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Thursday, 25 June 2015

सब्जी वाला

सब्जी वाले से मोल तोल करना अपने बस की बात नहीं है पर कभी कभार तो लेनी पड़ती है. ये काम श्रीमती बेहतर जानती हैं. सब्जी खरीदने का भी एक मजेदार इतिहास है. बहुत पुराने समय की बात है एक दिन श्रीमती ने कहा की आज बटर चिकेन घर में ही बनेगा और तो सब चीज़ें मौजूद हैं पर लहसुन और प्याज की कमी है जाओ ले आओ. चले गए बाज़ार और सौ ग्राम प्याज और एक किलो लहसुन ले आए ! अरे साहब बेभाव की पड़ी और तब से सब्जी मंडी का रास्ता बंद हो गया. 

खैर कभी कभी तो सब्जी ले लेनी चाहिए कोई हर्ज नहीं है. और आज ऐसा ही मौका आ गया. सब्जी वाले से थोड़ी सी वार्तालाप भी हुई :
- क्या नाम है आपका?
- जी सुभास.
- कब से ठेला लगा रहे हो?
- जी कई साल हो लिए अब तो. थोड़े टैम फैक्ट्री में काम किया पर हिसाब नहीं बैठा जी. 
- कितने की सब्जी डालते हो रोज?
- जी नूं समझो की ढाई की कभी साढ़े तीन की कभी चार की.
- अपने पैसे की या उधारी?
- ना जी उधारी न लेता. उधारी में कुछ बचत ना ए जी. 
- तीन सौ चार सौ तो बचते होंगे डेली?
- नूं है जी की दस बारह हजार महीने के हैं जी. दो तीन दिन छुट्टी भी होजा महीने में.
- बच्चे ?
- चार हैं जी. बड़ी वाली 13-14 की है जी छोटा 6 का है जी. 
- स्कूल जाते हैं?
- हाँ जी चारों ही जावें.
- आपकी मैडम भी कुछ कम करती है?
- न जी वो घर में ही रहवे.
- हाथ तंग हो जाता होगा कभी कभी?
- बस जी चल रा ए जी.
- आपकी फ़ोटो खींच लूँ?
- ले लो जी.

पूरी बात श्रीमती को बताई और काफी देर सब्जी वाले पर चर्चा हुई क्यूंकि हम दोनों ही पेंशनर हैं और समय काफी है. कुछ सवाल उभरे जिनके जवाब पता नहीं.
सुभाष सब्जी वाला कब रिटायर होगा - पता नहीं.
बच्चों की शादियाँ कैसे करेगा - पता नहीं.
परिवार में मेडिकल इमरजेंसी आने पर क्या करेगा - पता नहीं.
पर सुभाष सब्जी वाले की मुस्कराहट देख कर लगता है की सब ठीक हो जायेगा.

सुभाष सब्जी वाला 




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