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Wednesday, 26 August 2015

धरम का काज

हमारे बैंक का एक पुराना खातेदार था नफे सिंह. यदा कदा बैंक में आता रहता था. कई बार केबिन के बाहर चुपचाप खड़ा रहता और तभी अंदर आता जब मैं फ्री हो जाता. चाहे उमर 60 - 65 की होगी पर कुछ शर्माता कुछ झिझकता हुआ सा बात करता था. पढ़ा लिखा नहीं था शायद इसलिए या कुछ स्वभाव भी ऐसा ही था.

वैसे तो गाँव की ब्रांच में ज्यादातर लोग नफे सिंह की तरह ही आते हैं याने अनपढ़ या कम पढ़े लिखे. इसलिए काम धीमी गति से चलता है. पास बुक की एंट्री भी समझानी पड़ती है. नफे सिंह भी अपनी पास बुक ले कर कुछ समझना चाहता था. बहुत आराम और धीरज के साथ उसे बताया. जब से उसे जमीन का मोटा कंपनसेशन मिला है उसकी गिनती अब वीआई पी ग्राहकों में होती है और इसलिए उसका ख़याल रखना जरूरी था.

नफे सिंह छे फुटा पर पतली काठी वाला था. खेतों में काम करते करते हाथ भरी और खुरदरे हो गए थे. सिर पर बड़ा साफ़ा, कानों में सोने की मुर्कियाँ और सफ़ेद मूछें जो ऊपर से नीची की ओर जा कर फिर ऊपर जा रहीं थीं. मुझे तो उसके चेहरे का मुख्य आकर्षण उसकी बिल्ली जैसी आँखें लगती थीं. पता नहीं  राजस्थान की इस दूर दराज गाँव में यह यूरोपियन कहाँ से आ टपका! सफ़ेद आधी बाजू की कुर्ती और घुटनों से ऊपर धोती और चमड़े के भारी से जूते. बातचीत में पता लगा कि उसकी चार बेटियां थी जिनकी शादियां भी हो चुकी थी. बल्कि उनके भी बाल बच्चे थे. पहली घरवाली गुजरने के बाद बुढ़ापे में दूसरी घरवाली भी ले आया था.
- मनीजर साब रोटी टिक्कड़ तो चल गयो बस छोरा न दियो ठाकर जी ने.

इस बात का नफे सिंह को बड़ा अफ़सोस रहता था की उसका बेटा न हुआ. अपनी जमीन अब किसे देगा यह अहम् सवाल था उसके लिए. कुछ जमीन सरकार ने सड़क बनाने के लिए ले ली थी जिसका अच्छा खासा कंपनसेशन मिला था. काफी कुछ लड़कियों में बाँट दिया था पर बचा हुआ किसको दूं? बेटा होता तो अच्छा था. मरने के बाद अग्नि कौन देगा यह सवाल भी उसकी नींद में कभी कभी खलल डाल देता था. उसे समझाने की कोशिश बेकार चली जाती थी.

एक दिन बड़े साफ़ सुथरे कपड़ों में बैंक में आया. हाथ जोड़ कर रविवार को घर आने का न्योता दिया.
- मनीजर साब म्हारा धरम का काज है जी.
रविवार फुर्सत का दिन था. चूँकि मैं अकेला ही रहता था तो सोचा आज खाना भी नहीं बनाना पड़ेगा. मोटर साइकिल पर किक मारी और दावत खाने नफे सिंह के घर पहुँच गए. काफी चहल पहल थी नफे सिंह के घर पर. लाउड स्पीकर पर फ़िल्मी गाने बज रहे थे. झंडों और झंडियों से सजावट की हुई थी. आम के पत्तों की झालरें दरवाजों खिडकियों पर टंगी हुईं थीं. एक शामियाने के नीचे हलवाई व्यस्त था. दुसरे में कुछ लोग गुड़गुड़ी का मजा ले रहे थे और बच्चों का शोर भरा डांस चल रहा था.

नफे सिंह ने बड़ी गर्म जोशी से स्वागत किया और फोटो भी खिंचवाई. मेरे पूछने पर की यह सब किस लिए हो रहा है वह मुझे एक 'पढ़े लिखे' बन्दे के पास ले गया. बन्दे ने बताया की नफे सिंह इस चिंता में रहता था मरने के बाद बेटा अग्नि नहीं देगा और उसकी आत्मा भटकती रहेगी. चार बेटियां और चार जमाई राजा भी हैं पर ये कम उनका नहीं है. भाई भतीजों पे भी उम्मीद नहीं रखी थी. पंडित जी ने सुझाव दिया था कि मरने के बाद की सारी कारवाई अपने रहते रहते नफे सिंह खुद करवा ले. सो आज वही धरम का काज उसने अपनी आँखों के सामने करवा लिया है. अब मरने के बाद उसकी आत्मा भूतों में शामिल नहीं होगी बल्कि पितरों और पूर्वजों में मिल जाएगी.

इसलिए अब नफे सिंह संतुष्ट है.

चलो गाँव की ओर


   
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