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Thursday, 14 August 2014

जुलाई का आख़री दिन

छोटे से क़स्बे अम्हेड़ा के रहने वाले मोहन सिंह अपने को बड़ा ठेकेदार मानते हैं जबकी रिटायर हो चुके हैं । और ख़ुद को ठेकेदार साब कहलाना पसंद करते हैं हालाँकि सरकारी विभाग उन्हें पैटी कॉंट्रेक्टर कहता था । अब तक ७५ जन्मदिन पार कर चुके हैं पर अभी भी सुबह धीरे धीरे भजन गाते गाते चाय बना लेते हैं और साथ में कभी डबलरोटी के दो पीस या बिसकुट या मुरमुरे ले लेते हैं । एक कारण ये भी है की ख़ुद तो पाँच बजे उठ जाते हैं जबकी दोनों बेटे, दोनों बहुएँ और उनके तीन बच्चे सात बजे से पहले नहीं उठते । 

ठेकेदार साब ख़ुद ग्राउंड फ़्लोर पर रहते हैं, बड़ा बेटा पहले माले पर और छोटा बेटा दूसरे माले पर रहता है । यह मकान भी ठेकेदार की अपनी मेहनत और बचत का फल है क्यूँकि दोनों बेटों ने इसमें कोई योगदान नहीं दिया । इन दोनों के भरोसे तो इस शहर में यह मकान कभी नहीं बन पाता । ठेकेदार साब को यदा कदा जब भी ग़ुस्सा आता है तो इस बात का ज़ोरदार व्याख्यान कर देते हैं । ऐसे ऊँचे दर्जे के व्याख्यान के बाद माहौल गरमा जाता है। दोनों बहुएँ कभी कभी पलटवार कर देती हैं या फिर पतियों से या फिर आपस में ही उलझ पड़ती हैं । पर पड़ोसी मज़ा लेते हैं । 

ये मकान ही नहीं जब ठेकेदार साब ने देखा की दोनों बेटे पढ़ेंगे नहीं तो दो दुकानों का भी बंदोबस्त कर िदया था । बड़े बेटे की दुकान बिजली के सामान की और छोटे की दुकान में घरेलू सामान है । दाल रोटी तो चल रही है पर ख़ैर बर्तन हों तो टकराते ही हैं । ठेकेदार साब की घरवाली गुजर गई है और पिछले तीन साल से स्वर्ग में निवास कर रही है । 

दो ढाई साल तक तो ठेकेदार साब ने ख़ुद ही रोटियाँ बेली, कभी दाल भात तो कभी खिचड़ी, कभी डबलरोटी, कभी फलाहार कर लिया । पर पिछले चार पाँच महीनों से स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा है । घुटने में काफ़ी ज़्यादा दर्द रहने लगा है और चश्में का नम्बर भी बढ़ गया है । खाना बनाने में काफ़ी दिक़्क़त आने लग गई थी । बहस मुबाहसे के बाद यह तय हुआ की सुबह का चाय नाश्ता तो ठेकेदार साब ख़ुद ही बना लेंगे । जून के महीने से दोपहर और रात का खाना बड़ी बहू के जिम्मे रहेगा और जुलाई महीना छोटी बहू के जिम्मे और इस तरह यह एक एक महीने का क्रम जारी रहेगा । 

आज जुलाई महीने का आख़री दिन था और ठेकेदार साब दोपहर की नींद ले रहे थे । नींद खुली तो देखा की तीन बज रहे थे । कुछ भूख भी महसूस हो रही थी । पर किचन में थाली नहीं थी । इधर उधर देखा थाली कहीं भी नज़र नहीं आई ।  सोचा कि देख गई होगी की अभी सो रहे हैं इसलिए शायद वापिस ले गई होगी । पर जब पाँच बजने को आए तो ठेकेदार साब ने आवाज़ लगाना शुरू कर दी :
- अरे थाली कहाँ है ?
- अरे कोई जवाब तो दो !
छह बजने तक तो ठेकेदार साब ने कोहराम मचा दिया पर छोटी बहू नहीं आई नीचे । सात बजे नीचे उतरी तो बड़ी बहू ने छोटी बहू से पूछा:
- अरे आज थाली नहीं देनी थी क्या? क्या हुआ? बेचारे भूखे बैठे हैं । 
- मुझ पर क्यूँ बरस रही हो, थाली तो तुमने देनी थी । 
- मैंने ? मैंने कैसे ? महीना खतम कहाँ हुआ ? आज तो जुलाई का आख़री दिन है ना ?
- वाह ! तेरे जून में तीस दिन और ३०-३० थालियाँ और मेरी जुलाई में ३१ दिन और ३१-३१ थालियाँ ? आज तो तेरा नम्बर था मेरा नहीं । 

बहुत कठिन है डगर पनघट की !



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