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Saturday, 16 July 2016

बारिश

कॉलेज की पढ़ाई के उपरान्त नई सरकारी नौकरी लग गई थी. दफ़्तर भी कनॉट प्लेस में था इसलिए दिन भर रौनक़ ही रौनक़. ख़ास बात यह भी थी कि चाहें तो भीड़ में भी एकान्त ढूँढ लें या फिर भीड़ का हिस्सा बन जाएँ.

एकाकी स्वभाव-वश शाम को अवकाश के बाद कंधे पर झोला लटकाये पैदल ही दाये बायें निकल जाया करती थी. घर से दफ़्तर का समय बस से मात्र ८-१० मिनट का था तो बस पकड़ने की कोई जल्दी नहीं होती थी. कभी पैदल जनपथ, कभी हनुमान मंदिर या कभी बंगला साहिब की ओर निकल पड़ती थी. वहां से भी घर के लिए सवारी मिल ही जाती थी. याने की ज़िंदगी बिना भागम-भाग के मधुर गति से आगे बढ़ रही थी.

अगस्त का महीना था पर तारीख़ तो याद नहीं शायद १५ अगस्त के आस पास थी. मौसम ख़ुशमिज़ाज था कुछ काले बादल आसमान में तैर रहे थे. पैदल ही घूमते-घामते संसद भवन होते हुए इंडिया गेट के बस स्टैण्ड पहुंची. बस के इंतज़ार में वहां सामान्य से अधिक भीड़ थी. कुछ समय यूँ ही बस की इंतज़ार में बीत गया और इधर बूंदा-बांदी होने लगी. तभी पास मे आकर एक फटफटिया रूकी. पहले तो ध्यान नहीं दिया पर जब सवार ने हैलमैट उतारा तो पता लगा - अरे मिस्टर एच ? ये यहाँ क्यों ? शायद बारिश से बचने के लिये रुके हों या भीड़ में इनका कोई परिचित होगा. यह सोच कर नज़रें घुमा ली. पर उत्सुकता वश नज़रें फिर उस तरफ चली गईं. मिस्टर एच से नज़रें मिलते ही फट से मुख़ातिब हुए, 
- लगता है काफी देर से इंतज़ार कर रही हो. चलो बैठो मैं छोड़ देता हूँ.
लग रहा था कि फटफटी नई है ओर सवार नौसिखिया. सो टालने के लिए कहा 'धन्यवाद'. तो जवाब आया:
- जल्दी बैठो ये पेट्रोल नहीं मेरा दिल जल रहा है हाहाहा !
- अच्छा तो ये धुआं दिल जलने से है ! सवारी के साथ गाड़ी चलानी आती भी है क्या ?
- धग धग की आवाज़ तो सुनो, कहते हुए फटफटीया को जोर से रेस दे दी.
- अरे सब कुछ अंडर कण्ट्रोल है. जल्दी बैठो.
आस पास के कुछ लोग तिरछी नज़र रख रहे थे और लैला - मजनूँ की वार्ता का मजा ले रहे थे. इसलिए बात और ज्यादा न बढ़ाते हुए पिछली सीट पर ड्राइवर से कुछ दूरी रख कर बैठ गई.

विजय चौक के पास बारिश तेज़ हो गई. मिस्टर एच. ने फटफटीया का रूख फ़व्वारे के नीचे बने रेस्तराँ की तरफ कर दिया. बाइक कोने में खड़ी करके रेस्तरां के अन्दर भागे. वहाँ पर भीगे चेहरे को साफ़ किया और एक कोने वाले टेबल पर जा बैठे.

रेस्तरां में मद्धम सी रोशनी थी, बाहर भी अँधेरा और तेज़ बारिश. सिहरन सी हो गयी. इस नई स्थिति में मन में उथल पुथल शुरू हो गई. इसके साथ क्यों आई ? साफ  मना क्योँ नहीं किया ? पता नहीं कैसा व्यक्ति है ? घर देर से पहुंची तो माँ क्या कहेगी ? वेटर कैसे घूर रहा है ?

तभी वेटर ने पुछा,
- चाय या ठंडा ?
मिस्टर एच. ने एपल जूस की तारीफ करते हुए तपाक से दो ग्लास का आर्डर कर दिया. काफी देर ऐपल जूस की चुस्कियो के साथ इधर-उधर की बातें जो सामान्यतः दो अजनबियों के बीच होती हैं चलती रही. समय का कुछ ध्यान न रहा. जैसे ही बारिश रुकी मैंने पर्स उठा लिया.

बैरा बिल ले आया मिस्टर एच. ने तपाक से बिल पकड़ लिया. जेब से पर्स निकाला और खोला. अब मिस्टर का सारा ध्यान पर्स में चला गया. पूरे पर्स की तलाशी लेने के बाद चेहरे की रंगत बदलने लगी. पतलून की साइड और पीछे के खीसे देखने के बाद भी कुछ नहीं निकला. अब क़मीज़ की जेब टटोली और तब तक चेहरा लाल सुर्ख हो गया. खैर हमने भी भाँप लिया की जेब खल्लास थी. मिस्टर की खिसियाहट भरी मुस्कान पर हंसी आ गयी. हँसते हँसते बिल मिस्टर के हाथ से ले लिया और बैरे को पैसे दे दिए. बैरे ने मिस्टर एच. को देखा फिर उनकी फटफटिया को देखा और फिर व्यंग्य भरी मुस्कान फैंकी जैसे कह रहा हो की,
- तेरे जैसे कई देखे हैं !

जाहिर था कि मिस्टर एच. में मजनूं की आत्मा प्रवेश कर गई थी. और इस दीवानगी में फटफटिया के अलावा सब कुछ आउट ऑफ़ कंट्रोल था. इतना तो आभास हो गया था की पिछली सीट की सवारी की तलाश चल रही थी और खाली सीट भरने का इरादा अटल लग रहा था.

बारिश रुक चुकी थी और आसमान भी साफ़ हो गया था. मिस्टर मजनूँ ने झेंपते हुए कहा,
- कभी कभी ऐसा भी हो जाता है ! और फटफटिया स्टार्ट की. और मैं फिर से पिछली सीट पर सवार घर की ओर निकल पड़ी.
पर मुझे साफ़ आसमान की तरह ये भी साफ़ हो गया था की जल्द ही चाय पे बुलावा आने वाला है.

लम्बे सफ़र की शुरुआत 
-- गायत्री, नई दिल्ली.

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