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Friday, 11 March 2016

गौतम बुद्ध के पद चिन्हों पर - 2

गौतम बुद्ध का जन्म 2500 साल पहले शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी वन में हुआ. उनके पिता राजा शुद्धोधन थे और माँ का नाम माया था. माँ का निधन बेटे के जन्म के सात दिन बाद ही हो गया था इसलिए पालन पोषण मौसी महाप्रजावती (जो राजा शुद्धोधन की दूसरी रानी थी) ने किया. जन्म के समय उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया था. सिद्धार्थ के जन्म के बाद राज्य के 8 प्रमुख ब्राह्मणों ने राजा से कहा कि ये बालक या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या फिर महाज्ञानी संत. राजा की इच्छा थी की राजकुमार सिद्धार्थ आगे चल कर सम्राट बने इसलिए भविष्य में राज्य का कार्यभार सँभालने के लिए उन्हें युद्ध विद्या, हथियारों और धर्म ग्रंथों की शिक्षा दी गई. राजकुमार के लिए हर तरह की सुख सुविधा और विलासिता के प्रयोजन किये गए. 16 बरस में उनका विवाह यशोधरा से हुआ और बाद में पुत्र राहुल का जन्म हुआ.

राजा चाहते थे की सिद्धार्थ राजकाज चलाए और महल छोड़ कर संत न बन जाए. इसलिए राजा ने सिद्धार्थ के लिए तीन सुंदर महलों का निर्माण कराया जहाँ वे तीन अलग अलग मौसमों में रहते थे. उनकी सेवा में कोई भी बूढ़ा सेवक या बूढ़ी सेविका नहीं रखी जाती थी. सभी तरह की सुख सुविधाएं और मनोरंजन के साधन महल में ही मुहैय्या करा दिए जाते थे ताकि बाहर जाने की आवश्यकता ना पड़े. उनके पीछे एक सेवक हमेशा एक छत्र लेकर चलता था ताकि उन पर धूप या बारिश ना गिरे. पर फिर भी राजकुमार सिद्धार्थ ने एक दिन महल और परिवार त्याग दिया.

ऐसा क्यों किया एक राजकुमार ने?

एक दिन महल से बाहर राजकुमार सिद्धार्थ घूमने निकले तो उन्हें पहली बार एक बूढ़ा व्यक्ति दिखाई पड़ा. उसके दांत नहीं थे, बाल उड़ चुके थे और चेहरे पर झुर्रियां पड़ी हुई थी और वो लाठी लेकर चल रहा था. उन्हें लगा कि क्या मैं भी ऐसा ही हो जाऊँगा? दूसरी बार जब राजकुमार बाहर निकले तो एक रोगी देखा. चेहरा पीला पड़ा हुआ, साँस मुश्किल से आ रही थी और चला भी नहीं जा रहा था. राजकुमार सिद्धार्थ ने सोचा क्या ऐसा सभी के साथ होता है? ऐसा क्यूँ होता है? तीसरी बार महल से बाहर निकलने पर राजकुमार ने पहली बार एक अर्थी देखी जिसके पीछे पीछे परिजन रोते बिलखते जा रहे थे. राजकुमार सोच में पड़ गए कि क्या राजा और रंक सभी मर जाते हैं? चारों ओर दुःख फैला हुआ है और मैं विलासिता में रह रहा हूँ? चौथी बार महल से बाहर निकले तो कमंडल लिए हुए एक प्रसन्न साधु देखा. उनके मन में विचार आया कि इस साधु की तरह से स्वतंत्र रहना कितना अच्छा है!

इन घटनाओं की देख कर सिद्धार्थ का मन बैचैन रहने लगा था. एक दिन उन्होंने रात के समय रथ निकलवाया और जंगल की ओर प्रस्थान कर दिया. जंगल के सिरे पर सिद्धार्थ ने बाल काट दिए, राजसी गहने कपड़े उतार कर चन्ना रथवान को दे दिए और उसे वापिस भेज दिया. एक कमंडल और तीन वस्त्रों में जीवन के रहस्य की खोज में निकल पड़े. उस समय उनकी उम्र 29 साल की थी.

चलें सत्य की खोज में 

-----क्रमशः जारी रहेगा 
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