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Thursday, 4 May 2017

अमर शहीद ऊधम सिंह

हस्तिनापुर के जैन मंदिर देखने जा रहे थे. पर शहर में प्रवेश करने से पहले चौराहे पर एक मूर्ति दिखाई पड़ी. कौतुहलवश नज़दीक जाकर देखा तो मूर्ति के एक हाथ में पिस्तौल और दूसरे में किताब थी. ये मूर्ति अमर शहीद ऊधम सिंह काम्बोज की थी.

शहीद ऊधम सिंह के बारे में केवल इतनी ही जानकारी थी की उन्होंने जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के जिम्मेवार जनरल डायर को लन्दन में जाकर गोली मार दी थी. पर फिर अपनी जानकारी बढाने के लिए इस विषय पर इन्टरनेट पर खोज पड़ताल की तो पता लगा कि शहीद ऊधम सिंह का जीवन बहुत ही कठिन परिस्थितयों में गुज़रा था. साथ ही यह भी पता लगा की उन्होंने लन्दन जाकर तत्कालीन पंजाब के गवर्नर जनरल ओ' ड्वायर को गोली मारी थी ना की जनरल डायर को. ये दोनों व्यक्ति अलग अलग है हालांकि सरनेम मिलते जुलते हैं:

1. तत्कालीन पंजाब का राज्यपाल था गवर्नर जनरल सर माइकेल फ्रांसिस ओ' ड्वायर -
Governor General Sir Michael Francis O'Dwyer.
इसी शख्स को अमर शहीद ऊधम सिंह ने लन्दन में 13 मार्च 1940 को गोली मारी थी.

2. जलियांवाला बाग़ में तैनात फौजी टुकड़ी से गोलीबारी कराने वाला सैनिक अधिकारी था जनरल रेजिनाल्ड एडवार्ड हैरी डायर -
General Reginald Edward Harry Dyer.
जनरल डायर की मृत्य बीमारी के कारण 1927 में हुई थी.

ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर 1899 को पंजाब में संगरूर जिले के एक गाँव सुनाम में हुआ था. वे एक दलित गरीब काम्बोज परिवार से थे और बचपन में उनका नाम शेर सिंह रखा गया था. 1901 में उनकी माँ का निधन हो गया और 1907 में उनके पिता का भी देहांत हो गया. उन्होंने अपने बड़े भाई मुक्ता सिंह के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में दाखिला ले लिया. यहाँ उनका नाम ऊधम सिंह और भाई का नाम साधू सिंह रखा गया. 1917 में बड़े भाई साधू सिंह का भी निधन हो गया. 1919 में ऊधम सिंह ने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ हो लिए.

क्रांतिकारियों में सभी धर्मों के लोग शामिल थे और ऊधम सिंह सर्व धर्म समभाव में विश्वास रखते थे. यहाँ उन्होंने अपना नाम बदल कर राम मोहम्मद सिंह आज़ाद रख लिया. वे ग़दर पार्टी, भारतीय श्रमिक संघ और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी में भी कार्य करते रहे. ऊधम सिंह 13 अप्रैल 1919 के जलियांवाला काण्ड के प्रत्यक्षदर्शी थे और उन्होंने ठान लिया था कि इसका बदला जरूर लेना है. 1926 से 1931 तक उन्हें ब्रिटिश हुकूमत ने कैद करके रखा क्यूंकि उनके पास बिना लाइसेंस हथियार थे और क्रांतिकारी साहित्य भी पाया गया था. जेल से छूटने के बाद उन्होंने कई नामों से अफ्रीका और अमरीका की यात्राएं की. अंत में किसी तरह 1934 में वो लन्दन पहुंच गए.

लन्दन पहुँच कर एक कार और एक पिस्तौल भी खरीद ली. पिस्तौल को एक मोटी किताब के अंदर पन्ने काट कर फिट कर लिया और मौके का इंतज़ार करने लगे. पता लगा कि 13 मार्च 1940 के दिन कोक्स्टन हॉल, लन्दन में एक मीटिंग थी जहां ओ' ड्वायर ने भाषण देना था. ऊधम सिंह वहां अपनी मोटी किताब लेकर पहुँच गए. मोटी किताब में छुपी हुई थी भरी हुई पिस्तौल. बैठक खत्म होने के बाद ऊधम सिंह ने निशाना लिया और पिस्तौल धायं धायं कर दी. दो गोलियां ओ' ड्वायर को लगीं और वो वहीं ढेर हो गया. दो और घायल हो गए. ऊधम सिंह वहां से हिले नहीं और गिरफ्तारी दे दी. मुकदमा चला और 4 जून 1940 को उन्हें दोषी घोषित कर दिया गया. 31 जुलाई 1940 के दिन पेंटोविले जेल में उन्हें फांसी दे दी गयी. उस वक़्त उनकी आयु 40 वर्ष की थी. फांसी के बाद उन्हें जेल में ही दफना दिया गया.

1974 में उनकी अस्थियाँ भारत वापिस लाई गईं. पंजाब के विधायक साधू सिंह थिंड अस्थि कलश लेकर आये जिसे प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी, राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा और ज्ञानी जेल सिंह को सौंप दिया. उनका अंतिम संस्कार पैत्रक गाँव सुनाम में किया गया. बाद में एक अस्थि कलश जलियांवाला बाग़ में रख दिया गया और अवशेषों का सतलुज नदी में विसर्जन कर दिया गया.

इस देश भक्त की रोमांचक जीवनी को पढ़ कर बिस्मिल की लाइनें याद आ गईं : 

वक़्त आने पर दिखा देंगे तुझे ऐ आसमान,

हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है.
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोश कितना बाज़ु ए कातिल में है.


अमर शहीद ऊधम सिंह काम्बोज

हस्तिनापुर शहर से थोड़ा पहले अमर शहीद ऊधम सिंह की मूर्ति 




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