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Tuesday, 13 May 2014

खटिया खड़ी है

सच्ची बात तो ये है की अपन को खाना खाना तो अच्छा लगता है लेकिन खाना बनाना बिलकुल अच्छा नहीं लगता । और खाने में कमोबेश सभी चीज़ें पसंद हैं वेज भी और नोनवेज भी । वैसे कोई ऐसी चीज़ नहीं है कि जिस के बग़ैर खाना अधूरा रह जाता हो । न ही मैं कोई फ़रमाइश करता हूँ की आज फ़लाँ फ़लाँ चीज़ बनाई जाए । बहुत गरम चाय भी नहीं पीता और न ही बहुत ठंडी आईसक्रीम खाता हूँ । इस पर राम दुलारी की टिप्पणी कुछ इस तरह की होती है:

- तुम्हें तो स्वाद का पता ही नहीं चलता ।  तुम्हारे तो टेस्ट बड्स ही नहीं हैं ।

- कभी तो कुछ बोला करो की क्या खाना है और क्या नहीं । जो सामने रख िदया बस ठीक है । 

- नमक कम है या ज़्यादा ये तो बता सकते हो या नहीं ?

ऐसा नहीं है की मेरी जीभ को स्वाद का पता नहीं है । कुछ चीज़ें नापसंद भी हैं । जैसे की लौकी याने लुकिया, तोरी याने तुरई और टिंडे याने बेपसंदे । इन सब्ज़ियों पर डाक्टरों ने इतनी िसफारिशें चेप दीं हैं की इनको खाने की प्लेट में देखकर लगता है की कोई नर्स आस पास ही खड़ी है ।

वैसे तो कहावत है की दुनिया के सबसे बढ़िया खाना बनाने वाले लोग मर्द ही हैं न कि महिलाएँ । परन्तु इस तरह की कहावतों से मैं दूर ही हूँ । अरे भई जो भी बना हो जो सामने आ गया हो वो खा लो ज़्यादा मीन मेख क्या करना है । परन्तु मेरे कई दोस्त इस बात का मज़ाक़ भी उड़ाते हैं । उनके पास शहर के मशहूर रेस्तराँ, उनके ख़ास ख़ास मीनू और स्पेशल आईटम्स की लिस्ट तैयार रहती है । मसलन मटन समोसा इंडिया काफ़ी हाउस में शाम को मिलेगा, गरमा गरम छोले भटूरे खाने हों तो पहाड़ गंज चलो, क़ुल्फ़ी तो बस क़रोल बाग़ की ही खानी है, पराँठा खाने चाँदनी चौक की मेट्रो पकड़ो वग़ैरा ।

इस बात पर हमारे चोपड़ा जी की एक्सपर्ट कमेंटरी याद आ गई । रेस्तराँ में यार दोस्त बिरयानी का लुत्फ़ ले रहे थे तो चोपड़ा जी बोले: यार मीट आज कुछ अच्छी तरह गला नहीं है । लगता है की साले ने बुड्ढा बकरा काट दिया । 

ख़ैर, कभी कभी ख़ुद भी खाना बनाना पड़ ही जाता है । थोड़ा बहुत काम तो कर ही लेता हूँ गुज़ारे लायक मसलन चाय, आमलेट, दाल, रोटी । बस रोटियाँ गोल नहीं बन पाती ज़रा सा आड़ी ितरछी हो जाती हैं पर ख़ुद की बनी हों तो कोई शिकायत करे तो किससे करे ? 

पिछले दिनों राम दुलारी हमें हमारे हाल पर छोड़ कर आउट स्टेशन छुट्टी पर प्रस्थान कर गईं । फ्रिज में दो दिन का इंतज़ाम कर के रख गईं - गूँधा हुआ आटा, दाल और भिंडी की सब्ज़ी वग़ैरा । 

िडनर तो गरम ही करना था वो तो आराम से फ़िनिश हो गया । अब केवल दूध उबालना रह गया था । उसमें से एक गिलास पीने के लिए निकालना था और बस गुडनाईट । कल की कल देखी जाएगी । पोलीथिन के पैकेट खोले और एक लीटर दूध पतीले में डालकर गैस पर रख दिया । दूध उबलने में समय लगना था इस लिए टीवी के सामने बैठ गया । चुनाव समाचार देखते देखते दूध के बारे में भूल गया । दूध उबल कर गैस पर, काउन्टर पर और फ़र्श पर फैल गया । बस अपनी तो ज़मानत ज़ब्त हो गई । रात दस बजे खटिया खड़ी हो गई । 

सुबह का नाश्ता तैयार करना आसान लगता है और हो भी गया । दोपहर को सिर्फ़ दो चपातियाँ बनानी थी दाल और सब्ज़ी गरम करनी थी । सारा समान काउन्टर पर सेट कर दिया । चकला और बेलना निकाल लिया और गैस जला दी । गैस पर दाल गरम करने को रख दी । सूखे आटे का कटोरा भी निकाल लिया । दाल उम्मीद से पहले उबलने लगी । उस को बचाते बचाते सूखे आटे का कटोरा गिर पड़ा । आटा काउन्टर पर, कुछ पैंट पर, कुछ जूतों पर और बाक़ी फ़र्श पर बिखर गया ।

 खटिया फिर खड़ी हो गई । 




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