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Tuesday, 14 July 2015

प्रमोशन की पुड़िया

परसों रविवार था और घर से शाम 4 बजे गाड़ी लेकर निकले. फ्लाईओवर पर चढ़ तो गए नीचे उतरते ही जाम में जा फँसे. आगे भी गाड़ियाँ और पीछे भी गाड़ियाँ जो इस बात की निशानी थी की देश का जी डी पी बढ़ रहा है. बूंदा बंदी की वजह से ज्यादातर गाड़ियों की खिड़कियाँ बंद थीं लोग गाने सुन रहे थे बतिया रहे थे और दो चार मिनट के अंतर पर जरा जरा सा आगे खिसक रहे थे. तीन किमी चलने में पूरे 35 मिनट लग गए. ये दिल्ली का मानसूनी जाम था.

इसी मानसूनी जाम में रेंगते हुए आगे बढ़ रहे थे की एक ऑटो के पीछे लगे पोस्टर पर नज़र पड़ी. 'बॉस से परेशान?' पोस्टर ने कमबख्त बॉस याने कमबख्त रीजनल मैनेजर की याद दिला दी जो न खुद खुश हुआ न हमें होने दिया. और तब ये पोस्टर भी नज़र नहीं आया की कमबख्त रीजनल मैनेजर को खुश करने की पुड़िया ले लेते.

बात तो पुराने ज़माने की है जब अपन झुमरी तलैय्या के ब्रांच मैनेजर हुआ करते थे और तब गोयल साब अपने रीजनल मैनेजर हुआ करते थे. आपको उनका परिचय दे दूं - साँवला रंग, सुनहरे फ्रेम का चश्मा, बियर पी पी के मटके सा मोटा हुआ पेट और गंजा सिर. पर सिर के तीन ओर बालों की एक झालर थी जिसे कभी कभी काले रंग से रंग देते थे. दिन में सात आठ बार छोटी सी कंघी से झालर को सेट कर लेते थे. पचपन साल की उमर थी पार्टी वार्टी के शौक़ीन थे और हम जैसे मैनेजरों से उम्मीद रखते थे की हम शनिवार शाम या फिर इतवार शाम पार्टी में बुलाया करें. हमें ये लगता था की इस कमबख्त गंजे बॉस से थोड़ा दूर ही रहें और बस यही दूरी मार गई.

मैनेजर से चीफ मेनेजर की प्रमोशन का इंटरव्यू आ गया था. खूब पढाई की बैंक के सर्कुलर रट मारे, ब्रांच के बजट पूरे किए और गंजे बॉस के सारे सवालों के जवाब भी दे दिए. पर लिस्ट निकली तो नाम गायब. खैर कुछ समय गुज़रा तो गंजे बॉस की ट्रान्सफर हो गई. नए बॉस आ गए. पर बैंक की कार पर ड्यूटी बजाने वाला ड्राईवर पुराना ही था. एक दिन मिला तो बोला:
- सर इस बार आप रह गए इंटरव्यू में?
- अरे यार अगली बार हो जायेगा.
- थोड़ी सी कमी रह गई सर.
- कमी?
- सर आप साब और मेमसाब का जन्मदिन ढंग से नहीं मनाते थे.
- अरे यार सुबह सुबह गुलदस्ते तो भेज देता था और क्या करता?
- अरे सर गुलदस्ते के साथ सोने की चेन भी तो देनी थी जैसे औरों ने दी थी. वे तो निकल गए आप ही रह गए.

कम्बखत प्रमोशन की पुड़िया का राज़ देर से खुला.

बॉस से परेशान?



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