह कहानी बताती है कि कोई भी आदत इतनी गहरी नहीं कि उसे बदला न जा सके।अगर अंगुलिमाल बदल सकता है, तो हम क्यों नहीं?
तो आइए, आज से ही एक छोटा-सा कदम उठाएँ। किसी एक आदत को चुनें -कोई बुरी आदत जिसे छोड़ना है, या कोई अच्छी आदत जिसे डालना है।और उसे सजगता से देखना शुरू करें। जैसे ही स्पर्श हो, देखें। जैसे ही वेदना उठे, देखें।जैसे ही तृष्णा जागे, उसे पहचानें। और फिर देखें कि कैसे, धीरे-धीरे, बुरी आदत की पकड़ कमजोर होती है।लेकिन मन मजबूत करके करना खुद को ही पड़ेगा।
इस विषय पर और आगे पढ़ने के लिए कुछ पुस्तकें:
1. धम्मपद - हिंदी और बहुत सी अन्य भाषाओँ में उपलब्ध बुद्ध वचन
2. महासतिपट्ठान सुत्त - दीघ निकाय, सुत्त 22
3. Walpola
Rahula - What the Buddha Taught
4. Bhante
Henepola Gunaratna- Mindfulness in Plain English (हिंदी अनुवाद उपलब्ध)
5. Charles
Duhigg - The Power of Habit (आदत के बारे में तुलनात्मक अध्ययन हेतु)
6. पीयूष दीक्षित - 'बुद्ध के उपदेश' (सरल हिंदी में बुद्ध की कहानियाँ और शिक्षाएँ)
7. एस. एन. गोयन्का - 'धम्म की बातें' (विपश्यना पर आधारित व्याख्यान)
8. J.
Krishnamurthy - Freedom From the Known (आदत और मनोवृत्तियों पर गहन चिंतन)
9. डॉ. भीमराव आंबेडकर - बुद्ध और उनका धम्म' (बौद्ध दर्शन की आधुनिक व्याख्या)
10. Thich
Nhat Hanh - The Heart of the Buddha's Teaching (सरल भाषा में बौद्ध शिक्षाएँ)




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