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Saturday, 8 July 2017

कुंवारा कपूर

सरकारी बैंक की काफी बड़ी शाखा है झुमरी तलैय्या में. कुछ नहीं तो 55 से भी ज्यादा लोग काम करते होंगे. इनमें एक तिहाई तो महिलाएँ ही होंगी. दो बजे तक तो ग्राहकों की चहल पहल रहती है फिर तीन बजे तक महिला मंडल सक्रिय हो जाता है और चार बजे के बाद महिलाएँ खिसकना शुरू हो जाती हैं और पाँच बजे तक शांति छा जाती है. फिर केके याने श्रीमान किशन कपूर की ऊंची आवाज अक्सर सुनाई पड़ती है.

अकेले केके ही शाखा में कुँवारे सज्जन थे. इसलिए कई उपनाम भी रख दिए गए थे जैसे कि कंवारा किशन या कपूर कुंवारा. उमर ४५ साल, बाल फ़ौजी स्टाइल में कटे हुए और चुस्त कपड़े. ज़्यादातर सफेद टाईट पैंट और सफेद ही क़मीज़ पहनते थे. काले जूते और काली चौड़ी बेल्ट पर ख़ूब पॉलिश कर के चमका के रखते थे. बैंकर कम और पुलसिये ज्यादा लगते थे. पुलिस वाला लगने का एक और कारण भी था. कभी कभी कोट के नीचे होलस्टर पहन कर पिस्टल भी लगा के आते थे. बाद में पता लगा कि दिल्ली पुलिस की किसी स्कीम के मुताबिक़ स्पेशल पोलिस ऑफ़िसर भी थे. साल में १२ छुट्टियाँ अलग से मिलतीं और कभी कभी किसी पुलिस कैम्प में भी जाते रहते थे.

पर ऐसे में कुछ हेकड़ी या धौंस ज़माने की आदत भी पड़ गई थी. अगरआप भी केके की जगह होते तो शायद ऐसा ही करते? आप ख़ुद ही बात कर के देख लो केके से मजाल है कि कोई सीधा जवाब मिल जाए.

- केके साब छुट्टी कर ली?
- हाँ सोच रहा हूँ थाने जाकर सो जाऊँ!

- केके जी आप सफेद कपड़े ही पहनते हैं?
- वो क्या है कि चाइना बॉडर पर भी जाना होता है ना!

- केके सर लंच में कोई मिलने आया था.
- उसको बोलना था जाकर अपनी भैंस चराए!

- केके भाईसाहब बाहर बादल छाए हुए हैं छाता ले जाओ.
- आपकी क़मीज़ कमाल की है!

- केके साब ये पिस्टल लगाई हुई है आपने?
- हवा बदल रही है. इन हवाओं में कुछ है.

लुब्बो लुबाव ये कि केके जी से पार पाना कठिन काम था. ब्रांच की पुरुष पंक्ति केके को खुले साँड के रूप में देखती थी और हीन भावना में गिराने का कारण मानती थी. कुछ महिलाएँ केके को भस्मासुर मानती थी और कहती थी कि कुँवारा ही भसम हो जाएगा ये. कुछ लोगों को केके पर हँसी आती कुछ को दया. ब्रांच में केके एक रहस्यमय प्राणी था जिस पर किस्से, चुटकले और अफवाहें बनती रहती थी और फुर्र भी हो जाती थी लेकिन केके से दूरी भी बनी रहती थी.

लेकिन सब दिन होत न एक समान. जून के महीने में तीन लोगों की ट्रान्सफर हो गई और चार लोग नए आ गए. आने वालों में एक सुश्री चन्द्रमुखी भी थी. उम्र पैंतीस के आसपास, शरीर से थोड़ा नाटी और थोड़ा भारी, स्वभाव से हंसमुख और बिंदास. ठीक से पता नहीं लगा की शादी हुई नहीं या की नहीं. बहरहाल चन्द्रमुखी के आने से वातावरण कुछ हल्का हो गया. लोग दो और दो चार करने की बात करने लगे पर कभी जोड़ तीन रह जाता था और कभी पांच हो जाता.

केके अब कई बार चंद्रमुखी की सीट के आसपास मंडराते देखे जा सकते थे. केके गम्भीर मुद्रा में और चंद्रमुखी मुस्कुराती हुई. एक शाम साढ़े चार बजे केके चंद्रमुखी के सामने बैठे हुए थे जो कि असाधारण घटना थी. उससे भी अजीब बात यह लगी कि चंद्रमुखी के सामने चाय का प्याला और केके साब के सामने ठंडी बोतल. केके कभी किसी के पास बैठते नहीं थे खाने पीने की बात तो दूर रही.

दोनों की अच्छी छन रही थी दूर से तो ऐसा ही लग रहा था. केके साब ने झुक कर चंद्रमुखी के कान में कुछ खुसफुस करने की कोशिश की. ऐसा लगा कि चंद्रमुखी खिलखिला कर हंस पड़ेगी. पर चंद्रमुखी ने चट से केके साब के गाल पर चांटा चटक दिया. आवाज़ तो हल्की सी हुई पर गूंज बहुत जोर से हुई. केके साब तो तुरंत गेट के बाहर हो गए. जितना भी स्टाफ मौजूद था सब सुन्न हो गया. चंद्रमुखी ने हॉल में नज़र घुमाई और हंस कर बोली,
- अरे कुछ नहीं हुआ यार. इस केके का मतलब है कनकौवा!

केके उर्फ कनकौव्वा




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