Pages

Wednesday, 2 April 2025

गुरुद्वारा पंज प्यारे भाई धरम सिंह, हस्तिनापुर



पंज प्यारे या पांच प्यारे ( पंजाबी में -  ਪੰਜ ਪਿਆਰੇ ) वो पांच सिख कहलाते हैं जो गुरु गोविन्द सिंह के कहने पर अपना सिर कटवाने के लिए सहर्ष तैयार हो गए थे। इन के नाम हैं : भाई दया सिंह, भाई हिम्मत सिंह, भाई मोहकम सिंह, भाई धरम सिंह, भाई साहिब सिंह। ये पांच प्यारे सिख समाज के सामूहिक प्रतिनिधि माने जाते हैं। इन पाँचों के चुनाव की दिलचस्प कथा इस प्रकार है :   

सन 1699 का बैसाखी आयोजन आनंदपुर साहिब, पंजाब में गुरु गोबिंद सिंह द्वारा कराया गया था। सामूहिक कीर्तन के बाद गुरु साहिब ने मंच पर आ कर तलवार लहराते हुए कहा की गुरु साहिबान की आज्ञा पर जान न्योछावर करने के लिए कौन तैयार है ? सभा में सन्नाटा छा गया। तभी लाहौर निवासी दयाराम खत्री ने स्वयं को पेश कर दिया। उसे तम्बू में ले जाया गया और तम्बू के बाहर खून बहता नज़र आने लगा। गुरु जी ने खून से सनी तलवार से फिर गर्जना की। इस बार धरम दास जाट, निवासी गांव सैफपुर, हस्तिनापुर, जिला मेरठ ने हाँ कर दी और उसे भी तम्बू में ले जाया गया। इसी प्रकार तीसरी गर्जना पर जगन्नाथ पुरी, ओडिशा निवासी हिम्मत सिंह रसोइया, चौथी बार द्वारका, गुजरात के निवासी मोहकम चन्द दरजी और पांचवी बार की गर्जना में बिदर, कर्णाटक के निवासी साहिब चन्द नाई ने स्वयं को पेश कर दिया। 

बाहर बैठे लोगों को कुछ समझ नहीं आ रहा था। तभी गुरु साहिबान ने पांचों को सुन्दर कपड़ों में तैयार करवा के मंच पर पेश किया। पाँचों के नाम के साथ 'सिंह' शब्द जोड़ा और कहा कि अब तुम आनंदपुर निवासी हो और अब तुम्हारी कोई जाति या वर्ण नहीं है। गुरु साहिबान ने पांचों को अमृत पिलाया और फिर उन्हीं के हाथों से खुद भी अमृत छका। पांचों को गुरु साहिबान ने खण्डा ( छोटी दो धारी तलवार ) प्रदान किया और इस तरह से खालसा पंथ की शुरुआत हुई।

इसीलिए भाई नन्द लाल जी ने लिखा : 

वाह-वाह गोविंद सिंह आपे गुरु चेला !
गुर सिमर मनाई कालका खंडे की वेला
वाह-वाह गोविंद सिंह आपे गुरु चेला !
पिवो पाहुल खंडे धार होए जनम सुहेला
गुरु संगत कीनी खालसा मनमुखी दुहेला !

इस घटना को "खंडे बाटे की पाहुल" भी कहा जाता है। खण्डा और बाटा ( बर्तन ) जंतर कहलाते हैं, पांच बाणियां - 1. जपुजी साहिब और शब्द हजारे, 2. जाप साहिब, 3. त्व प्रसाद सवैये, 4. बैनती चौपाई साहिब और 5. आनंद साहिब, शाम को रहिरास और कीर्तन सोहेला मंतर कहलाते हैं। इन बाणियों को गुरु साहिबान ने खालसा के दैनिक अभ्यास में शामिल किया था। बाणियों को पढ़ते हुए मीठे पतासे बाटे में डाल कर और खण्डे को बाटे में घुमा कर जो जल तैयार होता है उसे पाहुल या अमृत कहते हैं। अमृत पी कर सिख, खालसा फ़ौज में शामिल हो जाते हैं। कालांतर में महिलाओं को भी 'पंज प्यारे' में शामिल किया जाने लगा। उनके नाम के साथ 'कौर' शब्द लगाया जाता है। पंज प्यारे नगर कीर्तन और जलूस में सबसे आगे रहते हैं, नए पंज प्यारों को अमृत पिलाते हैं और नए गुरुद्वारों में पत्थर लगाते हैं।

भाई धरम सिंह ( 1666–1708 )

इनका जन्म गांव सैफपुर, हस्तिनापुर जिला मेरठ में सम्वत 1724 में हुआ था। पिता का नाम चौधरी संतराम और माता का श्रीमती साभों था। जब उन्होंने अमृतपान किया तो उनकी आयु 32 वर्ष की थी। ये पहले 'पंज प्यारे' में से एक हैं जिन्हें स्वयं गुरु गोबिंद सिंह जी ने अमृतपान कराया था। इनकी शहीदी सम्वत 1795 में हुजूर साहिब नांदेड़, महाराष्ट्र में हुई। भाई धरम सिंह के सैफपुर गांव के पुश्तैनी घर में गुरुद्वारे की नींव रखी गई थी। गुरूद्वारे का अब तक काफी विस्तार हो चुका है और धार्मिक कार्यक्रम, लंगर चलाए जा रहे हैं।

हम हस्तिनापुर विपासना केंद्र गए हुए थे और वापसी में खेतों के बीच से गुजरते हुए गुरूद्वारे का बोर्ड नज़र आया था। हमने सोचा की गुरूद्वारे में भी मत्था टेकते चलें। गुरुद्वारा हस्तिनापुर की मुख्य सड़क से लगभग तीन चार किमी दूर सैफपुर गांव में है। हमें सड़क टूटी फूटी मिली पर रास्ते में साइन बोर्ड लगे हुए थे जिससे आसानी से पहुँच गए। प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :
  

गुरूद्वारे के अंदर का दृश्य 


भाई धरम सिंह की जीवन कथा 

 

गुरूद्वारे का प्रवेश द्वार 


गुरूद्वारे का एक दृश्य 


दर्शनार्थी 


गांव के वातावरण में गुरुद्वारा 


आने वाली बैसाखी की तैयारी की सूचना 


और अधिक जानकारी के लिए इंटरनेट पर  देखें - SikhiWiki, Encyclopedia of the Sikhs

Thursday, 12 December 2024

लोहागढ़ भरतपुर

लोहागढ़ किला, 18वीं शताब्दी में भरतपुर के महान शासक महाराजा सूरजमल ( 1707 - 1763 द्वारा निर्मित किया गया था। यह किला भरतपुर शहर के मध्य स्थित है, जो महाराजा सूरजमल द्वारा राजधानी घोषित किया गया था। भरतपुर नामक यह स्वतंत्र राज्य अपने समय में एक विशाल क्षेत्र तक फैला था, जिसमें आगरा, अलवर, अलीगढ़, मेवात, गुरुग्राम, मथुरा और मेरठ शामिल थे।

भरतपुर का नाम भगवान राम के भाई भरत के नाम पर रखा गया है, जबकि लक्ष्मण इस राज परिवार के कुलदेवता माने जाते हैं। पहले यह क्षेत्र सोगड़िया जाट सरदार रुस्तम के अधीन था, जिसे 1733 में जीतकर महाराजा सूरजमल ने भरतपुर शहर की नींव रखी। भरतपुर की स्थापना से पहले, इस क्षेत्र में विभिन्न छोटी रियासतों का शासन था:

  • 1670 में सिनसिनी रियासत।
  • 1695 में थून रियासत।
  • 1722 में डीग रियासत।

महाराजा बदन सिंह और उनके पुत्र महाराजा सूरजमल ने इन क्षेत्रों को एकत्रित कर भरतपुर राज्य बना दिया। महाराजा सूरजमल के शासनकाल के बाद से लेकर 1947 तक, भरतपुर राज्य में 13 महाराजा हुए।

लोहागढ़ किला अपनी अद्भुत मजबूती और सुरक्षा के लिए प्रसिद्ध है। इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं:

  • किले के चारों ओर पानी से भरी गहरी और चौड़ी खाई इसे अजेय बनाती है।
  • किले के अंदर महल, मंदिर और बुर्ज हैं।
  • इस किले का एक द्वार अष्टधातु से बना है।
  • किले के मध्य स्थित संग्रहालय, सुबह 9 बजे से खुलता है।
  • यह किला पर्यटकों के लिए दिनभर खुला रहता है। दोपहर की धूप तीखी हो सकती है; पानी साथ ले जाना उचित होगा।

भरतपुर एक छोटा किंतु प्राचीन शहर है, जो अपने इतिहास और संस्कृति के कारण अनोखा है।  अगर आप  केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान देखने आते हैं तो इस के साथ-साथ, लोहागढ़ किला भी अवश्य देखें। 

लगभग 30  किमी दूर डीग का किला और महल भी है वो भी देखे जा सकते हैं। 

प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :

 
1. भरतपुर का नक्शा जिसमें किले के दो और पुराने भरतपुर के दस गेट दर्शाए गए हैं 

2. जवाहर बुर्ज के ऊपर बारादरी पर सुन्दर कारीगरी 

3. जवाहर बुर्ज आरामघर 

4. जवाहर बुर्ज पर चार बारादरी हैं 

5. लोहागढ़ का जवाहर बुर्ज और बुर्ज पर बुजुर्ग !

6. किले में राजकीय संग्रहालय 

7. लोहागढ़ का किशोरी महल 

8. किशोरी महल में महाराजा सूरजमल की मूर्ति 

9. अष्टधातु से बना गेट 


10. किले की नहर जिसमें हमेशा पानी भरा रहता है 

11. किले की नहर 

12. लोहागढ़ का एक गेट 


13. किले का एक सुन्दर बांके बिहारी मंदिर 

 
14. भरतपुर का सुबह का फूल बाजार 

15. भरतपुर में सुबह का मशहूर नाश्ता - कचौड़ी और जलेबी 

16. ऊंट गाड़ी दिखे तो आप राजस्थान में हैं 

17. भरतपुर के एक चौराहे पर रखी तोप। ट्रैफिक ज्यादा था और चबूतरे पर इतने पोस्टर लगे हुए थे की पढ़ नहीं पाए कि इसका महत्त्व क्या है 

 
18. सुन्दर लक्ष्मण मंदिर, भरतपुर