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Thursday, 31 August 2017

विपासना शिविर में तीसरा दिन

तीसरे दिन सुबह चार बजे दरवाज़े के पास फिर घंटी बजने लग गई. पर इस बार देर नहीं की और तुरंत बिस्तर छोड़ दिया. ठन्डे पानी में गोता भी मार लिया और साढ़े चार बजे की घंटी से पहले ही मैडिटेशन हाल में अपने आसन पर विराजमान हो गए. आज मन बना लिया था कि साढ़े चार से साढ़े छे बजे तक के( पांच मिनट का ब्रेक है बीच में ) जो दो सेशन होते हैं वो दोनों सीरियसली करने हैं. पहला सेशन बेहतर रहा काफी देर तक मन को सांस पर जमाए रखने में सफलता मिली. पर मन की भटकन बीच बीच में आती रही. पर अब ऐसा आभास हुआ कि लगातार अभ्यास अगर किया जाए तो मैडिटेशन किया जा सकता है. ब्रेक के बाद दूसरा सेशन ज़रा ढीला चला. जो भी कारण रहा हो ध्यान बार बार हट रहा था और मन को खींच कर सांस पर लाना पड़ रहा था.

साढ़े छे के बाद एक घंटे का अवकाश नाश्ते वगैरा का था. जल्दी से पहले कपड़े धो लिए और फिर डाइनिंग हॉल में पहुंचे. आज नाश्ता ज्यादा नहीं लिया ताकि बाद में लगातार बैठने में असुविधा ना हो. नाश्ते के समय भी किसी से बात नहीं करनी थी इसलिए अपनी थाली लेकर दीवार की तरफ मुंह करके चुपचाप खा लिया. प्लेट, कटोरी, चम्मच और गिलास खुद ही धोने होते हैं सो धोकर रख दिए और बाहर आकर दस मिनट की चहलकदमी की.

ये सैर भी परिसर के अंदर ही करनी होती है इसलिए शांतिपूर्वक हरी हरी घास देखते हुए की. इस सैर में ख़याल आया कि यहाँ का खाना सादा सा है मिर्च मसाले हैं नहीं और तला हुआ कुछ भी नहीं है पर फिर भी अच्छा लग रहा है. घर में मिर्च्च ज्यादा डल जाए या मनपसन्द चीज़ ना बने तो कैसे बवाल होता है. घर में कभी बर्तन धोये नहीं यहाँ बर्तन भी अच्छी तरह चमका के धो दिए. बर्तन धोकर रखे भी इस तरह की आवाज़ ना हो. आश्रम में लगभग सौ से ज्यादा लोग थे पर कोई आवाज़ नहीं थी. केवल बीच बीच में चिड़ियों की आवाजें आती थी. अपने आप से बात करने का अच्छा मौका था. कभी इस तरह से स्वयं से बात की भी नहीं थी याने अपने आप से ही अनजान?

शायद हर धर्म में कहा गया है कि अपने को पहचानो पर पढ़ कर या सुनकर ये बात वहीं ख़तम हो जाती है. फुर्सत कहाँ है और कौन कोशिश करता है अपने को पहचानने की ?  यहाँ तो अखबार भी नहीं था, टीवी या रेडियो भी नहीं था तो पूरी शान्ति थी. मैच कौन जीता या मैच हुआ भी या नहीं ये भी नहीं पता. किसी से बहस नहीं, बात नहीं तो और ज्यादा शांति. मन में आया कि इस तरह से भी तो शान्ति के साथ घर में भी तो रहा जा सकता है. पर हम चाहें और निश्चय कर लें तभी ना! बच्चों का फोन नहीं आया और ना ही आ सकता था. हमने भी फोन नहीं किया ना ही कर सकते थे. मतलब की यहाँ मेरी दुनिया में मैं हूँ और बच्चे अपनी दुनिया में हैं. ये भी भ्रम टूटने लगा की उन्हें हमारी जरूरत है या हमें उनकी जरूरत है. फिर भी मन में उथल पुथल तो जारी रही.

दस मिनट के लिए कमरे में जाकर कमर सीधी की तो देखा कि दूसरे सज्जन जो मेरे साथ पार्टनर थे सामान समेत जा चुके हैं. अब पूछें किससे और बताएं किसको? 50-55 की उमर रही होगे रात को गोली खाकर सोते थे और उनकी खिड़की में तीन तरह की दवाई की शीशियाँ रखी हुई थी जो अब नहीं थी. बहरहाल यहाँ के नियमानुसार हमारी वार्तालाप भी नहीं हुई थे. उसके बाद कभी मुलाकात भी नहीं हुई. कोर्स की समाप्ति के बाद जानकारी मिली कि कुछ लोग कोर्स बीच में ही छोड़ कर चले भी जाते हैं. तीसरा और चौथा दिन महत्वपूर्ण दिन है और कहा जाए की साधक के परीक्षा के दिन हैं तो ठीक रहेगा.

पर हमने तो ठान लिया था की पूरे दस दिन लगाने हैं और बिना घबराए अच्छे से लगाने हैं. अपने को कुछ तो नए वातावरण में ढाल लिया था और आगे भी ढाल लेंगे. तीनों दिन असुविधा भी हो रही थी और जो होनी ही थी. और ऐसा भी लगा कि तीन दिन में ऐसी कोई क्लास नहीं हुई जिसमें बुद्ध और उनके मार्ग के बारे में कुछ बताया गया हो. दिन के अभ्यास के अंत में गोयनका जी का वीडियो भाषण होता है उसी में दिन की कारवाई पर चर्चा होती  है और अगले दिन के लिए इशारा कर दिया जाता है.  लेकिन बाद में जो जब दूसरा शिविर किया और बीच में पढ़ाई भी की तो समझ में आया की हमने यहाँ आकर क्या किया. ये भी विचार आया की अपने कपड़े, खाने, और रहने के तौर तरीके बदल कर खुद को भी बदला है. ये कदम मन की शांति की ओर ले जाने वाले कदम हैं, सरल जीवन की ओर जाने वाले कदम हैं.

सबका मंगल होए 



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