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Saturday, 5 September 2015

मेरा साहब तेरा साहब

तेजबीर सिंह उर्फ़ तेजू ड्राईवर और रमेश महतो ड्राईवर चाय की चुस्कियां लेते लेते बतिया रहे थे. तेजू हमारे रीजनल मेनेजर गोयल साब का ड्राईवर हैऔर महतो हेड ऑफिस दिल्ली के बड़े साब गुप्ता जी की गाड़ी चलाता है. बड़े साब आज झुमरी तलैय्या रीजन के प्रबंधकों को भाषण देने आये हैं. गुप्ता जी तनख्वाह बढ़ाने की बात तो नहीं करेंगे पर बिज़नस बढ़ाने पर बहुत जोर देंगे. खैर अपन तो ड्राईवर तेजू और महतो की बात कर रहे थे.

आम तौर पर यही होता है की तू भी ड्राईवर मैं भी ड्राईवर इसलिए हमारी दोस्ती भी बराबर की. पर यहाँ तो तेजू छोटे साब का ड्राईवर है और महतो बड़े साब का तो बराबरी की दोस्ती कैसे चलेगी. महतो छोटे साब के ड्राईवर को हिकारत से देखता है 'पिछाड़ी हो जा छोटू'. पर तेजू भी कम नहीं है 'म्हारे ते बड़े बोल न बोलियो'. वैसे भी दो ड्राईवर मिलते हैं तो अपनी बात कम और साहब मेमसाब लोगों की बात ज्यादा करते हैं क्यूँ?

महतो ने खैनी की पिचकारी फेंकी.
- भइय्या हमारे साब तो टूरिंग बहुत करते हैं इसलिए जो है ओभर टाइम का मजा है. खाना पीना भी फिरी हो जाता है तनिक रुपिया बचता है.
- म्हारा साब तो सुसरा कहीं न जावे झुमरी तलैय्या छोड़ के. म्हारा तो ओवर टाइम न बणता भाई.
- हमें तो भइय्या साब का टूरिंग का इंतजाम भी तो करना पड़ता है. अटैची हम खुदै तैयार करते हैं. पैंट कमीच से लेकर कच्छा बनियन और बुरुश तक सब लगा के सेट कर देते हैं.
- हैं? ए महतो तू साब की लुगाई है के?
- अरे मजाक न करो भइय्या. मेमसाब नहीं ना करती हैं सब तैयारी हमी करते हैं.
- बोतल बातल भी तो मिलती होगी महतो ?
- ना तो हम पीते ना साब फिर कहाँ से बोतल मिलेगी भइय्या ?
- म्हारी ये मौज तो है महतो. शाम को साब को तो चहिये ही चहिये. साब के साथ अपणा भी काम चल जाता है. पर मेमसाब नराज हो जाती है. पिछले मंगल एकादशी भी थी पर साब तो महफ़िल में बैठ गए. रात 11 बजे घर पहुंचे तो मेमसाब ने गेट पे ही साब की क्लास लगा दी
- ना दिन देखते हो ना वार बस पीनी जरूर है. बेवड़े बन गए हो बेवड़े.
साथ में म्हारे को भी ऐसी डांट मारी दी कि बस म्हारा भी धुआं काढ दिया. पर के करें यो बोतल चीज भी तो ऐसी है की सुसरी पीछा न छोडे !
- ये सब पीना पिलाना हमारे यहाँ नहीं ना चलता है. हमारी मेमसाब तो मंदिर बहुत जाती हैं. कोई बताएगा के फलाने गाँव फलाने शहर में मंदिर है तुरंतै गाड़ी के लिए आवाज लगेगी. पिछले सन्डे गए थे बड़े शिवालय. पहुंच के मालुम हुआ की साहब चढ़ावे का रूपया तो लाये नहीं भूल गए. मेमसाब नाराज हो गईं. अब मेमसाब तो मंदिर में बैठी रहीं और साहब मंदिर से बाहर आये. मोबाइल तो गाड़ी में ही छोड़ गए थे. नंबर लगाए, बात किये और बोले
- जाओ महतो जरा फलां फैक्ट्री में जल्दी जाओ और जैन साहब से मेरी नमस्ते कहना.
हम तुरंतै गए जैन साब की फैक्ट्री में और लिफाफा ला कर दे दिए.
- महतो कितने थे लिफाफे में ?
- अरे हमसे क्या पूछते हैं? हम थोड़े ही खोले थे. मोटा लिफाफा था बस.

- चलो लंच कर लो. साहब लोग खा चुके.

खाना तैयार है 

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