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Friday, 18 April 2014

चुनावी दावत

- आजा आजा बैठ मेरे यार ।  ले चाय ले । और के ख़बर है भई?

- लो कललो बात । थमने भी चाय पर चर्चा सुरू कर दी के?

- अरे ना यार ना । चर्चा तो आय पर करणी है की चाय पर । और खाय पे जो ख़र्चा बढ़ गयो वो? उसकी चर्चा न करोगे? आय बढ़ी ५% और ख़र्चा १०% । क्या कहो तम?

- अजी छोड़ो भी महँगाई ससुरी को । और २ - ४ िदन की छुट्टी मारो मौक़ा अच्छा है यो । चलो चुनाव प्रचार में चलते हैं । 

- उससे क्या होगा ?

- भई खाणा पीणा मुफ़्त में और करणा कराणा कुछ है नहीं । बस पर्चे बाँट िदयो या िफर नाम वाम भर िदयो सिलपों पर । और नहीं तो गाड़ी में घूम लेंगे ५ -४ नारे लगा देंगे । और झंडा ही तो िहलाणा है क्यों?

- मैं तो यार कभी गया नहीं िकसी पार्टी के दपतर न ही नारे लगाए कभी । 

- गया तो मैं भी नहीं पर ट्राई मारते हैं । अपणा क्या जा रा है?

- अरे यार न तो कोई कैंडीडेट जाणता न कोई पार्टी तो कैसै होगा ?

- अरे मेरी भी कभी सुण ले या अपनो रािगणी गाए जाओ तम?

- चल सुणा अपनी रािगणी । हल्ला ज़्यादा करे है तू । 

- देख यार सबके बारे में थोड़ी घणी जानकारी ईकटठी  करी है । मफ़लर वाले के यहाँ तो सूकी चाय है और उपर से चंदा और माँगेंगे सुसरे । 

- तो फेर क्या फ़ायदा हुआ जी ? यो तो मज़ा न आया । 

- तो सुण पप्पू के दफ़्तर में चलते हैं चाय, ठंडा, छोले भटूरे वग़ैरह ख़ूब हैं ऐसा बतावें हैं । शाम का भी जुगाड़ सुणा है पक्का है । 

- यो तो िफर भी कुछ ठीक सा लग रा । इसके अलावा भी कोई और है के?

-  अरे कई हैं मेरे यार तू तैयार तो हो । अपणा फेंकू है ना । उसके यहाँ बढ़ीया इंतज़ाम है परन्तु कुर्ता पजामा पहन लियो और ज़रा बोली ठीक से बोिलयो । बाक़ी शाम को न िमलती वहाँ पे। घर पर ले लियो । 

- टंगड़ी न िमलती कहीं ? ज़रा सा जी सा लग जा । क्यूँ ?

- जब देखो तब टंगड़ी थारी लार न थमती?

- इब छुट्टी भी लें और मज़ा सा भी न आवे तो क्या फ़ायदा ? बता । 

- देख एक मशाल वाला भी है वो करा सके टंगड़ी की फ़रमाइश पूरी । और एक यो है तलवार वाला वो भी करै है पूरी सेवा । पर्चे बाँटे जाओ चाय पाणी िलए जाओ हाथ के हाथ । क्या कहो?

- देखो जी छुट्टी की दरखास कल दे दूँगा दपतर में आगे तू समझ ले । और अगर मज़ा सा ना आया तो बस मेरे यार ढाई किलो के हाथ देख ले । छुपता िफरेगा गन्ने के खेतां में ।                                                                          


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