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Monday, 18 August 2014

सास का घर

जगत सिंह उर्फ़ जगतू एक ध्याड़ी मज़दूर है और ज़्यादातर खेत खलिहान में काम करता है । कभी कभी सफ़ेदी पेंटिंग भी करता है । मज़दूरी करते करते जगतू के हाथ पैर बड़े बड़े और सख़्त हो गए हैं । बीड़ी पीने और खाँसते रहने से गला भारी हो गया है । अपनी उम्र २४ साल बताता है पर लगता ३४ का है । अक्षर ज्ञान तो है पर ज़्यादा नहीं पढ़ा । पर है खुशदिल । काम करते करते भी कोई न कोई देसी राग गुनगुनाता रहता है । अगर पूछो की जगतू क्या गा रहा है तो हंस कर टाल देता है :
- बाबू सा म्हारे को न आता जी कुछ भी' । 

कई महीनों बाद दिवाली पर सफ़ेदी करने आया तो मैंने हाल पूछा । मुस्करा के बोला :
- म्हारा ब्या हो गया बाबू सा । 
- भई वाह जगतू बधाई हो । बहुरिया कैसी है ? ससुराल वाले कैसे हैं ?
- ससुर तो गुजर लिया जी कभी का बस सासू और एक साली है बाबू सा । 
- तू साली के नाम पर शर्मा रहा है जगतू । क्या चक्कर है ?
- वो तो कन्नी काट दे बाबू सा । 

जगतू की कन्नी कुछ यूँ कटी । 

शादी के बाद पहली बार जब जगतू ससुराल गया तो बस से उतर कर खेतों के बीच पगडंडियों से होता हुआ लगभग पाँच सात किमी का रास्ता पैदल चला । झोंपड़े के दरवज्जे पर सासू ने बहुत सारे आशीर्वाद देकर स्वागत किया, खटिया डाल दी, अंदर से दरी लाकर खटिया पर बिछाई और फिर बोली 'बिराजो सा' । जगतू हवाई चप्पल उतार कर खटिया पर चौकड़ी मार कर बिराजमान हो गया । सासू फिर अंदर गई और अलूमिनीयम के गिलास में पानी लाई । पानी पी चुका तो सास ने गिलास वापिस लिया और फिर अंदर गई । इस बार वो एक बीड़ी का बंडल और माचिस लाई और ज़मीन पर बैठ गई । जगतू और सासू ने बीड़ीयां सुलगाई और इतमीनान से बतियाने लगे । जगतू मन ही मन बोला - गजब हो गयो जगतू !

दोपहर को पालक बथुए का साग, दो मोटे प्याज़, हरी मिर्चें और चूल्हे में सिकी चार मोटी रोटियों का डट कर आनंद लिया और लंबी तान कर सो गया । रात का खाना भी जमाई राजा को खटिया पर परोसा गया जबकी सासू, साली और पत्नी तीनों नीचे बैठ कर जीम रहीं थीं । ख़ूब गपशप के साथ कैंडल नाइट डिनर सम्पन्न हुआ । रात पत्नी के सहवास में गुज़री और सुबह उठा तो मन प्रफुल्लित था । जीवन में कितनी मिठास थी । आनंद ही आनंद । जगतू के जीवन की सबसे सुहानी सुबह ! मुस्कुराते हुए जंगल पानी के लिए गया । और मुस्करा के नीम की दातून करने के बाद झोंपड़े में वापिस आया । मुस्कुराते हुए ही खड़िया मिट्टी के डले से अंदर की दीवार पर लिख दिया :

सास रो सुख का वास रो !

याने सास का घर तो बस सुख का घर है । सास तो न पढ़ सकी पर साली ने पढ़ लिया । उसका माथा ठनका और फ़ौरन जगतू की लाइन के नीचे जवाबी लाइन लिख दी की तू दो दिन का मेहमान है जीजू :

जदी दो दिन का आसरो !

दो दिन का आश्रय ? जगतू पढ़ कर भड़क गया कमबख़त ज़बान चलाती है तो ले अब नहीं जाता । धमकी भरी तीसरी लाइन लिख मारी :

रहूंगो तब लो, जब लो साँस रो !

साली तिलमिलाई की इस निकम्मे जीजू ने तो यहीं रहने की ठान ली है । ठोक कर लिख दी जवाबी लाइन :

दे दूँगी खुरपो खोदेगो घास रो !

जगतू ने पढ़ा, पोटली बाँधी और घर की राह ली । अगर खुरपा ही चलाना है और घास ही खोदनी है तो घर में ही खोदेंगे ना !

ससुराल की ओर !

पुनश्च - यह क़िस्सा कई बरस पहले आदरणीय सी पी स्वर्णकार जी ने आडीटरों की एक बैठक में सुनाया था । हालाँकि मैंने अपने ही ढंग से लिखा है । वे उन दिनों पंजाब नैशनल बैंक में डीजीएम थे और कुछ समय पहले सिंडीकेट बैंक के चेयरमैन पद से रिटायर हुए हैं । 

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