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Saturday, 25 March 2017

लाक्षा गृह, बरनावा

महाभारत के युद्ध से पहले युधिष्टिर ने निवेदन किया की उन्हें अगर हस्तिनापुर राज्य नहीं दिया जा सकता तो उसके बदले में केवल पांच गाँव ही दे दिए जाएं - पानीपत, सोनीपत, बागपत, तिलपत और वरुपत. पर कहाँ मिलने थे ये गाँव. दुर्योधन ने जवाब में कहा की सुई की नोक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा. बल्कि दुर्योधन ने पांडवों को मारने के लिए लाख का महल बनवाने की तैयारी करनी शुरू कर दी थी.

दुर्योधन ने अपने मंत्री ( या शिल्पकार? ) पुरोचन से सुंदर सा एक महल बनवाया. पर था वो लाख का बना हुआ याने जिसे आग जल्दी से ध्वस्त कर दे. पांचो भाई और कुंती वहां रहने के लिए पहुँच गए. पर समय रहते महात्मा विदुर ने पांडवों को सूचना पहुंचा दी. महल से नदी तक गुफा बना ली गई. फिर एक रात भीम ने महल में आग लगा दी. महल और उसमें सोया पुरोचन अग्नि की भेंट हो गए. पांचो पांडव और कुंती गुफा के रास्ते नदी तट पर सुरक्षित पहुँच गए.

यह कथा बहुत ही संक्षिप्त इसलिए कर दी की आपने पढ़ी, सुनी या टीवी पर देखी जरूर होगी. ये लाक्षा गृह कहाँ था? क्या कोई अवशेष मिले हैं इस किले के? इस विषय पर बहुत से लोगों बात हुई, इंटरनेट पर काफी पड़ताल की तो पता लगा की:

- एक लाक्षा गृह बरनावा में है जहाँ हिंडन नदी बहती है. ये जगह मेरठ से 35 किमी दूर है, 
- एक लाक्षा गृह चकराता, देहरादून से 60 किमी आगे यमुना तट पर है और 
- एक लाक्षा गृह इलाहाबाद के पूर्व में गंगा तट पर बताया जाता है.

इनमें से प्रामाणिक स्थान कौन सा है पता नहीं. अगर ऊपर लिखे पांच गांव - पानीपत, सोनीपत, बागपत, तिलपत और वरुपत - के नाम सही मान लिए जाएं और अगर हस्तिनापुर से बरनावा की दूरी देखी जाए - जो की 65 किमी है - तो बरनावा में ही लाक्षा गृह होना चाहिए. इसके अतिरिक्त महात्मा विदुर का गाँव बिजनौर भी हस्तिनापुर से दूर नहीं है. पर यहाँ गंगा नदी नहीं बहती बल्कि हिंडन और कृष्णा नदियों का संगम है. कृष्णा को अब काली कहते हैं जो वाकई काली हो चुकी है और लगभग ना के बराबर रह गई है. हिंडन की हालत भी नाज़ुक है जो नोयडा जाकर यमुना में मिल जाती है. बहरहाल मेरठ की रोहटा रोड लेते हुए हम बरनावा पहुँच गए. जब कभी देहरादून और इलाहाबाद की यात्रा होगी तो वहां के भी लाक्षा गृह देख लेंगे. पर देखकर लगा की हमारी तरह पुरातत्व विभाग भी संशय में ही है.

सड़क के साथ ही 100 फुट ऊँचा और 30 एकड़ में फैला हुआ एक विशाल टीला है जिस पर ASI का बोर्ड लगा है कि लाखा मंडल के नाम से प्रसिद्ध टीला. इसे पढ़ कर तसल्ली नहीं हुई कि लाक्षा गृह के लिए हाँ माना जाए या ना. टीले पर एक लाल पत्थर की बारादरी है, दो टूटे हुए गुम्बद हैं. ये कब और किसने बनाए इसके बारे में कुछ लिखा नहीं है. टीले के नीचे दो गुफाऐँ हैं जहाँ से हिंडन नदी 100 - 125 मीटर दूर है. टीले पर एक संस्कृत महाविद्यालय है जिसका एक छात्र ही हमारा गाइड था. गौशाला, यज्ञशाला और छात्र हॉस्टल भी है.
कुछ फोटो प्रस्तुत हैं: 


बाईं गुफा 
दाहिनी गुफा 
गुफा 

टीले से लिया गया फोटो. लाल बिंदु दाहिनी गुफा और लाल लाइन हिंडन नदी दिखा रहे हैं 

ASI के बोर्ड पर लिखा है  - लाक्षा मंडप के नाम से प्रसिद्द टीला,  Mound known as Lakha Mandap

टीले पर बनी बारादरी 
पता नहीं कब और किसने बनाई ये ईमारत
एक और गुम्बद 
प्रवेश द्वार 
बोर्ड पर लिखा है - महाभारत पर्यटन सर्किट योजना के अंतर्गत चिन्हित - 'लाक्षा गृह क्षेत्र, बरनावा (बागपत) आपका स्वागत करता है' 
लाखा मंडप टीले के ऊपर से नज़र आता बरनावा गाँव और बीच में है जैन मंदिर   

लाल बिंदु बरनावा गाँव दिखा रहा है. मेरठ से 35 किमी दूर 

खोजी यात्री लाखा मंडप टीले पर. इस काले पत्थर पर इस तरह से लिखा हुआ है: "बरनावा की पहचान महाभारत में वर्णित वारणावत से की गई है. यह हिंडन एवं कृष्णा नदियों के संगम पर स्थित है. गाँव के दक्षिण में लगभग 100 फीट ऊँचा और 30 एकड़ पर फैला हुआ एक टीला है जिसे लाक्षा गृह का अवशेष समझा जाता है. इस टीले के नीचे दो सुरंग स्थित हैं. इसी लाक्षा गृह में कौरवों ने पांडवों को एक षड्यंत्र  के अंतर्गत मारने का असफल प्रयत्न किया था. कहा जाता है कि पांडवों ने उक्त अग्निकांड से निकलने हेतु इस टीले के नीचे स्थित इन्हीं सुरंगो का प्रयोग किया था. वर्तमान में यहां एक संस्था श्री गांधी धाम समिति, वैदिक अनुसंधान समिति तथा श्री महानंद संस्कृत महाविद्यालय भी स्थापित है"




Wednesday, 22 March 2017

लोन मंजूर

बैंक दो दिन की छुट्टी के बाद खुला था इसलिए हॉल में काफी गहमा गहमी थी. पर हमारे चीफ साब इस हलचल के आदी थे और ठन्डे ठन्डे अपना काम निपटाते रहते थे. एक ज़माना गुज़र गया है हमारे चीफ साब को बैंक में. अब तो बस १८ महीने ही बचे थे रिटायर होने में. रिटायरमेंट की याद आते ही चीफ साब ने सर पर हाथ फेरा. बचे हुए पांच सात बाल पीछे को लेट गए और फिर वापिस आ कर अपनी अपनी जगह पर खड़े हो गए. फिर भी साब ने पिछली जेब से छोटी कंघी निकाली और सर पर चला दी. किनारे किनारे की काले और सफ़ेद बालों की झालर दुबारा सेट कर ली. टाई की नॉट चेक की और उसकी लम्बाई अपने मोटे पेट पर ठीक की. बस अब वो नए कस्टमर से बात करने के लिए तैयार हो गए.

- जी बताएं ( कमबख्त लोन ना मांगे बाकी सब तो ठीक है )?
- सर मेरा यूनिफार्म बनाने का काम है. पिछले दस सालों से कर रहा हूँ. बड़ी कोशिश के बाद एयर लाइन्स का बड़ा आर्डर मिला है. इनके लिए कपड़ा महंगा वाला लेना पड़ेगा सर और कारीगर भी महंगे होंगे. इसलिए कुछ हेल्प कर दें कोई लिमिट वगैरा बना दें सर तो बड़ी मेहरबानी होगी.
- सिर्फ आर्डर पे? एडवांस भी तो मिलेगा आपको? और टैक्स की रिटर्न आपकी? पिछली बैलेंस शीटें? कोई जमीन जायदाद गिरवी रखने के लिए है? देखना पड़ेगा ( कहाँ कहाँ से आ जाते हैं स्साले ).
- सारे कागज़ लाया हूँ मैं सर. दरअसल में आपके हेड ऑफिस भी गया था सर दो दिन पहले और चेयरमैन साब से मिला था. बहुत अच्छी तरह बात हुई सर चाय पर. उन्होंने ही कहा कि झुमरी तलैय्या ब्रांच मैनेजर गोयल साब से मिलो. बड़ी तारीफ़ कर रहे थे सर आपकी. कह रहे थे की गोयल साब कोई न कोई रास्ता जरूर निकालेंगे.
- हेंहेंहें चेयरमैन साब का बड़प्पन है जी ज़र्रानवाज़ी है ( चेयरमैन उल्लू का पट्ठा है और साथ में तू भी ). पहले आप चाय लें सर. आपके साथ लोन मैनेजर को भेज देता हूँ. उसकी रिपोर्ट आने के बाद देखते हैं क्या किया जा सकता है. ठीक है ना जी.

लोन मैनेजर की रिपोर्ट बाद में आई चेयरमैन का फ़ोन पहले आ गया,
- गोयल आपने जूनियर को पार्टी के साथ भेज दिया?
- सर सर वो ज़रा पैर में मोच ....पर फ़ोन तब तक कट चुका था. पार्टी को फ़ोन लगाया,
- आ रहा हूँ मैं.
लोन मैनेजर की रिपोर्ट साथ लेकर चीफ साब पहुँच गए पार्टी की फैक्ट्री में. फैक्ट्री का एक चक्कर लगाया पर ख़ास पसंद नहीं आई. ऑफिस में बैठे तो देखा कि काले शीशों से बंद बड़ा सुंदर ऑफिस बना हुआ था. सोचा लोन मैनेजर की रिपोर्ट पर बातचीत कर ली जाए. पर तभी दो महिलाएं अंदर आ गईं. फैक्ट्री वाले ने महिलाओं से मिलवाया,
- सर इनसे मिलिए ये मेरी पत्नी हैं सुधा. और ये हैं आयशा जो हमारे यहाँ मॉडलिंग करती हैं. एयरलाइन्स का काम लेना आसान नहीं है सर. स्टाइल वगैरा चेक करने के लिए मॉडल भी रखने पड़ते है सर. आयशा अरे साब के लिए कुछ लाओ ना?
ठंडी ठंडी बियर आई तो चीफ साब मुस्कराए. और जब बियर आयशा सर्व करने लगी तो चीफ साब धन्य हो गए. और जब आयशा ने बियर चार ग्लासों में डाली तो चीफ साब ढेर हो गए.

अगले दिन चीफ साब ने लोन मैनेजर को बुलाया,
- कैसी कैसी रिपोर्ट लिख देते हो यार? प्रोजेक्ट को गर्दन से नहीं पकड़ते तुम. कभी कान से पकड़ लेते हो और कभी नाक पकड़ लेते हो. महिलाएं इतना बढ़िया काम कर रही हैं हमें उनका साथ देना है. तभी तो तरक्की होगी. बढ़िया सी रिपोर्ट बना कर लाओ मैंने लोन की मंज़ूरी देनी है. समझे?

चीफ साब 



Saturday, 18 March 2017

अमर सागर जैन मंदिर, लौद्रवा, जैसलमेर

थार रेगिस्तान का एक प्रमुख शहर है जैसलमेर जो कि भाटी राजपूत महाराजा जैस्सल ने 1178 में बसाया था. इससे पहले भाटी राजपूतों की राजधानी लौद्रवा हुआ करती थी. लौद्रवा जिसे लुद्रावा या लौदर्वा भी कहते हैं जैसलमेर से लगभग 16 किमी दूर है.

जैसलमेर और लौद्रवा के बीच में एक बहुत ही सुंदर मंदिर है जो जैसलमेर के पटवा सेठ हिम्मत मल बाफना ने 1871 में बनवाया था. बाफना समाज के इतिहास कुछ इस तरह से बताया जाता है: परमार राजा पृथ्वीपाल के वशंज राजा जोबनपाल और राजकुमार सच्चीपाल ने कई युद्ध जीते जिसका श्रेय उन्होंने 'बहुफणा पार्श्वनाथ शत्रुंजय महा मन्त्र' के लगातार उच्चारण को दिया. युद्ध जीतने के बाद उन्होंने जैन आचार्य दत्तसुरी जी से जैन धर्म की दीक्षा ली. उसके बाद से वे बहुफणा कहलाने लगे. कालान्तर में बहुफणा, बहुफना, बाफना या बापना में बदल गया. बाफना समाज की कुलदेवी ओसियां की सच्चीय माता हैं. इसीलिए इनके मंदिरों में जैन तीर्थंकर के अतिरिक्त हिन्दू मूर्तियाँ भी स्थापित की जाती हैं.

मंदिर में ज्यादातर जैसलमेर का पीला पत्थर इस्तेमाल किया गया है. पर साथ ही सफ़ेद संगमरमर और हल्का गुलाबी जोधपुरी पत्थर भी कहीं कहीं इस्तेमाल किया गया है. मंदिर के स्तम्भ, झऱोखे और छतों पर कमाल की नक्काशी है.

जैसलमेर से मंदिर तक आने जाने के लिए आसानी से वाहन मिल जाते हैं. प्रवेश के लिए  शुल्क है और कैमरा शुल्क देकर फोटो भी ली जा सकती हैं. मंदिर सुबह से शाम तक खुला रहता है. यहाँ की रेगिस्तानी धूप बहुत तीख़ी है और हवा बहुत तेज़ जिसकी वजह से यहाँ सभी सिर ढक कर रखते हैं आप भी अपना ध्यान रखें. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:


जैन मंदिर 

मंदिर का कुआं

सुंदर प्रवेश द्वार 

भगवान आदिनाथ

सुंदर नक्काशी 

छत पर नक्काशी

छत पर नक्काशी

मंदिर


द्वारपाल

भैरू जी

चबूतरे पर नक्काशी

ऊपरली मंजिल पर 

मंदिर की परछाई सूखे तालाब पर

गोल गुम्बद 

पटवा सेठ श्री हिम्मत मल जी बाफना का स्मारक 




Wednesday, 15 March 2017

जैन मंदिर, लौद्रवा, जैसलमेर

लौद्रवा नामक जैन तीर्थ जैसलमेर से लगभग 16 किमी दूर है. यहाँ एक बहुत ही सुंदर और प्राचीन मंदिर - जिनालय है जो 23वें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी को समर्पित है.

लौद्रवा को लुद्र्वा या लुद्रावा भी कहते हैं. हज़ार बारह सौ साल पहले जब ईरान, इराक, अफगानिस्तान से व्यापारी ऊँटों के कारवां लेकर चलते थे उस वक़्त लौद्रवा व्यापारियों का एक छोटा सा पड़ाव था. यहाँ लोधुरवा राजपूतों का निवास था. नौवीं सदी में भाटी राजपूत देवराज ने लौद्रवा पर कब्जा कर लिया और इसे राजधानी बनाया.

व्यापारी कारवाँ का पड़ाव होने के कारण यह क्षेत्र समृद्ध था. इसी कारण यहाँ लूटपाट और हमले भी होते रहते थे. 1025 में महमूद ग़ज़नवी ने लौद्रवा की घेरा बंदी की और दूसरा बड़ा हमला 1152 में मोहम्मद गौरी ने किया. इन हमलों में मंदिर और शहर का जान माल का भारी नुक्सान हुआ. सुरक्षा को मद्दे नज़र रखते हुए महाराजा जैसल ने 1178 में राजधानी को लौद्रवा से हटा कर नई राजधानी जैसलमेर में बना दी.

हमलों में बर्बाद हुए मंदिरों को एक व्यापारी थारू शाह ने 1615 में दुबारा बनवाना शुरू किया. समय समय पर मंदिर का काम होता रहा और 1970 में इन्हें पूर्ण सुन्दरता के साथ पुनः स्थापित कर दिया गया. मंदिर में ज्यादातर स्थानीय पीला पत्थर इस्तेमाल किया गया है. पर साथ ही जोधपुर से लाया गया हल्का गुलाबी और मकराना का सफ़ेद संगमरमर भी इस्तेमाल किया गया है. मंदिर की जगती, स्तम्भ, तोरण, झरोखे और पत्थर की जालियों पर कमाल की और मनमोहक कारीगरी है.

मंदिर दिन भरे खुले रहते हैं और फीस देकर कैमरा इस्तेमाल किया जा सकता है. पास में ही जैन सात्विक भोजनालय है जहाँ संध्या से पहले कूपन पर भोजन उपलब्ध हो जाता है. जैसलमेर से आने जाने के लिए जीप और टैक्सी आसानी से मिल जाती हैं. पर थार रेगिस्तान के इस इलाके में तीख़ी धूप और तेज़ हवाएं चलती हैं ध्यान रखें. कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:

जिनालय  

मुख्य द्वार 

जगती या चबूतरा 

तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ का मंदिर 

छत पर सुंदर नक्काशी 

स्थानीय पीले पत्थर से बना सुंदर तोरण 

तीर्थंकर श्री ऋषभदेव का मंदिर 

चबूतरे पर की गई नक्काशी 

दीवारों के डिजाईन और फूल पत्ते 


मूर्तियाँ कम हैं और बहुत छोटी हैं 

जाली का मनमोहक काम 

परिसर में मुख्य मंदिर के अलवा तीन छोटे मंदिर भी हैं 

1950 में दी गई एक भेंट 


Saturday, 11 March 2017

खाभा फोर्ट, जैसलमेर

जैसलमेर शहर से 35 किमी दूर एक गाँव और किला है खाभा. इस गाँव खाभा से कई किस्से जुड़े हुए हैं. साथ ही किस्सों में 83 और गाँव भी हैं. इन 84 गाँव को पाली जिले से आये ब्राह्मण व्यापारियों ने 1200 के आसपास बसाया था. ये 84 गाँव जैसलमेर के बहुत बड़े इलाके में फैले हुए हैं. सभी 84 गाँव बड़े व्यवस्थित ढंग से बसाए गए थे और इनमें मंदिर, कुँए, तालाब, शमशान वगैरा भी थे. इन गाँव वासियों का काम था पशु पालन, खेती, नील, सोने और चांदी के जेवर, सिल्क, हाथी दांत और अफीम का व्यापार. ये व्यापार कराची, सिंध के रास्ते इरान, इराक, अफगानिस्तान से ऊँटों द्वारा हुआ करता था. इनमें दो प्रमुख गाँव थे खाभा और कुलधरा.

इन गाँव से टैक्स वसूली का काम जैसलमेर राज दरबार के दीवान किया करते थे. 1825 में जैसलमेर के दीवान सालेम सिंह थे जो अपनी सख्ती के कारण ज़ालिम सिंह कहलाते थे. सालेम सिंह की सात पत्नियाँ बताई जाती हैं पर फिर भी वसूली के दौरान कुलधरा के एक पालीवाल ब्राह्मण की कन्या उन्हें भा गई और गाँव प्रधान को हुक्म दिया गया की लड़की को शादी के लिए तैयार कर लें. रात को पंचायत बैठी और फैसला हुआ की 84 गाँव के सभी निवासी तुरंत जैसलमेर राज छोड़ कर चले जाएं. रातों रात सारे 84 गाँव खाली कर दिए गए. 

परन्तु बाद में बदनामी और वसूली के घाटे से बचने के लिए इन्हें वापिस लाने का प्रयास किया गया. 82 गाँव में कुछ परिवार आ भी गए परन्तु कुलधरा और खाभा में कोई वापिस नहीं आया. बताया जाता है की कुछ समय पहले सिंध, पकिस्तान से आये कुछ हिन्दुओं को यहाँ बसाया गया है. बहरहाल आजकल खाभा गाँव की आबादी लगभग 300 है.  

कुछ इतिहासकारों का कहना है कि पानी की कमी के कारण निवासियों का पलायन होता गया. जनसंख्या घट जाने के बावजूद टैक्स वसूली में कमी नहीं की गई जिसके कारण लोग गाँव छोड़ कर चले गए. पर इतने समृद्ध गाँव एक साथ खाली क्यूँ और कैसे हो गए यह एक पहेली है.

पर हर पर्यटक को राज दरबार के दीवान के अत्याचार और रातों रात गाँव का खाली होना कौतुहल और अचरज भरा लगता है और गाँव देखने की इच्छा भी होती है. इसीलिए देशी विदेशी पर्यटक काफी संख्या में कुलधरा और खाभा के खंडहर देखने आते हैं. कुलधरा से सम्बन्धित किस्सा इस लिंक पर देखा जा सकता है:

http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/03/blog-post.html भूत प्रेतों का गाँव - कुलधरा, जैसलमेर 
खाभा के बारे में ये भी कहा जाता है कि यह गाँव नेहड़ नाम के पालीवाल ब्राह्मण को दहेज़ में दिया गया था जिसे दोबारा व्यवस्थित ढंग से बसाया गया. खाभा गाँव और किले को पर्यटन स्थल में विकसित किया जा रहा है. किला तो छोटा सा ही है पर इसमें जियोलॉजी का संग्रहालय भी बनाया जा रहा है. यह जान कर आश्चर्य हुआ की करोड़ों साल पहले यहाँ थार रेगिस्तान के बजाए समुन्दर हुआ करता था जो धीरे धीरे सात आठ सौ किमी पीछे हट गया और इस इलाके की बहती नदियाँ भी सूख गईं. अब यहाँ रह गए हैं केवल झाड़ियाँ और सूखी पीली रेत के टीले.

खाभा आने जाने के लिए जैसलमेर से सवारी आसानी से मिल जाती है. धूप यहाँ बड़ी तीखी होती है और हवा लगातार बहुत तेज़ चलती है. साथ ही खाने पीने की असुविधा है इसलिये इंतज़ाम कर के चलें. किला सुबह से शाम तक खुला है और प्रवेश शुल्क देकर देखा जा सकता है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

खाभा किला 

किले का बायाँ पक्ष

खाभा फोर्ट की बाँई दीवार  

पुनरुद्धार का काम जारी है 

पीला पत्थर जैसलमेर की विशेषता है 
पूरा बन जाने पर सुंदर नज़र आएगा  

तेज़ गर्मी और कड़ी सर्दी से बचाव के लिये छत के नीचे बल्लियाँ लगाईं गई हैं 

किले के मंदिर में महिषासुर मर्दिनी

खाभा गाँव का एक हिस्सा जहाँ थोड़े से लोग रहते हैं 

कारों के पीछे एक मंदिर और दो छतरियां भी देखी जा सकती हैं  

कभी सुव्यवस्थित गाँव रहा होगा खाभा 

'रण' ( जैसे कच्छ का रण )  को परिभाषित करता एक पोस्टर 

खुदाई में पाए गए तरह तरह के पत्थर 

प्राचीन बोल्डर या गोलाश्म 

गोलाश्म की परिभाषा 

किले के पिछली ओर की एक खिड़की से रेतीले टीलों का नज़ारा 

खाभा का इतिहास 

थार रेगिस्तान में खाभा फोर्ट जिस पर लाल झंडी लगी हुई है. किले से कांडला बंदरगाह लगभग 625 किमी दूर है