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Sunday, 31 January 2016

ऐसे भी और वैसे भी

अगर आप संसद मार्ग पर निकलें तो बहुत सी ऊँची-ऊँची इमारतें मिलेंगी जिनमें से कुछ में बैंक हैं. हमारा बैंक भी वहीँ है. बैंक कई फ्लोर में फैला हुआ है और इन फ्लोर पर बहुत से कर्मचारी, अधिकारी, हाकिम और हुक्काम काम करते हैं. इनमें से कुछ काम करते हैं और कुछ आराम करते हैं. कुछ ऊपर से नीचे आते हैं और कुछ नीचे से ऊपर जाते हैं. कुछ कभी कभी नारे भी लगाते हैं और कुछ नारे सुनते हैं. कभी तो ये सब समझ आता है पर कभी नहीं भी आता.

यहाँ काम करने वाले कई प्रकार के होते हैं. कुछ के हाथ में बन्दूक होती है, कुछ के हाथ में डस्टर या झाड़ू होते हैं, कुछ के हाथ में फाइलें और कुछ के हाथ में प्लास्टिक या लेदर फोल्डर होते हैं. कुछ खाली हाथ चलते हैं पर उनको भी कुछ काम करने पड़ते होंगे या शायद नहीं करने पड़ते होंगे. पता नहीं.

जिनके हाथ में बन्दूक है वो दरवाज़े पर खड़े-खड़े लोगों की शक्लें देखते रहते हैं. जिनके हाथ में डस्टर या झाड़ू है वो एक तरफ सफाई कर के धूल मिट्टी दूसरी तरफ डाल देते हैं. दूसरे दिन वे दूसरी तरफ की सफाई करते हैं और कूड़ा तीसरी तरफ सरका देते हैं. ये कारवाई चलती रहती है.  

जिनके हाथ में फाइल हैं वो छोटे साहब से लेकर बड़े साहब को देने जाते हैं और फिर बड़े साहब से लेकर छोटे साहब को वापस करने जाते हैं. ये लोग ज्यादातर खैनी और तम्बाकू का प्रयोग करते हैं और गलियारों और सीढ़ियों के कोने खराब कर देते हैं. इनमें से कुछ सिगरेट और बीड़ी का धुआं भी उड़ाते हैं और बैंक की कम और सिनेमा और टीवी सीरियल की बातें ज्यादा करते हैं. 

जिनके हाथ में प्लास्टिक या लेदर के फोल्डर होते हैं वे कम मुस्कराते हैं और धीर-गंभीर मुद्रा में होते हैं. नीली या काली स्याही से ये कागजों पर लिखते रहते हैं और उसे लिख कर या पढ़ कर महसूस करते हैं की बैंक, देश और समाज के लिए बड़े बड़े काम कर रहे हैं. बैंक का प्रॉफिट और साथ में देश का जीडीपी बढा रहे हैं. इनमें से एक आधा जब सस्पेंड या डिसमिस होता है तो कुछ समय के लिए बैंक का प्रॉफिट और देश का जीडीपी रुक जाता है.

कुछ नारे लगाने वाले भी हैं जो नेता कहलाते हैं. हर वर्ग में हैं. जो जितना ज्यादा शोर मचाता है वह उतना ही बड़ा नेता बन सकता है. या फिर ज्यादा पंगे खड़ा करता है तो वो भी ऊपर की ओर चढ़ सकता है. कई बार तो कुछ नेता लोगों के सर पर खड़े हो कर भी भाषण दे देते हैं.

नारे सुनने वाले भी बहुत हैं जो शातिर और चालाक हैं. नारे सुन कर १० % बढ़ा कर बड़े हाकिम के कान में फुसफुसाते हैं. बड़े हाकिम की बात को १० % घटा कर नारे लगाने वाले के कान में फुसफुसाते हैं. ये चाय इधर भी बैठ कर पीते हैं और उधर वालों के साथ भी पीते हैं. 

कभी तो ये सब समझ में आता है पर कभी नहीं भी आता. आप समझ लेते हैं क्या ?

हम ऐसे भी हैं 

Saturday, 30 January 2016

जी हुज़ूर

गोयल साब ने केबिन छोड़ने से पहले घर फोन लगाया:
- सुनो उषा मैं साहब के घर हो कर आऊंगा थोड़ी देर हो जाएगी घर आने में.
- अरे परसों ही तो गए थे.
- तू समझती नहीं अरे मैं आकर बताता हूँ. फोन रख कर गोयल साहब ने जेब से छोटी कंघी निकली, बालों पर फेर कर बाल सेट कर लिए और बाहर निकल पड़े.

गोयल साब से आप मिले नहीं का ? मिलना चाहिए भई. आइये हम ही मिलाय देते हैं. गोयल साब हमारे बैंक के बड़के अफसर हैं भई. रीजनल मनीजर हैं भैय्या. पूरा का पूरा झुमरी तलैय्या का रीजनवा सँभालते हैं कौनो मजाक है ? चाहे गाय भैंसिया का लोन हो, चाहे फक्टरी लगाना हो या ट्रक गिरवाना हो सब का लोन करते हैं. कलम की पॉवर है भाई एक करोड़ की. इधर कलम चली उधर रुपया गिरा आपके खाते में. बस फाइल के कागजा पूरे किये जाओ और पैसवा लिए जाओ. बस अभी बोतल ले के गए हैं अंदर कोठी में. जी-एम साब के साथ दो ठो पेग लगा के आते होंगे. बची हुई हमें भी मिल जाती है ना जी. साब की गाड़ी भी तो हमीं ना चलाते हैं ?

गोयल साब वापस आये और डिनर करने के साथ-साथ उपदेश भी देने लगे:
- देखो उषारानी साब लोगों के घर बोतल लेकर जाना जरूरी होता है ये समझ लो. अपनी प्रमोशन का नंबर इस साल आने वाला है और इसी जी-एम ने नंबर भी देनें हैं. इसलिए ये तो अपनी इन्वेस्टमेंट है.
- अजी बोतल दे आये गंजे को वो तो ठीक है आप तो दिवाली में सोना भी दे आये गंजे की घरवाली को. लोगों की घरवाली खुश रहे बस. और अपनी ? अपनी खाली हाथ बैठी रहे.
- अरे क्या हो गया जो होली दिवाली में दे दिला दिया तो - हैं ? और फिर कौन सा अपनी जेब से जाता है ? भई इधर से आता है कुछ % उधर चला जाता है. इस साल सुसरे पर एक लाख खर्चा कर दिया है और अगर इस सुसरे ने पोस्टिंग सही कर दी तो बस वसूली पूरी हो जाएगी.
- तुम्हारा हिसाब किताब तुम्हीं जानो. इस बार मेरी दिवाली ज़रा ढंग से होनी चाहिए.
- चिंता ना करो तुम उषारानी.

कुछ दिनों बाद एक सुबह महतो ड्राईवर कुछ बदहवास सा लग रहा था देखते ही बोला:
- नमस्ते साब ! हम बड़के साब की कोठी से आ रहे हैं. चार सरकारी गाड़ी खड़ी है जी वहां सब लाल बत्ती वाली. पांच चार पुलिसिया भी हैं जी वहां. बता रहे हैं की कौनो रेड पड़ गई है जी.
- अच्छा अच्छा तुम गाड़ी निकालो.

एक मिनट के लिए गोयल साब सुन्न हो गए. फिर सम्भले तो बहुत सी चीज़ें और ख्याल सर में मंडराने लगे. फिर फुसफुसाए:
- सुनती हो उषा ? महतो कह रहा की साब के घर रेड पड़ गई है. एक काम करो कीमती सामान ले के निकल लो और अपनी सहेली के यहाँ छोड़ आओ. और हाँ कोई पूछे तो कह देना कि तुम जी-एम वी-एम को नहीं जानती हो ना उसकी घरवाली को. वो तो ऑफिस की वजह से नाम वाम सुना है बस. हम तो दाल रोटी खाते हैं और प्रभु का गुण गाने वालों में से हैं.
स्साला एक लाख तो गया नाली में ऊपर से एक दो और लग जाएगा सेटिंग बैठाने में. जाने आज का दिन कैसा निकला है सुसरा सुबह सुबह मूड ऑफ कर दिया.

जी हुज़ूर 


Wednesday, 27 January 2016

चीफ साहब

हमारे चीफ साब बड़े सलीके से काम करते थे. टेबल बिलकुल साफ़ होनी चाहिए, टेबल पर केवल एक राइटिंग पैड होना चाहिए और उसके साथ एक पेंसिल रक्खी होनी चाहिए बस. यही नहीं कपड़ों के मामले में भी सलीका होना चाहिए. चकाचक सफ़ेद शर्ट, पोलिश की हुई बेल्ट, टाई और चमकते हुए जूते ये उनकी खासियत थी. जेब में हमेशा दो महंगे से पेन लगे रहते थे एक से वो दस्तखत करते थे और दूसरे से नोट लिखते थे.

बैंक में केरीयर की शुरुआत सीधे पीओ से हुई थी. मेहनत और लगन से काम करने वाले थे. जैसे घोड़े की आँखों पर दाएं बाएं पतरे लगा दिए जाते हैं ताकि वो केवल आगे देख सके उसी तरह चीफ साब ने भी खुद ही पतरे लगा लिए थे और वो केवल आगे ही देखते थे. जल्दी जल्दी प्रोमोशन लेना चाहते थे. ये सारी क़ाबलियत देख कर ही उन्हें शेयर विभाग सौंपा गया था.

अब आप देखिये कि हमारा शेयर विभाग छोटा मोटा नहीं है. किट्टी में एक करोड़ से लेकर सौ करोड़ रूपए तक फण्ड होता है रोज़ शेयर बिकते भी हैं और ख़रीदे भी जाते हैं पर साब मजाल है की किसी लेनदेन में कभी घाटा हुआ हो. हमारे चीफ साब के रहते एक भी डील बिना प्रॉफिट के बुक नहीं होती थी. चश्में के लेंस में से डील की सारी बारीकियां देख लेते थे. धाक थी चीफ साब की.

पर घर रोज़ लेट पहुँचते थे चीफ साब. इसकी वजह से घरवाली और दोनों बच्चे अक्सर नाराज़ हो जाते थे. पर इनको कौन समझाए कि अगर काम करना है तो परफेक्शन होनी चाहिए न ? रही घुमने फिरने की बात तो बहुत लम्बी जिन्दगी पड़ी है घूम लेंगे पता नहीं क्या जल्दी है इनको ? और सेहत तो ठीक ही है क्या हुआ है मेरी सेहत को ?

11 मई 1998 को चीफ साब की टेबल पर बैंक की फण्ड पोजीशन रख दी गई. शेयर बाज़ार ठीक ठाक था. बैंक की सेल कम थी और परचेज़ ज्यादा होनी थी. चीफ साब ने सेल / परचेज़  करने वाले शेयर्स के नाम लिख कर नोट जीएम साब को भेज दिया. जीएम साब ने दस्तखत करके ईडी साब को भेज दिया. ईडी साब ने ओके करके चेयरमैन साब को भेज दिया वहां भी ओके हो गई. नोट वापिस आ गया डील की कारवाई पूरी कर ली गई तो चीफ साब ने इत्मिनान से चाय की चुस्की ली.

चाय के साथ साथ टीवी पर शेयर के बाज़ार भाव पर भी नज़र थी. उन्होंने दुबारा नज़र डाली टीवी पर और फिर जल्दी से दूसरे मोनिटरों पर नज़र डाली. ये क्या ? ब्रेकिंग न्यूज़ -
"भारत द्वारा पोखरण में परमाणु बम विस्फोट, अमेरिका ने पाबंदियां लगाईं, शेयर बाज़ार नीचे गिरा".

चीफ साब के चेहरे की रंगत उड़ गई और शरीर ढीला पड़ गया. जल्दी से डील निकाल कर दुबारा टीवी पर देखने की कोशिश की पर बेकार सारा बाज़ार ही नीचे लुढ़क रहा था. आज की सारी की सारी डील में घाटा हो गया. चीफ साब ने सर पकड़ लिया.

पर बाहर ऑफिस में खबर फैली तो ज्यादातर लोग खुश थे. कुछेक चुस्त बन्दों ने मिठाई भी बांटना शुरू कर दी थी. एकाध ने हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे भी लगा दिए. इस माहौल में किसी ने चीफ साब की ओर ध्यान नहीं दिया. उन्होंने जीएम साब को इण्टरकॉम पर सारी स्थिति बताई, ड्राईवर को बुलाया और चुपचाप घर चले गए.

घर जाकर बोले 'चाय बना दो तबियत ठीक नहीं लग रही है '. यह कह कर वो कुर्सी में लुढ़क गए. जब तक चाय आती तब तक सांसें बंद हो चुकी थीं.

जीवन संध्या 


Monday, 25 January 2016

Happy Republic Day

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ! Happy Republic Day! गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ! Happy Republic Day!


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Sunday, 24 January 2016

औकात

सागर किनारे पेड़ों का एक झुरमुट था. उस झुरमुट में बैठे एक कौवे की नज़र रेत में बैठे कुछ मछुवारों पर थी. मछुवारों ने आग जला रखी थी और जोर जोर से बतियाते हुए मछली भून रहे थे. दारु पीने और मछली की दावत के बाद एक दो मछुवारे वहीँ लेट गए और कुछ नाचने गाने लगे. कौवे ने उड़ान भरी और वहीँ जा उतरा.

उतरते ही मछली का पिंजर नज़र आ गया. चोंच में पकड़ लिया और थोडा दूर हट गया. पिंजर को पैर में दबाया और चोंच से मांस नोच नोच कर खाने लगा. खाकर हंसा और पेड़ों के झुरमुट की ओर ख़ुशी से कांव-कांव करते हुए उड़ा. वहां उसकी अर्धांगिनी बैठी उंघ रही थी.
- अरे ओ कव्वी उंघती रहेगी क्या ? चल आजा तेरी मस्त दावत कराता हूँ.
दोनों ने खूब मछली खाई और पानी पीने के लिए वहां पड़ी एक बोतल गिरा दी जिसमें दारु थी. पानी के बजाए दारु पी ली और दोनों मस्त होकर हवा हवाई होने लगे. तब कव्वी बोली :
- चल कौवे आज समंदर में तैरते हैं ?
- चल तैरते हैं.
पर एक ऊँची लहर आई जिसने कव्वी को उठाकर पटक दिया और मछली ने जल्दी से उसे लपक लिया. कौवे ने ऊपर उड़ कर बुरी तरह से 'कव्वी कव्वी' चिल्लाना शुरू कर दिया. झुरमुट से और बहुत से दोस्तों यारों के ले आया. सबने मिल कर कांव कांव का शोर मचाया पर कव्वी ना मिलनी थी न मिली.
झुरमुट में दुबारा कौव्वों की मीटिंग हुई. बहुत से विचार दिए गए - कुछ दुःख के, कुछ सहनुभूति के और कुछ गुस्से में:
- बड़ी सुंदर कव्वी थी जी. चोंच कितनी शानदार थी जी.
- बहुत सुरीली आवाज़ में कांव कांव किया करती थी.
- समंदर ने ये अच्छा नहीं किया. हमारी सुंदरी डुबो दी.
- हमें समंदर के खिलाफ कुछ करना चाहिए.
- इस समंदर को अपने पानी पर बड़ी ऐंठ है. हमें तो इसका पानी निकाल कर फेंक देना चाहिए. ना होगा बांस ना बजेगी बांसुरी.
- चलो, चलो, चलो का शोर मच गया. सब कौव्वे मिल कर कांव कांव करते हुए समंदर पर टूट पड़े. अपनी अपनी चोंचों में पानी भर कर दूर फेंकने लगे. कुछ ही देर में थकने लगे, आँखें लाल हो गयीं, मुंह में खारा पानी भरने के कारण कांव कांव बंद होने लगी.
समंदर ने कुछ देर कौव्वों की हरकत देखी. फिर मुस्कराया और एक ऊँची लहर झुण्ड पर दे मारी. कुछ कौवे लहर की चपेट में आ गए और बाकी जान बचा कर झुरमुट की ओर उड़ गए.  

आज दावत है
यह किस्सा एक जातक कथा पर आधारित है और इस किस्से में अपनी औकात में रहने के लिए कहा गया है. जातक कथाएँ 2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के समय से प्रचलित हुईं. गौतम बुद्ध 35 वर्ष की आयु से लेकर 80 की आयु तक ज्ञान का प्रचार करते रहे. अपने प्रवचनों में अपने जीवन के अनुभव और बहुत सी छोटी छोटी कथाएँ उदहारण के तौर पर बताया करते थे. कुछेक कथाएँ दुसरे अरहंतों की भी हैं. धम्म प्रचार के साथ साथ ये जातक कथाएँ बहुत से देशों - श्रीलंका, म्यामार, कम्बोडिया, तिब्बत, चीन और ग्रीस तक पहुँच गयीं.

इस कहानी के और भी रूपान्तर हैं :
- एक बार समुंदर चिड़ियों के अंडे बहा कर ले गया. सब चिड़ियों ने मिलकर गरुड़ देवता से अपील की. गरुड़ के कहने पर समुंदर ने अंडे वापस लौटा दिए.
- कुत्तों के झुण्ड को नदी के तल में हड्डियाँ दिखाई पडीं. उनको पाने के लिए कुत्तों ने सोचा की नदी का पूरा पानी पीकर ख़त्म कर देते हैं (अरबी लोक कथा ).



Saturday, 23 January 2016

A working day

Daily wagers rarely have a day off & they don't even wish for it. Day, date or season does not matter.
Three snaps from Meerut:

Both the ladies shall earn ₹100/- each. Grass collected shall be bonus - fodder for their buffaloes

Dinesh selling colourful balloons for ₹10 each & hopes to finish the day with 250 or so

This friendly neighbourhood vendor stocks fruits worth ₹5000/- or so & hopes to pocket ₹ 500  at the end of the day




Wednesday, 20 January 2016

Horoscope of a lazy Sunday

Lazy Sunday morning at times brings out hazy ideas. Something prompted me to look for horoscope of the day for the zodiac sign Cancer. This zodiac sign is my sign as I was born on first of July. Surfing through internet three interesting declarations for people having Crab as their birth sign were found on three different sites:

1. Consciously cultivate change. Over-eating is a strong probability! 

Amazing really how this snoopy fellow snooped about my plan for a Sunday special treat of butter chicken + beer. And what right has he to poke in to my butter chicken? Or the beer? On the other hand if I don't go for the chicken & the beer the retailers shall be having lesser income. No the economic cycle must go on. Let me enjoy my butter chicken with beer & let the retailers have their income & let them also enjoy life. These fortune tellers are no good & that's why I don't like these silly horoscopes! As for his advice on 'consciously cultivate change' I will take help of some guru in Himalayas.

2. When it comes to activities today, your eyes may be bigger than your stomach.

What does he mean by that? I have read it four times but this does not make any sense to me. The eyes of homo sapiens are always smaller than their stomachs. In fact I can't imagine anything that walks or crawls or flies or swims to have bigger eyes than their respective stomachs. This fellow must be out of his mind to conclude like that. It's no use reading such horrible horoscopes.

3. You might be more inclined to stay in close touch of your heart once you realize you don't have to reveal your secrets to anyone.

And what is this blah blah in horoscope for Sunday? There are some or the other secrets inside heart & inside mind 24 x 7. This is no secret & public at large knows it. There are some secrets not to be told to dear wife but can be told to dear friends. Some secrets can be shared with dear wife but not with dear friends. And there are some secrets you keep exclusively with yourself. These are to be written down & placed in locker with instructions to open them 30 years after Final Departure as per Official Secrets Acts.
These horoscopes are nothing but 'horror-scopes'!

To know forecasts about future other options are also available - Palmistry, Janampatri & the Tarot Cards. Here the parrot picks up a card for you which is then interpreted by the above gentleman. For just Rs. 50.00 (not negotiable) get to know your future. His address: Opp. Rock Temple, Kanyakumari, TN, India 


Monday, 18 January 2016

पेंशन के नोट

नफे सिंह ने अपनी सफ़ेद मूंछो पर ताव दिया और बैंक की पास-बुक दिखा कर पूरे भारत की जनता के सामने घोषणा कर दी:
- पेंसन चढ़ गई भई खाते में इब चिंता किस बात की ?
नफे सिंह नें बैंक खाते से एक हजार तीन सौ रुपये निकाले. नोट तीन बार गिने कहीं कम तो न दे दिए खजांची ने ?
- भई नूं है की आजकल बिस्वास करने का जमाना नइ है.
नोट गिन कर कोट के नीचे का स्वेटर ऊपर किया, स्वेटर की नीचे की कमीज़ ऊपर उठाई और बनियान में बने स्पेशल जेब में 1000 जमा कर दिए. नफे सिंह इस बनियान को लाकर वाली बनियान कहता था. तीन सौ कोट के पॉकेट में दाल दिए. दो एक बार थपथपा कर जेब सेट कर दी, कपड़े सीधे कर लिए और फिर घर की ओर प्रस्थान कर दिया.

रास्ते में उसका पहला पड़ाव था ठेका जहाँ से उसने रम का एक पउव्वा ख़रीदा और झोले में डाल लिया. सब्जी वाले से गाजर, मूली, टमाटर, आलू और प्याज ले लिए. आखिर में पोती के लिए टाफियां लीं और झोले में गेर लीं. अब नफे सिंह के चहरे पर से तनाव हट गया और संतोष झलकने लगा. हलकी सी मुस्कराहट आ गई और चाल मस्तानी हो गई. आज शाम की दावत तो फिट हो गई दुनियादारी गई भाड़ में.

घर पहुँच कर टाफियां पोती को दी तो वो खुश हो गई. सब्जियां खटिया पर डाल दीं और धीरे धीरे सीढियाँ चढ़ कर अपने कमरे में आ गया. पहले रम का पउव्वा संभाला फिर जूते उतारे और थकावट दूर करने खटिया पर लेट गया. उठा तो 6 बज रहे थे. कम्बखत बहु ने आज तो खाना भी नहीं पुछा. जोर से बोला:
- रे आज ते तैने रोटी टिक्कड़ भी ना पूछी ? कित गई ?
- अजी कई बेर वाज लगा ली सोए पड़े थम तो. इब मोहल्ले को थोड़ा ही जगाणा था ? रोटी तो रोज मैं-इ खिलाऊं और कुण खिलाएगी थमें ? ये राखी थाली.
- चल ठीक है जरा मरा प्याज टमाटर काट दे नमक लगा के और पानी की बोतल दे दे.
- ये ल्लो.

बहु के जाने का बाद तकिये की नीचे से पउव्वा निकला और दबी आवाज़ में किलकारी भरी. जल्दी से स्टील के गिलास में रम डाली पानी मिलाया और एक घूँट पिया
- वाह ! वाह ! गला तर हो गया. स्साले दो-दो छोरे तीन-तीन जंवाई, एक नहीं कहता की नफे सिंह म्हारे बाप दो घूँट लगा ले चैन से बैठ के. हाल-इ ना पूछते निकम्मे स्साले ! इनसे तो घरवाली ठीक थी. वो भी पहले निकल गई कमबखत. मेरे जाने के बाद चली जाती. इब ज्यादा याद आती है सुसरी ! ये ले दूसरा घूँट तेरे नाम का बस तू खुस रह जहाँ भी है तू.

तब तक नीचे बहु को भी भनक लग चुकी थी उसकी आवाज़ भी आने लगी :
- सत्तर साल की उमर हो ली पर बताओ बोतल ना छोड्डी. बुढ़िया भी मना करते करते चली गयी और नाती पोते हो लिए पर बोतल न छोड्डी. क्या सिखाओगे थम बालकों ने ? रोटी टाइम ते चइये. रोटी बनाने में पैसा लगे है म्हेनत लगे है.

- रे अपने पैसे से पियूँ मैं. अपनी रोटी के पैसे दूं मैं. पेंसन मिले है पेंसन.

- ना अबकी बेर थम पेंसन के नोट खा लियो, कच्चे कागज़ खा लियो. ना तो बोतल में पेंसन के नोट घोल के पी लियो.

चलो घर चलें 

Sunday, 17 January 2016

कसौली के क़िस्से

कसौली काफ़ी पुराना पर छोटा सा कैन्ट है जो अब जिला सोलन हिमाचल प्रदेश का हिस्सा है। शिमला से 77 किमी दूर, ठंडा और शांत पहाड़ी इलाक़ा है। वहाँ कुछ समय बिताने का मौका मिला और टाइम पास करने के लिए वहाँ के पुराने बाशिंदों से बातचीत हुई। तीन किस्से सुने जो पेश हैं पर पता नहीं कितने % सच हैं।

# काला कुत्ता
कसौली में लोअर पाईन मॉल है जहाँ शापिंग के लिए तो कुछ नहीं था पर घूमते हुए नजर पड़ी एक पुरानी ख़स्ता हाल लक्कड़ की इमारत पर जो अपने अच्छे दिनों का याद कर रही थी। उसके दाहिनी ओर एक शराब का ठेका था और उस ठेके के पीछे रसोई गैस की एजेंसी थी। ठेके के आगे एक चबूतरे पर काला कुत्ता बैठ था। ग़ौर से देखने पर पता चला कि कुत्ता नहीं कुत्ते की मूर्ति थी। 

कौतूहल वश ठेके में पूछा तो जवाब मिला 'ये तो अंग्रेज़ों के ज़माने का है'। तब आगे की दुकानों में पूछताछ की तो एक दुकानदार ने बताया की मकान मालिक की किसी अंग्रेज़ से गरमा गरमी हो गई। अंग्रेज़ ने पिस्टल निकाल ली और ठाँय कर दी। पर इस बीच काला कुत्ता फ़िरंगी पर झपट पड़ा और गोली खाकर चित्त हो गया। उस घटना की यादगार है ये मूर्ति। 

एक और दुकानदार का कहना था कि कुछ शरारती तत्वों नें ठेके में से शराब चुराई और ग़ल्ले में भी हाथ मारने की कोशिश की। खड़खड़ाने की आवाज सुनकर कुत्ता उन पर झपटा और वो चोर भाग लिए। सुबह कुत्ते की मदद से पकड़े गए और सज़ा मिली। बाद में इस कुत्ते की मूर्ति इंग्लैंड में बनवा कर यहाँ स्थापित की गई। 

दोनों ही किस्से कुछ कुछ अधूरे से लगते हैं। हफ़्ते दस दिन के लिए दुबारा जा कर रिसर्च करनी पड़ेगी या फिर किसी न्यूज़ चैनल को सूचना देनी पड़ेगी !

स्थायी चौकीदार
# लोहे की संदूक
यह कहानी ऐसे शख्स ने सुनाई जिसका परिवार 1920 से कसौली में है इसलिए इस क़िस्से में कुछ तो दम होना चाहिए। क़िस्सा यूँ है कि कसौली से लगा हुआ एक गाँव था 'डार' जो अब पुरानी कसौली कहलाता है। इस गाँव में क़रीबन 75% मुस्लिम थे। 1947 में आज़ादी और बँटवारे की अफ़वाहों का बाज़ार गरम था। मुस्लिम परिवारों ने अपने अपने ज़ेवरात पोटलियों में डाले और उन पर अपने नाम लिखे। पोटलियों को इकट्ठा कर के एक भारी भरकम लोहे की संदूक में रख दिया और बड़े से बड़े ताले लगा दिये। संदूक को खींच कर गली के एक कोने में सेट कर दिया और बटवारे के हल्ले में कालका-लाहौर रेलगाड़ी से कूच कर गए।  

कुछ दिन गुज़रे तो फिर से गाँव में फिर हलचल शुरू हुई। लोहे की संदूक ताश का टेबल बन गया और उसके इर्द गिर्द शराबी इकट्ठा होने लग गए। एक लाला ने दुकान खोलनी थी तो उसने मज़दूरों की मदद से संदूक को दस फ़ीट पीछे करा दिया। दूसरी दुकान खुली तो संदूक और आगे चली गई। तीसरी दुकान खुली तो और आगे चली गई। पर तीसरे लाला ने अपने लड़कों की सहायता से रात को संदूक खोल दी। 

कहते हैं तीसरे लाला जी बहुत जल्दी अमीर हो गए थे और कसौली छोड़ कर अम्बाला चले गए थे। 

पुरानी कसौली की पुरानी गलियाँ 

# पादरी और प्रॉपर्टी डीलर
कसौली का क्राईस्ट चर्च काफ़ी पुराना है। इसकी नींव 1840 में रखी गई थी और पहली प्रार्थना 24 जुलाई 1853 में कराई गई थी। कालांतर में रैव. रघुबीर मैसी को 1999-2002 के लिए क्राईस्ट चर्च का पादरी नियुक्त किया गया। पादरी रहते हुए रैव. रघुबीर मैसी ने चर्च के दो गोदाम, एक गेस्ट हाउस और एक सरवैंट क्वार्टर 60,000 ₹ लेकर श्री श्याम सुंदर को लीज़ पर दे दिये। पर पादरी ने ये पैसे चर्च के खाते में जमा नहीं कराए। 
श्याम सुंदर अग्रवाल रीयल इस्टेट एजेंट का बोर्ड अभी लगा हुआ है। 
और मुक़दमा भी जारी है। 

क्राईस्ट चर्च, कसौली


Friday, 15 January 2016

भगवान एक या अनेक

किलाफिस शहर के बीचो बीच एक मंदिर था. मंदिर के बाहर एक महापुरुष भगवान के बारे में उपदेश दिया करते थे. बहुत से भगवानों की कथाएँ और वंदना किया करते थे. कुछ लोग उन्हें सुनते थे, कुछ नज़रंदाज़ कर देते थे और कुछ कहते थे की इन भगवानों के बारे में हमें पता है और उन भगवानों का आशीर्वाद हमारे साथ दिन रात है.

कुछ समय बाद उसी किलाफिस शहर में एक और महापुरुष आये और जनता को संबोधित करते हुए बोले कि भगवान या देवता का अस्तित्व नहीं है. कुछ लोगों ने उनके प्रवचन सुने, कुछ ने नज़रंदाज़ कर दिया और कुछ ने कहा ये महापुरुष  ठीक ही कहते होंगे क्यूंकि देवता ज्यादा होने से भी तो डर लगता है.

कुछ समय बाद उसी शहर किलाफिस में एक और महापुरुष पधारे और प्रवचन देने लगे कि भगवान केवल एक ही है. कुछ ने उन्हें सुना, कुछ ने अनसुना कर दिया और कुछ लोगों को डर लगा कि अब तो एक ही भगवान का फैसला मानना पड़ेगा. 

कुछ समय बाद किलाफिस शहर में एक और महापुरुष पधारे. जनता को संबोधित करके बोले भगवान तीन हैं और उनकी संगिनी बड़े दिल वाली करुणामयी माँ भी उनके साथ ही रहती है. उन सब का एक ही वाहन है वायु. कुछ ने सुना, कुछ ने नहीं और कुछ लोगों को सांत्वना मिली कि करुणामयी माँ भी साथ है. माँ जरूर गरीबों और बेसहारों को सहारा देगी.

पर आज भी शहर किलाफिस में बहुत से निवासी इस बहस में उलझे रहते हैं कि भगवान एक है या भगवान अनेक हैं या भगवान है ही नहीं या फिर भगवान तीन हैं जिनके साथ करुणामयी माँ है. 



यह किस्सा खलील जिब्रान की एक कहानी God & many Gods पर आधारित है जो उनके कहानी संग्रह The Wanderer में प्रकाशित हुआ है. जिब्रान का अरबी नाम जिब्रान खलील जिब्रान था और उनका जन्म लेबनान में 1883 हुआ. 12 वर्ष की आयु में माता पिता के साथ न्यू यॉर्क चले गए थे और वहीं बस गए थे. उनकी मृत्यु न्यू यॉर्क में 1931 में हुई और उनकी इच्छानुसार उन्हें लेबनान में 1932 दफनाया गया. वो एक कलाकार, चित्रकार, कवि, दार्शनिक और लेखक थे. उनकी बहुत सी रचनाओं में से विशेष हैं : The Prophet और  Broken Wings.


Wednesday, 13 January 2016

हिंगलिश हरेंदर की

अपना छोरा हरेंदर हमारी इमली खेड़े की किरकिट टीम का कप्तान था. छुट्टी वाले दिन जितने लड़के इक्कठे होते उनमें से दो कप्तान बन जाते और एक कप्तान हरेंदर ही होता था. बाकी आधे आधे बंट जाते. खेल के नियम भी उसी वक़्त तय हो जाते थे मसलन दस-दस ओवर का गेम रहेगा. बॉल टिप्पेदार दी जाएगी और अगर 'सुर्रा' हुई तो बोल्ड आउट नहीं माना जाएगा. चौधरी साब की दीवार को गेंद ने लुढ़क कर छुआ तो चौक्का, सीधी जा लगी तो छक्का और दीवार पार कर गई तो आउट.
एक दिन एक नया खिलाड़ी शामिल हो गया और दनादन शॉट मारने लगा. एक शॉट दिवार के बाहर हो गई और 'आउट' 'आउट'  का शोर मच गया. पर नया खिलाड़ी हटने को तैयार नहीं था. तंग आकर हमने अपने कप्तान हरेंदर से कहा :
- जरा समझा दे सुसरे ने अंग्रेजी बोल के.
हरेंदर नए खिलाड़ी के सामने डट गया और तब आँख से आँख मिलाकर नूं बोल्या:
- ओ छोरे प्ले प्ले नॉट प्ले. वी प्ले डेली प्ले. यू नॉट प्ले योर फादर नॉट प्ले. गेटआउट !

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छोरे हरेंदर ने बताया की उसे क्लास की एक लड़की बड़ी अच्छी लगती है.
- बस यार कसम ते मैं तो कतई जान दे दूं उस खातर !
- ना तो तैने उसे बताणा तो था?
- सची बता दूं के ? कदी नाराज हो जा ?
- ना ना इब नाराजगी किस बात की ? पर अंग्रेजी में बोलियो इम्प्रेस्सन बढ़िया रहवेगा.
- अंग्रेजी तो मैं जाणु. बोल दूँ के ?
- हाँ हाँ चिंता ना करे. मैं यहीं खड़ा.
तब हरेंदर छोरी ते नूं बोल्या :
- ओये छोरी ! आई डाई ऑन यू. पलीज छोरी यू डाई ऑन मी !

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हरेंदर के गाँव इमली खेड़े में एक शब्द प्रचलित है नम्बरदार. गाँव के बड़े आदमी के लिए इस्तेमाल होता है ये शब्द. हरेंदर भी नम्बरदार कहलाना पसंद करता है. काफी दिनों से ये शब्द दिमाग में घूम रहा था की नम्बर + दार शब्द कैसे बना होगा अंग्रेजी से या फिर हिंदी से या फिर उर्दू मिला कर ? गूगल में खोज की और पूछा:
- 'meaning of  लम्बरदार' तो जवाब आया :
- "Labrador - a big yellow or brown dog" और साथ में बोला की अंग्रेजी का शब्द तो हमने बता दिया और किसी भाषा में पूछो ?
खैर आगे खोज जारी रही. ढूँढने पर पता लगा की मुगलिया फ़ौज में सबसे आगे जो सिपाही झंडा लेकर चलता था उसे आलमबरदार कहते थे याने ध्वज वाहक या Standard Bearer. अब चेन इस तरह से बनी :
आलमबरदार > अलमबरदार > लम्बरदार > नम्बरदार > छोरा हरेंदर.

अपणा गाँव अपणा देस 


Saturday, 9 January 2016

पुतला

किसान ने खेत में बीज बोने के बाद खेत के बीचो बीच एक पुतला खड़ा कर दिया. फिर सामान समेटा और घर की राह ली.
- चलो अब चिड़ियों को ये पुतला डराता रहेगा और बीज सलामत रहेंगे.
कुछ दिनों बाद किसान खेत में दुबारा पहुंचा. पुतले से पूछा,
- अरे तू चिड़ियों को डरा रहा है ना ?
- हाँ हाँ बड़ा मज़ा आता है डराने में. तुझे भी तो आता होगा ?
- अरे चिड़ियों को डराने में क्या मज़ा आता है ? मुझे नहीं आता है.
- तू भी मेरे जितना मज़ा ले सकता है किसान भाई बशर्ते तेरे दिमाग में भी उतना ही भूसा भरा हो !


यह किस्सा खलील जिब्रान की एक कहानी Scarecrow पर आधारित है जो उनके कहानी संग्रह The Madman में प्रकाशित हुआ है. जिब्रान का अरबी नाम जिब्रान खलील जिब्रान था और उनका जन्म लेबनान में 1883 हुआ. 12 वर्ष की आयु में माता पिता के साथ न्यू यॉर्क चले गए थे और वहीं बस गए थे. उनकी मृत्यु न्यू यॉर्क में 1931 में हुई और उनकी इच्छानुसार उन्हें लेबनान में 1932 दफनाया गया. वो एक कलाकार, चित्रकार, मूर्तिकार, कवि, दार्शनिक और लेखक थे. उनकी बहुत सी रचनाओं में से विशेष हैं : The Prophet और  Broken Wings.

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Friday, 8 January 2016

लोहड़ी के लोकगीत

लोहड़ी का त्योहार मकर संक्रान्ति से एक दिन पहले १३ जनवरी को मनाया जाता है। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के आसपास लोहड़ी की ज़्यादा धूम रहती है। १३ जनवरी की शाम आग जला कर कड़कती सर्दी की छुट्टी कर दी जाती है। मूँगफली, रेवड़ी और फुल्ले  याने पापकोर्न बाँटे जाते हैं। साथ ही ढोल की धुन पर गीतों और भंगड़े का आनंद लिया जाता है। लोहड़ी पर गाए जाने वाले लोकगीतों में से कुछ यहाँ प्रस्तुत हैं।


हुल्ले नी माईये हुल्ले
दो बेरी पत्ते झुल्ले
दो झुल्ल पईयां खजूरां
खजूरां सट्टया मेवा 
एस मुँडे दे घर मंगेवां
एस मुंडे दी वोटी निकड़ी
ओ खांदी चूरी कुटड़ी
कुट कुट भरया थाल
वोटी बवे ननांणा नाल
नंनाण ते वड्डी परजाई
मैं कुड़मां दे घर आई
मैं लोहड़ी लैण आई !

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सुन्दर मुंदरिये - होय !
तेरा कौन विचारा - होय !
दुल्ला भट्टी वाला - होय !
दुल्ले धी व्याई - होय !
सेर शक्कर पाई - होय !
कुड़ी दा लाल पटाका - होय !
कुड़ी दा सल्लू पाटा - होय !
सल्लू कौन समेटे - होय ! 
चाचे चूरी कुट्टी - होय !
ओ जिमीदारां लुट्टी - होय !
जिमीदार सुधाए - होय ! 
गिन गिन भोले आए - होय !
इक भोला रै गया - होय !
सिपाई फड़ के लै गया - होय ! 
सिपाई ने मारी इट्ट - होय !
भांवे रो ते भांवे पिट्ट - होय !
सानू दे दे लोड़ी, ते जीवे तेरी जोड़ी

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असी गंगा चल्ले - शावा !
सस सौरा चल्ले  - शावा !
जेठ जेठाणी चल्ले - शावा !
देयोर दराणी चल्ले - शावा !
पियारी शौक़ण चल्ली - शावा !

असी गंगा न्हाते - शावा !
सस सौरा न्हाते - शावा !
जेठ जठाणी न्हाते - शावा !
देयोर दराणी न्हाते - शावा !
पियारी शौक़ण न्हाती - शावा !

शौक़ण पैली पौड़ी - शावा !
शौक़ण दूजी पौड़ी - शावा !
शौक़ण तीजी पौड़ी - शावा !
मैं ते धिक्का दित्ता - शावा !
शौक़ण विच्चे रूड़ गई - शावा !

सस सौरा रोण - शावा !
जेठ जठाणी रोण - शावा !
देयोर दराणी रोण - शावा !
पियारा ओ वी रोवे - शावा !

मैं क्या तुस्सी क्यूँ रोंदे
त्वाडे जोगी मैं बथेरी 
मैंनू द्यो वधाइयां 
त्वाडे जोगी मैं बथेरी - शावा शावा !




Thursday, 7 January 2016

Folk artists

Both these snaps were taken in Dilli Haat, New Delhi.

Devi getting angry 

Devi & her mount lion getting ready to take on the devil 



Monday, 4 January 2016

काली थाली

प्राचीन समय में सेरी नामक शहर में दो व्यापारी रहा करते थे. दोनों गली कूचों में घूम घूम कर कंगन, चूड़ियाँ और सिंगार का सामान बेचते थे. आपस में तालमेल रखने के लिए उन्होंने शहर को दो हिस्सों में बाँट रक्खा था. शहर का बायाँ हिस्सा एक व्यापारी का और दाहिना हिस्सा दूसरे व्यापारी के पास था. पर ये भी तय था की अगर किसी गली में से पहला व्यापारी चक्कर लगा चुका हो तो उसके जाने के बाद दूसरा व्यापारी उस गली में अपना सामान बेच सकता है. अब आप तो जानते ही हैं कि व्यापार में ये सब समझौते करने ही पड़ते हैं वरना आपस में सिर फुटव्वल करने से तो दोनों का ही नुकसान हो जाता है ना ?

एक दिन व्यापारी को गली में आता देख एक छोटी सी लड़की अपनी दादी से लिपट गई और जिद करने लगी कि मुझे चूड़ी दिलवा दो. दादी ने जवाब में सिर हिलाया,
- बिटिया पैसे नहीं हैं तो कैसे लें?
- दादी उसको पैसों के बदले काली थाली दे दो और चूड़ी ले लो बस.
- अरे बिटिया काली थाली पता नहीं वो लेगा भी या नहीं.
- पर दादी आप बात तो करो ना.
दादी ने व्यापारी को बिठाया. व्यापारी ने देखा की दादी पोती गरीब भी हैं और दोनों भोले भाले हैं. दादी ने कहा,
- बिटिया जिद कर रही है और मुद्रा मेरे पास है नहीं. तुम इस थाली के बदले एक चूड़ी दे दो तो ये बिटिया खुश हो जाएगी.
थाली पर चूल्हे के धुंए की कालिख और धूल जमी पड़ी थी. व्यापारी ने हाथ में लेकर देखा. झोले से कसौटी निकाल कर थाली के पीछे रगड़ी तो अवाक् रह गया.
- यह तो सोने की थाली है!
पर उसके मन में खोट आ गया और व्यापारी चालाकी दिखाने लगा,
- अरे इस काली थाली का कुछ मोल नहीं है. बेकार मेरा समय नष्ट कर दिया. इस थाली से तो आधी चूड़ी भी नहीं मिलेगी.
व्यापारी यह कह कर वह चलने के लिए खड़ा हो गया. बुढ़िया और उसकी पोती मन मसोस कर रह गए. पर व्यापारी मन ही मन सोच रहा था कि अगर बुढ़िया दुबारा कहेगी तो इसे एक चूड़ी दे दूंगा. पर सीधी सादी बुढ़िया ने कुछ नहीं कहा. व्यापारी ने सोचा की चलो कल फिर चक्कर लगाऊंगा.

इधर दूसरा व्यापारी अपने इलाके की फेरी लगाने के बाद इस गली की ओर आ निकला. उसे आता देख छोटी लड़की ने दादी को फिर पकड़ लिया,
- दादी इसको काली थाली दिखाओ ये मान जाएगा. इसे दिखा दो ना?
- तू कहती है तो इसे भी दिखा देती हूँ. मानेगा ये भी नहीं तू देख लेना.

व्यापारी ने धुंए सी काली थाली परखी. थाली के पीछे खुरच कर देखा तो हैरान हो गया.
- ये तो सोने की थाली है अम्मां, बोलो क्या लोगी?
- बेटा इसके बदले में जो दे सकता है दे दे. मैं इसे अब क्या करूंगी.
- देखो अम्मां इसके बदले में जो कुछ मेरे पास है मैं दे देता हूँ. साथ में जो मेरी जेब में जो भी सोने चांदी की मुद्राएँ हैं वो भी दे देता हूँ. मुझे नदी पार वापस जाने के लिए नाव वाले को आठ सिक्के देने होंगे मैं केवल वही रख लेता हूँ. बाकी सब कुछ ये रहा.
सौदा निपटा कर उस व्यापारी ने काली थाली झोले में डाली और नाव में बैठ कर नदी पार अपने घर वापस चल पड़ा.

उधर पहला व्यापारी मन ही मन उधेड़ बुन में लगा हुआ था:

- मुझे वो थाली छोड़नी नहीं चाहिए थी. उस काली थाली से कम से कम 50 स्वर्ण मुद्राएँ मिल जाती. बस अब मैं एक निजी दूकान ले लेता और रोज रोज की फेरी लगाने से छुट्टी मिल जाती. मुझे वो थाली छोड़नी नहीं चाहिए थी. अब पता नहीं मिले या ना मिले ? पर बुढ़िया और पोती सीधे से तो हैं. किसी से बात भी नहीं करेंगे. बुढ़िया को मैंने बताया भी तो नहीं की ये सोने की थाली है. उसके लिए तो काली थाली रद्दी है रद्दी. पर मुझे वो थाली छोड़नी नहीं चाहिए थी. इसकी जानकारी तो बस दूसरे व्यापारी को मिल सकती है अगर वो कहीं बुढ़िया की गली में चला गया तो कमबख्त. नहीं नहीं अभी तो शहर के दूसरे हिस्से में भटक रहा होगा सुसरा. और चला गया तो ? मुझे वो थाली छोड़नी नहीं चाहिए थी.

सोचते सोचते उसका सिर घूमने लगा और बदन तपने लगा. उसे पता ही नहीं चला कब वो वापिस फिर बुढ़िया के सामने पहुँच गया.
- लाओ वो थाली दे दो मैं तुम्हें एक चूड़ी दे देता हूँ. तुम भी क्या याद करोगी.
- थाली तो दूसरा फेरी वाला ले भी गया भैया जी.

व्यापारी ये सुन कर घबरा गया. नदी की तरफ दौड़ लगा दी. गिरते पड़ते, हाँफते हाँफते नदी किनारे पहुंचा तो देखा की नाव तो दूसरे किनारे पहुँचाने वाली है और दूसरा व्यापारी उतरने वाला है. वो जोर से चिल्लाना चाहता था पर उसके गले से आवाज़ नहीं निकल पाई. वह नीचे गिरा और वहीं ढेर हो गया.



यह किस्सा एक जातक कथा पर आधारित है और इस किस्से में लालच बुरी बला या फिर Honesty is best policy को दर्शाया गया है. जातक कथाएँ 2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के समय से प्रचलित हुईं. गौतम बुद्ध 35 वर्ष की आयु से लेकर 80 की आयु तक ज्ञान का प्रचार करते रहे. अपने प्रवचनों में अपने जीवन के अनुभव और बहुत सी छोटी छोटी कथाएँ उदहारण के तौर पर बताया करते थे. कुछेक कथाएँ दुसरे अरहंतों की भी हैं. धम्म प्रचार के साथ साथ ये जातक कथाएँ बहुत से देशों - श्रीलंका, म्यामार, कम्बोडिया, तिब्बत, चीन और ग्रीस तक पहुँच गयीं.



Friday, 1 January 2016

आस्तिक और नास्तिक

एक प्राचीन शहर अफकार में दो महाज्ञानी पुरुष रहा करते थे. दोनों के ज्ञान का डंका दूर दूर तक बजता था. परन्तु दोनों महापुरुष एक दुसरे को ज़रा भी ना भाते थे. हमेशा उनकी कोशिश होती थी कि कैसे एक दूसरे को नीचा दिखाया जाए.

उनमें से एक नास्तिक था जो भगवान के अस्तित्व से इनकार करता था और कहता था की भगवान कहीं नहीं है. दूसरा आस्तिक था और भगवान की ही चर्चा करता रहता था.

एक दिन सुबह सुबह दोनों की सरे आम बहस हो गई. दोनों के चेले भी पहुँच गए अपने अपने ज्ञानी गुरुओं को समर्थन करने. घंटों बहस चली कभी नरम तो कभी गरम. कभी एक पक्ष ने शोर मचाया कभी दूसरे ने तालियाँ. कई घंटे गुजर गये तो धीरे धीरे चेले खिसकने लगे. बहस का नतीजा ना निकलता देख थक हार के दोनों महाज्ञानी अपने अपने रस्ते हो लिए.

महाज्ञानी नास्तिक मंदिर पहुंचा, मूर्ति को दण्डवत प्रणाम किया और अपने किये की माफ़ी मांगी. उसने भगवान की आरती की और वो आस्तिक बन गया.

महाज्ञानी आस्तिक अपने घर पहुंचा और अपने सारे धर्म ग्रन्थ बाहर निकल फेंके और उनमें आग लगा दी. अब वो नास्तिक बन गया.


यह किस्सा खलील जिब्रान की एक कहानी The Two Learned Men पर आधारित है जो उनके कहानी संग्रह The Madman में प्रकाशित हुआ है. जिब्रान का अरबी नाम जिब्रान खलील जिब्रान था और उनका जन्म लेबनान में 1883 हुआ. 12 वर्ष की आयु में माता पिता के साथ न्यू यॉर्क चले गए थे और वहीं बस गए थे. उनकी मृत्यु न्यू यॉर्क में 1931 में हुई और उनकी इच्छानुसार उन्हें लेबनान में 1932 दफनाया गया. वो एक कलाकार, चित्रकार, कवि, दार्शनिक और लेखक थे. उनकी बहुत सी रचनाओं में से विशेष हैं : The Prophet और  Broken Wings.