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Saturday, 30 May 2015

भगदड़

Two things are infinite: the universe and human stupidity. And I am not sure about universe - Albert Einstein


भारत में मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और चर्चों की संख्या के कोई सरकारी आँकड़े नहीं मिलते। इन इमारतों की अलग से रजिस्टर करने की कोई प्रथा नहीं है न ही कोई नियम है। चर्च की संख्या हज़ारों में हो सकती है क्यूँकि अंग्रेज़ों के जाने के बाद कोई विशेष बढ़ोतरी नहीं हुई होगी। पर मसजिदें काफ़ी ज्यादा होंगी शायद लाखों में हों। मंदिरों की संख्या शायद दस लाख से ऊपर ही होगी।

भारत में छै लाख से ज्यादा गाँव हैं, पाँच हज़ार छोटे शहर हैं और चार सौ बड़े शहर हैं और इन सब में सवा सौ करोड़ लोग समाए हुए हैं। इतनी बड़ी जनसंख्या और भौगोलिक फैलाव वाले देश में दस पंद्रह लाख मंदिर ज्यादा नहीं हैं। चाहे बिजली पानी सब तक न पहुँचा हो पर धर्म हर नुक्कड़ हर गली में किसी न किसी रूप में पहुँचा हुआ है। और धर्म की विभिन्नता के साथ देश के कोने कोने में कई तरह की मान्यताएं, कर्म काण्ड, पूजा पाठ की विधियाँ, भ्रांतियाँ, जादू टोने और अंधविश्वास भी ख़ूब पहुँचे हुए हैं। बाबा, गुरू, गुरुदेव और गुरूघंटाल भी दूर दूर तक फैले हुए हैं।

फ़िल्म इंडस्ट्री, बैंकिंग इंडस्ट्री, सीमेंट इंडस्ट्री की तरह धार्मिक इंडस्ट्री भी चल रही है। भक्तों और अंधभक्तों की भारी भीड़ है। दान देने वालों की कमी नहीं क्यूँकि इस इंडस्ट्री में काले या सफेद धन का झंझट नहीं है। बिचौलियों की कमी नहीं है। साथ ही आम आदमी की ख़्वाहिशों में कमी नहीं है इसलिए इस इंडस्ट्री के अच्छे दिन चल रहे हैं। 

धार्मिक संगठन हैं जिसमें और इंडस्ट्री की तरह CEO हैं, जनरल मैनेजर हैं, मैनेजर हैं, सफ़ेदपोश वर्कर हैं और नीलपोश मज़दूर भी हैं। किताबें, मैगज़ीन, वीडियो बनते और छपते हैं। चूरन, दवाइयाँ, तेल और साबुन भी बनवाए जाते हैं। जन्म कुण्डली, हस्त रेखा और ग्रह जनता के दिमाग़ को घुमा रहे हैं। टीवी चैनल हैं और अख़बारों में विज्ञापन हैं। पर कभी कभी इस इंडस्ट्री में भी भूचाल आ जाता है। 

नीचे दिए गए आँकड़े इंटरनेट से लिए गए हैं। इस तरह के आँकड़े और भी होंगे। घायल भी बहुत हुए होंगे और दुर्घटना के कारण भी रहे होंगे। हर दुर्घटना के बाद जांच पड़ताल भी हुई होगी और कुछ मुआवज़ा भी दिया गया होगा और फ़ाइलें रद्दी में फेंक दी गई होंगी :

- 03-02-1954 कुम्भ मेले में भगदड़ मच गई और लगभग 800 लोग मरे। 
- 23-11-1994 गोवारी आदिवासियों पर नागपुर पुलिस ने लाठी चलाई और भीड़ में भगदड़ मच गई। 114 लोग मारे गए। 
- 15-07-1996 भगदड़ की दो वारदातें हुईं : हरिद्वार में 21 लोग मारे गए और उज्जैन में 39 लोग। 
- 14-01-1999 मकर ज्योति के दिन पामबा, केरल में भगदड़ मच गई जिसमें 53 लोग मरे। 
- 25-01-2005 मंधेर देवी मंदिर ज़िला सतारा, महाराष्ट्र में पूर्णिमा के दिन मची भगदड़ में 291 लोगों की जानें गई। 
- 03-08-2008 नैना देवी मंदिर, हिमाचल प्रदेश में भगदड़ के कारण 146 तीर्थ यात्री मारे गए। 
- 30-09-2008 चामुण्डा देवी मंदिर जोधपुर, राजस्थान में भगदड़ मच गई । 224 लोगों की जानें गई। 
- 04-03-2010 क्रिपालु महाराज आश्रम, कुण्डा, ज़िला प्रताप गढ़ उत्तर प्रदेश में भगदड़ के कारण 63 लोग जान गवाँ बैठे। 
14-01-2011 मकर ज्योति के दिन पुल्लूमेदू , सबरीमाला, केरल में भगदड़ मच गई और 106 लोग मारे गए। 
- 24-09-2012 सत्संग देवघर, झारखंड में हुई भगदड़ में 12 लोग मारे गए। 
- 13-02-2013 कुम्भ मेला इलाहाबाद में भगदड़ मची और 36 लोग मारे गए। 
- 13-10-2013 नवरात्रों में पुल पर जो रतनगढ़ माता मंदिर के नज़दीक है, भगदड़ मच गई और 115 लोग जान गवाँ बैठे। 
- 08-01-2014 मालाबार हिल, मुम्बई में सैयदना मोहम्मद बुरहान्नुद्दीन के अंतिम दर्शन के समय भगदड़ में 18 लोग मरे।
- 03-10-2014 दशहरे के मेले में गांधी मैदान पटना में भगदड़ मची और 32 लोग मारे गए। 

इनक्वायरी कमीशन तो इस पर भी बैठना चाहिए की किस भ्रम में थे ये ग़रीब मरने वाले ?
क्या इच्छा या मान्यता लेकर जा रहे थे ये लोग और क्यूँ ? 
किसने बरगलाया इन्हें कि इन्हीं मंदिरों में जाकर क़िस्मत चमकेगी ?

बिना पुरुषार्थ के कुछ होने वाला नहीं है। बिना अपने अंदर झाँके ज्ञान मिलने वाला नहीं है। 

अंधेरे से उजाले की ओर चलें 


Thursday, 28 May 2015

चाय, कॉफ़ी और सेल्फी

    Travelling - it leaves you speechless then turns you into a storyteller - Ibn Battuta

आजकल लम्बी यात्रा करना इतना मुश्किल नहीं है जितनी की इब्ने बतूता ( जन्म 1304 - देहान्त 1377, मोरक्को। जीवन के सात साल बतूता ने भारतीय उप महाद्वीप में गुज़ारे ) के समय थी। आजकल यात्रा का कोई भी साधन हो बीच बीच में ढाबे, होटल या स्टेशन आ जाते हैं और आप यात्रा ब्रेक कर सकते हैं। साथ ही चाय कॉफ़ी ले कर ताज़ा दम हो सकते हैं। 

हालाँकि चाय, कॉफ़ी और कोल्ड ड्रिंक फिरंगियों की देन हैं पर दैनिक जीवन में हवा और पानी की तरह शामिल हो चुकी हैं। ख़ास तौर से यात्रा के दौरान इनके बग़ैर गुज़ारा नहीं है। अब इनमें चाहे कैफीन हो या कोई दूसरी नशीली चीज़ हो पर चाय कॉफ़ी के बग़ैर गाडी चलती नहीं। छाछ, लस्सी और नींबूपानी अब निचली पायदान पर हैं। 

और जब से मोबाइल में कैमरा आया है तो चाय कॉफ़ी के साथ सेल्फी का नशा भी चढ़ गया है। नमूने के तौर पर :

एलेप्पी होटल, केरल। दोसा और इडली के नाश्ते के साथ गरमा गरम फ़िल्टर कॉफ़ी का मजा ही कुछ और है। बड़ा अच्छा स्वाद, ख़ुशबू और स्फूर्ती देने वाली है ये कॉफ़ी। भारत के दो हिस्से हैं एक उत्तर भारत जहाँ रेलगाड़ी में आवाज आती है 'चाय चाएय्या' दूसरा दक्षिण भारत जहाँ रेलगाड़ी में आवाज आती है ' कोपी कोपीय्या' 

आगा खान पैलेस पुणे। सुबह जल्दी पहुँच गए पैलेस देखने पर उस वक़्त टिकट बूथ तो खुला नहीं था पर चाय का बूथ खुला था। ऐसे में चाय की चुस्की लेते लेते ही टाइम पास हो जाता है  

राजस्थान सरकार का मिडवे होटल जो जयपुर-दिल्ली के बीच में है। नाश्ते में बढ़िया कॉफ़ी पेश की गई तभी तो चेहरे पर मुस्कराहट आ गई !

हथगढ फ़ोर्ट रिसोर्ट, शिरड़ी के नज़दीक। महाराष्ट्र में भी कॉफ़ी का काफ़ी प्रचलन है





Wednesday, 27 May 2015

Long drive to Delhi : 39 - Luxmi Vilas Palace, Vadodara ii of ii

From Shirdi we continued our journey in Alto 800 towards Surat via Dang. After overnight stay in Surat we proceeded to Vadodara and we found it to be a beautiful historical city.

Baroda or Vadodara is located on the banks of river Vishwamitri about 130 km from Gandhi Nagar, capital of Gujrat. The city has had various names as Vadpatraka (leaves of banyan tree) or Vadodara. English travellers called it Brodera. In 1974 it was officially named as Vadodara. Well connected with rest of the country, it is third largest city of Gujrat.

Baroda state or province or area had been under Gupta dynasty, Chalukya dynasty & Solanki dynasty. It came under Sultans in 1297 who were later overthrown by Mughals. In 1721 it came under the rule of Gaekwads of Maratha Confederacy & later under Gaekwad dynasty as an independent state. It continued under Gaekwads till 1949 when it was merged in to Indian Union.

Rule of Maharaja of Baroda state Sir Sayajirao Gaekwad III (1863 - 1939 ) is considered to be golden period in the history of Baroda. During his reign many institutions & buildings including Laxmi Vilas Palace came up. Some photos:

Beauty tames the beast

Intricate design on the ceiling & walls

Back side of the palace which faces Peacock Garden

In the Peacock Garden lawns

Barasinghas

Porch towards the lawns


Old guns gathering rust near Museum inside the palace complex

Along the walls of Luxmi Vilas Palace complex lives a commoner


More photos of the Palace are available in Part i on the following link -

 http://jogharshwardhan.blogspot.com/2015/01/long-drive-to-delhi-38-vadodara-i-of-ii.html








Sunday, 24 May 2015

सुबाथू के सितारे

शिमला हिल्स में बसा सुबाथू छोटा सा लगभग दो सौ साल पुराना कैन्ट है जो अब जिला सोलन, हिमाचल प्रदेश का हिस्सा है। सुबाथू क़रीबन 4500 फ़ीट ऊँचा है और शिमला से 60 किमी दूर, ठंडा और शांत पहाड़ी इलाक़ा है। वहाँ के बच्चे भी उसी तरह से शांत और सुंदर लगे। भारी बस्तों के बावजूद पहाड़ी स्कूलों में फुर्ती से ऊपर-नीचे भाग रहे थे। और एक हम थे जो हफ़्ते भर के स्टे में घुटनों की मालिश ही करते रहे ! 

इन सभी बच्चों उज्जवल भविष्य के लिए आशीर्वाद और शुभकामनाएँ। सुबाथू के होनहार सितारों के कुछ चित्र :

चैल या चायल या Chail समुद्र तल से 2250 मीटर ऊँचा है। चैल से थोड़ा सा और ऊपर महाकाली मंदिर में बच्चे 

 महाकाली मंदिर में 
लोअर बाज़ार सुबाथू में

सुबाथू-धर्मपुर रोड पर सुबह आठ बजे का द्रश्य 

सुबाथू बाज़ार दोपहर में स्कूल से लौटते बच्चे 


Wednesday, 20 May 2015

Rainbow in Subathu, Shimla Hills

Subathu town is part of Solan district & is located on Shimla Hills. And Shimla Hills are part of Shivalik Range of Himalayas. Subathu is 66 km from Chandigarh via Kalka & Dharampur & is at a hight of over 4000 ft. It was unusual to have rain in May. But it did rain in the afternoon & resulted in half rainbow which lasted for few minutes. Some pics:

Dark clouds in the afternoon 
Colours of nature
Sun comes out



Tuesday, 19 May 2015

मेरठ का एक गाँव गगोल, 1857 और दशहरा

मेरठ शहर के दक्षिण में लगभग बीस किमी दूर है गगोल गाँव। गाँव की कुछ ज़मीन प्रस्तावित मेरठ एअरपोर्ट में चली जानी है और स्थानीय लोग मुआवज़े के मोटे मोटे चेकों की इंतज़ार में हैं !  गाँव बड़ा और सम्पन्न नजर आता है। दो बैंक हैं, मोबाइल सिगनल टावर है, बड़े मकान व बड़ी गाड़ियाँ काफ़ी संख्या में हैं परन्तु स्वच्छता की कमी है। खुली नालियाँ, टूटी सड़कें और लाल ईंटों की टेढ़ी मेढ़ी गलियाँ आपका स्वागत करती हैं। पर उत्तर प्रदेश के ज़्यादातर गांवों से बेहतर है। गाँव में ज़्यादातर गुर्जर हैं और उनके अलावा जाट, मुस्लिम और अन्य परिवार भी हैं। फ़ौज और खेती रोज़गार के मुख्य साधन हैं। कॉलेज या कोई बड़ा अस्पताल नहीं है। 

गगोल गाँव का एक ऐतिहासिक महत्व है। यहाँ के लोगों ने 1857 के 'विद्रोह' में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। गगोल, लिसाडी, मुरादनगर और नूरनगर के क्रांतिकारियों ने झंडा सिंह उर्फ़ झंडू दादा के नेत्रत्व में में गाँव के नज़दीक एक अंग्रेज़ी कैम्प को नेस्तानाबूद दिया। अंग्रेज़ों ने पलटवार की तैयारी की और मेरठ शहर के कोतवाल बिशन सिंह को गाइड नियुक्त किया। बिशन सिंह का भाई राजा तुलाराव रिवाड़ी का क्रांतिकारी नेता था। बिशन सिंह भी क्रांति से प्रभावित थे और फौरन हमले की ख़बर किसी तरह गाँव तक भिजवा दी। कोतवाल बिशन सिंह ने अंग्रेज़ी टुकड़ी को जानबूझ कर देर करवा दी। अंग्रेज़ों ने तीन जून 1857 के दिन गगोल और आसपास के गाँवों पर हमला बोल दिया पर लोग तब तक भाग चुके थे। गाँवों को तहस नहस कर के आग लगा दी गई। कोतवाल बिशन सिंह हरियाणा की ओर भाग निकले। बाद में वहाँ नारनौल में अंग्रेज़ों के हाथ मारे गए। इस घटना का वर्णन मेरठ गजट में यूँ लिखा गया :

" 174 Meerut Dietrict.
Carabineers had gone out with the Collector to punish the villages of Gagaul^ Sisari and Muradnagar to the south ofMeerut, for having stopped communications along the Agra road. The Wllages were surrounded and burnt, but all the inhabitant? had escaped owing to the treachery of Bishan Singh, the kotwal of Meerut, who subsequently joined the rebels, ^e "

कुछ दिनों बाद फिरंगियों ने गगोल पर फिर हमला किया और विद्रोह के अपराध में नौ लोगों को गिरफ़्तार कर लिया। इन पर बग़ावत का मुक़दमा चला और फाँसी की सजी सुना दी गई। 1857 में दशहरे वाले दिन इन्हें फाँसी पर लटका दिया गया। इनके नाम हैं : राम सहाय, घसीटा सिंह, रम्मन सिंह, हरजस सिंह, हिम्मत सिंह, कढेरा सिंह, शिब्बा सिंह बैरम और दरबा सिंह। 

गाँव के पास एक पीपल के नीचे इन लोगों की समाधियाँ बना दी गईं जहाँ हर दशहरे पर इन्हें श्रद्धांजली दी जाती है। और इसीलिए 1857 से अब तक गगोल गाँव में दशहरा नहीं मनाया जाता। इस रीत में केवल एक छूट दी जा रही है की अगर दशहरे वाले दिन कोई बच्चा पैदा होता है तो दशहरा मना लिया जाता है। सरकारी तौर पर गगोल को कोई अलग से दर्जा या सहूलियत नहीं मिली हुई है। एक अधूरा स्तम्भ दिखाया गया की सरकार कोई स्मारक बना रही है पर काम ठप्प पड़ा है। इस लेख के लिए कुछ जानकारी गांव के बुज़ुर्गों ने दी और कुछ इंटरनेट से ली गई। गाँव की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं :


"शहीदों की चिताओं पर हर बरस लगेंगे मेले, वतन पर मिटने वालों का बस यही आख़री निशाँ होगा"। शहीदों की समाधियाँ। पीपल के विशाल तने और शाखाओं के फैलाव से लगता है की यह बहुत पुराना पेड़ है और शायद 1857 में भी रहा होगा। कुछ गाँव वालों का कहना है की फाँसी यहीं दी गई थी न की मेरठ कलक्टरेट में 

गगोल तीर्थ

गगोल तीर्थ से जुड़ा तालाब 

तालाब के एक कोने में लगा हुआ सन 1895 का एक पत्थर। अर्थात गगोल तीर्थ 1895 से और कई दशक पहले का रहा होगा

पंजाब नैशनल बैंक की गगोल शाखा। बाँए हर्ष वर्धन, दाएँ बैंक के अधिकारी चमन लाल वर्मा और पीछे मकान मालकिन वर्मा जी का भी सहयोग लिया गया जानकारी इकट्ठा करने में

गगोल गाँव में आपका स्वागत है। गाँव में गुर्जरों का बाहुल्य है पर जाट, मुस्लिम और अन्य परिवार भी काफ़ी संख्या में हैं


गाँव में अभी भी टाँगे, झोटा बुग्गी का काफ़ी प्रचलन है पर साथ ही ट्रेक्टर और बड़ी गाड़ियाँ भी काफ़ी हैं


मौसम का मिज़ाज बिगड़ने से पहले भूसा समेटना ज़रूरी है




Saturday, 9 May 2015

1857 और मेरठ

दस मई 1857, रविवार मेरठ के फिरंगियों का विश्राम का दिन था। इनमें ज़्यादातर अंग्रेज़ कुछ पुर्तगाली कुछ डच और कुछ अन्य यूरोपियन थे। कुछ सदर में शॉपिंग कर रहे थे, कुछ चर्च में थे और कुछ घरों में। अचानक शोर शराबे के साथ काली पलटन के कुछ सिपाहियों और शहर निवासियों ने हमला बोल दिया। फिरंगियों के सँभलने से पहले उनमें बहुत से मार दिए गए और कुछ भाग गए। पूरे शहर और आसपास के गाँवों में विद्रोह फैल गया। शाम होते होते नारा बुलंद हो गया ' चलो दिल्ली'।

उन दिनों मेरठ छावनी में 2000 से ज्यादा अंग्रेज़ सिपाही और अफ़सरान थे जबकी लगभग 3000 लोकल यानी 'काली पलटन' के सिपाही थे। ये लोग तीसरी बंगाल लाइट कैविलरी में शामिल थे। कुछ महीनों पहले अंग्रेज़ों ने एनफील्ड नाम की एक नई राइफ़ल सिपाहियों में बाँटी थी जिसके कारतूस पर गाय और सूवर की चरबी लगी होती थी। राइफ़ल में कारतूस लोड करने के लिए मुँह से कारतूस का कवर हटाना पड़ता था। इसको ले कर पूरे देश की 'काली पलटन' में बड़ा रोष था। इस तथ्य को अनदेखा करते हुए हुए लेफ़्ट कर्नल कारमाइकेल स्मिथ ने 24 अप्रैल के दिन 90 सिपाहियों की टुकड़ी को इन्हीं कारतूसों का फ़ायरिंग अभ्यास करने का आदेश दिया। 

85 ने आदेश मानने से इंकार कर दिया और उनका कोर्ट मार्शल कर दिया गया। बग़ावत के आरोप में सरसरी तौर पर मुक़दमा चला और 74 को दस दस साल की क़ैद और 11 को जो कम उम्र के थे पाँच पाँच साल की बामशक्कत क़ैद की सज़ा दी गई। 

जेल भेजने से पहले सरे आम वर्दियाँ उतार ली गईं जबकी बाकी सेना देखती रही। नंगे बदन और हथकड़ियाँ पहना कर जुलूस की शक्ल में जेल ले जाया गया। रास्ते में क़ैदियों पर जनता की गालियों की बौछार पड़ी। अगले दिन याने दस मई रवीवार के दिन पूरे शहर में अशांति बढ़ गई और ग़ुस्सा फूट पड़ा। कोतवाल धन सिंह गुर्जर ने इन पच्चासी सिपाहियों को छोड़ दिया। बाकी क़ैदियों को जनता ने छुड़ा लिया और शोर शराबे के साथ अंग्रेज़ों पर हल्ला बोल दिया। बग़ावत का बिगुल बज गया। 

स्वतंत्रता संग्राम 1857 का स्मारक जो 1972 में बनाया गया। इस मीनार के पीछे एक कुँआ था जो प्याऊ का काम करता था। इससे कुछ क़दम दूर औघड़नाथ मंदिर या काली पलटन का मंदिर है। यही विद्रोह का अड्डा या उदगम स्थल बना

काली पलटन मंदिर (औघड़ नाथ मंदिर) का स्मारक मेरठ कैन्ट

मेरठ संग्रहालय में लगी एक पेंटिंग। फ़क़ीर जो चरबी लगे कारतूसों के ख़िलाफ़ सिपाहियों को समझा कर विद्रोह के लिए तैयार करते थे

स्वतंत्रता संग्राम का सुंदर चित्रण माल रोड-रुड़की रोड चौराहे पर, मेरठ कैंट

माल रोड पर ही एक और स्मारक। निचले लाल पत्थर पर उन पच्चासी लोगों के नाम हैं जिन्होंने संग्राम का श्रीगणेश किया

इन नामों से भी अनेकता में एकता झलकती है

मेरठ संग्रहालय में लगी एक पेंटिंग। क़ैदी जेल से भागने की तैयारी में

सदर थाने के पास एक स्मारक जहाँ से संग्राम शुरू हुआ

दस मई 2015 का औघड़ नाथ मंदिर परिसर


मेरठ से सम्बंधित निम्नलिखित दो लेख और भी हैं चाहें तो नजर डाल सकते हैं:

1. Meerut a short write-up

  ( http://jogharshwardhan.blogspot.com/2014/04/meerut-synopsys.html )  

2. मेरठ का एक गाँव गगोल, 1857 और दशहरा

 ( http://jogharshwardhan.blogspot.com/2015/04/1857_25.html )





Sunday, 3 May 2015

बजा होरन निकल फ़ौरन


Horn Please

महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश जारी कर के ट्रकों के पीछे Horn OK Please लिखने पर बैन लगा दिया है। और अगर लिखा पाया गया तो ₹ 500/- जुर्माना, परमिट रद्द और फ़िटनेस सर्टिफ़िकेट जारी नहीं होगा। बहुत बढ़िया फ़ैसला है। परिवहन विभाग का कहना है की Horn शब्द पढ़ कर होर्न बजाने की इच्छा जाग्रत हो जाती है ( जैसे # अगर दीवार पर लिखा हो की 'यहाँ मूतना मना है' वहीं लोगों को याद आ जाता है # या जहाँ लिखा हो की 'यहाँ कूड़ा फेंकना मना है' तो वहीं कूड़े का ढेर मिलेगा )। भोंपू या प्रेशर होरन ख़ास तौर पर ओवरटेक करते हुए ज़ोरों से लगातार बजाया जाता है कान फटने वाले हो जाते हैं।  पर यह बैन सफल तो तभी होगा जब सभी प्रदेशों में एक साथ लागू हो।


देश में ज़्यादातर वाहन चालकों को होर्न बजाने में बड़ा मजा आता है। इनमें छोटे वाहन भी शामिल हैं जिनके मालिक पुंगी, शहनाई या बाँसुरी बजाने का शौक़ रखते हैं। बड़ी बसों और बड़े ट्रकों के होर्न और भी ऊंची यानी ज़ोरदार आवाज वाले होते हैं। दिल्ली में तो सख़्ती होने के कारण प्रेशर होर्न कम बजाए जाते हैं परन्तु दिल्ली से बाहर निकलते ही तेज भोंपू सुनाई पड़ने लग जाते हैं। राजमार्गों पर धड़ल्ले से बजाए जा रहे हैं कोई रोकने वाला नहीं है। ज़्यादातर बसों और ट्रकों के पीछे भोंपू या होर्न के लिए नारे भी लिखे मिलेंगे। नमूने : 

बजा होरन निकल फौरन
होरन प्लीज,
आवाज दो,
Horn Please,
Awaz Do,
Blow Horn
Pukaro 

अब अगर ये शुरूआत हो ही गई है तो कुछ वर्षों में इन नारों का नाम इतिहास में ही मिलने वाला है। वैसे तो शोर मचाने के कारण और भी हैं मसलन दूल्हा, दोस्तों यारों का डाँस और बैंड बाजे के साथ सड़क पर जुलूस, पार्टी में रात बारह एक बजे तक जोरदार डी जे, और शोर मचाने वाली धार्मिक शोभा यात्रा वग़ैरा। बस ज़रा थाम्बा ! इन पर भी रोक लगाई जाए। 

होर्न प्लीज़ 
बजा होरन निकल फ़ौरन 



Saturday, 2 May 2015

सड़क किनारे

भारत के किसी भी राजमार्ग पर निकल जाइए हर दस बारह किमी पर कोई न कोई धार्मिक स्थान मिल जाएगा चाहे मंदिर हो, चर्च हो या गुरुद्वारा हो। सड़क से ज़्यादा दूर भी नहीं जाना पड़ता बल्कि सड़क किनारे ही दर्शन हो जाते हैं। हिन्दुस्तान में पीर, दरगाह, बाबा, सन्त, फ़क़ीर और गुरूओं की भी कमी नहीं है। इन धार्मिक स्थलों में पैसे, सोना, चाँदी, हीरे, जवाहरात की गिनती नहीं है न ही कोई क़ानून है जिसके अंतर्गत सालाना आडिट होता हो। पैसा होने के कारण इनमें धूर्त, तिकड़मी और गुमराह करने वालों की भी कमी नहीं है। और इसलिए यहाँ काले धन की गुंजाइश भी बनी रहती है। 

एक बार अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन  Mark Twain भारत आए। जनवरी से अप्रेल 1896 तक भारत और श्रीलंका का दौरा किया और अन्य बातों के अलावा ये भी लिखा : In religion, all other countries are paupers. India is the only millionaire. मार्क ट्वेन  का मतलब केवल पैसा न होकर आध्यात्मिक पूँजी रहा होगा क्यूँकि उसकी भी यहाँ कमी नहीं है। वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, गीता, त्रिपिटक और अन्य ग्रंथों में अध्यात्म दर्शन भरा पड़ा है। और भी सुंदर बात है कि इनमें विविधता और अनेकता भी है। इनमें चार्वाक जैसे विचारक का भी ज़िक्र है जिसके अनुसार भगवान का कोई अस्तित्व ही नहीं है। 

पर अध्यात्म या भगवान की चर्चा बहुत लम्बी, जटिल है और शायद अंतहीन है। यहां तो केवल भारत की विविधता जो राह चलते धार्मिक स्थलों में नजर आती है उसी का ज़िक्र है। दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान चलते चलाते ली गई कुछ तसवीरें प्रस्तुत हैं :


बैंगलोर से पोंडीचेरी की ओर जाते हुए - थिरूवन्नामलाई मंदिर

बेकल फ़ोर्ट केरल की ओर जाते हुए सड़क किनारे एक मंदिर 


बैंगलोर - पोंडीचेरी राजमार्ग पर एक मस्जिद

मैंगलोर - बैंगलोर रोड पर नैलाडी के पास एक चर्च