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Tuesday, 19 May 2015

मेरठ का एक गाँव गगोल, 1857 और दशहरा

मेरठ शहर के दक्षिण में लगभग बीस किमी दूर है गगोल गाँव। गाँव की कुछ ज़मीन प्रस्तावित मेरठ एअरपोर्ट में चली जानी है और स्थानीय लोग मुआवज़े के मोटे मोटे चेकों की इंतज़ार में हैं !  गाँव बड़ा और सम्पन्न नजर आता है। दो बैंक हैं, मोबाइल सिगनल टावर है, बड़े मकान व बड़ी गाड़ियाँ काफ़ी संख्या में हैं परन्तु स्वच्छता की कमी है। खुली नालियाँ, टूटी सड़कें और लाल ईंटों की टेढ़ी मेढ़ी गलियाँ आपका स्वागत करती हैं। पर उत्तर प्रदेश के ज़्यादातर गांवों से बेहतर है। गाँव में ज़्यादातर गुर्जर हैं और उनके अलावा जाट, मुस्लिम और अन्य परिवार भी हैं। फ़ौज और खेती रोज़गार के मुख्य साधन हैं। कॉलेज या कोई बड़ा अस्पताल नहीं है। 

गगोल गाँव का एक ऐतिहासिक महत्व है। यहाँ के लोगों ने 1857 के 'विद्रोह' में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। गगोल, लिसाडी, मुरादनगर और नूरनगर के क्रांतिकारियों ने झंडा सिंह उर्फ़ झंडू दादा के नेत्रत्व में में गाँव के नज़दीक एक अंग्रेज़ी कैम्प को नेस्तानाबूद दिया। अंग्रेज़ों ने पलटवार की तैयारी की और मेरठ शहर के कोतवाल बिशन सिंह को गाइड नियुक्त किया। बिशन सिंह का भाई राजा तुलाराव रिवाड़ी का क्रांतिकारी नेता था। बिशन सिंह भी क्रांति से प्रभावित थे और फौरन हमले की ख़बर किसी तरह गाँव तक भिजवा दी। कोतवाल बिशन सिंह ने अंग्रेज़ी टुकड़ी को जानबूझ कर देर करवा दी। अंग्रेज़ों ने तीन जून 1857 के दिन गगोल और आसपास के गाँवों पर हमला बोल दिया पर लोग तब तक भाग चुके थे। गाँवों को तहस नहस कर के आग लगा दी गई। कोतवाल बिशन सिंह हरियाणा की ओर भाग निकले। बाद में वहाँ नारनौल में अंग्रेज़ों के हाथ मारे गए। इस घटना का वर्णन मेरठ गजट में यूँ लिखा गया :

" 174 Meerut Dietrict.
Carabineers had gone out with the Collector to punish the villages of Gagaul^ Sisari and Muradnagar to the south ofMeerut, for having stopped communications along the Agra road. The Wllages were surrounded and burnt, but all the inhabitant? had escaped owing to the treachery of Bishan Singh, the kotwal of Meerut, who subsequently joined the rebels, ^e "

कुछ दिनों बाद फिरंगियों ने गगोल पर फिर हमला किया और विद्रोह के अपराध में नौ लोगों को गिरफ़्तार कर लिया। इन पर बग़ावत का मुक़दमा चला और फाँसी की सजी सुना दी गई। 1857 में दशहरे वाले दिन इन्हें फाँसी पर लटका दिया गया। इनके नाम हैं : राम सहाय, घसीटा सिंह, रम्मन सिंह, हरजस सिंह, हिम्मत सिंह, कढेरा सिंह, शिब्बा सिंह बैरम और दरबा सिंह। 

गाँव के पास एक पीपल के नीचे इन लोगों की समाधियाँ बना दी गईं जहाँ हर दशहरे पर इन्हें श्रद्धांजली दी जाती है। और इसीलिए 1857 से अब तक गगोल गाँव में दशहरा नहीं मनाया जाता। इस रीत में केवल एक छूट दी जा रही है की अगर दशहरे वाले दिन कोई बच्चा पैदा होता है तो दशहरा मना लिया जाता है। सरकारी तौर पर गगोल को कोई अलग से दर्जा या सहूलियत नहीं मिली हुई है। एक अधूरा स्तम्भ दिखाया गया की सरकार कोई स्मारक बना रही है पर काम ठप्प पड़ा है। इस लेख के लिए कुछ जानकारी गांव के बुज़ुर्गों ने दी और कुछ इंटरनेट से ली गई। गाँव की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं :


"शहीदों की चिताओं पर हर बरस लगेंगे मेले, वतन पर मिटने वालों का बस यही आख़री निशाँ होगा"। शहीदों की समाधियाँ। पीपल के विशाल तने और शाखाओं के फैलाव से लगता है की यह बहुत पुराना पेड़ है और शायद 1857 में भी रहा होगा। कुछ गाँव वालों का कहना है की फाँसी यहीं दी गई थी न की मेरठ कलक्टरेट में 

गगोल तीर्थ

गगोल तीर्थ से जुड़ा तालाब 

तालाब के एक कोने में लगा हुआ सन 1895 का एक पत्थर। अर्थात गगोल तीर्थ 1895 से और कई दशक पहले का रहा होगा

पंजाब नैशनल बैंक की गगोल शाखा। बाँए हर्ष वर्धन, दाएँ बैंक के अधिकारी चमन लाल वर्मा और पीछे मकान मालकिन वर्मा जी का भी सहयोग लिया गया जानकारी इकट्ठा करने में

गगोल गाँव में आपका स्वागत है। गाँव में गुर्जरों का बाहुल्य है पर जाट, मुस्लिम और अन्य परिवार भी काफ़ी संख्या में हैं


गाँव में अभी भी टाँगे, झोटा बुग्गी का काफ़ी प्रचलन है पर साथ ही ट्रेक्टर और बड़ी गाड़ियाँ भी काफ़ी हैं


मौसम का मिज़ाज बिगड़ने से पहले भूसा समेटना ज़रूरी है




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