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Monday, 7 March 2016

गौतम बुद्ध के पद चिन्हों पर - 1

काफी बरस पहले शायद 1993 में स्वर्गीय श्री एस.एन. गोयनका जी द्वारा तिहाड़ जेल, नई दिल्ली में कैदियों के लिए विपासना कैम्प की शुरूआत की थी. उस वक़्त के अखबारों में उस विपासना कैम्प की चर्चा हुई और फिर घर पर भी. तब मुझे ऐसा लगा था कि गोयनका जी कोई मनोवैज्ञानिक होंगे और कैदियों को 'विपासना' द्वारा सुधारने की कोशिश कर रहे होंगे. हमारे जैसे लोगों को विपासना से क्या लेना देना. बात आई-गई हो गई.

रिटायरमेंट के बाद समय था तो फिर से विपासना के बारे में इन्टरनेट पर खोजबीन शुरू की. पता लगा कि विपासना या विपश्यना तो मैडिटेशन या ध्यान या समाधि लगाने की एक प्राचीन विधि है जिसे गौतम बुद्ध ने पुनर्जीवित किया था और इसी विधि को अपनाकर निर्वाण का रास्ता खोज निकाला. विपासना शब्द गूगल करने से बहुत सी जानकारी ले सकते हैं. विपासना शिविर की व्यवस्था भारत और विश्व के बहुत से शहरों में है उसकी जानकारी भी ले सकते हैं.

विपासना पाली भाषा का एक शब्द है और विपश्यना संस्कृत का. विपश्यना का शाब्दिक अर्थ तो है अच्छी तरह से देखना या ठीक से देखना. जो जैसा है उसे ठीक वैसा ही देखना ना घटाना ना बढ़ाना. याने reality check.
पहले समय में कहा जाता था की सूरज पूर्व में 'उगता' है और पश्चिम में 'डूबता' है. पर बाद में खोज-बीन द्वारा यह सत्य पाया गया कि सूरज भी घूम रहा है और धरती भी सूरज की परिक्रमा कर रही है. इसलिए सूरज का पूर्व में 'उगना' और पश्चिम में 'डूबना' सही नहीं बल्कि कल्पना है.

आज के मनुष्य का शरीर, उसकी इन्द्रियां, शरीर की जरूरतें और मन में आते विचार वैसे ही हैं जैसे बुद्ध के समय में या उनसे भी पहले थे. मन में लगाव, राग-द्वेष, इर्ष्या, भय, लालच, आसक्ति, गुस्सा और प्रतिशोध की भावनाएं वैसी ही हैं. आज भी मन की इच्छा न पूरी होने पर हम दुखी होते हैं, आज भी अनहोनी से भय लगता है और आज भी अपनों से बिछड़ने में दुःख घेर लेता है. सब कुछ ठीक चल रहा हो तो अचानक नई समस्या बिन बुलाए आन खड़ी हो जाती है. और कुछ नहीं तो सफ़ेद बाल निकल आना या प्रमोशन ना होना ही ब्लड प्रेशर बढ़ा देता है.

और ये समस्याएँ केवल मेरी या आपकी नहीं हैं बल्कि हरेक की हैं. हर कोई इन्हीं में उलझा हुआ है. और इन समस्याओं के आने का कारण कोई ख़ास उम्र, या ख़ास स्थान या घटना या ख़ास व्यक्ति नहीं है बल्कि ये एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. अंतर्मन की ये प्रक्रिया ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेती. एक के बाद एक उलझनें अंतर्मन में जमा होती जाती हैं और परेशान करती हैं.

और इसके साथ ही शुरू हो जाती हैं धार्मिक गुरुओं और स्थानों की तलाश जहाँ से कुछ सुकून मिल सके. कभी मन की शांति मिल भी जाती है कभी नहीं भी और कभी कुछ देर के लिए. और कभी ऐसा भी हो जाता है कि गुरुजी भी घोटाला कर जाते हैं.
निकले तो थे खुशी ढूंढने पर दुःख पीछा करने लगे. इस पर कपिल कुमार की लाइनें याद आ गई:
'हंसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है,
कोई हमदर्द नहीं दर्द मेरा साया है!'

हंसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है 



----- क्रमशः जारी रहेगा.                                                                               

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