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Friday, 22 September 2017

हिंदी दिवस की पार्टी

साब ने अपने मटके जैसे पेट पर लाल टाई सेट की और शीशे में नज़र मारी. टाई ओके है. सिर पर आठ दस बाल बचे थे पर फिर भी आदतन उन बालों में कंघी घुमा दी. बेल्ट दुबारा से बाँधी. ये कमबख्त परेशान करती थी. दिन में दो तीन बार खोलकर फिर बांधनी पड़ती थी. क्या किया जाए बियर की चियर्स तो शाम को करनी ही होती है. और अब फर्क भी क्या पड़ता है जी रिटायर होने में चार महीने ही बाकी हैं. अब मेकअप की आखरी आइटम थी फुसफुस. दोनों साइड खुशबू स्प्रे करके सरकारी गाड़ी में बिराजमान हो गए. ड्राईवर से बोले,

- ऑफिस चलो. और सुनो 11 बजे मंत्री जी की फ्लाइट आनी है. हिंदी अफसर को ले जाना और रास्ते में दो ढाई सौ का एक बुक्के बनवा लेना. उनके नाम की तख्ती भी बनवा कर साथ ही ले जाना. निर्मला को बोल देना कंप्यूटर से हिंदी में कागज़ पर सुंदर सा नाम छाप देगी. तुम तख्ती पकड़ना और निर्मला बुक्के पकड़ लेगी. बुक्के का बिल संभाल लेना.

हमारे साब बड़े सिस्टम से चलते हैं तभी ना झुमरी तलैय्या के रीजनल मैनेजर हैं. झुमरी तलैय्या बैंक का सबसे बड़ा रीजन है और यहाँ बड़े बड़े लोन हैं. साब की बैंक के चेयरमैन साब के साथ अच्छी पटती है. साब बड़े बड़े लोगों के साथ शाम को क्लब में बैठते हैं. कभी कभी मेमसाब भी साथ जाती हैं.
ऑफिस पहुँच कर साब ने एक नज़र हॉल में मारी फिर अपने केबिन में घुस कर सिंहासन पर बैठ गए. चाय की चुस्की लेकर घंटी मार दी.
- निर्मला को भेजो.
- निर्मला जी गुड मोर्निंग. वाह ये अच्छा किया आज आप साड़ी पहन कर आई हैं. आज हिंदी अधिकारी लग रही हैं. वर्ना जीन वीन पहन कर आती हैं तो अंग्रेज़ी भाषा की अफसर लगती हैं. ऐसा है कि मंत्री जी की 11 बजे की फ्लाइट है. ड्राईवर आपको ले जाएगा. मंत्री जी को आप बुक्के दे देना और ढंग से ले आना. अच्छी रिपोर्ट लेनी है उनसे. डीएम ऑफिस जाना है वरना मैं खुद ही जाता. खैर उनको शाम को मैं छोड़ दूंगा. और क्या तैय्यारी है आज की ?
- जी बारा साढ़े बारा बजे मुख्य अतिथि को कार्यालय का निरीक्षण करा देंगे और मैनेजरों से मिलवा देंगे. कोई फाइल वगैरा देखना चाहें की हिंदी में काम हो रहा है या नहीं वो दिखा देंगे. एक बजे से दो बजे तक कांफ्रेंस रूम में मीटिंग होगी जिसमें आप मुख्य अतिथि का परिचय और सम्मान कर देंगे. दस मिनट के लिए उनके आशीर्वचन सुन लेंगे. प्रतियोगिता के पुरस्कार उनसे दिलवा देंगे. फिर आप की बारी है. अंत में मैं धन्यवाद प्रस्ताव रख दूंगी. उसके बाद लंच.
- ठीक-ए ठीक-ए. हमारे ऑफिस की कमजोर कड़ी कौन कौन हैं ?
- वेंकटेश जी उन्हें तो हिंदी लिखनी नहीं आती थोड़ा बहुत पढ़ लेते हैं और बोल लेते हैं. दूसरे हैं कपिल मोहन जी जो अच्छी हिंदी जानते हुए भी फाइलों में इंग्लिश में ही टिपण्णी करते हैं. मानते नहीं हैं. बाकी स्टाफ ठीक है.
- अच्छा. एक काम करो इन दोनों को कोई स्पेशल प्राइज दिलवा दो मंत्री जी से. कुछ भी बहाना मार देना कि हिंदी के लिए बड़ी मेहनत कर रहे हैं ये दोनों प्रबंधक. गिफ्ट में कोई पेन सेट वेट दिलवा देना. और हाँ मेरी तो आख़री स्पीच है अगले हिंदी दिवस में तो मेरी पेंशन लग चुकी होगी. एक पर्चे पर ज़रा स्पीकिंग पॉइंट्स लिख देना बाकी मैं संभाल लूंगा.
- जी सर.

मंत्री जी द्वारा ऑफिस के निरीक्षण के बाद कांफ्रेंस चालू हुई. इनाम बांटे गए और मंत्री जी द्वारा हिन्दी में काम करने पर शाबाशी दी गई और राष्ट्र भाषा के प्रचार प्रसार पर जोर दिया गया. हिंदी अधिकारी ने अनुरोध किया कि क्षेत्रीय प्रबंधक दो शब्द कहें तो उस पर आर. एम. साब जो बोले उसके कुछ अंश:

- माननीय मंत्री जी हमारा तो दिन अंग्रेजी के अखबार से शुरू होता है और शाम टीवी की अंग्रेजी न्यूज़ पर जाकर ख़तम होती है. ऐसा नहीं है कि हिंदी पढ़ लिख नहीं सकते पर अगर आसान सी हिंदी होती तो शायद जल्दी बदलाव आ जाता. पहले बैंक में इंग्लिश के सर्कुलर निकलते थे फिर महीने बाद उनका हिंदी वर्शन आता था. अब दोनों एक साथ आने लगे हैं. लेकिन हिंदी सर्कुलर के अंत में एक लाइन लिखी होती है की विवाद की स्थिति में इंग्लिश सर्कुलर ही मान्य होगा ! चलिए हिंदी लागू हो गई. एक और बात है मंत्री जी जापान में जापानी भाषा अधिकारी नहीं है, रूस में रूसी भाषा अधिकारी नहीं पर हिन्दुस्तान में हिंदी भाषा अधिकारी है. एकाधा हिंदी अफसर नहीं है हजारों की संख्या में हैं चाहे उनके बच्चे इंग्लिश माध्यम स्कूलों में पढ़ते हों. खैर धीरे धीरे लागू हो जाएगी. हमारी ये पारी तो समाप्त हो रही है अगले हिंदी दिवस में मुलाकात नहीं हो पाएगी. सभी को शुभकामनाएं और धन्यवाद.

सभा समाप्त हुई और चूँकि एयरपोर्ट जाने में काफी समय था तो क्षेत्रीय प्रबंधक ने माननीय मंत्री जी से झुमरी तलैय्या क्लब में चलकर बैठने का अनुरोध किया जो स्वीकार कर लिया गया. गपशप हुई और अंग्रेजी के दो दो पेग लगाए गए. माननीय मंत्री जी हवाई जहाज में बैठ कर घर चले गए और क्षे.प्र. सरकारी गाड़ी में बैठ कर घर चले गए.

घर की ओर 
 


Sunday, 17 September 2017

विपासना शिविर का छठा और सातवाँ दिन

विपासना मैडिटेशन के पांच दिन हो चुके थे और अब सुबह चार बजे उठने में कोई दिक्कत नहीं थी. अधिष्ठान में लगातार बिना हिले जुले बैठने में भी अभ्यस्त हो गए थे. वैसे भी तो ये बात कहते तो किससे कहते ? बोलती तो बंद थी पांच दिनों से ! देख लीजिये दुखड़े तो दुखड़े अपने छोटे मोटे सुखड़े भी किसी को बता नहीं पाए. इसलिए कुछ हद तक अपने अंदर के उबाल से छुटकारा हो गया. ये भी एक अनुभव था जिसका महत्व उस वक़्त समझ में नहीं आया पर अब विचार करने पर लगता है की अपनी कथा व्यथा सुनाने को मन कितना आतुर हो जाता है और मानसिक बैचेनी का कारण बनता है. जैसे कि 'मैं और मेरे साथ जो हुआ वो तो दुनिया से अलग है ! स्पेशल है !' जबकि ऐसा बहुत से लोगों के साथ होता ही रहता है.

पांच दिन गुजरने के बाद दूसरे साधकों पर ध्यान जाना भी घट गया था. कोई ऐसे कर रहा है या वैसे उस पर नज़र जानी स्वत: ही बंद हो गई. दूसरों को क्या देखें पहले खुद से तो निपट लें ! आचार्य जी ने दिन में एक एक घंटे की छूट भी दी कि या तो आप अपने कमरे में अभ्यास कर लें या फिर पगोडा में. अपने कमरे में किया तो बीच बीच में विघ्न पड़ा किसी बाहरी कारण से नहीं बल्कि अपने ही मन की हलचल से.

जहां तक पगोडा की बात है यह मंदिर नुमा बड़ा गोल हॉल था. इसमें किनारे किनारे गोलाई में शायद 30-40 छोटे छोटे कमरे या कक्ष या कोठरियां थीं. कोठरी इस लिए की इसमें आप या तो खड़े हो सकते थे या बैठ सकते थे परन्तु लेट नहीं सकते थे. सामने की दीवार में लगभग छे फुट की ऊँचाई पर एक गोलाकार रोशनदान था. अगर कक्ष के बीचो बीच फर्श पर आप बैठ जाएं तो दो फुट आगे, दो फुट बाएं और और दो फुट दाएं सफ़ेद दीवार और पीठ के दो फुट पीछे दरवाज़ा बंद. अटपटा सा लगा, घुटन सी महसूस हुई और लगा जेल में आ गए ! ठीक से ध्यान नहीं लगा. इस ध्यान कक्ष की पहली बैठक का अनुभव अलग ही रहा. बोलती बंद, आँख बंद, शरीर की हलचल बंद, तीन तरफ से दीवारें बंद और पीठ पीछे दरवाज़ा बंद याने * ? "x" @ # % $* ! उस वक़्त की भावनाओं के लिए शब्द कम पड़ गए ! पर अगले दिन जब उसी कक्ष में साधना की तो मन की स्थिति सामान्य रही.

छठे दिन और सातवें दिन एक बार फिर से पद्मासन लगा कर, कमर गर्दन सीधी रख कर और आँखें बंद करके शरीर में होने वाली संवेदनाओं पर ध्यान लगाना शुरू कर दिया. शुरू में तो स्थूल वेदनाएं ही समझ में आ रही थीं जिसमें से सबसे बड़ी तो थी घुटने का दर्द जो लगातार बैठने से हो रहा था. कन्धों में और रीढ़ का हड्डी में कुछ महसूस ही नहीं होता था. पर अभ्यास के बाद बारीक और सूक्ष्म संवेदनाएं भी पकड़ में आने लगीं. किसी किसी अंग में दबाव या खिंचाव पर भी ध्यान जाने लगा. छाती और फेफड़ों की हलकी सी हरकत भी पहचान में आने लगी. वो दोहा याद आ गया :

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान,
रसरी आवत जात के सिल पर परत निसान !

पगडंडियाँ 




Thursday, 14 September 2017

लेमन झील, स्वित्ज़रलैंड

स्विट्ज़रलैंड लगभग चौरासी लाख की आबादी वाला देश है जो ऐल्प्स के बर्फीले पहाड़ों में बसा हुआ है. यह देश चारों ओर से दूसरे देशों - इटली, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया और लिकटेंस्टीन से घिरा हुआ है. शायद इसीलिए यहाँ वायु सेना और थल सेना तो है परन्तु जल सेना नहीं है. स्विट्ज़रलैंड में चार राजभाषाएँ - फ्रेंच, जर्मन, इटालियन और रोमान्श इस्तेमाल की जाती हैं.

स्थानीय करेंसी का नाम स्विस फ्रैंक है. वर्ष 2016 के अनुमान के अनुसार प्रति व्यक्ति आय सामान्य GDP के अनुसार 78245 अमरीकी डॉलर है और इसके मुकाबले भारत की 2016-17 अनुमानित प्रति व्यक्ति आय सामान्य GDP पर आधारित फ़ॉर्मूले के अनुसार 1800 अमरीकी डॉलर है. याने हिन्दुस्तानियों को अभी बहुत मेहनत करनी है !

इस ठन्डे और खुबसूरत देश की कुछ फोटो यश वर्धन के सौजन्य से प्रस्तुत हैं:

लेमन झील ( अंग्रेजी में Lake Geneva और फ्रेंच में  le lac leman ) के किनारे सुंदर मूर्ति समूह 

लेमन झील के किनारे गायक फ्रेड्डी मरकरी की मूर्ति 

लौसने Lausanne की झील 

लौसने शहर में एक मूर्ति - समुद्री घोड़े की सवारी 

झील में एक मज़ेदार कृति 

झील का एक दृश्य

झूला 

लौसने शहर में 

Contributed by Yash Wardhan.





Saturday, 9 September 2017

बुद्ध के समकालीन धार्मिक विचार

राजकुमार सिद्धार्थ गौतम अब से ढाई हजार साल पहले अपना परिवार और महल छोड़ कर जंगलों की ओर सत्य की खोज में निकल पड़े थे. उनकी उम्र उस वक़्त 29 वर्ष की थी. उस समय के ज्ञानी साधुओं, सन्यासियों और विचारकों से मिले, विचारों का आदान प्रदान किया. पहले पहल मिलने वालों में से प्रमुख थे आलार कालाम और उद्दक रामपुत्र. इनसे उन्होंने योग ध्यान और समाधि में बैठना सीखा पर दुःख से मुक्ति पाने का संतोषजनक मार्ग ना पाने के कारण वे आगे बढ़ते गए.

उस समय वेद, पुराण और उपनिषद का प्रचलन था. उस समय के समाज में वर्ण व्यवस्था भी प्रचलित थी अर्थात समाज चार भागों में विभाजित था- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र. राजकुमार सिद्धार्थ स्वयं क्षत्रिय थे. साथ ही उस समय जीवन को चार भागों या आश्रमों - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास में बांटने का भी प्रचलन था जिसका जिक्र जातक कथाओं में आया है.

वेद, पुराण और जैन धर्म ग्रंथों का समय-क्रम पक्का नहीं है. इनका रचनाकाल सम्भवतः 1500 से 75000 वर्ष ईसापूर्व में कब रहा होगा कहना मुश्किल है क्यूंकि इस पर इतिहासकारों में मतभेद हैं. पर यह तो जाहिर है कि उस समय आत्मा, परमात्मा, दर्शन और धर्म की बहुत सी विचार धाराएं साथ साथ ही चल रहीं थीं. वैदिक साहित्य में उस समय के जीवन के मूल विषयों पर मन्त्रों और श्लोकों में जो चर्चा है वो किसी ना किसी रूप में आज भी हमें प्रभावित करती हैं. वैदिक साहित्य को चार मुख्य भागों में बांटा जा सकता है :
'संहिता' में मन्त्रों और स्तुतियों का संग्रह है जैसे कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद.
'ब्राह्मण' ग्रंथों में यज्ञ करने की विभिन्न विधियाँ, उनके उद्देश्य और उनसे फल प्राप्ति की चर्चा है.
'आरण्यक' ग्रंथों में वानप्रस्थ और आध्यात्म की चर्चा है और
'उपनिषद' में आत्मा, ब्रह्म और आध्यात्म की चर्चा है.
वेदों पर आधारित 6 मुख्य दर्शन हैं जो सभी आस्तिक दर्शन कहलाते हैं. इनकी संक्षिप्त रूप रेखा इस प्रकार है:

* न्याय दर्शन जिसमें परमात्मा को सर्वव्यापी और निराकार कहा गया है. प्रकृति को अचेतन और आत्मा को शरीर से अलग कहा गया है. यह दर्शन महर्षि गौतम द्वारा रचित है.

* वैशेषिक दर्शन में वेदों को ईश्वर का वचन माना गया है. मनुष्य के कल्याण और उन्नति के लिए धर्म पर चलना आवश्यक बताया गया है. महर्षि कणाद के अनुसार जीव और ब्रह्म अलग अलग हैं और एक नहीं हो सकते.

* सांख्य दर्शन महर्षि कपिल द्वारा रचित है. इसमें कहा गया है कि प्रकृति अचेतन और शाश्वत है पर मनुष्य चेतन है और प्रकृति को भोगता है. असत्य से सत्य की उत्पति नहीं होती और सत्य कारणों से ही सत्य कार्य होते हैं.

* योग दर्शन में परमात्मा और आत्मा का मिलन यौगिक क्रियाओं द्वारा कराने की बात कही गई है. इन्द्रियों को अन्तर्मुखी कर ध्यान और समाधि लगाने से आत्मा और परमात्मा का 'योग' संभव है. अंतःकरण शुद्धि पर महर्षि पतंजलि ने ज्यादा जोर दिया है.

* महर्षि जैमिनी द्वारा रचित मीमांसा दर्शन वेद मन्त्र और वैदिक क्रियाओं को सत्य मानता है. यह दर्शन उन्नति के लिए पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों पर ज्यादा जोर देता है.

* वेदांत दर्शन या उत्तर मीमांसा महर्षि व्यास द्वारा ब्रह्मसूत्र में रचित है. इसमें कहा गया है कि ब्रह्म सर्वज्ञ है पर निराकार है और जन्म-मरण से ऊपर है पर आत्मा से अलग है. मीमांसा में भी आगे चल कर कई धाराएं चल पड़ी - द्वैत, अद्वैत, विशिष्ठाद्वैत.

इन दर्शन शास्त्रों के अतिरिक्त नास्तिक विचार भी उस समय प्रचलित थे. ईश्वर और परलोक ना मानने के कारण इस दर्शन को लोकायत भी कहा जाता है. परलोक को ना मानने वाले, केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण मानने वाले और वेदों से असहमति रखने वाले दर्शन हैं: चार्वाक, माध्यमिक, योगाचार, सौतांत्रिक, वैभाषिक और आर्हत.

जैन दर्शन में भी नास्तिकता का पुट है. जैन दर्शन में ऐसा माना गया है कि सृष्टि शाश्वत है और सृष्टि का कोई सृष्टिकर्ता नहीं है. जीव स्वयं अपने पिछले जन्मों के कर्मों से सुख-दुःख पाते हैं. जैन धर्म में अहिंसा परम धर्म है. साथ ही मन, वाणी और काया पर जीत करने वाला 'जिन' या अरहंत कहलाता है. इन्हीं जिन के मंदिर बनाए जाते हैं और किसी भगवान के नहीं.

कुल मिला के इस तरह की आस्तिक और नास्तिक वादों की 60-65 विचार धाराएं राजकुमार सिद्धार्थ के सन्यास लेने के समय में प्रचलित थीं. मोटे तौर पर इन्हें दो धाराओं में बांटा जा सकता है. पहली धारा वैदिक ज्ञान और मान्यताओं से जुड़ी थी. दूसरी धारा उन लोगों की थी जो वैदिक कर्मकांडों से अलग प्रकृति के नियमों में जीवन यापन करना चाहते थे. इन्हें श्रमण या श्रमन कहा जाता था और ये लोग मूलतः जिज्ञासु रहे होंगे. चूँकि श्रमणों का प्रकृति पर ज्यादा जोर था इसलिए वो ज्यादातर समाज से दूर जंगलों में ही विचरते रहते थे और अपने साथ कम से कम सुविधाएँ रखते थे. शायद जिज्ञासु राजकुमार सिद्धार्थ महल छोड़ने के लिए इनसे प्रभावित हुए हों.

जैन मंदिर, कमल बस्ती, बेलगाम, कर्नाटक

नोट: मैं एक जिज्ञासु की तरह गौतम बुद्ध का मार्ग समझने की कोशिश में हूँ. भूल-चूक के लिए क्षमा.




Friday, 8 September 2017

विपासना शिविर का पांचवां दिन

मैडिटेशन सीखने का पांचवां दिन आ गया. पद्मासन, या आलथी पालथी या चौकड़ी लगाकर, कमर गर्दन सीधी रखकर सांस पर ध्यान देना है और फिर अपनी काया पर हो रही संवेदनाओं को जानना है. सर से लेकर पैर तक और फिर पैर से लेकर सर तक. विभिन्न अंगों में विभिन्न तरह की संवेदनाएं हो सकती हैं जैसे कि अंगों पर दबाव, खिंचाव, गर्म होना, ठंडी हवा का लगना, कपड़े का स्पर्श, दर्द होना और कहीं किसी भाग में कुछ भी महसूस ना होना. पर अधिष्ठान में फिर बैठने से पहले क्यों ना पिछ्ले चार दिन के अनुभवों की समीक्षा कर ली जाए :

- लगातार आनापान करने से महसूस हुआ कि एकाग्रता बढ़ी है.
- जब तक सांस पर ध्यान रहता था तो विचार हट जाते थे और शरीर का कष्ट भी भूल जाता था. ऐसा लगा कि अगर लगातार अभ्यास किया जाए तो विचारों को देर तक रोका जा सकता है.
- जब जब सांस पर से ध्यान हटता था विचारों की विडियो चल पड़ती थी. ये विडियो या तो पुरानी घटनाओं पर आधारित थे या भविष्य की कामना पर. मतलब कि सांस पर ध्यान टिका रहना वर्तमान में रहना है.

फिर से आसन पर बिराजमान हो गए और शुरू कर दिया काम. कमर में, घुटनों में और गर्दन में दर्द होना ही था पर अब शरीर आदी हो गया था. दूसरे शब्दों में कहें तो शरीर ने मन को इस्तीफ़ा दे दिया था की अब मैं शिकायत नहीं करूँगा ! घंटे भर के अधिष्ठान के अलावा कभी कभी मामूली सा हिलना जुलना हो जाता था. पर वो भी बहुत ही धीरे से स्लो मोशन में ताकि पड़ोसी या फिर अपना ही मन बुरा ना मान जाए.

पहली बार के विपासना शिविर में इसी में उलझे रहे कि थकावट हो रही है या दर्द हो रहा है. दूसरे शिविर में ये सोच घट गई थी. वाणी तो अब शांत ही थी क्यूंकि चार दिन से किसी से बात नहीं हुई और ना ही किसी को आँख से आँख मिलाकर देखा, शरीर की क्रियाएं भी कम से कम हो गईं और शरीर स्थिर रहने लगा. मन भी एकाग्र होने लगा था. पहली बार में ये बातें बड़ी और भारी भरकम लगीं जबकि दूसरी बार में नहीं. ये सब तो आगे जाने का रास्ता ही था.

इसलिए अभ्यास करते ही जाना था. काया में होने वाली संवेदनाओं को देखना था. सिर से पैर तक और पैर से सिर तक. अब काया के भी दो भाग कर लीजिये ! याने बाहिरी काया और अंदरूनी काया. बाहर की संवेदनाएं देखते चलें और फिर अंदर की शुरू कर दें.

कहना आसान था पर करते हुए हंसी आ रही थी कि शरीर के अंदर मन को ले जाएं? मन अब ज्यादा भटक रहा था. बार बार सांस पर फोकस करना पड़ता था. पर धीरे धीरे मन इस प्रक्रिया में चल पड़ा.

सबका मंगल होए 





Tuesday, 5 September 2017

मस्जिद पीटर वाली, मेरठ

मेरठ कैंट में एक वेस्ट एंड रोड है जिसके एक तरफ चार पांच बड़े बड़े स्कूल हैं और दूसरी तरफ कुछ रिहायशी मकान और एक मस्जिद है. वहां से जब भी गुज़रना हुआ तो मस्जिद पर लगा हुआ नाम पढ़ा मस्जिद पीटर वाली तो अजीब सा लगा कि पीटर तो किसी ईसाई का नाम है फिर मस्जिद पीटर के नाम पर कैसे?

मस्जिद के दरवाज़े के ऊपर एक संगमरमर के पत्थर पर लिखा है 'मस्जिद पीटर दर्जी वाली'. ना जाने कौन थे और कब रहे होंगे ये पीटर दर्जी? इन्टरनेट पर सुन्नी बोर्ड(  upscwb.org ) भी तलाशा पर इस मस्जिद का रिकॉर्ड नज़र नहीं आया.

एक दिन गाड़ी रोक कर दुकान में पूछा तो पप्पू भाई ने बताया कि उनका परिवार 1978 से ये दुकान किराये पर चला रहा है. बहुत से लोग यही सवाल पूछते हैं पर उन्हें पीटर के बारे में जानकारी नहीं है. इस मस्जिद को वैसे पीतल वाली मस्जिद भी कहते हैं क्यूंकि बुर्जियों पर पीतल लगा हुआ है. पप्पू भाई ने बताया कि आजकल जो मौलवी हैं वे बिहार से आए हुए हैं इसलिए उन्हें भी पता नहीं होगा.

बहरहाल पीटर दर्जी का राज़ खुला नहीं खोज जारी है. आपको कुछ खबर हो तो बताएं.

मस्जिद पीटर वाली  

पीतल वाली मीनार 

मस्जिद के अंदर पप्पू भाई के साथ 

 'मस्जिद पीटर दर्जी वाली' 




Sunday, 3 September 2017

जैसलमेर किला

जैसलमेर का किला भाटी राजपूत महाराजा जैसल द्वारा 1156 में बनवाया गया था. थार रेगिस्तान में बसा जैसलमेर शहर जयपुर से लगभग 560 किमी दूर है और दिल्ली से 780 किमी. रेगिस्तान होने के कारण गर्मियों में तापमान 50 के नज़दीक पहुँच जाता है और सर्दियों में शून्य के नज़दीक पहुँच सकता है. एक पुरानी कहावत जैसलमेर के हालात बयान करती है:

बख्तर कीजे लोहे का,
पग कीजे पाषाण !
घोड़ा कीजे काठ का,
तब देखो जैसान !

याने यात्री कपड़ों के बजाए लोहे का बख्तर पहन लें जो ना मैला हो और ना फटे, पैर पत्थर के बना लें जो तपती रेत में झुलसे नहीं और ना ही थकें, घोड़ा लकड़ी का ले लें जो ना कभी थके और ना पानी मांगे और तब जैस्सल राजा का स्थान देखने निकलें ! अब बख्तर और घोड़ा तो पुरानी बात हो गई पर आप जैसलमेर जाते समय अपनी गाड़ी का कूलैंट और ए.सी. जरूर चेक कर लें !

अठारहवीं सड़ी तक इराक, ईरान, अफगानिस्तान, चीन जैसे देशों से व्यापारी ऊँटों के कारवां लेकर चलते थे और जैसलमेर सिल्क रूट के व्यापारियों का एक पड़ाव था. अफीम, सोने, चांदी, हीरे जवाहरात, सूखे मेवों वगैरा का व्यापार हुआ करता था. यहाँ के राजा इन व्यापारियों से टैक्स वसूला करते थे. 

त्रिकुटा पहाड़ी पर बने किले की चौड़ाई 750 फुट है और लम्बाई 1500 फुट. त्रिकुटा पहाड़ी की ऊंचाई जमीन से लगभग 250 फुट है. किला बनने के बाद 1276 में और फिर 1306 में किले की मरम्मत हुई और कई बदलाव किये गए. किले की सुरक्षा के लिए चारों ओर तीन ऊँची और चौड़ी दीवारों का घेरा है. चार बड़े दरवाज़े हैं और पचास से ज्यादा बुर्जियां और परकोटे हैं. इनमें साढ़े तीन हज़ार से ज्यादा सैनिक रहते थे. 

किले के अंदर महल हैं, दुकानें हैं, सात जैन मंदिर हैं, पचास के करीब रेस्तरां हैं और लगभग 4000 लोग अब भी रहते हैं. इसलिए ये किला 'जीता जागता' किला है! 2013 में इसे World Heritage Site बना दिया गया है. किले में स्थानीय हलके पीले पत्थर का खूब प्रयोग किया गया है. सुबह और शाम के सूरज की किरणों में ये पत्थर सुनहरे लगते हैं जिसके कारण इस किले को सोनार किल्ला भी कहा जाता है. 
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

किले के अंदर महल 

प्रवेश द्वार 

प्रवेश से पहले पूजा 

संकरा रास्ता और ऊपर रक्षा चौकियां 

सुंदर कारीगरी - लक्ष्मी नाथ जी का मंदिर 

किले की संकरी गलियाँ 

किले की दीवार से नज़र आता शहर 

जैन मंदिर 
जैन मंदिरों की नक्काशी अद्भुत है 


जैन मंदिर की दीवार 

जैन मंदिर कमाल की कारीगरी 

नीचे एक दुकान और ऊपर ख़ास राजस्थानी शैली में छज्जा 

ऊँची नीची राहें 

किले के निवासियों की महफ़िल 

गाइड के साथ गपशप 

तोप के बगैर तो किला अधूरा है 

प्रवेश के पास किले की दीवार. ढलान पर रोड़े पत्थरों का ढेर सुरक्षा के लिए अच्छा है  





Saturday, 2 September 2017

विपासना शिविर का चौथा दिन

विपासना शिविर की तीसरी शाम को गोयनका जी के एक घंटे के वीडियो प्रवचन में साधकों के मन में उठे सवालों की चर्चा की गई और समझाया गया. जैसा की रोज़ होता है उसी प्रवचन में अगले दिन की रूप रेखा भी बता दी गई. चौथे दिन की विशेष बात थी अधिष्ठान. शिविर में वैसे तो पूरे दिन कार्यक्रम एक से ही हैं. चार बजे उठना, साढ़े चार से लेकर साढ़े नौ बजे रात तक लगातार मैडिटेशन करना. हाँ बीच बीच में नाश्ते, खाने के अलावा छोटे छोटे ब्रेक थे और शाम को एक घंटे का प्रवचन जिसमें अधिष्ठान पर बैठने के लिए बताया गया.

अधिष्ठान का शाब्दिक अर्थ अगर इन्टरनेट में देखें तो कई पर्याय मिलेंगे : abode, establishment, installation, site, situation, fixed rule, वास स्थान, आधार, आश्रय और संस्थान. इनमें से मुझे installation शब्द ठीक लगा क्यूंकि अब हमें अपने आसन पर जम कर बैठना था. किसी भी सूरत में एक घंटे तक हिलना नहीं था. अपने को धरती में गड़े खम्बे की तरह install कर लेना था. अगर कान में मच्छर गाना गाने लगे, शरीर पर कोई मक्खी बैठने लगे, खुजली हो, पसीना आ जाए या घुटने में दर्द हो तो भी हिलना नहीं था. हिलना नहीं बस हिलना नहीं!

परीक्षा तो अब शुरू हुई. किस्से कहानियों में पढ़ते थे कि तप करते करते सन्यासी के शरीर पर लताएं चढ़ गईं, सांप बिच्छू चलने लग गए या चींटियों ने बाम्बी बना ली. कुछ ऐसा ही होने वाला था क्या? पर नहीं हम तो पार्ट टाइम संत बनने निकले हैं. केवल एक घंटे की तो क्लास थी. इस अधिष्टान का दूसरा भाग वही था सांस को देखते रहने का अभ्यास. अब तीसरा भाग भी आ गया था: ऊपर से नीचे तक शरीर के हरेक भाग पर ध्यान लगाते जाना याने शरीर की मानसिक यात्रा करना. इसका क्या मतलब? मतलब ये कि शरीर के अंगों में हो रही संवेदनाओं को महसूस करना या उन पर ध्यान देना. किसी अंग में दर्द है, किसी में गर्मी है, किसी भाग में खुजली है, किसी अंग में कम्पन है, किसी में पसीना है, किसी अंग को कपड़ा छू रहा है, किसी अंग पर दबाव है या फिर किसी अंग पर खिंचाव है उसको महसूस करना. हो सकता है किसी अंग में कुछ महसूस ही नहीं हो रहा हो. जो भी हो रहा है उसे महसूस करना. इस यात्रा को तरीके से करना है याने ऊपर से शुरू होकर हरेक अंग की संवेदना को देखते हुए धीरे धीरे नीचे की ओर जाना है. फिर पैर के अंगूठे से धीरे धीरे हरेक अंग की संवेदना को महसूस करते हुए ऊपर की ओर वापिस. सिंपल!?

पिछले तीन दिनों के आनापान के अभ्यास ने अब साथ दिया. अनापान लगातार करने से एकाग्रता बढ़ गई थी. ये भी जानकारी थी की कमर, गर्दन और घुटनों में दर्द होगा. ये भी जानकारी थी कि मन लगातार फोकस नहीं रह पाएगा भटकन भी होगी और लगातार बैठने से मन में उकताहट भी होगी. एक घंटा स्थिर न रह पाया तो? मैं करूँगा सोच कर डट कर बैठ गया. सहायता योगाभ्यास से भी मिली जो हम दोनों 20 सालों से करते आ रहे थे. योगासनों के बाद शव आसन कराया जाता था जिसमें आसन पर पीठ के बल लेट कर शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ना होता है. शवासन में भी शरीर की मानसिक यात्रा कराई जाती थी - सर के बाल,माथा, भोंहें, आँखें, पलकें, नासिका, होंठ, ठुड्डी, गला, छाती, भुजाएं, कलाई, हथेलियाँ, उँगलियाँ, उदर, जननेंद्रियाँ, जंघाएँ, घुटने, पिंडलियाँ, टखने, पैर, उंगलियाँ, नाख़ून और फिर इसी तरह ऊपर की ओर वापिस.

प्रयत्न के बावजूद मन भटका और कई ख़याल आए कि अन्य धर्मों और समाजों की तरह ये कोई रस्म है? अगर मैं ना करूँ तो क्या होगा? अगर मैं कर लूँगा तो क्या होगा? क्या गौतम बुद्ध ने भी इसी तरह किया था या केवल हम से करवाया जा रहा है? शरीर तो मेरा ही है इसमें संवेदनाएं भी आती जाती रहती हैं महसूस भी की हैं तो इनमें अब क्या देखना है?  ऐसा भी लगा कि मैं एक थर्ड परसन हूँ दूर से अपने शरीर को देख रहा हूँ उस शरीर में आती जाती सांस को भी दूर से देख रहा हूँ! रोंगटे खड़े हो गए! बड़ा अजीब सा लगा तो झटके से सांस पर ध्यान लगाया और फिर मानसिक यात्रा जहां रुकी थी वहां से शुरू कर दी. एक घंटे की बैठक में आखिर के 15-20 मिनट असहनीय दर्द में गुज़रे. ध्यान हट कर एक ही बात पर केन्द्रित था - घंटी अब बजी के अब बजी. अंत में जब गोयनका जी की आवाज़ गूंजी तो आह कितना आनंद आया. जेल से छूटे! घुटने खोल दिए और आँखें भी खोल ली. आलथी पालथी से उठकर खड़े होने में भी वक़्त लगा. पर अस्संभव लगने वाला काम हो ही गया.

बाद के अध्ययन से पता लगा कि काया की संवेदनाओं को समझना विपश्यना का एक महत्वपूर्ण अंग है इसे कायानुपश्यना कहते हैं याने अपनी काया को जानना.

सबका मंगल होए 

नोट: जिज्ञासा -वश गौतम बुद्ध का बताया मार्ग समझने की कोशिश कर रहा हूँ. भूल-चूक के लिए क्षमा 




Friday, 1 September 2017

नास्तिकवाद

 बुद्ध का जन्म ईसापूर्व 563 में हुआ और महानिर्वाण ईसापूर्व 443 में. 29 की आयु में महल और परिवार त्याग कर वन की ओर प्रस्थान किया और 6 वर्ष तक सत्य की खोज में लगे रहे. उस समय वेद, पुराण और उपनिषद का प्रचलन था. साथ ही नास्तिकवाद भी प्रचलित था. और नास्तिक वाद में भी कई तरह की विचार धाराएं चल रहीं थीं. इन नास्तिकों का कोई बड़ा संगठन या ग्रुप नहीं था. फिर भी नास्तिक विचारकों या उनके शिष्यों की कमी नहीं थी. ये ज्यादातर वैदिक ज्ञान और कर्मकांड को नकारते थे और वेदों से अलग हट कर जीवन के उद्देश्य की खोज में लगे हुए थे. ज्यादतर भिक्षा पर या जंगल के कंद मूलों पर निर्वाह करते थे, नंगे या कम से कम कपड़े और सामान रखते थे. इन्हें श्रमण या शर्मन कहा जाता था.

इन नास्तिकों में चार्वाक का नाम प्रसिद्ध है. ये कौन थे इसकी ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है. चार्वाक कोई व्यक्ति था या केवल एक विचार धारा ये भी पता नहीं. चार्वाक शब्द का मूल चारू+उव्वाच याने सुंदर वाक्य भी बताया जाता है जिन्हें बोल कर लोगों को कर्मकांड के विरुद्ध बताया जाता था! जो भी हो इस विचार धारा में प्रभु, परलोक, आत्मा या परमात्मा का अस्तित्व नहीं है. चेतन शरीर के समाप्त होते ही सब कुछ विलीन हो जाता है. इसलिए यह कहा गया कि किसी भी तरह के वैदिक कर्मकांडों की आवश्यकता नहीं है. चार्वाक की एक कहावत प्रसिद्ध है - "ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत, यावाज्जिवेत सुखं जीवेत!" अर्थात जब तक जियो सुख से जियो, घी पियो चाहे ऋण ही लेना पड़े.

चार्वाक के अतिरिक्त कुछ और नास्तिक सन्यासियों का किसी ग्रन्थ या कथा में जिक्र किया गया है वो हैं:

* अजीत केशकामब्ली जो 'अक्रियावाद' के पक्षधर थे. उनके अनुसार ब्रह्माण्ड धरती, वायु, जल और अग्नि का मेल है. मृत्यु के पश्चात कोई जीवन नहीं है. किसी की हत्या करने में पाप नहीं है और किसी भी तरह से आनंद लेने में बुराई नहीं है.

* संजय वैरात्रिपुत्र के अनुसार जो होना है वो होता है और होनी अनहोनी को रोका नहीं जा सकता. आत्मा, परमात्मा और किसी भी तरह के सिद्धान्त के कोई मायने नहीं हैं. इस धारा को विक्षेप्वाद या 'अज्ञान' वाद भी कहा गया है.

* निर्गंठ नटपुत्र जैन दर्शन के उपासक थे और तीर्थांकर पार्श्व के शिष्य कहे जाते थे. ये नंगे रहते और विश्चास करते थे की इस जन्म में जो हो रहा है वह पिछले जन्मों के कर्मों का फल है. घर बार सब कुछ त्याग करके अगर तपस्या करें और ब्रह्मचारी रहें तो पिछली गलतियाँ सुधारी जा सकती हैं. उनका कहना था कि अहिंसा परम धर्म है.

* मख्खाली गोसाल भी नग्न सन्यासियों में थे. कहा जाता है की मख्खाली जैन तीर्थांकर महावीर के अनुयायी थे. उनके अनुसार मनुष्य की कोई स्वतंत्र इच्छा या कर्म नहीं हैं बल्कि नियति के अनुसार सभी बंधे हुए हैं और सभी को संसार की हरेक योनि में से गुजरना है. नियति के आधार पर ही संसार में आवागमन चलता रहता है.

* पूरण कश्यप भी अक्रियावाद के समर्थक थे. उनके अनुसार मनुष्य को हत्या या चोरी करने से पाप नहीं लगता और भला कार्य करने से पुण्य नहीं मिलता.

* पाकुड़ कात्यायन के अनुसार सात तत्व स्वयंभू हैं ना बनाए जा सकते हैं और ना ही मिटाए जा सकते हैं. ये हैं पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, सुख, दुःख और जीव. मनुष्य का शरीर इन्हीं तत्वों में विलीन हो जाता है और सब कुछ यहीं समाप्त हो जाता है.

जैन और बौद्ध धर्मों में भी नास्तिकवाद का पुट है. गौतम बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व पर ना हाँ कहा ना ही ना. उन्होंने ये कहा की पहले बताये मार्ग पर चलो बाद में पूछना.

प्रकृति की गोद में 

नोट: मैं एक जिज्ञासु की तरह गौतम बुद्ध का मार्ग समझाने की कोशिश कर रहा हूँ. भूल-चूक के लिए क्षमा.