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Friday, 29 July 2016

कांवड़ यात्रा 2016

सावन के महीने के साथ ही तैयारी कांवड़ की. कांवड़ लेकर हरिद्वार जाना और गंगाजल लाना कभी पैदल हुआ करता था. अब तो ये कार्य हर तरह के वाहन में भी होने लग गया है. एक अनुमान के अनुसार 2015 में एक करोड़ से अधिक लोगों ने हरिद्वार की कांवड़ यात्रा की. इस बार संख्या कहीं ज्यादा हो सकती है. कांवड़ यात्रा का एक प्रमुख पड़ाव है पूरा महादेव का मंदिर जहाँ कांवड़िये शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं. यह मंदिर मेरठ से करीब 25 किमी दूर बागपत जिले के बालैनी क्षेत्र में है. मंदिर की स्थापना से जुड़ी मान्यता संक्षेप में इस प्रकार है :

मंदिर के आसपास का इलाका पुराने समय में कजरी वन कहलाता था. इस वन में ऋषि जमदाग्नि अपनी पत्नी रेणुका तथा परिवार के साथ रहते थे. एक दिन ऋषि की अनुपस्थिति में राजा सहस्त्रबाहू शिकार पर आये और रेणुका को उठवा कर ले गए. पर सहस्त्रबाहू की रानी ने - जो रेणुका की बहन थी, मौक़ा पाते ही रेणुका को महल से निकाल कर वापिस आश्रम भिजवा दिया. परन्तु जमदाग्नि इस बात पर क्रोधित हो गए और रेणुका को आश्रम से निकाल दिया. पुत्रों को आदेश दिया की रेणुका का सर धड़ से अलग कर दिया जाए. तीन पुत्रों ने मना कर दिया जिस पर ऋषि जमदाग्नि ने उन्हें श्राप देकर पत्थर बना दिया. चौथे ने जिसका नाम राम था, आज्ञा मान ली और माँ का वध कर दिया. 

परन्तु राम को इस कर्म से बड़ी पीड़ा और ग्लानि हुई. प्रायश्चित करने के लिए राम ने हिंडन नदी के किनारे शिवलिंग की स्थापना की और तपस्या शुरू कर दी. घोर तपस्या के बाद भगवान शिव प्रकट हुए. राम ने माँ को जीवित करने का आग्रह किया जो पूरा हुआ. भगवान ने दुष्टों का नाश करने के लिया एक परशु या फरसा प्रदान किया. इस फरसे से राम ने राजा सहस्त्रबाहू और अन्य दुष्टों का सफाया कर दिया और उनका नाम परशुराम पड़ गया. माना जाता है की परशुराम ने कांवड़ में गंगा जल लाकर सावन के प्रथम सोमवार को शिवलिंग का अभिषेक किया जिससे कांवड़ परम्परा शुरू हुई. 

आजकल चल रही कांवड़ यात्रा के कुछ फोटो प्रस्तुत हैं जो ज्यादातर मेरठ के आसपास राष्ट्रिय राजमार्ग NH 58 पर लिए गए हैं :      

पूरा महादेव या परशुरामेश्वर मंदिर 
पूरा महादेव मंदिर का शिवलिंग

चाय पी के फिर चलेंगे 
गंगाजल की गगरी नीचे रखना मना है इसलिए स्टैंड बनाए गए हैं 
शिवलिंग और मंदिर गाड़ी की छत पर
महिलाएं और बच्चे भी पैदल यात्रा में शामिल
आसान तो कुछ भी नहीं है
 कांवड़ ले जाने वाले भोला या भोली कहलाते हैं 
 मेरठ की सड़कों पर
नए नए मुखोटों के साथ 
बम भोले   
एक और मुखौटा और पंजे  



Wednesday, 27 July 2016

Snake & Branch Manager

Promotions are always welcome in job. It comes after a tedious process of tests / interview / pulls & pressures. You get raise in salary, better perks & recognition. Of course there is factor of satisfaction also which varies from Arora ji to Zaidi saab.

Measurement system of satisfaction devised by Arora ji is simple. He says - happy > it is state of mind after 2 pegs, happier > it is state of mind after 3 pegs + a tangdi & happiest > it is state of mind after 4 pegs + butter chicken. Zaidi saab has a different measurement scale. He says it is my Begum who pushes me into promotions. So if she is happy Zaidi saab is proportionately happy. 

As the promotion list came out both Arora ji & Zaidi saab were declared successful. They were very happy to throw party. After you get promotion it is time to get proper place of posting. If posting is in a good town or city you enjoy your tenure. In case the place is in far flung area stomach upsets or headaches are common. Heartburn may be severe in case your friend gets better posting.

The list of postings came out & both Arora ji & Zaidi saab got Jaipur Region. There was party time again. Both reported there & whereas Zaidi saab was retained in Jaipur, Arora ji was asked to take charge of Jharoda branch in Dholpur. Arora ji had severe heartburn & instead of saying 'Cheers' he said 'Teri to ...'.

Arora ji sat in the bus going to Jharoda looking out of the window. Most of the road passed through dusty tree-less barren land. God had perhaps forgotten to irrigate & fertilise the area. Once in a while he saw goats & sheep grazing or a couple of thatched huts. He kept on cursing HRD & rebuking Zaidi saab for managing posting.

At last he reached the branch. It was set in a large hut like house with boundary wall. Entry was through a rusty gate in boundary wall which had a large thatched canopy overhead. Behind the branch there were two rooms nicknamed Manager Mahal. Royal bath was in far corner along the boundary wall without any roof. While taking bath in the morning he heard shouts of maid. She was employed as Panihari for bringing water @ Rs.10 a bucket. She was asking him to come out. He wrapped his towel around & came out.  She placed a large Tasla - a tin sheet tub & ordered,
- Now stand in this Tasla & have bath. I have to wash your clothes from this residual water in the tub. No more than four buckets as Panihari gets payment for only four buckets!

It was a tough posting. On Saturday Arora ji decided to visit his family. After closure of branch he packed his bag & tried to close the gate but could not. He put the bag down, took the gate in both hands & pulled hard. The gate closed with a bang shaking the entire structure & thatched canopy. A snake from the thatch fell on the head of Arora ji. Both the snake & Arora ji were startled & started dancing. Both were afraid of each other & wanted quick separation. Arora ji wanted to shout for help but his voice failed. In confusion snake jumped on the ground & disappeared. But Arora ji was terrified. He ran & ran & ran till he reached Delhi!
He threw back the promotion at management & is now enjoying his old trusted formula of two pegs a day for happy life.
Jharoda branch needs a new manager now. Are you ready?  
Nagin


Sunday, 24 July 2016

वो काटा

अगस्त का महीना आते ही दुकानों में  रंगे बिरंगी पतंगें और साथ में माँझे में लिपटी चरखियाँ दिखाई देने लगती हैं. पतले पतले रंगीन काग़ज़ और बांस की बनी हल्की फुल्की पतंग पतले से धागे के सहारे हवा भर के जब ऊपर उड़ती है तो वाह बस वो गाना याद आ जाता है, 
- चली चली रे पतंग मेरी चली रे ......
उड़ती पतंग, हथेलियों पर सरकते मांझे के साथ साथ पतंगबाज का मन भी आसमान छूने लग जाता है. 

पतंगों का इतिहास २००० वर्ष पूर्व चीन से जुड़ा हुआ है. चीनी पतंगे बड़ी होती हैं और इन्हें बनाने के लिये रेशमी धागा और बांस के हलकी और मजबूत खपचियां उस समय आसानी से उपलब्ध थीं. चीन से चली ये पतंग उड़ते उड़ते जापान, कोरिया, और थाईलैंड होती हुई भारत पहुँच गई. और यहाँ तक की पतंगबाजी नेता जी नगर नई दिल्ली के हमारे सरकारी क्ववाटर में घुस गई. 

हमारे भैय्या जगदीश पतंगबाजी के पक्के फैन थे और साथ में था उनका एक लंगोटिया यार चंदू. दोनों सातवीं क्लास में इकट्ठे पढ़ते थे. दोनों पतंग उड़ाने में, पेंचे लड़ाने में और पतंग लूटने में कॉलोनी में मशहूर थे. स्कूल की छुट्टी हुई और उनकी पतंगबाजी की तैयारी शुरू हो जाती थी. दोनों के पास पंतगबाजी के अनेक रंगीन क़िस्से थे जो पतंगबाज़ी को अनूठा रूप देते थे. उनसे सुन कर ऐसा लगता था कि इससे मज़ेदार तो कोई और खेल है ही नहीं. पतंगबाज़ी का उनका शौक़ किसी मौसम या दिन का मोहताज न था. 

सुबह सुबह माँझे पर शीशे का चूरा और चावल की लेई लगा कर धूप में टांग देते थे. कहते थे कि सूख कर मज़बूत हो जाएगा. बहुत से टेक्निकल शब्द प्रयोग करते थे - सद्दी, मांझा, कन्नी वगैरा. उनका दावा था की क्या मजाल किसी की पंतग उनसे ऊपर चली जाये. 

भैय्या पतंग उड़ाते तो चंदू चरखी थामते. पेंच लड़ते ही ऐसा शोर मचता जैसे जंग छिड़ गई हो ! छत पर आगे पीछे दौड़ लगती.
- अबे ढील छोड़ ढील.
- लपेट जल्दी लपेट. अबे यार सद्दी लपेट !
पेंच लड़ने के बाद पतंगें कभी अलग हो जाती या कभी कट जाती और हवा में बहने लग जाती. छतों पर धम-धम होने लगती तो आस पड़ोस की आंटियों से भी डांट पड़ती पर जोश में रत्ती भर फ़र्क़ न पड़ता. 

पेंच लड़ाने वालों के आस पास पतंग लूटने वाले भी होते जो हाथ मे डंडे या कँटीली झाड़ लेकर झपटने को तैय्यार रहते. पतंग लूटना भी एक अच्छी खासी कला है जो पतंगों के साथ लुप्त होती जा रही है. पतंग कटते ही लुटेरों की नज़रें आसमान में लहराती पतंग पर और दौड़ ज़मीन पर. इस भागमभाग में कुछ पता नहीं कि आगे गाड़ी है या गड्ढा है. बस जिसने लूट ली वो ही सिकंन्दर !

भैय्या चाहे अपनी पंतग कटी हो या दूसरे की अपना मांझा और चरखी दोस्त के पास फेंक के कटी पतंग के पीछे दौड़ पड़ते. रोज़ हाथ पैरों में चोटें और खरोंचें लगी रहती. पतंग के शौक़ के चलते ऑंखों पर चश्मा भी लग गया. पर पतंग का शौक़ बरक़रार रहा. 

एक दिन स्कूल से छुट्टी होने पर दोनों दोस्त घर वापिस आ रहे थे कि 'वो काटा' सुनाई पड़ा. ऊपर देखा तो हवा में तैरती कटी पतंग दिखाई पड़ी. बस फिर क्या था दोनों लपके. जब पतंग हवा से आगे बढ़ी तो दोनों ने रफ़्तार बढ़ा दी. इस दौड़ में दूसरों से धक्का मुक्की भी चल रही थी. पतंग हवा का झोंका लगते ही ऊपर उठ गयी. बस्ते का भार अब पतंग और उनके बीच रुकावट बनता जा रहा था. पतंग को हाथ से जाता देख दोनों ने बस्ते वहीं फैंक दिए. मामला करो या मरो का रूप ले चुका था. लम्बी दौड़ और मशक्कत के बाद कटी पतंग हाथ लग गई. चेहरे पर पसीने के साथ साथ युद्ध-विजेता का भाव आ गया.

वापिस बस्ते उठाने आए तो दोनों बस्ते गायब ! बहुत खोजने पर भी नहीं मिले तो बग़ैर बस्ते के रोनी सूरत लेकर घर मे घुसे. घर में तो भूचाल आ गया. दोनों को झापड़ लगे ताड़-ताड़ और खूब डांट पड़ी.

बस्ते की तलाश मे २ - ३ टीमें इधर उधर दौड़ी. एक टीम ने सूचित किया की कॉपियां तो कबाड़ी को बिक गई हैं और किताबें बस्ते सहित पुरानी किताबों की दुकान वाले को किसी ने बेच दी हैं.

माँ पैसे लेकर भागी. वही बस्ते, किताबें और कॉपियां दुबारा खरीद कर लाई. घर आकर तलाशी शुरू हुई. कोने कोने में से पतंग, चर्खियां, सद्दी, मांझे को इकठ्ठा किया गया. सारा सामान घर के बाहर रख कर सबके सामने तहस नहस कर दिया गया.

उस दिन के बाद हमारे घर से पतंगबाज़ी चीन वापिस चली गई !

- गायत्री, नई दिल्ली. 

पतंग 

Tuesday, 19 July 2016

विवाह

विवाह तो अपने यहाँ दो ही तरीके से हो सके हैं जी - या तो प्रेम विवाह कर लो या फिर 'अरेंज विवाह' करवा लो. पर ये लिख कर रख लो जी कि दोनों में से कोई भी तरीक़ा आसान ना है बड़े लफड़े हैं जी दोनों में. वैसे तो अपने देश में कहीं कहीं एक तीसरा तरीक़ा भी चलता है जी शादी करने का. वो ये कि मनपसंद छोरे-छारी को उठवा लो पर हम ना हैं जी इसके फ़ेवर में. ना जी ना हम ज़िम्मेवारी नहीं लेते इस कलजुगी किडनैपी शादी की. भई शादी करवाणी है या के गिरफ़्तारी करवाणी है ? और कलजुग में स्वयंवर भी ना चलता जी.

आजकल प्रेम विवाह तो काफी चल पड़ा है जी. भई प्रेम विवाह करो तो उसमें कई मजे हैं और कई परेशानियाँ भी हैं जी. और अगर अरेंज विवाह करवाओ तो उसमें भी कई उतार कई चढ़ाव हैं जी. सौ की सीधी बात यो है जी कि दुनिया किसी रस्ते जीण ना देवे. एक बात और भी है जी जब तक शादी हो ना जाए अपनी जान टंगी रहे जी अधर में त्रिशंकु की तरह.

इस विषय पर जी जनता जनार्दन से काफी राय-मशवरा किया, किताबों में खोजबीन भी की, शास्त्रार्थ भी किया और जी सबका निचोड़ निकाल कर यूँ लिख दिया जी ताकि सनद रहे. नोट कर लो जी कि यहाँ प्रे.वि. का मतलब है प्रेम विवाह और अ.वि. का मतलब है अरेंज विवाह. पसंद आए या ना आये पढ़ने वाला खुद समझदार और जिम्मेवार है.

प्रे.वि. - अपना पाटनर स्वयं खोजना पड़ेगा और स्वयं पटाना होगा.
अ.वि. - आपका पाटनर खोजने में मम्मी पप्पा दौड़ लगाएंगे.

प्रे.वि. - बंगाली, गुजराती जो पसंद हो वही पाटनर पटा लो.
अ.वि. - ना ना ना ये चक्कर बिलकुल नहीं चलेगा. केवल बिरादरी में से मिलेगा पाटनर.

प्रे.वि. - किसी कोने किसी एरिया में देख लो - शिलॉन्ग या शिमला या शमसाबाद.
अ.वि. - झुमरी तलैय्या के हो झुमरी तलैय्या में रहो बस.

प्रे.वि. - कॉफ़ी हाउस, रीगल सिनेमा और फटफटिया के पेट्रोल के खर्चे आपके जिम्मे.
अ.वि. - सारे खर्चे पप्पा के.

प्रे.वि. - फ्री मनपसंद डिग्री मिलेगी कोई सी ले लो - लैला-मजनू , ढोला-मारू, शिरीं-फरहाद, आवारा, दीवाना, लफंत्रू.
अ.वि. - यहाँ ऐसी डिग्री मिलेगी - अच्छा बेटा, समझदार बिटिया, आज्ञाकारी, होनहार, सुलझे हुए बच्चे.

प्रे.वि. - दान दहेज़ या तो निल मिलेगा या फिर कम मिलेगा.
अ.वि. - गरम सूट से लेकर चड्डी बनियान, बर्तन भांडे से लेकर पलंग तक सब मिलेगा. गाड़ी का भी चांस है.

प्रे.वि. - पाटनर पटा के मम्मी पप्पा की भी मिन्नत करनी पड़ेगी. मम्मी जल्दी मानती है पापा देर से.
अ.वि. - मम्मी पापा मेहनत करेंगे, समझाएंगे, दुलारेंगे और पेम्पर करेंगे.

प्रे.वि. - दोस्त यार हेल्प करेंगे और भाई, बहन और रिश्तेदार टांग खीचेंगे.
अ.वि. - दोस्त यार केवल बारात में खाने पीने और नाचने आएँगे.

प्रे.वि. - शादी कोर्ट में कर सकते हो घोड़ी, बैंड-बाजे के बगैर भी हो सकती है.
अ.वि. - घोड़ी, बैंड-बाजा और बरात जरूरी है. धूम धाम और भी जरूरी है.

बस जी पहले अध्याय की इति तो यहीं करते हैं. और खबर मिलेगी तो सूचित कर दिया जाएगा. पर भई एक बात सुन लो - शादी के पहले और शादी के बाद भी बैंड तो हस्बैंड का ही बजेगा क्यूंकि पत्नी तो वो है जो पति पर तनी रहे !

विवाह 


Saturday, 16 July 2016

बारिश

कॉलेज की पढ़ाई के उपरान्त नई सरकारी नौकरी लग गई थी. दफ़्तर भी कनॉट प्लेस में था इसलिए दिन भर रौनक़ ही रौनक़. ख़ास बात यह भी थी कि चाहें तो भीड़ में भी एकान्त ढूँढ लें या फिर भीड़ का हिस्सा बन जाएँ.

एकाकी स्वभाव-वश शाम को अवकाश के बाद कंधे पर झोला लटकाये पैदल ही दाये बायें निकल जाया करती थी. घर से दफ़्तर का समय बस से मात्र ८-१० मिनट का था तो बस पकड़ने की कोई जल्दी नहीं होती थी. कभी पैदल जनपथ, कभी हनुमान मंदिर या कभी बंगला साहिब की ओर निकल पड़ती थी. वहां से भी घर के लिए सवारी मिल ही जाती थी. याने की ज़िंदगी बिना भागम-भाग के मधुर गति से आगे बढ़ रही थी.

अगस्त का महीना था पर तारीख़ तो याद नहीं शायद १५ अगस्त के आस पास थी. मौसम ख़ुशमिज़ाज था कुछ काले बादल आसमान में तैर रहे थे. पैदल ही घूमते-घामते संसद भवन होते हुए इंडिया गेट के बस स्टैण्ड पहुंची. बस के इंतज़ार में वहां सामान्य से अधिक भीड़ थी. कुछ समय यूँ ही बस की इंतज़ार में बीत गया और इधर बूंदा-बांदी होने लगी. तभी पास मे आकर एक फटफटिया रूकी. पहले तो ध्यान नहीं दिया पर जब सवार ने हैलमैट उतारा तो पता लगा - अरे मिस्टर एच ? ये यहाँ क्यों ? शायद बारिश से बचने के लिये रुके हों या भीड़ में इनका कोई परिचित होगा. यह सोच कर नज़रें घुमा ली. पर उत्सुकता वश नज़रें फिर उस तरफ चली गईं. मिस्टर एच से नज़रें मिलते ही फट से मुख़ातिब हुए, 
- लगता है काफी देर से इंतज़ार कर रही हो. चलो बैठो मैं छोड़ देता हूँ.
लग रहा था कि फटफटी नई है ओर सवार नौसिखिया. सो टालने के लिए कहा 'धन्यवाद'. तो जवाब आया:
- जल्दी बैठो ये पेट्रोल नहीं मेरा दिल जल रहा है हाहाहा !
- अच्छा तो ये धुआं दिल जलने से है ! सवारी के साथ गाड़ी चलानी आती भी है क्या ?
- धग धग की आवाज़ तो सुनो, कहते हुए फटफटीया को जोर से रेस दे दी.
- अरे सब कुछ अंडर कण्ट्रोल है. जल्दी बैठो.
आस पास के कुछ लोग तिरछी नज़र रख रहे थे और लैला - मजनूँ की वार्ता का मजा ले रहे थे. इसलिए बात और ज्यादा न बढ़ाते हुए पिछली सीट पर ड्राइवर से कुछ दूरी रख कर बैठ गई.

विजय चौक के पास बारिश तेज़ हो गई. मिस्टर एच. ने फटफटीया का रूख फ़व्वारे के नीचे बने रेस्तराँ की तरफ कर दिया. बाइक कोने में खड़ी करके रेस्तरां के अन्दर भागे. वहाँ पर भीगे चेहरे को साफ़ किया और एक कोने वाले टेबल पर जा बैठे.

रेस्तरां में मद्धम सी रोशनी थी, बाहर भी अँधेरा और तेज़ बारिश. सिहरन सी हो गयी. इस नई स्थिति में मन में उथल पुथल शुरू हो गई. इसके साथ क्यों आई ? साफ  मना क्योँ नहीं किया ? पता नहीं कैसा व्यक्ति है ? घर देर से पहुंची तो माँ क्या कहेगी ? वेटर कैसे घूर रहा है ?

तभी वेटर ने पुछा,
- चाय या ठंडा ?
मिस्टर एच. ने एपल जूस की तारीफ करते हुए तपाक से दो ग्लास का आर्डर कर दिया. काफी देर ऐपल जूस की चुस्कियो के साथ इधर-उधर की बातें जो सामान्यतः दो अजनबियों के बीच होती हैं चलती रही. समय का कुछ ध्यान न रहा. जैसे ही बारिश रुकी मैंने पर्स उठा लिया.

बैरा बिल ले आया मिस्टर एच. ने तपाक से बिल पकड़ लिया. जेब से पर्स निकाला और खोला. अब मिस्टर का सारा ध्यान पर्स में चला गया. पूरे पर्स की तलाशी लेने के बाद चेहरे की रंगत बदलने लगी. पतलून की साइड और पीछे के खीसे देखने के बाद भी कुछ नहीं निकला. अब क़मीज़ की जेब टटोली और तब तक चेहरा लाल सुर्ख हो गया. खैर हमने भी भाँप लिया की जेब खल्लास थी. मिस्टर की खिसियाहट भरी मुस्कान पर हंसी आ गयी. हँसते हँसते बिल मिस्टर के हाथ से ले लिया और बैरे को पैसे दे दिए. बैरे ने मिस्टर एच. को देखा फिर उनकी फटफटिया को देखा और फिर व्यंग्य भरी मुस्कान फैंकी जैसे कह रहा हो की,
- तेरे जैसे कई देखे हैं !

जाहिर था कि मिस्टर एच. में मजनूं की आत्मा प्रवेश कर गई थी. और इस दीवानगी में फटफटिया के अलावा सब कुछ आउट ऑफ़ कंट्रोल था. इतना तो आभास हो गया था की पिछली सीट की सवारी की तलाश चल रही थी और खाली सीट भरने का इरादा अटल लग रहा था.

बारिश रुक चुकी थी और आसमान भी साफ़ हो गया था. मिस्टर मजनूँ ने झेंपते हुए कहा,
- कभी कभी ऐसा भी हो जाता है ! और फटफटिया स्टार्ट की. और मैं फिर से पिछली सीट पर सवार घर की ओर निकल पड़ी.
पर मुझे साफ़ आसमान की तरह ये भी साफ़ हो गया था की जल्द ही चाय पे बुलावा आने वाला है.

लम्बे सफ़र की शुरुआत 
-- गायत्री, नई दिल्ली.

Tuesday, 12 July 2016

नॉन-वेज

शादी तो लगभग तय हो गई है. लड़की लड़के ने आपस में मुलाकात भी कर ली है. लड़के ने मीटिंग में लड़की से पूछा,
- मुझे तो नॉन-वेज पसंद है ख़ास तौर से बटर चिकेन.
- नहीं जी हम तो वेज हैं. पर कोई खाए तो हमें एतराज नहीं है( बच्चू बाद में तेरा मुर्गा बनाउंगी मक्खन लगा के. बड़ा आया है जीन पहन के सवाल पूछने ).
- आप जीन्स वगैरा नहीं पहनती ?
- कभी कभी( ये तो मम्मी की वजह से आज सलवार कमीज़ पहन ली वर्ना तो ये मुझे बिलकुल पसंद नहीं ).
- फ़िल्में तो पसंद आती होंगी. देखती हो ?
- कभी कभी( ये हीरो है या विलेन ? सवाल पर सवाल किये जा रहा है ).
- नौकरी ठीक चल रही है ? शादी के बाद नौकरी छोड़ दोगी क्या ?
- नहीं नौकरी तो करनी है( चाहे तुझे छोड़ दूँ पर नौकरी नहीं छोडूंगी ).
- चलो मिलते हैं फिर. आपसे मिल कर अच्छा लगा.
- जी बाय( चल फूट ले. वैसे अब तक जो कनकौवे आये हैं उनमें से तो तू बेहतर लग रहा है ).

मुलाकात तो हो गयी - मम्मी से मम्मी की , पप्पा से पप्पा की और लड़के से लड़की की लेकिन अभी 'हाँ' नहीं हुई है. लड़के ने कहा कि लड़की तो ठीक है. उसके बाल बड़े सुंदर हैं, एक गाल में डिंपल है और नौकरी भी अच्छी है मतलब कुल मिलाकर ओके है.
- पर बेटा जी थोड़ी बहुत इन्क्वायरी तो जरूरी है ना. उनके अड़ोस-पड़ोस में ज़रा घर-बार का पता कर लेते हैं. और लड़की सर्विस करती है तो वहां भी ज़रा तनख्वाह वगैरा पूछ लेते हैं. हफ्ते दस दिन में जवाब दे देंगे. तू ज़रा शांति रख. मैं और पप्पा करते हैं कुछ.

पप्पा ने पहले बड़े भाईसाब को जासूसी पर लगाया. फोन मिलाया,
- नमस्ते भाईसाब. वो ना कल एक लड़की देख कर आये थे. तो वो ना आपके पास ही कोई कम्पनी है उसमें काम करती है. तो ना आप उसका पता करा दो ज़रा.
- अरे वाह मुबारक हो. भई लड़के को पसंद है तो फिर क्या चाहिए हैं ना ? फिर भी कहते हो तो पता करा देता हूँ हैं ना. मेरी जो स्टेनो है ना उसके जेठ के साले की छोटी साली उसी कम्पनी में करती है. सारी खोज-खबर मिल जाएगी हैं ना. कोई दिक्कत नहीं है.

पप्पा ने दूसरे जासूस को फोन लगाया.
- मैं गुप्ता जी का पड़ोसी बोल रहा हूँ जी वो ना आपके कज़िन हैं ना जी ? ज़रा कष्ट देना था. वो ना आपकी कॉलोनी में फ्लैट नंबर 10 में ना जी फलां-फलां रहते हैं जी. उनके बारे में ना ज़रा जानकारी चाहिए थी जी. वो ना बेटे के रिश्ते की बात चल रही है जी और आपको पता है जी आजकल जमाना ख़राब है जी. ठीक है थैंक्यू जी थैंक्यू !

मम्मी ने तीसरे जासूस को फ़ोन किया,
- बहन जी 32 नम्बर से बोल रही हूँ. मुझे बिट्टू की मम्मी ने बताया कि आपकी कज़िन की सहेली की बेटी एक कम्पनी में काम करती है. प्लीज़ उससे एक लड़की के बारे में पता करा दो जो उसी कम्पनी में काम करती है. थैंक्यू जी !

लड़की की मम्मी ने एक जासूस दौड़ा दिया ये पता लगाने के लिए की लड़का सिगरेट तो नहीं फूंकता ? दूसरा जासूस दौड़ा दिया की पता लगाओ दारू बाज तो नहीं है ? तीसरी महिला जासूस को ये पता लगाने के लिए भेजा की बेटी को अलग कमरा मिलेगा या नहीं.
लड़की के पप्पा ने गुप्तचर भेज दिए की पता लगाओ की कार अपनी लाया था या मांग के ? तनख्वाह कितनी है ?

10 दिन बाद सारे जासूसों ने रिपोर्ट दे दी. 
01 महीने बाद सगाई हो गई. 
06 महीने बाद बैंड बज गया. 
02 साल बाद नन्हा मुन्ना आ गया. 
25 साल बाद नन्हें मुन्ने की नौकरी लग गई. 
32 साल बाद मुन्ना लड़की देखने गया और लड़की से बोला, 
- मैं तो वेज हूँ और आप ?
- आई लव बटर चिकेन !

वेज या नॉन-वेज 
   

Sunday, 10 July 2016

सब चलता है

रिटायरमेंट के बाद पेपर पढ़ने का अलग ही मज़ा है. चाय की चुस्की के साथ इत्मीनान से हर पेज, हर विज्ञापन और हर टेंडर भी पढ़ते रहो. पहले सुर्खियाँ पढ़ते थे और अंदर के पेज बिना पढ़े कबाड़ी के पास चले जाते थे. अब अखबार के पूरे पैसे वसूल कर लेते हैं. कैसी कैसी ख़बरें मिलती हैं पढ़ने को. मसलन परसों ही इस खबर पर नज़र पड़ी की ग्यारह साल बाद कंज्यूमर कोर्ट ने फैसला सुनाया. जरा इस खबर पर गौर फरमाइए:

* कुमार साब ने 18 जून 2001 को 300 रुपये प्रति माह का एक रेकरिंग खाता स्टेट बैंक, मेरठ में खोला.

* 29 जनवरी 2005 को कुमार साब को बताया गया की आर डी खाते की किश्तें पूरी हो गयी हैं और उनकी पास-बुक में लिख दिया गया कि उन्हें 11,511 रुपये मिलेंगे.

* कुमार साब ने 7 फरवरी 2005 को बैंक से पेमेंट लेने के लिए लिखित प्रार्थना की.

* 9 फरवरी 2005 को 1509 रूपये की पेनाल्टी काट कर बाकी बैलेंस दे दिया गया. ये पेनाल्टी इसलिए काटी गयी कि उन्होंने समय से किश्तें जमा नहीं की थी. कुमार साब इस बात से सहमत नहीं थे. पर उनकी बात का संतोषजनक जवाब किसी ने नहीं दिया ना ही पेनाल्टी वापिस की.

* उन्होंने 5 जुलाई 2005 को कंज्यूमर कोर्ट में शाखा प्रबंधक के खिलाफ शिकायत दर्ज कर दी.

* ग्यारह साल बाद 5 जुलाई 2016 को कंज्यूमर कोर्ट ने बैंक को आदेश दिया कि कुमार साब को पेनाल्टी के 1509 रुपये वापिस दिए जाएं और उस पर 7 फरवरी 2005 से 9% ब्याज भी दिया जाए.

हिन्दुस्तानी काम काज कैसे चलता है उसका सही नज़ारा इस खबर में है. हमारा फलसफा है - 'सब चलता है' !

इन ग्यारह सालों में 4 - 5 ब्रांच मैनेजर तो बदल गए होंगे. हो सकता है कि कोर्ट को जवाब देने के लिए बैंक ने कोई वकील भी रख लिया हो. इस मुकदमे की रिपोर्ट रीजनल ऑफिस भी जाती होगी. वहां भी 4 - 5 रीजनल मैनेजर बदल गए होंगे. इन ग्यारह सालों में ग्यारह बार इंस्पेक्शन / ऑडिट भी हुए होंगे कुछ इंटरनल और कुछ बाहरी. पर साब किसी ने बिल्ली के गले में घंटी नहीं बाँधी ? अब भी क्या पता इस फैसले के खिलाफ बैंक द्वारा अपील कर दी जाए !

इन ग्यारह सालों में कोर्ट में कई Presiding Officer भी बदले होंगे. फाइल भी बीसियों बार तहखाने से बाहर आई होगी पर हवा खाकर फिर वापिस तहखाने में चली गयी होगी.

इन ग्यारह सालों में कुमार साब के बाल भी शायद सफ़ेद हो गए होंगे. उम्मीद है की जिस काम के लिए खाता खोला था वो काम तो हो ही गया होगा. इसलिए अब पेनाल्टी और उस पर मिले ब्याज से अब आराम से बैठ कर बियर तो पी ही सकते हैं. या फिर चाहें तो चाय की चुस्की ले लें - मुबारक हो कुमार साब !

चाय की चुस्की 


Thursday, 7 July 2016

जामुन

जुलाई के बरसाती मौसम में बाहर गली में जामुन वाले की आवाज सुनाई पड़ी,
- जामुन काले काले रा !
- जामुन बड़े रसीले रा !
फट से बाहर निकली तो देखा कि रेड़ी पर हरे हरे पत्तों के ऊपर जामुन की छोटी सी ढेरी लिये भाई आवाज लगा रहा था. जामुन ताज़ा और बड़े बड़े थे. काले- जामुनी रंग में सुंदर लग रहे थे. पर दाम भी कम नहीं था २०० रू किलो. पाव भर के पैसे दिये और नमक की पुड़िया के साथ जामुन ले लिये. 

जामुन बरसाती मौसम का तोहफ़ा है. इसे काला जामुन, जम्बू, जम्बुल, राजमन या ब्लैकबेरी भी कहते हैं. वैसे विज्ञान में इसका नाम है - Syzygium cumin. यह भारत के अलावा दक्षिण एशिया के कई देशों में पाया जाता है. जामुन का पेड़ सदाबहार, घना और काफी बड़ा होता है. अगर आप इंडिया गेट गए हों या फिर 26 जनवरी की परेड देखी हो तो जामुन के पेड़ ज़रूर देखे होंगे. जामुन के पेड़ के पत्ते, पेड़ की छाल, फल और गुठली, सभी बड़े उपयोगी हैं. जामुन में, प्रोटीन, कैल्शियम और कार्बोहायड्रेट भी हैं. मधुमेह का एंटी है. 

घर आकर जामुन धो कर नमक के साथ आनंद लिया. जामुन चाहे कितना ही मीठा हो खा कर मुंह का स्वाद थोड़ा कसैला सा हो जाता है और जीभ जामुनी हो जाती है. स्वाद ठीक रखने के लिए हल्का सा नमक सही रहता है.

जामुन खाते खाते बचपन का ख़्याल आ गया. पिताजी की पोस्टिंग एयर फ़ोर्स स्टेशन, रेस कोर्स, नयी दिल्ली में थी. वहीँ सरकारी क्वार्टर में रहते थे. वहाँ पर इमली और जामुन के बहुत से बड़े बड़े पेड़ थे. घर से सिर्फ सौ मीटर दूर एक ट्यूब वैल था जिसके अहाते में भी जामुन के पेड़ थे जो पके जामुनों से लदे हुए थे. वायु सेना का पड़ाव होने के कारण यह निषिद्ध क्षेत्र था और वहां का रास्ता गार्ड रूम के सामने से था. गार्ड वहां से अंदर जाने को मना करते थे पर पेड़ के पके जामुन हमें न्यौता देते थे कि आ जाओ !

स्कूलों की तो उन दिनों गर्मी की छुट्टियाँ थी. भैय्या ने कहा,
- देखो सुबह पांच बजे तो गार्ड सोया रहता है. चुपचाप गार्ड रूम के पीछे से अंदर घुस जाएंगे. अगर तुम दोनों तैयार हो तो कल सुबह हमला बोला जाए ?
सुबह सुबह भैय्या ने हम दोनों बहनों को जगा दिया अभी बादलों के वजह से पूरा उजाला भी नहीं हुआ था.
- चुपचाप चल पड़ो. गार्ड रूम में इस वक़्त कोई भी नहीं है अभी. कोई चद्दर ले लो. जामुन ऊपर से टपकेंगे तो उस में इकट्ठे कर लेना. जल्दी कर लो.

रात को जो चादर ओढ़ी थी वही चादर लेकर हम निकल पड़े. भैय्या ने चप्पल उतारी और फुर्ती से पेड़ पर चढ़ गए. ऊपर चढ़ कर भैय्या ने पेड़ की डाल हिलानी शुरु कर दी. जामुन की टपाटप बरसात होने लगी. हम दोनों बहनों ने चादर फैला कर दो-दो सिरे पकड़ लिए. चादर में जामुन जमा होने लगे. भैया बन्दर की तरह जिस डाल की तरफ बढ़ते, हम भी चादर फैला कर उसी तरफ फुदकने लग जाते. पर इतने में दूर कहीं गाड़ी की आवाज़ आई.
- भैया उतरो उतरो कोई आ रहा है !
- आया आया तुम लोग निकल लो.
चादर के चारों कोने इकट्ठे करके गठरी बना कर मैंने कंधे पर डाल ली और हम दोनों घर की और दौड़े. पीछे मुड़ कर देखा तो भैय्या भी पेड़ से कूद कर नंगे पैर भागे आ रहे थे और चप्पलें हाथों में पकड़ी हुई थीं.

घर पहुँचने पर जोरदार स्वागत हुआ. चद्दर खराब करने पर खूब डांट पड़ी और एक हफ्ते तक डांट चलती रही. अनुशासन तोड़ने और बिना आज्ञा फल तोड़ने पर भैय्या को एक करारा चांटा लगा और डांट और भी लम्बी चली - शायद दस बारह दिन तक लगातार चलती रही.

पर मीठे रसीले जामुनों के साथ थोड़ा सा नमक तो चलता है !
जामुन काले काले रा !