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Sunday, 20 December 2015

पहला पैकेज

आजकल तनख्वाह की चर्चा कम होती है और उसकी जगह पैकेज आ गए हैं. तनख़्वाह या पगार प्रति महीने होती है जबके पैकेज सालाना. जैसे 7 लाख का पैकेज, 15 लाख का पैकेज वगैरा. बीच बीच में कोई खबर आ जाती है की फलां-फलां को एक करोड़ का पैकेज किसी फ़िरंगी कम्पनी ने दिया. पिछले महीने ही दिल्ली के चेतन कक्कड़ को गूगल ने सालाना 1.25 करोड़ का पैकेज ऑफर किया है. वैसे चेतन की फ़िलहाल पढ़ाई चल रही है और 2016 में ख़तम होनी है.

पैकेज तो साहब हमारा भी तय हुआ था अलबत्ता उसके 12 टुकड़े कर के हमें महीने की तनख़्वाह के रूप में एक टुकड़ा पकड़ा दिया गया था : पूरे 362 रूपये और 50 पैसे. जीवन बीमा होता नहीं था, यातायात / यात्रा का भत्ता मिलता नहीं था इसलिए सन 1972 के पैकेज का पता लगाना आसान था > 362.50 x 12 = 4350.00 सालाना. तो 4350 रुप्पली में सारा साल ऐश करो ! गूगल वूगल तो तब पैदा भी नहीं हुए थे.

करोड़ के पैकेज किसी को मिले तो अखबार में छपना ही था. पर हमारे सन 1972 के पैकेज की भी कम चर्चा नहीं हुई साहब. पूरे गाँव कसेरू खेड़े में खबर फ़ैल गई थी की लड़का बैंक में लग गया है. प्रसिद्ध पत्रकारों की तरह गाँव वालों ने इंटरव्यू लिए और टिपण्णी भी की :
'बड़ा हुसिय्यार छोरा है जी यो',
'हम तो लड्डू खावेंगे जी लड्डू',
'साबास बेटा माँ बाप का नाम रोसन कर दिया तैने',
'बस इब सादी कर दो लौंडे की'
'बेटा माँ बाप के आसिर्वाद से मिली है नौकरी इनकी सेवा करता रहियो'.

इन पैकेजों में कहीं तो बोनस शामिल होता है और कहीं लिखा होता है की साल बाद में देखा जाएगा. हमारे सन 1972 के पैकेज में ऐसा कुछ नहीं था पर हाँ ओवरटाइम की सुविधा थी. पर वो भी तब जब आपका प्रोबेशन पूरा हो जाएगा याने आप पक्के हो जाओगे तब. जब छे महीने के बाद पक्के हो गए तो सातवें महीने में ओवरटाइम मिला लगभग 20 रुपये. क्या मस्त रकम थी इंडियन कॉफ़ी हाउस, कनाट प्लेस में अड्डा जमाने के काम आती थी. कॉफ़ी और सैंडविच या कॉफ़ी और सांभर वड़ा का बिल 5 रुपये के नीचे नीचे निपट जाता था. टिप देने का कोई मतलब नहीं होता था. इसलिए तीन चार सिटिंग आराम से हो जाती थी.

अब पैकेज देने वाला कहता है की इतने पैसे दूंगा बोल इतना काम करेगा ? ठीक है तो चल शुरू हो जा. ठीक वैसे ही लेने वाले की पसंद नापसंद भी अब चलने लगी है. पैसा लेने वाला भी कह सकता है की मेरी पगार बढ़ाते हो या मैं छोड़ूँ ? हमारे पंगे कुछ और ही थे. सभी बैंक वाले क्लर्कों की एक सी तनख्वाह होगी और तनख्वाह बढ़ेगी तो सबकी बढ़ेगी. और नहीं बढ़ाओगे तो सभी क्लर्क हड़ताल करेंगे. और हड़ताल हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. और हड़ताल में नारे लगाना हमारा अधिकार है :
'तन्खा में बढ़ोतरी - करनी होगी करनी होगी',
'वर्ना बैंक में क्या होगा - हड़ताल होगी हड़ताल होगी',
'इस हड़ताल का जिम्मेवार कौन - ये निक्कम्मी सरकार',
'जब हम ना बैंक खोलेंगे - बैंक में उल्लू बोलेंगे'.

हमारे पैकेज तो इस तरह समाजवादी जमाने में हड़ताल कर के बढ़ते थे. ज़माना समाजवाद का हो या पूँजीवाद का पैकेज देने वाला कंजूसी दिखाता ही है. शायद ही किसी देसी कंपनी ने किसी नए रंगरूट को एक करोड़ का पैकेज दिया हो. जब समाजवाद था तो हम समाजवादी ना हुए और जब पूँजीवाद आया तो हम पूंजीवादी न हुए. यहाँ तो खिचड़ी पैकेज ही मिलते थे और मिलते रहेंगे.

फिरंगी किरकिट का देसी पैकेज


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