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Friday, 29 July 2016

कांवड़ यात्रा 2016

सावन के महीने के साथ ही तैयारी कांवड़ की. कांवड़ लेकर हरिद्वार जाना और गंगाजल लाना कभी पैदल हुआ करता था. अब तो ये कार्य हर तरह के वाहन में भी होने लग गया है. एक अनुमान के अनुसार 2015 में एक करोड़ से अधिक लोगों ने हरिद्वार की कांवड़ यात्रा की. इस बार संख्या कहीं ज्यादा हो सकती है. कांवड़ यात्रा का एक प्रमुख पड़ाव है पूरा महादेव का मंदिर जहाँ कांवड़िये शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं. यह मंदिर मेरठ से करीब 25 किमी दूर बागपत जिले के बालैनी क्षेत्र में है. मंदिर की स्थापना से जुड़ी मान्यता संक्षेप में इस प्रकार है :

मंदिर के आसपास का इलाका पुराने समय में कजरी वन कहलाता था. इस वन में ऋषि जमदाग्नि अपनी पत्नी रेणुका तथा परिवार के साथ रहते थे. एक दिन ऋषि की अनुपस्थिति में राजा सहस्त्रबाहू शिकार पर आये और रेणुका को उठवा कर ले गए. पर सहस्त्रबाहू की रानी ने - जो रेणुका की बहन थी, मौक़ा पाते ही रेणुका को महल से निकाल कर वापिस आश्रम भिजवा दिया. परन्तु जमदाग्नि इस बात पर क्रोधित हो गए और रेणुका को आश्रम से निकाल दिया. पुत्रों को आदेश दिया की रेणुका का सर धड़ से अलग कर दिया जाए. तीन पुत्रों ने मना कर दिया जिस पर ऋषि जमदाग्नि ने उन्हें श्राप देकर पत्थर बना दिया. चौथे ने जिसका नाम राम था, आज्ञा मान ली और माँ का वध कर दिया. 

परन्तु राम को इस कर्म से बड़ी पीड़ा और ग्लानि हुई. प्रायश्चित करने के लिए राम ने हिंडन नदी के किनारे शिवलिंग की स्थापना की और तपस्या शुरू कर दी. घोर तपस्या के बाद भगवान शिव प्रकट हुए. राम ने माँ को जीवित करने का आग्रह किया जो पूरा हुआ. भगवान ने दुष्टों का नाश करने के लिया एक परशु या फरसा प्रदान किया. इस फरसे से राम ने राजा सहस्त्रबाहू और अन्य दुष्टों का सफाया कर दिया और उनका नाम परशुराम पड़ गया. माना जाता है की परशुराम ने कांवड़ में गंगा जल लाकर सावन के प्रथम सोमवार को शिवलिंग का अभिषेक किया जिससे कांवड़ परम्परा शुरू हुई. 

आजकल चल रही कांवड़ यात्रा के कुछ फोटो प्रस्तुत हैं जो ज्यादातर मेरठ के आसपास राष्ट्रिय राजमार्ग NH 58 पर लिए गए हैं :      

पूरा महादेव या परशुरामेश्वर मंदिर 
पूरा महादेव मंदिर का शिवलिंग

चाय पी के फिर चलेंगे 
गंगाजल की गगरी नीचे रखना मना है इसलिए स्टैंड बनाए गए हैं 
शिवलिंग और मंदिर गाड़ी की छत पर
महिलाएं और बच्चे भी पैदल यात्रा में शामिल
आसान तो कुछ भी नहीं है
 कांवड़ ले जाने वाले भोला या भोली कहलाते हैं 
 मेरठ की सड़कों पर
नए नए मुखोटों के साथ 
बम भोले   
एक और मुखौटा और पंजे  



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