एक बार की बात है। एक मेंढक नदी के किनारे बैठा था। तभी एक बिच्छू वहाँ आया और बोला, "भाई मेंढक, मुझे नदी के उस पार जाना है। क्या तू मुझे अपनी पीठ पर बैठाकर पार कर देगा?"
मेंढक ने कहा, "अरे बिच्छू, तू तो डंक मारने के लिए मशहूर है। मैं तुझे बिठा तो लूँ पर क्या पता तू बीच नदी में मुझे डंक मार दे और मैं मर जाऊँ।"
बिच्छू बोला, "भाई, ऐसा कैसे हो सकता है? अगर मैंने तुझे डंक मार दिया तो तू मर जाएगा और मैं खुद भी तो डूब जाऊँगा। तेरी सोच गलत है।"
मेंढक को बात ठीक लगी। उसने बिच्छू को अपनी पीठ पर बैठा लिया और नदी पार करने लगा। बीच नदी में पहुँचते ही बिच्छू ने मेंढक को डंक मार दिया। जहर फैलने लगा और दोनों डूबने लगे।
मरते-मरते मेंढक ने पूछा, "बिच्छू, तूने ऐसा क्यों किया? अब हम दोनों डूबेंगे।"
बिच्छू ने आखिरी साँस में कहा, "मैं क्या करूँ भाई, डंक
मारना तो मेरी आदत है।"
यह कहानी आपने भी सुनी होगी। बचपन में हम इसे एक नैतिक कहानी के रूप में पढ़ते थे - कि बुरे लोग अपना स्वभाव नहीं बदलते। लेकिन क्या वाकई यह सिर्फ बुराई का सवाल है? या फिर यह उस चीज़ की कहानी है जिसे हम 'आदत' कहते हैं?
बिच्छू ने जानबूझ कर बुराई नहीं की थी। उसने वह किया जो उससे बिना सोचे-समझे हो गया। यही आदत की खासियत है - वह हमसे बिना पूछे, बिना हमारी इजाजत के, अपना काम कर देती है।
'आदत' शब्द हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा सच है। सुबह उठते ही सबसे पहले हाथ का फोन की तरफ बढ़ना, चाय की चुस्की के बिना दिन की शुरुआत न होना, कुर्सी पर बैठते ही पैर हिलाने लगना, या फिर तनाव होने पर सिगरेट जला लेना - ये सब आदतें ही हैं। कोई हमें यह नहीं सिखाता, कोई हमें यह याद नहीं दिलाता, फिर भी हम आदत-वश काम करते चले जाते हैं। जैसे कोई अदृश्य शक्ति हमें चला रही हो।
विज्ञान कहता है कि हमारे दिन का करीब 40-45 फीसदी हिस्सा आदतों से चलता है। मतलब, हम आधे समय तो बिना सोचे-समझे, मशीनी जिंदगी जीते रहते हैं। डगलस एडम्स ( The Hitchhiker's Guide to the Galaxy) ने बड़े मजे की बात कही है -
"हम पैदा होते हैं, फिर थोड़ा बड़े होते हैं, फिर थोड़े और बड़े होते हैं, और फिर अचानक एक दिन हम खुद को वही काम करते हुए पाते हैं जो हमने कल किया था, और परसों किया था, और पिछले हफ्ते किया था... और तब हमें एहसास होता है कि हमारी जिंदगी एक आदत बन चुकी है।"
लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल है। अगर आदतें हमें जकड़ लेती हैं, तो क्या इनसे मुक्ति पाना संभव है? और अगर संभव है, तो कैसे? क्या इच्छाशक्ति से आदत बदली जा सकती है? क्या डांट-फटकार से
बदलाव आ
सकता है? कोई नया गैजेट खरीद लेने से, या फिर नए साल में संकल्प कर लेने से आदतें बदल सकती हैं? तजुर्बा तो यही कहता है कि जनवरी के पहले हफ्ते में सुबह उठ कर योगासन करने का जोश फरवरी आते-आते ठंडा पड़ जाता है।
इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए हमें एक ऐसे रास्ते पर चलना होगा जो ढाई हजार साल पुराना है, लेकिन आज भी उतना ही सार्थक है। यह रास्ता है बुद्ध का रास्ता। बुद्ध ने आदतों को सिर्फ बाहरी हरकतों के रूप में नहीं देखा, बल्कि उन्होंने मन की गहराइयों में जाकर देखा कि आदतें आखिर पैदा होती कहाँ से हैं, पनपती कैसे हैं, और हम पर हावी क्यों हो जाती हैं।
बौद्ध दर्शन में आदत के लिए एक खास शब्द है -
'संस्कार'। ये संस्कार हमारे कर्मों, हमारे विचारों और हमारी भावनाओं के कारण बनते हैं। जैसे बार-बार रस्सी रगड़ने से पत्थर पर निशान पड़ जाता है, वैसे ही बार-बार किए गए कामों से हमारे मन में गहरी लकीरें बन जाती हैं। और फिर यही लकीरें हमारा भविष्य का रास्ता तय करने लगती हैं।
इस निबंध में हम आदतों को इसी नज़रिए से समझने की कोशिश करेंगे। हम देखेंगे कि बौद्ध दृष्टिकोण में आदतें कैसे बनती हैं, कैसे ये हमें अपने जाल में फँसाती हैं? और सबसे ज़रूरी बात - क्या बुद्ध ने आदतों से मुक्ति पाने का जो रास्ता बताया, वह आधुनिक जीवन में कैसे काम आ सकता है।
बिच्छू ने आखिरी साँस में मेंढक को कहा था, "यह मेरी आदत है।" लेकिन क्या सच में हम इसके लिए मजबूर हैं? क्या आदत हमारी पहचान बन जाती है? या फिर हम उस पहचान से आगे जा सकते हैं? आइए, इन सवालों के जवाब बुद्ध की नज़र से ढूँढने की कोशिश करते हैं।
अध्याय 1: आदत के बारे में आम धारणाएं
रविवार की सुबह अलार्म बजता है, आप हाथ बढ़ाकर उसे बंद कर देते हैं। फिर क्या होता है? शायद मोबाइल उठा लेते हैं। बिना किसी सोच-विचार के अंगुलियाँ अपना काम करने लगती हैं। बस यूँ ही इंस्टाग्राम या व्हाट्सप्प पर नज़र चलती जाती है।
यह है आदत।
आदत क्या है और कैसे बनती है?
सरल भाषा में समझें तो आदत वह है जो हम बिना सोचे करते हैं। मनोवैज्ञानिक इसे एक सरल से फॉर्मूले में समझाते हैं - संकेत, दिनचर्या, इनाम। जैसे सुबह उठते ही (संकेत), हम फोन देखते हैं (दिनचर्या) और कुछ नया जानने का सुख पाते हैं (इनाम)। यही क्रम बार-बार दोहराया जाए तो एक दिन यह आदत बन जाती है। फिर संकेत मिलते ही दिनचर्या अपने आप शुरू हो जाती है इनाम मिले या न मिले।
सोचिए, जब आप साइकिल चलाना सीख रहे थे तो कितना ध्यान लगाना पड़ता था? कभी पैडल पर तो कभी आगे सड़क पर, कभी
बैलेंस बनाने
पर सोचना पड़ता था। लेकिन सीख जाने के बाद पैर अपने आप चलने लगते हैं। ये है आदत की ताकत - यह मुश्किल काम को आसान बना देती है।
यही कहानी चाय की है। कितने लोग हैं जिनकी सुबह बिना चाय के नहीं होती? चाय न मिले तो दिन ही नहीं चढ़ता। यह आदत इतनी पक्की हो जाती है कि जिंदगी का एक हिस्सा बन जाती है।
अच्छी आदतें, बुरी आदतें
समाज ने आदतों को दो हिस्सों में बाँट रखा है - अच्छी और बुरी। सुबह जल्दी उठना, व्यायाम करना, समय पर खाना खाना - ये अच्छी आदतें हैं। देर तक जागना, धूम्रपान करना, गाली देना - ये बुरी आदतें हैं।
लेकिन यह बँटवारा इतना सीधा नहीं है। जो एक के लिए अच्छी आदत है, वह दूसरे के लिए बुरी हो सकती है। कोई सुबह 5 बजे उठकर दौड़ने निकल जाता है तो कोई 5 बजे सोया रहता है और 7 बजे उठता है। फिर भी, कुछ आदतें ऐसी हैं जिन पर लगभग सभी लोग सहमत हैं - जैसे धूम्रपान सेहत के लिए हानिकारक है, या फिर समय का पाबंद होना अच्छी बात है।
आदतें और गुलामी
असली समस्या तब शुरू होती है जब आदतें हमारे बस में नहीं रहती हैं और हम उनके गुलाम बन जाते हैं।
उदहारण के लिए, आपका सोने का समय है पर सोने से पहले आपने सोचा कि पाँच मिनट फोन देख लूँ। लेकिन जब आप फोन से नज़र उठाते हैं, तो बारह बज चुके होते हैं। यह पाँच मिनट कहाँ चला गया? किसी ने कोई वीडियो भेजा, किसी ने रील, फिर किसी ने दूसरी... और आप देखते रहे, रुक नहीं पाए। यही है आदत का हावी होना।
या फिर वह आदमी जो बार-बार सिगरेट छोड़ने की कोशिश करता है। हर बार ठान लेता है कि बस, ये आखिरी सिगरेट है। अगले दिन ऑफिस में जैसे ही थोड़ा तनाव आता है, उसका हाथ अपने आप जेब की तरफ बढ़ जाता है। और जब तक उसे पता चलता है, सिगरेट सुलग रही होती है। फिर पछतावा, फिर वादा, और फिर वही सिलसिला।
आदतें छोड़ने के आम तरीके
आदतों से परेशान होकर हम तरह-तरह के उपाय करते हैं।
कोई ठान लेता है कि नए साल में ये आदत बदल दूँगा। जनवरी आती है, एक हफ्ते तक सब कुछ प्लान के मुताबिक चलता है, फिर धीरे-धीरे पुरानी आदतें वापस लौट आती हैं। फरवरी आते-आते संकल्प फुर्र हो जाता है।
कोई महँगा गैजेट खरीद लेता है - फिटनेस बैंड, स्मार्टवॉच, जॉगिंग वाले महँगे जूते। कुछ दिन उत्साह रहता है, फिर वह गैजेट भी अलमारी में धूल खाने लगता है।
कोई अपने दोस्तों के सामने ऐलान कर देता है कि मैंने यह आदत छोड़ दी है। फिर शर्मिंदगी के डर से कुछ दिन निभाता है। लेकिन अकेले में आदत फिर हावी हो जाती है।
कोई डांट-फटकार का सहारा लेता है। घरवाले डाँटते हैं, डॉक्टर डाँटते हैं, दोस्त टोकते हैं। लेकिन डाँट के डर का का असर भी कुछ दिनों का ही होता है।
ये तरीके क्यों काम नहीं करते?
ये सारे तरीके इसलिए काम नहीं करते क्योंकि ये बीमारी के लक्षणों का इलाज करते हैं, जड़ का नहीं। यह ऐसा ही है जैसे पेड़ की पत्तियाँ पीली हो रही हैं और हम पत्तियों पर हरा रंग डाल दें।
आदत कोई चीज़ नहीं है जो बाहर से चिपकी है। यह हमारे मन के ताने-बाने में शामिल है। इसे बदलने के लिए सिर्फ इच्छाशक्ति, अपने आप से वादे या डाँट-फटकार काफी नहीं, इसके लिए खुद की समझ की जरूरत है: याने आदत आखिर है क्या, यह कहाँ से पैदा होती है? क्या इसे पैदा होने से पहले पहचाना जा सकता है ?
यहाँ बुद्ध का रास्ता हमारी मदद कर सकता है। बुद्ध ने आदतों को सिर्फ बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि मन से जुड़ी क्रिया माना है। उन्होंने देखा कि हर आदत के पीछे इच्छा, चाहत या लालसा का एक पूरा तंत्र है। और सबसे बड़ी बात, उन्होंने यह भी देखा कि इस तंत्र को समझकर हम आदतों को बदल सकते हैं।
पर आगे बढ़ने से पहले एक छोटी-सी कहानी पेश है:
एक गाँव में एक युवक रहता था। उसे खटिया पर बैठकर पैर हिलाने की आदत थी। पैर हिलाते-हिलाते उसके पैर में चोट लग गई। उसने सोचा, "इस खटिया में ही कोई खराबी है।" उसने नई खटिया मँगवा ली।
कुछ दिन बाद फिर वही हुआ। पैर हिलाते-हिलाते चोट लग गई और उसने फिर खटिया बदल दी। जब भी चोट लगे वो लड़का नई खटिया मंगवा ले।
आखिरकार एक स्याने बुज़ुर्ग ने उससे कहा , "बेटा, खटिया बदलते-बदलते तो तू थक गया, इस बार पैर हिलाने की आदत बदलने की कोशिश कर।"
हम भी अक्सर ऐसा ही करते हैं। आदत को बदलने के लिए बाहरी उपाय करते हैं, खटिया बदलते हैं, गैजेट बदलते हैं, माहौल बदलते हैं। जबकि असली काम तो मन के अंदर होना चाहिए - उस आदत को जड़ से देखना, समझना और बदलना।
अध्याय 2: बौद्ध दृष्टिकोण: आदत से गहरा रिश्ता
हमने देखा कि आदतें छोड़ने के आम तरीके अक्सर कामयाब नहीं होते - क्योंकि हम खटिया बदलते रहते हैं, पैर हिलाने की आदत नहीं। असली समस्या बाहर नहीं, अंदर मन में है।
अब सवाल यह है कि आखिर यह 'अंदर' है क्या? और दूसरा सवाल है कि आदतें कैसे बदली जा सकती हैं?
बुद्ध ने इस 'अंदर' को बड़ी गहराई से देखा। उन्होंने पाया कि हमारा मन कोई स्थिर चीज़ नहीं है, बल्कि निरंतर बहने वाली एक धारा है। इस धारा में तरह-तरह की चीज़ें तैरती रहती हैं - विचार, भावनाएँ, इच्छाएँ, यादें। और इन सबके बीच कुछ ऐसी चीज़ें हैं जो बार-बार लौटकर आती हैं। यही हैं आदतें।
बौद्ध दर्शन में आदतों को समझने के लिए तीन महत्वपूर्ण शब्द हैं - संस्कार, तृष्णा और अनुशय। आइए इन्हें एक-एक करके समझते हैं।
संस्कार: आदत के बीज
'संस्कार' शब्द सुनते ही हमें अक्सर अच्छे-बुरे संस्कारों की बात याद आती है। माँ-बाप कहते हैं, "बच्चों में अच्छे संस्कार डालो।" लेकिन बौद्ध दृष्टिकोण में संस्कार का मतलब कुछ अलग है।
संस्कार यानी वे चीज़ें जो हमने खुद बनाई हैं, संचित की हैं। जब भी हम कुछ सोचते हैं, कुछ बोलते हैं, कुछ करते हैं - एक छोटा-सा निशान हमारे मन पर पड़ जाता है। जैसे बार-बार किसी रास्ते पर चलने से वहाँ पगडंडी बन जाती है, वैसे ही बार-बार किए गए कामों से मन में रास्ते बन जाते हैं।
गौर कीजिए कि सुबह उठते ही सबसे पहले क्या करते हैं? यह सोचना नहीं पड़ता, बस हो जाता है। क्यों? क्योंकि इस रास्ते पर आप हज़ारों बार चल चुके हैं। यह रास्ता अब पक्का हो गया है। यही है संस्कार।
बुद्ध ने एक बार अपने शिष्यों से कहा था - "भिक्षुओं, जैसे कोई किसान खेत की मेंड़ पर चलता है, और बार-बार चलने से वहाँ एक रास्ता बन जाता है, वैसे ही बार-बार किए गए कर्मों से हमारे मन में संस्कार बनते हैं। और फिर ये संस्कार हमें उसी रास्ते पर चलने के लिए खींचते हैं।"
यह समझना बहुत ज़रूरी है कि संस्कार सिर्फ बुरी आदतों के लिए नहीं हैं। अच्छी आदतें भी संस्कार हैं। जो व्यक्ति रोज़ सुबह ध्यान करता है, उसके मन में ध्यान का संस्कार गहरा होता जाता है। एक दिन ऐसा आता है कि सुबह उठते ही शरीर अपने आप ध्यान की मुद्रा में बैठ जाता है।
एक बार बुद्ध के एक शिष्य ने पूछा, "भगवान, क्या अच्छे कर्म और बुरे कर्म, दोनों ही हमें बाँध देते हैं?"
बुद्ध ने कहा, "हाँ, वत्स। जैसे दो बैल गाड़ी खींच रहे हों - एक सफेद, एक काला - दोनों ही गाड़ी को खींच रहे हैं। बैलों का
रंग चाहे सफेद हो या
काला, गाड़ी की रफ़्तार
पर कोई
प्रभाव नहीं
पड़ता। इसलिए सिर्फ अच्छे-बुरे का सवाल नहीं है, बल्कि जागरूकता का सवाल है।"
यानी सिर्फ अच्छी आदतें डाल लेने भर से काम नहीं चलता। हमें यह भी देखना होगा कि आदतें बनती कैसे हैं, और हम उनके प्रति सचेत कैसे रह सकते हैं।
तृष्णा: आदत का ईंधन
अब सवाल यह है कि आखिर ये आदतें इतनी मजबूत क्यों हो जाती हैं? इन्हें ताकत कहाँ से मिलती है?
बुद्ध कहते हैं - तृष्णा से। तृष्णा यानी प्यास, चाहत, लालसा।
जब भी हम कोई सुखद अनुभव करते हैं, तो मन में एक इच्छा जागती है - इसे फिर से पाऊँ, फिर से भोगूँ। यही इच्छा हमें बार-बार वही काम करने के लिए उकसाती है और धीरे-धीरे वह काम आदत बन जाता है। समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं:
मान लीजिए आपने कभी चॉकलेट खाई। उसका स्वाद अच्छा लगा। मन में एक सुखद अनुभूति हुई। अब मन चाहता है कि यह सुख फिर मिले। अगली बार जब आपको चॉकलेट दिखती है, तो मन तुरंत उसे खाने के लिए उतावला हो जाता है। जब खाते हैं, सुख मिलता है, और ज्यादा सुख पाने के लिए और प्रयत्न करते हैं। इस तरह यह चक्र मजबूत हो जाता है। कुछ दिनों बाद यह आदत बन जाती है और तब बिना चॉकलेट के दिन अधूरा लगता है।
यही कहानी सिगरेट की है, शराब की है, मोबाइल की है। हर बार हम कोई सुखद अनुभव पाते हैं, और फिर उसी सुख को दोबारा पाने की तृष्णा हमें बार-बार वही काम करने पर मजबूर करती है।
बुद्ध ने तृष्णा को तीन भागों में बाँटा है:
1. काम-तृष्णा (Craving for sense pleasures) - यह सबसे आम और सीधी-सादी तृष्णा है। आँख, कान, नाक, जीभ, शरीर और मन - इन छह इंद्रियों के सुखद अनुभवों को बार-बार पाने की चाहत। अच्छा खाना, सुंदर चीज़ें देखना, मीठा संगीत सुनना, महकती चीज़ें सूँघना, मुलायम स्पर्श पाना, और मन को अच्छे लगने वाले विचार - इन सबकी लालसा ही काम-तृष्णा है।
2. भव-तृष्णा (Craving for becoming) - यह कुछ बनने की चाहत है, कुछ होने की लालसा है। कोई बड़ा आदमी बनना, अमीर बनना, मशहूर बनना, शक्तिशाली बनना चाहता है - यह भव-तृष्णा है। लेकिन यह सिर्फ बड़ा बनने तक सीमित नहीं है। कोई 'अच्छा इंसान' बनना चाहता है, कोई 'आदर्श पति' बनना चाहता है, कोई 'महान देशभक्त' बनना चाहता है, कोई
सैकड़ों साल
जीना चाहता
है, ये सब भव-तृष्णा के ही रूप हैं।
बनने की यह चाहत हमें लगातार कुछ न कुछ करने के लिए प्रेरित करती है। और इसी से तरह-तरह की आदतें जन्म लेती हैं। जैसे कोई व्यक्ति हमेशा 'सक्सेसफुल' बनना चाहता है, तो वह दिन-रात काम करने की आदत डाल लेता है। यह आदत उसे कहीं से कहीं ले जाती है, लेकिन साथ ही उसकी सेहत और रिश्तों को भी खोखला कर सकती है।
एक और उदाहरण - सोशल मीडिया पर 'पॉपुलर' बनने की चाहत। लोग घंटों सोचते रहते हैं कि कैसी पोस्ट डालूँ, कैसी फोटो लगाऊँ जिससे
हजारों लाइक मिलें। यह भव-तृष्णा ही है जो उन्हें बार-बार फोन चेक करने की आदत में धकेलती है।
3. विभव-तृष्णा (Craving for non-becoming) - यह भव-तृष्णा के बिलकुल उलट है। यह कुछ 'न' होने की चाहत है, किसी ख़ास स्थिति से मुक्त हो जाने की चाहत। दुख से छुटकारा पाने की, तकलीफ से बचने की, किसी चीज़ को खत्म कर देने की चाहत।
यह थोड़ा पेचीदा लग सकता है, लेकिन उदाहरणों से साफ हो जाएगा।
मान लीजिए किसी को ऑफिस में बहुत तनाव है। बॉस डाँटता है, काम का बोझ है, सहकर्मी परेशान करते हैं। अब इस तनाव से बचने के लिए वह शराब पीने लगता है। शराब पीकर वह 'खुद नहीं' रहता - उसकी चेतना बदल जाती है, वह अपने आपको भूल जाता है। यह है विभव-तृष्णा - 'मैं' न रहने की। दुख मुक्त हों
या न
हों मैं मुक्त हो जाऊं।
या फिर कोई व्यक्ति जो बहुत शर्मीला है। पार्टी में जाने पर बेचैनी होती है, लोगों से बात करने में डर लगता है। वह बचने के लिए मोबाइल में घुस जाता है, या फिर कोने में जाकर बैठ जाता है। वह 'वहाँ मौजूद' नहीं रहना चाहता। यह भी विभव-तृष्णा का ही एक रूप है - उस खास स्थिति में 'न होने' की चाहत।
एक आम उदाहरण - नींद की गोलियाँ। लोग इसलिए नहीं खाते कि उन्हें नींद का सुख चाहिए, बल्कि इसलिए खाते हैं कि बेचैनी, चिंता, परेशानी - इन सबसे मुक्त हो जाना चाहते हैं। वे 'सो जाना' चाहते हैं यानी थोड़ी देर के लिए 'नहीं' रहना चाहते।
तीनों तृष्णाएँ हमारी जिंदगी में एक साथ काम करती हैं। एक ही आदत में कई तृष्णाएँ हो सकती हैं। जैसे फोन देखने की आदत लें:
- काम-तृष्णा: कोई अच्छा वीडियो देखूँ, मजेदार फोटो देखूँ, अच्छा संगीत सुनूँ।
- भव-तृष्णा: अपडेटेड रहूँ, दुनिया से जुड़ा रहूँ, किसी से कम न रहूँ, एक जानकार इंसान बना रहूँ।
- विभव-तृष्णा: बोरियत से बचूँ, अकेलेपन से बचूँ, अपने विचारों से बचूँ। फोन में खो जाने पर मैं अपने आपको भूल जाता हूँ, दारु पी लूँ और अपनी परेशानियाँ भूल जाऊं।
बुद्ध का कहना है कि ये तीनों तृष्णाएँ ही दुख का कारण हैं। क्योंकि जब तक ये तृष्णाएँ हैं, तब तक मन बेचैन रहेगा तब
तक कुछ न कुछ चाहता रहेगा - या तो कुछ पाना चाहेगा, या कुछ बनना चाहेगा, या खुद से भागना चाहेगा। और यही बेचैनी हमारी आदतों को जन्म देती है और पोषित करती है।
एक छोटी-सी कहानी प्रस्तुत है : एक बार एक व्यक्ति बुद्ध के पास आया। वह बहुत दुखी था। उसने कहा, "भगवान, मैं बहुत अमीर हूँ। मेरे पास सब कुछ है। फिर भी मन नहीं लगता। क्या कमी है?"
बुद्ध ने पूछा, "तुम और अमीर बनना चाहते हो?"
उसने कहा, "हाँ, और अमीर बनना चाहता हूँ।"
बुद्ध बोले, "यह भव-तृष्णा है।"
फिर पूछा, "तुम सुख-सुविधाएँ और भोगना चाहते हो?"
उसने कहा, "हाँ, और भी सुख चाहिए।"
बुद्ध बोले, "यह काम-तृष्णा है।"
फिर पूछा, "और जब ये सब नहीं मिलता तो क्या होता है?"
उसने कहा, "तो और दुख होता है। भागना चाहता हूँ सबसे।"
बुद्ध बोले, "यह विभव-तृष्णा है। ये तीनों तृष्णाएँ ही तेरे दुख का कारण हैं। इन्हीं के कारण तू बेचैन है। इन्हीं के कारण तेरा बैचैन रहना तेरी आदत बन गई है।"
यह बात समझ में आ जाए तो हम अपनी आदतों को एक नई रोशनी में देख सकते हैं। हर आदत के पीछे कोई न कोई तृष्णा काम कर रही है। और तृष्णा को समझे बिना आदत नहीं बदल सकती।
अनुशय: गहरी प्रवृत्तियाँ
संस्कार और तृष्णा को समझ लेने के बाद भी एक सवाल बाकी है। कुछ आदतें ऐसी होती हैं जो बहुत गहरी होती हैं। जैसे जन्म से साथ आई हों। कुछ लोग बहुत गुस्सैल होते हैं, कुछ बहुत डरपोक, कुछ बहुत भोगी। यह सब कहाँ से आता है?
यहाँ बुद्ध एक और शब्द देते हैं - अनुशय। अनुशय यानी वे गहरी पड़ी प्रवृत्तियाँ जो जन्म-जन्मांतर से हमारे साथ हैं। ये हमारे मन की उन गहरी तहों में छिपी हैं, जहाँ हम
कभी पहुँच नहीं पाते।
बुद्ध ने सात प्रकार के अनुशय बताए हैं - काम-राग (भोगों में आसक्ति), प्रतिघात (क्रोध), मान (अहंकार), दृष्टि (गलत धारणाएँ), विचिकित्सा (संशय), भव-राग (बने रहने की चाहत), अविद्या (अज्ञान)।
हमारी बहुत सी आदतें इन्हीं अनुशयों से निकलती हैं। जैसे किसी को बार-बार गुस्सा आता है - यह प्रतिघात अनुशय की वजह से है। कोई हमेशा अपनी बात पर अड़ा रहता है - यह मान अनुशय है। कोई हर बात में शक करता है - यह विचिकित्सा है।
एक बार की बात है। बुद्ध के एक प्रमुख शिष्य, आनंद ने पूछा, "भगवान, एक ही माँ-बाप की गोद में पले-बढ़े दो भाई एक जैसे क्यों नहीं होते? एक दयालु होता है, दूसरा क्रूर। एक संतोषी, दूसरा लालची। ऐसा क्यों?"
बुद्ध ने कहा, "आनंद, जैसे एक खेत में तरह-तरह के बीज होते हैं - कुछ अच्छे, कुछ बुरे - वैसे ही हर प्राणी के मन में अनगिनत संस्कारों और अनुशयों के बीज होते हैं। जिन बीजों को हम पानी देते हैं, वे उगते हैं। यही कारण है कि एक ही माहौल में रहते हुए भी लोग अलग-अलग होते हैं।"
सारांश में
इस तरह
से परिभाषित
कर सकते
हैं : अनुशय वे गहरे बीज हैं जो हमारे मन की तहों में पड़े हैं। तृष्णा वह पानी है जो इन बीजों को सींचती और संस्कार वे पौधे हैं जो उगते हैं और फिर अपने बीज खुद पैदा कर लेते हैं।
समझने के लिए गुस्से की आदत को लीजिए।
किसी व्यक्ति में क्रोध का अनुशय गहरा है - यानी क्रोध के बीज उसके मन में मौजूद हैं। जो भी बात उसे बुरी लगती है, मन में तृष्णा जागती है - "यह मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकता, मुझे ईंट का जवाब पत्थर से देना आता है।" यह तृष्णा क्रोध के बीज को सींचती है। और फिर व्यक्ति गुस्सा करता है, चिल्लाता है, मारता-पीटता है। यह क्रिया एक संस्कार बन जाती है। बार-बार ऐसा करने से यह संस्कार गहरा होता जाता है। और यह संस्कार फिर से आक्रोश-अनुशय को मजबूत कर देता है।
यह एक चक्र है। अनुशय से तृष्णा, तृष्णा से कर्म, कर्म से संस्कार, और संस्कार से अनुशय और मजबूत।
इस चक्र को समझना बहुत ज़रूरी है। क्योंकि जब तक हम इस चक्र को नहीं समझेंगे, तब तक हम आदतों को सिर्फ बाहरी स्तर पर बदलने की कोशिश करते रहेंगे - खटिया बदलते रहेंगे, पैर हिलाने की आदत नहीं बदलेंगे।
बुद्ध का रास्ता हमें इस चक्र को तोड़ने का तरीका बताता है। वह तरीका है - सजगता, समझ, और करुणा से भरा हुआ आत्म-अवलोकन।
पर उस पर विचार करने से पहले, एक कहानी सुनिए: एक बार एक व्यक्ति बुद्ध के पास आया और बोला, "भगवान, मुझे गुस्सा बहुत आता है। मैं इसे रोकना चाहता हूँ, लेकिन रुकता नहीं। क्या करूँ?"
बुद्ध ने कहा, "जब गुस्सा आए, तो उसे रोकने की कोशिश मत करो। बस उसे देखो। देखो कि कैसे वह आता है, कैसे रहता है, कैसे जाता है। उसे पहचानो - 'यह गुस्सा है, यह मैं नहीं हूँ, यह सिर्फ एक भावना है।' और जब तुम यह देखने लगोगे, तो एक दिन पाओगे कि गुस्सा आता भी है, लेकिन अब तुम उसके गुलाम नहीं हो।"
यही है बौद्ध दृष्टिकोण का सार - आदतों से लड़ना नहीं, उन्हें समझना है। उनके आने, रुकने और जाने को सजगता से देखना। और धीरे-धीरे उनकी पकड़ से मुक्त हो जाना।
अगले अध्याय में हम देखेंगे कि यह सब होता कैसे है। यानी आदत बनने की पूरी प्रक्रिया - स्पर्श से लेकर उपादान तक - और इस प्रक्रिया में सजगता कैसे काम करती है।
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(ब्लॉग का अगला भाग 2/2 में क्रमशः जारी रहेगा)