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Thursday, 8 October 2015

अपना श्राद्ध

श्राद्ध आते ही कई तरह के विधि विधान लागू हो जाते हैं. फलां दिन पूजा है, फलां दिन ब्राह्मण भोज करवाना है, नॉन-वेज नहीं खाना है, दारु नहीं पीनी है, अंडा भी बंद है, बाल नहीं कटवाना है वगैरा. पूरा कर्फ़्यू लग जाता है साहब. परन्तु घरेलू खाने पीने में काफी पकवान भी शामिल हो जाते हैं. रसोई से तरह तरह की सुगंध आने लगती है जो मन को बहुत भाती है.

बैठे बैठे यूँ ही ख्याल आया की जो भी अनुष्ठान इन दिनों में करते हैं क्या वो पितरों तक पहुँच जाता है? वायरलेस या ब्लूटूथ या किसी जादू के सहारे कैसे जाता होगा ? भौतिक रूप में तो हलुआ पूड़ी जाना मुश्किल है. और पंडित जी भी कितने ही परिवारों में जीमते हैं कहाँ तक पितरों के नाम धाम याद रख पाते होंगे? फिर भोजन में गाय, कुत्ता और कौवे का भी तो शेयर अलग रखना है. पता नहीं ये लोग कैसे आगे खबर पहुंचाते होंगे कि श्रद्धांजलि प्राप्त हो गई है?

इस मौके पर कबीर दास जी की एक कहानी याद आ गई. एक दिन रामानंद जी ने कबीर दास जी को कहा की वे दूध ले आएं ताकि श्राद्ध में पितरों के लिए खीर बनाई जा सके. कबीर दास जी ने बर्तन लिया और निकल पड़े. बहुत देर तक वापिस नहीं आये तो रामानंद जी उन्हें खोजना शुरू किया. देखा तो कबीर दास जी एक मरी हुई गाय के पास बर्तन लेकर बैठे हैं. रामानंद जी ने पुछा ये क्या है? कबीर दास जी ने उत्तर दिया की गाय घास खाएगी उसके बाद ही तो दूध देगी. रामानंद जी ने कहा गाय तो मर चुकी है वो अब घास नहीं खाएगी. कबीर दास जी ने जवाब दिया की आज की मरी हुई गाय घास नहीं खा सकती तो फिर बीसियों साल पहले मरे हुए पितर खीर कैसे खा लेंगे?

इसी तरह की एक कहानी है गुरु नानक देव जी की. वे हरद्वार पहुंचे तो देखा लोग सूरज की तरफ देख कर जल चढ़ रहे हैं. पूछने पर जवाब मिला की वे अपने पितरों को जल अर्पण कर रहे हैं. गुरु नानक देव जी ने पश्चिम की ओर मुंह करके लोटे से जल चढ़ाना शुरू कर दिया. उनसे पुछा गया की ऐसा क्यूँ कर रहे हैं. तो बाबा जी ने जवाब दिया की अपने खेतों को पानी दे रहा हूँ. तुम अपने पितरों को दूसरी दुनिया में जल चढ़ा रहे हो तो मैं इसी धरती पर अपने खेतों में जल नहीं भेज सकता?

कबीर दास जी और गुरु नानक देव जी के विचार और उन विचारों के पीछे के भावार्थ पर गौर करने की जरूरत है.

फिर मन में ये भी विचार आया की हम भी किसी दिन पितर बन जाएंगे. ऊपर बैठ कर देखेंगे की हलवा बन रहा है या खीर? हम स्वर्ग से धरती वाले घर के ड्राइंग रूम को देख पाएँगे? ये सोच कर मामला श्रीमतीजी से डिस्कस किया. जैसे हमें श्राद्ध के नियम क़ानून पालन करने में अटपटे लग रहे हैं ऐसे हमारे जाने के बाद हमारे बच्चों को भी मुश्किल लगेंगे. तो क्यूँ न हम बच्चों को इस बंधन से मुक्त कर दें? हमारे जाने के बाद जैसा ठीक समझें वैसा कर लें हमें कोई एतराज नहीं होगा. हम जहां भी होंगे आशीर्वाद भेजते रहेंगे. हमारे ना होने पर बच्चे नाहक क्यूँ परेशान हों ?

इस सहमती के बाद श्रीमतीजी ने एक चित्र बनाया. अगर हम ऊपर से देखेंगे तो धरती के ड्राइंग रूम में हमारी फोटो पर इस तरह से हार टंगा होगा :

हम स्वर्गवासी हुए 


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