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Tuesday, 2 August 2016

चाय नहीं कॉफ़ी

जनरल मैनेजर बनने के ठीक एक साल बाद नरूला साब रिटायर हो गए. अच्छी पेंशन मिल रही थी इसलिए ड्राईवर अभी भी बरकरार था. सैर सपाटे में काम आ जाता था. दिन में किसी दोस्त यार के पास जाना हो या शेयर ब्रोकर के पास तो गाड़ी खुद चलाने में कोफ़्त होती थी. रिटायर होने के बाद एक नरूला साब ने एक नौकरी ज्वाइन कर ली पर चार महीने भी नहीं चली. बजाए सुनाने के सुननी पड़ती है कम्बखत. पहले के जी एम जैसा रुतबा अब कहाँ. दूसरी नौकरी दो महीने भी नहीं चली. उसके बाद फैसला कर लिया कि अब और नौकरी नहीं करनी.

किसके लिए करनी है नौकरी ? वसंत विहार में चार बेडरूम का फ्लैट और रहने वाले केवल दो प्राणी. बैंक बैलेंस, शेयर्स और सोना काफी है. आराम की ज़िन्दगी है तो पंगा क्यूँ लिया जाए. इकलौती बिटिया पढने गई थी ऑस्ट्रेलिया वहीं उसने नौकरी कर ली और वहीं शादी. पिछले सात साल में एक बार शादी करके आई थी और एक बार नरूला साब पत्नी को लेकर वहां मिलकर आए थे. दिन में एकाध फोन जरूर करती थी वो. हाल चाल पता लगता रहता था. जमाई राजा कभी कभी बात करते थे.

आराम की ज़िन्दगी चल रही थी. सुबह की सैर के बाद नाश्ता, अखबार, फेसबुक वगैरा फिर खाने के बाद एक झपकी. शाम को टीवी या दोस्त या कभी बियर. हफ्ते में दो दिन क्लब, कभी किट्टी और कभी बढ़िया सा पांच सितारा डिनर. और कुछ चाहिए जिंदगी में ?

हाँ चाहिए तो है - एक हमसफ़र. एक दिन नरूला साब से बिना पूछे बिना बताए श्रीमती साथ छोड़ कर स्वर्ग सिधार गईं. दो तीन महीने तक तो महसूस नहीं हुआ क्यूंकि घर पर लोगों का आनाजान था और कागज़ी कारवाई भी पूरी करनी थी. पर फिर घर का सूनापन फील होने लगा. अब बिटिया के फोन आते तो कहती की छोड़ो इंडिया यहीं आ जाओ. एक बार को ख़याल आ जाता कि ठीक कह रही है पर दूसरे ही पल मन बदल जाता. कभी ख़याल आता कि यहाँ की पेंशन में बचत है वहां का पता नहीं. यहाँ दोस्त यार रिश्तेदार हैं वहां पता नहीं. बिटिया समझाती की यहाँ भी बहुत दोस्त बन जाएंगे आ जाओ.

देखते देखते साल गुज़र गया. अब सुबह मेड जैसी चाय नाश्ता देती थी चुपचाप खा लेते थे. लंच डिनर कई बार खुद ही गर्म करना पड़ता. कभी ऊँगली जल जाती कभी दाल गिर पड़ती. कभी दूध फ्रिज के बाहर छूट जाता तो कभी बना हुआ खाना भी पड़ा रह जाता. दिनचर्या सिमट गयी थी और समय किसी किसी दिन रुक जाता था. एक दिन नरूला साब ने टिकट कटा ही लिया.

वहां पहुँच कर देखा कि वहां की जिंदगी में बहुत बदलाव है और काफी खुलापन है. परन्तु किसे बताएं मन की बात ? किसे कहें कि मन लग भी रहा है और नहीं भी ? बिटिया और जमाई सुबह सुबह निकल जाते और देर से आते कई कई दिन बात भी नहीं हो पाती. वीकेंड में सैर सपाटे के प्रोग्राम बन जाते थे. कभी बिटिया के साथ कभी किसी ग्रुप में कभी किसी पेंशनर के साथ. बिटिया ने कई सीनियर्स से मुलाकात करा दी. भारत से गए लोगों के कई क्लबों में परिचय करा दिया. लेकिन राजा तो आप तभी होगे जब प्रजा होगी अर्थात अपनी बात सुनाएं किसे ? कभी-कभी ये कश्मकश चेहरे पर भी झलक जाती थी. बिटिया भांप रही थी कि पापा के मन में कुछ उलझन है.
एक दिन डिनर पर बातों ही बातों में बिटिया और जमाई राजा ने नरूला साब को चौंका दिया. बिटिया बोली,
- आपके लिए श्रीमती ललिता नायर कैसी रहेगी ?
- क्या मतलब ?
- शादी और क्या ? या लिव-इन ?
- बिलकुल ठीक रहेगी, जमाई जी ने कहा.
जोर का झटका जोर से लगा और नरूला साब की बोलती बंद हो गयी. जुबान से 'हाँ' निकलने में तीन महीने लग गए.

नए जोड़े के लिए बिटिया और जमाई ने सारा बंदोबस्त करा दिया. शादी की सिम्पल सी कारवाई के बाद दोनों एक छोटे से फ्लैट में शिफ्ट हो गए. पहली सुबह श्रीमती ललिता नायर नरूला ने गुड मोर्निंग के साथ कॉफ़ी पेश की.
- यार चाय नहीं है ?
- अब से कॉफ़ी ही मिला करेगी. चाय पीनी हो तो खुद बना लेना !

गरमा गरम कॉफ़ी 


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